अंतिम कॉल भाग 1
अविनाश शर्मा दिल्ली की एक औसत टेक कंपनी में सीनियर डेटा एनालिस्ट था। सत्ताइस साल की उम्र में उसका जीवन केवल दो चीजों के इर्द-गिर्द घूमता था—ऑफिस के अंतहीन एक्सेल शीट्स और घर पर बीमार पिता के इलाज के बढ़ते खर्च। मिडिल क्लास परिवार का अकेला कमाऊ सदस्य होने के कारण वह हर दिन मानसिक और आर्थिक दबाव से जूझ रहा था।
प्रमोशन की सख्त जरूरत थी, लेकिन बॉस हर बार उसकी मेहनत का श्रेय खुद ले जाता था। एक साधारण सी जिंदगी जी रहे अविनाश को अंदाजा भी नहीं था कि एक मामूली तकनीकी गड़बड़ी उसे मौत के मुहाने पर लाकर खड़ा कर देगी।
उस मंगलवार की रात ऑफिस में सन्नाटा था और अविनाश एक क्लाइंट का पुराना सर्वर डेटा क्लीन कर रहा था। अचानक उसकी स्क्रीन पर एक एन्क्रिप्टेड फाइल पॉप-अप हुई, जिसका नाम ‘प्रोजेक्ट कुरुक्षेत्र’ था। जिज्ञासावश जब उसने उस फाइल के सिक्योरिटी कोड को बायपास किया, तो उसके होश उड़ गए।
वह कोई सामान्य व्यावसायिक डेटा नहीं था, बल्कि देश के सबसे बड़े फार्मास्युटिकल टाइकून और कुछ शीर्ष नौकरशाहों के बीच करोड़ों रुपये के लेन-देन और नकली दवाओं के वितरण का कच्चा चिट्ठा था। उस डेटा में साफ लिखा था कि कैसे एक जानलेवा वायरस के नकली टीके बाजार में उतारकर करोड़ों कमाने की साजिश रची जा रही थी।
अविनाश अभी उस फाइल को समझने की कोशिश ही कर रहा था कि अचानक ऑफिस के कॉरिडोर में भारी कदमों की आवाज गूंजी। उसने खिड़की से बाहर झांका तो देखा कि ब्लैक सूट पहने तीन हथियारबंद लोग सीधे उसकी केबिन की तरफ बढ़ रहे थे।
डर के मारे उसका गला सूख गया और उसने बिना सोचे-समझे उस फाइल को अपनी निजी पेनड्राइव में कॉपी किया और सिस्टम को शटडाउन कर दिया। वह पीछे के फायर एग्जिट की तरफ भागा, लेकिन जैसे ही उसने दरवाजा खोला, सामने एक शूटर खड़ा था। अविनाश ने अपनी पूरी ताकत से पास पड़ा एक भारी मेटल का डस्टबिन उसके सिर पर दे मारा और अंधेरी सीढ़ियों से नीचे की ओर दौड़ लगा दी।
सड़क पर आते ही उसने अपनी पुरानी बाइक स्टार्ट की और तेज रफ्तार से अंधेरी सड़कों पर निकल गया। पीछे दो काली एसयूवी गाड़ियां उसका पीछा कर रही थीं, जिनकी हेडलाइट्स की रोशनी उसकी बाइक के रियर-व्यू मिरर पर पड़ रही थी।
दिल्ली की तंग गलियों का फायदा उठाकर अविनाश ने किसी तरह उन्हें चकमा दिया और अपने दोस्त और मेंटर, राघव के घर की तरफ रुख किया। राघव उसी कंपनी में चीफ टेक्निकल ऑफिसर था और अविनाश का इकलौता भरोसेमंद मददगार था। रात के दो बजे जब अविनाश हांफते हुए राघव के घर पहुंचा, तो उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं।
राघव ने उसे पानी दिया और पूरी बात ध्यान से सुनी, फिर उसने पेनड्राइव को अपने लैपटॉप में लगाया। डेटा देखते ही राघव के चेहरे का रंग उड़ गया और उसने बेहद गंभीर आवाज में कहा, “अविनाश, तुम नहीं जानते कि तुमने किस ततैया के छत्ते में हाथ डाल दिया है।
यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि एक सुनियोजित नरसंहार है, जिसके पीछे देश के सबसे ताकतवर लोग हैं।” राघव ने तुरंत पुलिस के एक उच्च अधिकारी को फोन करने की बात कही, जिसे वह व्यक्तिगत रूप से जानता था। अविनाश को लगा कि शायद अब वह सुरक्षित है, लेकिन यह उसकी सबसे बड़ी भूल थी।
राघव जैसे ही फोन करने के लिए दूसरे कमरे में गया, अविनाश की नजर लैपटॉप की स्क्रीन पर पड़ी, जहां एक चैट विंडो खुली हुई थी। उस चैट में राघव किसी अज्ञात व्यक्ति को लिख रहा था, ‘काम हो गया है, लड़का पेनड्राइव के साथ मेरे घर पर है, अपनी टीम भेजो।’
अविनाश के पैरों तले जमीन खिसक गई; उसका सबसे भरोसेमंद मेंटर ही उस साजिश का हिस्सा था। ठीक उसी पल बाहर गाड़ियों के रुकने और दरवाजे टूटने की आवाज आई। राघव हाथ में एक साइलेंसर लगी पिस्तौल लेकर कमरे में वापस आया और ठंडे स्वर में बोला, “माफ करना अविनाश, तुम्हारी कीमत इस डेटा से ज्यादा नहीं है।”
अंतिम कॉल भाग 2

मौत को सामने देखकर अविनाश के भीतर का डर अचानक एक अजीब से गुस्से और जीने की जिद में बदल गया। जैसे ही राघव ने ट्रिगर दबाने की कोशिश की, अविनाश ने अपनी पूरी ताकत से सामने रखी कांच की टी-टेबल को राघव की तरफ उछाल दिया।
कांच टूटने की भयानक आवाज के साथ राघव का संतुलन बिगड़ा और गोली दीवार में जा लगी। अविनाश ने झपटकर लैपटॉप से अपनी पेनड्राइव निकाली और राघव की कलाई पर जोरदार वार करके पिस्तौल फर्श पर गिरा दी। वह बिना पीछे मुड़े मुख्य दरवाजे की तरफ भागा, जहां दो शूटर पहले से ही लॉबी में दाखिल हो चुके थे।
अविनाश ने अपार्टमेंट की बालकनी का दरवाजा खोला और बिना सोचे-समझे दूसरी मंजिल से नीचे खड़ी एक कचरा उठाने वाली गाड़ी के तिरपाल पर छलांग लगा दी। पीठ में असहनीय दर्द हुआ, लेकिन वह तुरंत उठ खड़ा हुआ और रात के अंधेरे में ओझल हो गया।
अब उसके पास न तो कोई घर था और न ही कोई दोस्त; पूरा सिस्टम उसके खिलाफ हो चुका था। सुबह होते ही टीवी पर खबर चलने लगी कि अविनाश शर्मा नाम का एक टेक कर्मचारी अपने ही ऑफिस के डेटा चोरी और अपने मेंटर राघव पर जानलेवा हमले के आरोप में फरार है। पुलिस और अपराधी दोनों उसकी जान के पीछे पड़े थे।
दोपहर तक अविनाश को अपने फोन पर एक अज्ञात नंबर से वीडियो कॉल आई, जिसे देखकर उसका दिल बैठ गया। स्क्रीन पर उसके बीमार पिता को व्हीलचेयर पर बांधा गया था और उनके पीछे एक शूटर खड़ा था।
दूसरी तरफ से एक भारी, ठंडी आवाज आई, “अविनाश, आज शाम पांच बजे तक प्रगति मैदान के अंडरपास के पास वह पेनड्राइव लेकर आओ, वरना अपने पिता के अंतिम संस्कार की तैयारी करो।” अविनाश के सामने अब एक असंभव विकल्प था—या तो वह अपने बेगुनाह पिता की जान बचाए या फिर लाखों मासूमों की जिंदगी दांव पर लगाने वाले उस सच को उजागर करे।
