धन्वंतरि और अमृत कलश

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धन्वंतरि और अमृत कलश

सृष्टि के प्रारंभ काल में जब देव और दानव दोनों ही अपनी-अपनी शक्तियों को बढ़ाने के लिए लालायित थे, तब ब्रह्मांड के सबसे बड़े मंथन की आधारशिला रखी गई। क्षीर सागर के अनंत जल विस्तार में देवताओं के राजा इंद्र और असुरों के सम्राट बलि ने एक संधि की, जिसके अनुसार वे दोनों मिलकर समुद्र का मंथन करेंगे और जो भी दिव्य रत्न प्राप्त होंगे, उन्हें आपस में आधा-आधा बांट लेंगे।

इस महामंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को नेती के रूप में चुना गया। भगवान विष्णु ने स्वयं अपनी अनंत माया से कच्छप अवतार लेकर मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण किया ताकि वह पाताल में न धंस जाए।

देव और असुर दोनों ने मिलकर जब समुद्र को मथना शुरू किया, तो उसमें से एक के बाद एक चौदह दिव्य रत्न निकले। इन रत्नों में हलाहल विष, कामधेनु, उच्चैश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, अप्सरा रंभा, देवी लक्ष्मी, वारुणी और शंख जैसी चमत्कारी वस्तुएं शामिल थीं।

प्रत्येक रत्न के निकलते ही देवों और असुरों के बीच उसे पाने की होड़ मच जाती थी, लेकिन सबका मुख्य लक्ष्य केवल एक ही था—अमृत, जिसे पीकर वे अमर हो सकें। समुद्र की लहरें तीव्र गति से घूम रही थीं, और पूरा ब्रह्मांड उस महामंथन की गूंज से कांप रहा था।

जैसे-जैसे समुद्र मंथन अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा था, वैसे-वैसे दोनों पक्षों के बीच का तनाव और अधिक गहरा होता जा रहा था। असुरों के मन में पहले से ही यह शंका थी कि देवता उनके साथ छल कर सकते हैं, जबकि देवता असुरों की बढ़ती शक्ति से भयभीत थे।

तभी, समुद्र के गहरे नीले पानी के बीच से एक अत्यंत दिव्य और अलौकिक पुरुष प्रकट हुआ, जिनके चार हाथ थे और वे शंख, चक्र, जलूका और औषधियों से सुसज्जित थे। यह कोई और नहीं बल्कि आयुर्वेद के देवता और भगवान विष्णु के अंशावतार धन्वंतरि थे, जिनके हाथों में चमचमाता हुआ सोने का अमृत कलश था।

इस कलश में वह दिव्य तरल पदार्थ था, जिसकी एक बूंद ही किसी भी जीव को अमरता प्रदान कर सकती थी और उसे बुढ़ापे तथा मृत्यु के भय से सदा के लिए मुक्त कर सकती थी।

जैसे ही अमृत कलश धन्वंतरि के हाथों में दिखाई दिया, पूरे क्षीर सागर के तट पर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। दोनों पक्षों के योद्धा अपनी सुध-बुध खोकर केवल उस सोने के घड़े को देखने लगे, जिसकी चमक सूर्य के समान तेज थी।

अमृत कलश का प्राकट्य और असुरों का प्रहार
अमृत कलश को देखते ही असुरों के सब्र का बांध पूरी तरह से टूट गया और उनके मन में लालच की अग्नि धधक उठी। असुरों ने सोचा कि यदि देवताओं ने इस अमृत को पहले पी लिया, तो वे कभी भी स्वर्ग पर अपना अधिकार वापस नहीं पा सकेंगे और सदा के लिए देवताओं के दास बनकर रह जाएंगे।

इस विचार के आते ही असुरराज बलि के सेनापति और स्वरभानु नामक पराक्रमी असुर ने अपने सैनिकों को एक क्रूर आदेश दिया। पलक झपकते ही, सैकड़ों शक्तिशाली असुर धन्वंतरि की ओर लपके और इससे पहले कि देवता कुछ समझ पाते, असुरों ने धन्वंतरि के हाथों से बलपूर्वक वह दिव्य अमृत कलश छीन लिया।

असुरों की इस अचानक और हिंसक कार्रवाई से देवताओं के खेमे में हाहाकार मच गया और वे अपनी हार के डर से कांप उठे। धन्वंतरि शांत भाव से पीछे हट गए क्योंकि उनका कार्य केवल अमृत को प्रकट करना था, लेकिन देवताओं के लिए यह स्थिति अत्यंत आत्मघाती और भयानक सिद्ध होने वाली थी।

कलश को अपने कब्जे में लेते ही असुरों के बीच ही उसे पहले पीने को लेकर एक भयानक विवाद खड़ा हो गया। प्रत्येक असुर चिल्ला रहा था कि समुद्र मंथन में उसने सबसे अधिक परिश्रम किया है, इसलिए अमृत की पहली बूंद पर केवल उसी का अधिकार होना चाहिए।

