परछाइयों का फरेब

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परछाइयों का फरेब Part 1

समीर की जिंदगी एक रुकी हुई घड़ी की तरह थी, जिसमें न कोई हलचल थी और न ही कोई नयापन। रोज सुबह उठना, नोएडा की उसी भीड़भाड़ वाली सड़क से होकर अपने आईटी ऑफिस जाना और रात को थककर सो जाना, यही उसकी नियति बन चुकी थी।

वह एक बेहद आम इंसान था, जिसे अपनी इस उबाऊ और एकांत जिंदगी से कोई खास शिकायत भी नहीं थी, क्योंकि वह शांति पसंद करता था। लेकिन वह इस बात से बिल्कुल अनजान था कि किस्मत ने उसके लिए एक ऐसा खौफनाक जाल बुना है, जो उसकी इस शांत दुनिया को हमेशा के लिए तहस-नहस करने वाला था।

उस रात दिल्ली में भारी बारिश हो रही थी, और आसमान में कड़कती बिजली किसी अनहोनी का स्पष्ट संकेत दे रही थी। समीर अपने फ्लैट की बालकनी में खड़ा होकर गर्म कॉफी पीते हुए बारिश की बूंदों को निहार रहा था, तभी अचानक दरवाजे की तेज घंटी बजी।

रात के ग्यारह बज रहे थे, और इतनी देर रात किसी के आने की कोई उम्मीद नहीं थी, जिससे उसके मन में एक अजीब सी उलझन और बेचैनी पैदा हो गई। उसने सावधानी से दरवाजे के पीपहोल से बाहर झांका, लेकिन वहां कोई इंसान नहीं था, सिर्फ बाहर के खाली कॉरिडोर की पीली और रहस्यमयी रोशनी नजर आ रही थी।

दरवाजा खोलने पर उसे अपने पैरों के पास फर्श पर भूरे रंग के मोटे कागज में लिपटा एक छोटा सा पार्सल मिला, जिस पर बारिश की कुछ बूंदें गिरी हुई थीं। उसने घबराहट और उत्सुकता के साथ उस पार्सल को उठाया और जब उस पर लिखे पते को ध्यान से देखा, तो उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई।

पार्सल पर स्पष्ट अक्षरों में उसके पिता ‘राजीव शर्मा’ का नाम लिखा था, जिनकी पंद्रह साल पहले एक भयानक कार दुर्घटना में दर्दनाक मौत हो चुकी थी। एक मृत व्यक्ति के नाम से इतनी रात गए इस तरह का रहस्यमयी पार्सल आना कोई भद्दा मजाक नहीं हो सकता था, बल्कि यह किसी गहरी साजिश की शुरुआत लग रही थी।

कांपते हाथों से समीर ने उस पार्सल को खोला, तो उसके अंदर एक पुरानी, जंग लगी धातु की डिब्बी निकली जिस पर अजीब सी नक्काशी की गई थी। उस डिब्बी के अंदर एक बेहद पुरानी और कीमती दिखने वाली पॉकेट वॉच रखी थी, जिसका शीशा हल्का सा चटका हुआ था।

उसने उस घड़ी को बाहर निकाला और देखा कि उसकी सुइयां ग्यारह बजकर बयालीस मिनट पर आकर हमेशा के लिए रुक गई थीं। जब उसने घड़ी के पिछले हिस्से को साफ करने की कोशिश की, तो अचानक एक हल्का सा क्लिक सुनाई दिया और घड़ी का पिछला ढक्कन खुल गया।

उस छोटे से गुप्त तहखाने के अंदर एक बेहद आधुनिक और छोटा सा माइक्रो-यूएसबी ड्राइव छिपाकर रखा गया था, जिसे देखकर समीर की सांसें अटक गईं। एक पुरानी विंटेज घड़ी के अंदर इस आधुनिक तकनीक का मिलना इस बात का सबूत था कि यह पार्सल हाल ही में किसी ने जानबूझकर उसे भेजा है।