अविनाश ने हार मानने के बजाय लड़ने का फैसला किया; इन कुछ घंटों के संकट ने उस साधारण क्लर्क को एक बेहद चालाक और मजबूत इंसान बना दिया था। उसने एक पुरानी इंटरनेट कैफे में जाकर पेनड्राइव के डेटा को एक सुरक्षित क्लाउड सर्वर पर अपलोड किया और उसकी लिंक को देश के सभी प्रमुख मीडिया घरानों और अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसियों को एक टाइमर के साथ शेड्यूल कर दिया।
अगर वह शाम पांच बजे तक एक विशिष्ट कोड एंटर नहीं करता, तो वह डेटा खुद-ब-खुद पूरी दुनिया के सामने लाइव हो जाता। इसके बाद वह एक सोची-समझी रणनीति के साथ तय ठिकाने की तरफ बढ़ा।
शाम के ठीक पांच बजे, प्रगति मैदान का वह सुनसान अंडरपास सन्नाटे में डूबा हुआ था। एक काली एसयूवी वहां आकर रुकी, जिसमें से राघव और तीन शूटर अविनाश के पिता को लेकर नीचे उतरे। अविनाश हाथ में पेनड्राइव लिए कंक्रीट के एक खंभे के पीछे से बाहर आया।
राघव ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा, “स्मार्ट लड़के, आखिरकार तुम आ ही गए, चलो अब चुपचाप पेनड्राइव हमारे हवाले करो।” अविनाश ने शांत रहकर अपने फोन की स्क्रीन उनकी तरफ घुमाई, जिस पर एक काउंटडाउन टाइमर चल रहा था और केवल तीन मिनट बचे थे।
अविनाश ने गरजते हुए कहा, “यह पेनड्राइव अब सिर्फ एक प्लास्टिक का टुकड़ा है, असली डेटा क्लाउड पर है। अगर अगले दो मिनट में मेरे पिता को नहीं छोड़ा गया और तुम लोगों ने आत्मसमर्पण नहीं किया, तो यह पूरी फाइल दुनिया के सामने होगी।”
राघव बौखला गया और उसने अपने शूटरों को गोली चलाने का इशारा किया, लेकिन ठीक उसी वक्त अविनाश ने पहले से छिपाई हुई स्मोक ग्रेनेड पिन खींचकर जमीन पर फेंक दी। पूरा अंडरपास घने सफेद धुएं से भर गया और अंधाधुंध फायरिंग की आवाजें गूंजने लगीं। अविनाश ने धुएं का फायदा उठाकर रेंगते हुए अपने पिता की व्हीलचेयर को खींचा और उन्हें एक सुरक्षित पिलर के पीछे छुपाया।
धुएं के बीच ही एक शूटर अविनाश पर झपटा, लेकिन अविनाश ने आत्मरक्षा में जमीन पर पड़ी एक लोहे की रॉड उठाई और पूरी ताकत से उसके घुटने पर दे मारी। शूटर दर्द से कराहते हुए गिरा तो अविनाश ने उसकी बंदूक छीन ली। राघव धुएं से बाहर भागने की कोशिश कर रहा था, लेकिन अविनाश ने उसके पैर पर सटीक निशाना लगाकर गोली मार दी। राघव जमीन पर गिरकर तड़पने लगा।
ठीक उसी समय काउंटडाउन समाप्त हुआ और फाइलें दुनिया भर के सर्वर पर पब्लिश हो गईं। कुछ ही मिनटों में साइरनों की आवाज से पूरा इलाका गूंज उठा; केंद्रीय जांच ब्यूरो और स्वात की टीमें वहां पहुंच चुकी थीं क्योंकि अविनाश ने लाइव लोकेशन पहले ही लीक कर दी थी। साजिश का पर्दाफाश हो चुका था, और एक आम इंसान ने अपनी बुद्धिमानी और साहस से पूरे तंत्र को घुटनों पर ला दिया था।
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प्रस्तुति: Saying Central Team