असुरों की इस आपसी फूट और कोलाहल का लाभ उठाकर कुछ चतुर दानवों ने कलश को छिपाने और उसे लेकर भागने की योजना बनाई। स्वरभानु ने कलश को अपने मजबूत हाथों में कसकर पकड़ लिया और अपने सबसे भरोसेमंद असुर साथियों को इशारा किया कि वे इस कलश को सुरक्षित स्थान पर ले जाएं।

देवताओं ने जब देखा कि अमृत उनके हाथों से हमेशा के लिए जा रहा है, तो वे अत्यंत व्याकुल हो गए और उन्होंने अपनी तलवारें और धनुष संभाल लिए। इस प्रकार, क्षीर सागर का शांत तट अचानक एक भयंकर युद्धभूमि में बदलने लगा, जहाँ एक तरफ अमृत को बचाने की जिद्द थी और दूसरी तरफ उसे चुराने का कुटिल प्रयास।

स्वर्गलोक में खलबली और देवराज इंद्र की व्याकुलता
जब देवताओं ने देखा कि असुर अमृत कलश को लेकर भागने की तैयारी में हैं, तो देवराज इंद्र का सिंहासन डोलने लगा और उनके माथे पर चिंता की लकीरें गहरी हो गईं।

इंद्र भली-भांति जानते थे कि यदि असुरों ने अमृत की एक भी बूंद पी ली, तो तीन लोक में उनका आतंक इतना बढ़ जाएगा कि कोई भी शक्ति उन्हें परास्त नहीं कर पाएगी। इंद्र ने तुरंत अपने पुत्र जयंत को संकेत किया कि वह किसी भी कीमत पर असुरों का पीछा करे और उस कलश को वापस लेकर आए।

जयंत ने बिजली की गति से अपने रथ को आगे बढ़ाया और असुरों के मार्ग को रोकने का प्रयास किया, जिससे आकाश में ही एक भयानक हवाई युद्ध छिड़ गया। देवता और असुर आपस में भिड़ गए, और अस्त्र-शस्त्रों की टंकार से दसों दिशाएं गूंज उठीं, जिससे पृथ्वी पर भी प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई।

जयंत ने वीरतापूर्वक लड़ते हुए स्वरभानु पर प्रहार किया, जिसके कारण अमृत कलश उसके हाथ से छूटने लगा, लेकिन असुरों की विशाल संख्या के सामने जयंत अकेला पड़ रहा था।

असुरों ने जयंत को चारों तरफ से घेर लिया और उस पर तीखे बाणों की बौछार कर दी, जिससे विवश होकर जयंत को पीछे हटना पड़ा। इस बीच, असुरों की टोली कलश को लेकर आकाश मार्ग से अत्यंत तीव्र गति से भागने लगी ताकि वे पाताल लोक या किसी सुरक्षित गुफा में जाकर इसका चुपचाप पान कर सकें।

रास्ते में जब-जब देवताओं ने असुरों को रोकने का प्रयास किया, तब-तब दोनों पक्षों के बीच कलश को छीनने की छीना-झपटी हुई। इस भयंकर और तीव्र छीना-झपटी के दौरान, अमृत कलश से दिव्य अमृत की कुछ बूंदें छलक कर पृथ्वी के चार अत्यंत पवित्र स्थानों पर गिरीं।

ये स्थान थे—प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन, जहाँ आज भी उस दिव्य घटना की स्मृति में महाकुंभ मेले का भव्य आयोजन किया जाता है। इन स्थानों की भूमि अमृत की बूंदों के स्पर्श से सदा के लिए पवित्र और मोक्षदायिनी बन गई, लेकिन आकाश में असुरों की चोरी का प्रयास अभी भी थमा नहीं था और वे देवताओं को चकमा देकर लगातार आगे बढ़ रहे थे।

भगवान विष्णु की माया और मोहिनी का अवतरण

देवताओं की इस घोर पराजय और व्याकुलता को देखकर भगवान विष्णु अत्यंत द्रवित हो उठे और उन्होंने इस संकट से संसार को बचाने का निश्चय किया। विष्णु जानते थे कि असुरों को केवल शारीरिक बल से हराना असंभव है क्योंकि उनकी संख्या बहुत अधिक है और वे इस समय अत्यंत उन्माद में हैं, इसलिए यहाँ कूटनीति और माया का प्रयोग करना अनिवार्य था।

भगवान विष्णु ने अपनी परम मोहिनी माया का सृजन किया और एक अत्यंत सुंदर, लावण्यमयी और सम्मोहक स्त्री का रूप धारण किया, जिसे इतिहास में ‘मोहिनी’ के नाम से जाना गया। मोहिनी का सौंदर्य इतना अकल्पनीय और अलौकिक था कि जो भी उसे एक बार देख लेता, वह अपनी सुध-बुध खोकर केवल उसी को देखता रह जाता था।