बिना एक पल गंवाए, समीर ने अपना लैपटॉप चालू किया और उस यूएसबी ड्राइव को उसमें लगा दिया, जबकि उसका दिल किसी ड्रम की तरह जोर-जोर से धड़क रहा था। स्क्रीन पर सिर्फ एक वीडियो फाइल नजर आई, जिसका नाम ‘आखिरी सच’ लिखा था, और समीर ने कांपती उंगलियों से उस फाइल पर डबल क्लिक कर दिया।

वीडियो शुरू होते ही स्क्रीन पर उसके पिता राजीव का चेहरा उभरा, जो बहुत डरे हुए और बदहवास लग रहे थे, और पीछे किसी फैक्ट्री जैसी जगह की आवाजें आ रही थीं। “समीर, मेरे बेटे… अगर तुम यह वीडियो देख रहे हो, तो इसका मतलब है कि मैं अब इस दुनिया में नहीं हूँ और उन्होंने मुझे मार दिया है,” उसके पिता की कांपती हुई आवाज कमरे के सन्नाटे को चीरती हुई गूंजी।

“मेरी मौत कोई हादसा नहीं थी, बल्कि एपेक्स फार्मास्यूटिकल्स के काले कारनामों को छिपाने की एक साजिश थी, क्योंकि मैंने उनके सबसे खौफनाक राज का पर्दाफाश कर दिया था। किसी पर भी भरोसा मत करना, खासकर उन लोगों पर जो तुम्हारी मदद करने का दावा करें, क्योंकि दुश्मन तुम्हारे बहुत करीब है।”

इससे पहले कि उसके पिता कुछ और बता पाते, वीडियो में पीछे से एक जोर का धमाका हुआ और स्क्रीन अचानक काली हो गई, जिसके बाद वीडियो हमेशा के लिए खत्म हो गया। समीर पसीने से लथपथ कुर्सी पर पीछे की तरफ गिर सा गया, क्योंकि उसके दिमाग में पंद्रह साल पुरानी वो भयानक यादें ताजा हो गई थीं जब पुलिस ने उसके पिता की मौत को शराब पीकर गाड़ी चलाने का नतीजा बताया था।

आज तक वह इसी झूठ को सच मानकर जी रहा था, लेकिन इस एक छोटे से वीडियो ने उसकी पूरी जिंदगी और उसके अतीत को एक भयंकर झूठ में बदल दिया था। उसे एहसास हो गया कि वह अब एक ऐसे खतरनाक चक्रव्यूह में फंस चुका है, जहां से बाहर निकलने का रास्ता उसे खुद खोजना होगा।

अगली सुबह जब समीर अपने ऑफिस के लिए निकला, तो उसे हर गुजरते इंसान और हर रुकती गाड़ी में एक अनजाना सा खौफ नजर आने लगा था। उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कोई अदृश्य साया लगातार उसका पीछा कर रहा है और उसकी हर छोटी-बड़ी हरकत पर नजर रख रहा है।

जब वह मेट्रो स्टेशन के पास पहुंचा, तो उसने शीशे में देखा कि एक काले रंग की एसयूवी कार पिछले आधे घंटे से ठीक उसी रफ्तार से उसके पीछे चल रही थी। घबराहट में उसने ऑफिस जाने का इरादा बदल दिया और भीड़ का फायदा उठाते हुए एक संकरी गली से होता हुआ वापस अपने अपार्टमेंट की तरफ भाग निकला।

जब वह अपने फ्लैट के दरवाजे पर पहुंचा, तो उसका ताला टूटा हुआ देखकर उसकी रगों में दौड़ता खून जैसे जम सा गया। उसने धीरे से दरवाजा धक्का दिया और अंदर का नजारा देखकर वह सुन्न रह गया; पूरा घर तहस-नहस था, सोफे के कुशन फटे हुए थे और किताबें फर्श पर बिखरी पड़ी थीं।

हमलावर जाहिर तौर पर उसी पार्सल और यूएसबी ड्राइव की तलाश में आए थे, जो खुशकिस्मती से समीर ने अपनी जैकेट की अंदरूनी जेब में सुरक्षित छिपा कर रखा था। उसे समझ आ गया कि उसका यह घर अब उसके लिए एक मौत का जाल बन चुका है, और उसे तुरंत यह शहर छोड़कर किसी सुरक्षित जगह पर छिपना होगा।

समीर ने जल्दी से एक छोटे बैग में कुछ कपड़े और अपने पिता की पुरानी डायरी रखी, जो उसे सालों पहले उनके सामान से मिली थी, और फ्लैट के पिछले दरवाजे से बाहर निकल गया। वह शहर के बाहरी इलाके में स्थित एक सस्ते और गुमनाम से होटल में आकर छिप गया, जहां उसने अपना फोन बंद कर दिया ताकि कोई उसे ट्रैक न कर सके।

रात के अंधेरे में, वह अपने पिता की उस डायरी के पन्नों को पलटने लगा, जिसमें कई जगहों पर अजीबोगरीब नंबर और कुछ जटिल रासायनिक सूत्र लिखे हुए थे। उसे यकीन था कि एपेक्स फार्मा के उस काले सच का असली सुराग इसी डायरी के पन्नों में कहीं न कहीं बहुत ही चालाकी से छिपाया गया है।

तभी अचानक कमरे के लैंडलाइन फोन की तेज घंटी बजी, जिसने कमरे की दमघोंटू शांति को भंग कर दिया और समीर को बुरी तरह चौंका दिया। किसी को भी उसके इस ठिकाने के बारे में नहीं पता था, फिर इस अनजान नंबर पर कॉल आना किसी बड़े खतरे की घंटी से कम नहीं था।

उसने झिझकते हुए रिसीवर उठाया, तो दूसरी तरफ से एक लड़की की फुसफुसाती हुई आवाज आई, “समीर, अगर तुम जिंदा रहना चाहते हो और अपने पिता के कातिलों को सजा दिलाना चाहते हो, तो कल सुबह सिटी लाइब्रेरी के पीछे वाले कैफे में मुझसे मिलो।” बिना समीर के कुछ बोले, उस अजनबी लड़की ने फोन काट दिया और समीर को सवालों के एक और गहरे समंदर में अकेला छोड़ दिया।

अगली सुबह, समीर अपनी पहचान छिपाने के लिए एक टोपी और चश्मा पहनकर उस कैफे में पहुंचा, जहां एक कोने में एक बेहद आत्मविश्वास से भरी हुई लड़की बैठी उसका इंतजार कर रही थी। उसने अपना नाम नैना बताया और दावा किया कि वह एक स्वतंत्र खोजी पत्रकार है, जो पिछले तीन सालों से एपेक्स फार्मास्यूटिकल्स के भ्रष्टाचार और उनके अवैध कारनामों पर काम कर रही है।

नैना ने समीर को कुछ ऐसे गुप्त दस्तावेज दिखाए, जिनमें उसके पिता का नाम और उनके द्वारा किए गए कुछ सीक्रेट रिसर्च प्रोजेक्ट्स का जिक्र था, जिसे देखकर समीर को उस पर थोड़ा भरोसा होने लगा। नैना ने बताया कि उसे समीर के होटल का पता उसके पिता के एक पुराने खबरी के जरिए मिला था, जो अब इस दुनिया में नहीं है।

नैना और समीर ने मिलकर उस डायरी के कोड्स को डिकोड करना शुरू किया, जो एक बेहद मुश्किल और दिमागी कसरत वाला काम था। कई घंटों की लगातार मेहनत और माथापच्ची के बाद, नैना ने उस डायरी में लिखे नंबरों के पैटर्न को समझ लिया और बताया कि ये असल में एक जीपीएस कोऑर्डिनेट हैं।