मोहिनी के वस्त्रों की सरसराहट और उसकी पायल की मधुर झंकार से पूरा वातावरण एक जादुई सुगंध और शांति से भर गया। वह अत्यंत धीमी और आकर्षक चाल से उस स्थान की ओर बढ़ी, जहाँ असुर अमृत कलश को लेकर आपस में लड़-झगड़ रहे थे।

जब असुरों ने अपनी लड़ाई के बीच में अचानक मोहिनी को आते देखा, तो वे अपनी सारी शत्रुता, युद्ध और यहाँ तक कि अमृत कलश को भी पूरी तरह भूल गए। उनका क्रूर और हिंसक स्वभाव मोहिनी के एक कटाक्ष और उसकी मधुर मुस्कान के सामने पूरी तरह पिघल कर पानी-पानी हो गया।

असुरराज बलि और स्वरभानु सम्मोहित होकर मोहिनी के समीप आए और अत्यंत विनीत भाव से उसका परिचय पूछने लगे, जैसे वे किसी देवी के सामने खड़े हों। मोहिनी ने अपनी सुरीली आवाज में असुरों से कहा कि वे इतने शक्तिशाली और बुद्धिमान होकर भी इस तरह आपस में क्यों लड़ रहे हैं, जो उनकी प्रतिष्ठा के सर्वथा विपरीत है।

उसने अत्यंत चतुराई से असुरों के अहंकार को सहलाया और प्रस्ताव रखा कि यदि वे चाहें, तो वह इस अमृत का समान रूप से विभाजन कर सकती है। असुर मोहिनी के इस मायावी जाल में पूरी तरह फंस चुके थे और उन्होंने बिना सोचे-समझे अमृत कलश मोहिनी के कोमल हाथों में सौंप दिया, जो कि देवताओं की सबसे बड़ी कूटनीतिक विजय थी।

अमृत का अंतिम विभाजन और असुरों का पराभव

धन्वंतरि और अमृत कलश

अमृत कलश को अपने हाथों में लेते ही मोहिनी ने अपनी माया का अगला चरण प्रारंभ किया और देव तथा दानव दोनों को दो अलग-अलग पंक्तियों में बैठने का निर्देश दिया। असुर मोहिनी के सौंदर्य के वश में होकर उसकी हर बात मानने के लिए तैयार थे, इसलिए वे तुरंत एक तरफ बैठ गए, जबकि देवता दूसरी तरफ अत्यंत अनुशासित होकर बैठ गए।

मोहिनी ने देवताओं की पंक्ति से अमृत बांटना शुरू किया, जिसे देखकर असुर थोड़े बेचैन तो हुए, लेकिन मोहिनी की तिरछी नजरों और मधुर मुस्कान ने उन्हें शांत रहने पर विवश कर दिया। इसी बीच, स्वरभानु नामक चतुर असुर भांप गया कि मोहिनी वास्तव में देवताओं का पक्ष ले रही है और उनके साथ बहुत बड़ा छल हो रहा है।

स्वरभानु ने तुरंत अपना रूप बदला और एक देवता का भेष बनाकर चुपके से सूर्यदेव और चंद्रदेव के बीच की पंक्ति में आकर बैठ गया। मोहिनी ने जैसे ही स्वरभानु को देवता समझकर उसके मुख में अमृत की कुछ बूंदें डालीं, वैसे ही सूर्य और चंद्रमा ने चिल्लाकर उसकी वास्तविक पहचान उजागर कर दी।

पहचान उजागर होते ही, इससे पहले कि स्वरभानु अमृत को पूरी तरह अपने गले से नीचे उतार पाता, मोहिनी के रूप में छिपे भगवान विष्णु ने तुरंत अपने वास्तविक रूप में आकर सुदर्शन चक्र का आह्वान किया।

सुदर्शन चक्र ने अत्यंत तीव्र गति से जाकर स्वरभानु का सिर धड़ से अलग कर दिया, लेकिन चूंकि अमृत उसके गले तक पहुंच चुका था, इसलिए उसके शरीर के दोनों भाग अमर हो गए। उसका सिर ‘राहु’ और धड़ ‘केतु’ के नाम से जाना गया, जो आज भी सूर्य और चंद्रमा से प्रतिशोध लेने के लिए उन्हें ग्रहण लगाते हैं।

इस घटना के बाद असुरों का सम्मोहन पूरी तरह टूट गया और उन्हें समझ आ गया कि अमृत कलश की चोरी का उनका प्रयास पूरी तरह विफल हो चुका है। असुरों ने क्रोध में आकर देवताओं पर अंतिम आक्रमण किया, लेकिन तब तक देवता अमृत पीकर पूरी तरह अमर और अजेय हो चुके थे।

देवताओं ने अत्यंत सुगमता से असुरों को परास्त कर पाताल लोक भेज दिया और इस प्रकार धन्वंतरि द्वारा आविष्कृत अमृत कलश सुरक्षित रूप से स्वर्गलोक पहुंच गया, जिससे सृष्टि का संतुलन सदा के लिए बहाल हो गया।

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 लेखक / मूल रचनाकार : पौराणिक कथाएँ
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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