जब उन्होंने उन कोऑर्डिनेट्स को इंटरनेट के नक्शे पर डाला, तो वह जगह शहर से बहुत दूर एक सुनसान इलाके में स्थित एक पुरानी और बंद पड़ी सूती मिल की तरफ इशारा कर रही थी। दोनों ने तय किया कि आज रात ही वे उस पुरानी मिल में जाएंगे और वहां छिपे उस असली सबूत को ढूंढ निकालेंगे, जिसके लिए एपेक्स फार्मा किसी की भी जान लेने को तैयार थी।

परछाइयों का फरेब Part 2

परछाइयों का फरेब
परछाइयों का फरेब

रात का अंधेरा बहुत गहरा हो चुका था जब समीर और नैना की कार उस पुरानी और जर्जर सूती मिल के जंग लगे लोहे के गेट के सामने आकर रुकी। वह जगह किसी भूतहा इमारत जैसी लग रही थी, जहां चारों तरफ सिर्फ सन्नाटा, मकड़ी के जाले और हवा के टकराने से पैदा होने वाली डरावनी आवाजें गूंज रही थीं।

दोनों ने अपनी टॉर्च जलाई और बहुत ही सावधानी से उस इमारत के मुख्य दरवाजे को धकेलते हुए अंदर प्रवेश किया, जहां धूल का एक मोटा गुबार हवा में तैर रहा था। समीर का दिल जोर से धड़क रहा था, लेकिन अपने पिता की मौत का सच जानने की आग ने उसके अंदर के सारे डर को खत्म कर दिया था।

वे डायरी में बने एक छोटे से नक्शे की मदद से मिल के बेसमेंट की तरफ जाने वाली घुमावदार और टूटी-फूटी सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे। बेसमेंट में एक भारी लोहे का दरवाजा था, जिस पर एक पुराना लेकिन बेहद मजबूत डिजिटल लॉक लगा हुआ था, जिसे तोड़ना किसी भी इंसान के लिए नामुमकिन था।

समीर ने कुछ पल सोचा और फिर उस पॉकेट वॉच को याद किया जो ठीक 11:42 पर रुकी हुई थी; उसने कांपती उंगलियों से कीपैड पर ‘1142’ टाइप किया। एक भारी और कर्कश आवाज के साथ लॉक खुल गया, और समीर को एहसास हुआ कि उसके पिता ने मौत से पहले हर सुराग कितनी बुद्धिमानी से छोड़ा था।

दरवाजे के पीछे एक छोटा सा गुप्त कमरा था, जिसके बीचों-बीच एक मेज पर लाल रंग की एक मोटी फाइल रखी हुई थी, जिस पर ‘प्रोजेक्ट 7 – कॉन्फिडेंशियल’ लिखा था। समीर ने जल्दी से फाइल खोली और उसके पन्ने पलटने लगा, जिनमें इंसानों पर किए गए अवैध और खतरनाक दवा परीक्षणों की खौफनाक तस्वीरें और मौत के आंकड़े दर्ज थे।

एपेक्स फार्मा ने अपनी नई दवा के साइड इफेक्ट्स छिपाने के लिए सैकड़ों गरीब और लाचार लोगों को मौत के घाट उतार दिया था, और समीर के पिता ने इस पूरी रिपोर्ट को दुनिया के सामने लाने की योजना बनाई थी। इन सबूतों को देखकर समीर की आंखों में आंसू आ गए; उसके पिता एक सच्चे हीरो थे, जिन्होंने सच्चाई के लिए अपनी जान की कुर्बानी दे दी थी।

लेकिन इससे पहले कि समीर उस फाइल को अपने बैग में रख पाता, अचानक पूरे बेसमेंट में कई तेज फ्लडलाइट्स जल उठीं और कमरा रोशनी से नहा गया। कदमों की भारी आवाजों के साथ एक दर्जन से ज्यादा हथियारबंद लोग वहां आ धमके और उन्होंने अपनी बंदूकों का निशाना समीर और नैना की तरफ तान दिया।

उन गुंडों के बीच से एक लंबा और खूंखार दिखने वाला आदमी आगे आया, जिसने काले रंग का एक महंगा सूट पहन रखा था और उसके चेहरे पर एक क्रूर मुस्कान थी। समीर घबराहट में पीछे हटा और उसने अपनी सुरक्षा के लिए नैना का हाथ पकड़ना चाहा, लेकिन जो हुआ उसने समीर की आत्मा तक को झकझोर कर रख दिया।

नैना ने झटके से अपना हाथ समीर की पकड़ से छुड़ाया और एक ठंडी मुस्कान के साथ चलकर उस सूट वाले आदमी के ठीक बगल में जाकर खड़ी हो गई। “बहुत बढ़िया काम किया तुमने, समीर,” नैना की आवाज में अब वो हमदर्दी नहीं थी, बल्कि एक क्रूर और शातिर विजेता का अहंकार झलक रहा था।

“अगर तुम न होते, तो हम शायद कभी इस आखिरी सबूत तक नहीं पहुंच पाते, क्योंकि तुम्हारे चालाक बाप ने इसे इतनी अच्छी तरह छिपाया था कि हमारी पूरी टीम हार मान चुकी थी।” समीर यह देखकर बुरी तरह सुन्न पड़ गया था कि जिस लड़की पर उसने सबसे ज्यादा भरोसा किया, वही एपेक्स फार्मा के सीईओ की इकलौती बेटी और उनकी मुख्य फिक्सर थी।

“तुमने मुझे धोखा दिया,” समीर की आवाज में दर्द और सदमा दोनों साफ झलक रहे थे, जबकि उसका शरीर गुस्से और लाचारी से कांप रहा था। नैना जोर से हंसी और बोली, “धोखा तो इस दुनिया का सबसे पुराना खेल है समीर, और तुम जैसे भावुक मूर्ख हमेशा इस खेल में मोहरे बनते हैं।

हमने ही तुम्हारे घर वो पार्सल भेजा था ताकि तुम उसे ट्रैक करो और हमें इस जगह तक ले आओ, क्योंकि हम जानते थे कि राजीव शर्मा सिर्फ अपने बेटे पर ही भरोसा करेगा। अब शराफत से वह लाल फाइल और यूएसबी ड्राइव मुझे दे दो, तो शायद मैं तुम्हें तुम्हारे बाप की तरह तड़पाने के बजाय एक आसान मौत दे दूं।”

नैना और उसके आदमियों को पूरी उम्मीद थी कि मौत को सामने देखकर समीर गिड़गिड़ाएगा या रहम की भीख मांगेगा, लेकिन वहां कुछ और ही हो रहा था। समीर के चेहरे से अचानक वो खौफ और लाचारी का मुखौटा गायब हो गया, और उसकी जगह एक बेहद शांत, ठंडी और रहस्यमयी मुस्कान ने ले ली।

उसने उस लाल फाइल को लापरवाही से मेज पर वापस फेंक दिया और अपनी जेब में हाथ डालकर बड़े आराम से दीवार के सहारे टिक कर खड़ा हो गया। “तुम्हें सच में लगता है नैना, कि मैं इतना बड़ा बेवकूफ हूँ कि एक अनजान लड़की पर आंख मूंदकर भरोसा कर लूँगा?” समीर के इस अप्रत्याशित सवाल ने पूरे कमरे के माहौल को एकदम से बदल दिया।

नैना के माथे पर सिलवटें पड़ गईं और उसका आत्मविश्वास थोड़ा डगमगाने लगा; उसने गुस्से में पूछा, “तुम्हारा क्या मतलब है? तुम अब कोई चालाकी नहीं कर सकते, तुम चारों तरफ से घिरे हुए हो।” समीर ने एक गहरी सांस ली और कहा, “तुम्हारी एक्टिंग बहुत शानदार थी नैना, लेकिन तुमने कल कैफे में एक बहुत छोटी सी, मगर जानलेवा गलती कर दी थी।

तुमने बात करते हुए उस अवैध परीक्षण को ‘प्रोटोकॉल 7’ कहा था, जबकि मेरे पिता की डायरी और उस वीडियो में उसे हमेशा ‘प्रोजेक्ट 7’ कहा गया है। ‘प्रोटोकॉल 7’ कंपनी का अंदरूनी कोड वर्ड था जो सिर्फ यूएसबी की उन फाइलों में लिखा था जो मैंने तुम्हें कभी दिखाई ही नहीं थीं; उसी पल मुझे समझ आ गया था कि तुम एक खतरनाक भेड़िया हो।”

समीर की बात सुनकर नैना का चेहरा पीला पड़ गया और उसने घबराहट में झपटकर उस लाल फाइल को खोला, लेकिन उसके अंदर सिर्फ खाली और कोरे पन्ने थे। “यह कैसे संभव है? तो फिर असली फाइलें कहां हैं?” नैना लगभग चिल्लाते हुए बोली, जबकि उसके आदमियों ने भी बेचैनी में एक-दूसरे की तरफ देखना शुरू कर दिया।

समीर ने मुस्कुराते हुए अपनी कलाई घड़ी देखी और कहा, “मेरे पिता इतने कच्चे खिलाड़ी नहीं थे कि असली सबूत किसी बंद पड़ी मिल में छोड़कर जाएं; डायरी का कोड इस जगह का नहीं, बल्कि शहर के सेंट्रल बैंक के एक पुराने लॉकर का था, जो मैंने कल दोपहर ही खाली कर लिया था। यह जगह तो उन्होंने सिर्फ तुम जैसे कुत्तों को फंसाने के लिए एक जाल के रूप में तैयार की थी, और तुम बड़ी आसानी से इस जाल में फंस गए।”

समीर ने आगे बताया कि असली दस्तावेज और वीडियो के सारे सबूत वह आज शाम को ही सीबीआई के हेडक्वार्टर और देश के सबसे बड़े न्यूज़ चैनलों को मेल कर चुका है। “अभी तक तो तुम्हारे पिता के ऑफिस में छापे भी पड़ने शुरू हो गए होंगे, और तुम्हारे पास भागने का भी कोई मौका नहीं है,” समीर की आवाज में एक भयानक शांति थी।

नैना ने गुस्से में पागल होकर अपने आदमियों को गोली चलाने का आदेश दिया, लेकिन तभी बाहर से एक साथ कई पुलिस सायरन की तेज आवाजें पूरे इलाके में गूंजने लगीं। सीबीआई और पुलिस की स्पेशल फोर्स ने पूरी मिल को चारो तरफ से घेर लिया था, और अब शिकार और शिकारी के बीच का खेल पूरी तरह से पलट चुका था।

पुलिस के कमांडो ने बेसमेंट का दरवाजा तोड़ दिया और कुछ ही सेकंड में नैना और उसके सारे हथियारबंद आदमियों को जमीन पर गिराकर हथकड़ियां पहना दीं। नैना की आंखों में अब अपनी हार का खौफ साफ नजर आ रहा था, जबकि समीर उसे इस तरह घुटनों के बल पड़े हुए देखकर एक अजीब सा सुकून महसूस कर रहा था।

पुलिस इंस्पेक्टर ने समीर के पास आकर उसे धन्यवाद दिया और बताया कि एपेक्स फार्मा के सीईओ को भी दिल्ली एयरपोर्ट से गिरफ्तार कर लिया गया है। पंद्रह साल पुराना वह न्याय, जिसका इंतजार समीर की आत्मा अनजाने में कर रही थी, आज आखिरकार मुकम्मल हो गया था। समीर ने एक आखिरी बार उस अंधेरे बेसमेंट की तरफ देखा और खुली हवा में बाहर निकल आया, क्योंकि अब उसकी जिंदगी की रुकी हुई घड़ी ने फिर से चलना शुरू कर दिया था।

शहर की बारिश और अधूरी मोहब्बत

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प्रस्तुति: Saying Central Team

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