ढलती शाम

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ढलती शाम part 1

लखनऊ के अमीनाबाद की तंग गलियों में बशारत का पुराना सा पुश्तैनी मकान था, जहां वह अपनी बूढ़ी अम्मी और छोटी बहन माहिरा के साथ रहता था। बशारत एक सीधा-साधा नौजवान था, जो चौक इलाके में एक छोटी सी इत्र की दुकान चलाता था।

उसकी जिंदगी सुबह दुकान खोलने, ग्राहकों को मोगरे और खस का इत्र सूंघाने और शाम को घर लौटकर अम्मी के हाथ की बनी बिरयानी खाने तक ही सीमित थी। बशारत स्वभाव से बेहद संकोची और अपने काम से काम रखने वाला इंसान था, जिसे दुनियादारी के दांव-पेचों से कोई सरोकार नहीं था। लेकिन उसे क्या मालूम था कि उसकी इस बेहद आम और शांत जिंदगी के पीछे साजिशों का एक ऐसा गहरा जाल बुना जा रहा है, जिसमें वह बहुत जल्द खुद ही फंसने वाला था।

एक ढलती हुई शाम को जब बशारत अपनी दुकान बढ़ा रहा था, तभी एक बेहद सलीकेदार और महंगे लिबास में एक शख्स उसकी दुकान पर आया। उस अजनबी की आंखों में एक अजीब सा ठहराव था और उसकी उंगली में नीलम की एक चमकीली अंगूठी थी जो रोशनी में चमक रही थी।

उसने बशारत से कोई इत्र नहीं मांगा, बल्कि जेब से एक छोटा सा मखमली डिब्बा निकाला और काउंटर पर रख दिया। अजनबी ने बेहद धीमी और मखमली आवाज में कहा कि यह अमानत बशारत के मरहूम वालिद जनाब अमजद अली की है, जिसे सही वक्त पर लौटाने का वादा उसने किया था। बशारत कुछ पूछ पाता, उससे पहले ही वह शख्स अंधेरी गली के मोड़ पर गायब हो चुका था।

बशारत ने धड़कते दिल से उस डिब्बे को खोला, तो उसके अंदर कोई कीमती जेवर या रुपया नहीं था, बल्कि हाथीदांत का बना एक पुराना सा पासा था जिस पर कोई अजीब से अंक खुदे हुए थे। घर आकर जब उसने यह पासा अपनी अम्मी जुबैदा बेगम को दिखाया, तो उनके चेहरे का रंग पूरी तरह उड़ गया और उनके हाथ से चाय का प्याला छूटकर फर्श पर गिर गया।

अम्मी ने तुरंत बशारत से वह पासा छीन लिया और उसे कसम दी कि वह इसके बारे में कभी किसी से बात न करे और न ही उस अजनबी को दोबारा ढूंढ़ने की कोशिश करे। अम्मी की इस बेतहाशा घबराहट ने बशारत के जेहन में गहरे शक के बीज बो दिए, क्योंकि उसके वालिद तो बीस साल पहले एक मामूली सड़क हादसे में मारे गए थे।

अगले ही दिन से बशारत को महसूस होने लगा कि कोई साए की तरह उसका पीछा कर रहा है, चाहे वह सुबह फज्र की नमाज के लिए मस्जिद जा रहा हो या दुकान पर बैठा हो। उसकी बहन माहिरा ने भी बताया कि कॉलेज के बाहर एक काली गाड़ी अक्सर खड़ी रहती है, जिसके शीशे काले हैं और कोई अंदर बैठकर लगातार उन पर नजर रखता है।

बशारत ने जब इस बात की तहकीकात करने की सोची, तो उसे अपने घर की अलमारी के पीछे छुपा हुआ एक पुराना खत मिला जो उसके वालिद ने मरने से ठीक दो दिन पहले अपनी बहन को लिखा था। उस खत में किसी ‘खानदान की विरासत’ और ‘अंधेरे के रखवाले’ जैसे रहस्मयी शब्दों का इस्तेमाल किया गया था, जिसने बशारत की रातों की नींद उड़ा दी।

तभी बशारत की जिंदगी में उसके बचपन के दोस्त तारिक की दोबारा एंट्री हुई, जो कई सालों बाद दुबई से वापस लौटा था और अब बहुत अमीर हो चुका था। तारिक ने बशारत की परेशानी देखकर उसे अपनी मदद की पेशकश की और कहा कि वह अपने रसूख का इस्तेमाल करके इस अजनबी का पता लगा सकता है।

बशारत को अपने जिगरी दोस्त पर पूरा भरोसा था, इसलिए उसने बिना कुछ सोचे-समझे उस हाथीदांत के पासे और वालिद के खत के बारे में सब कुछ तारिक को बता दिया। तारिक ने बेहद ध्यान से बशारत की पूरी कहानी सुनी और उसकी आंखों में एक पल के लिए वैसी ही चमक कौंधी, जैसी उस नीलम की अंगूठी वाले अजनबी की आंखों में थी।

ढलती शाम part 2

ढलती शाम

तारिक की सलाह पर बशारत ने उस पासे पर खुदे अंकों को डिकोड करने के लिए एक पुराने इतिहासकार प्रोफेसर रहमान से मिलने का फैसला किया, जो पुराने लखनऊ के किस्सों के माहिर थे। प्रोफेसर रहमान ने जब उस पासे को देखा, तो उनके माथे पर पसीने की बूंदें उभर आईं और उन्होंने बशारत को बताया कि यह कोई मामूली पासा नहीं बल्कि नवाबों के जमाने के एक खुफिया तहखाने की चाबी का हिस्सा है।

उन्होंने बताया कि बशारत के वालिद कोई मामूली इंसान नहीं थे, बल्कि वे उस दौर के एक बेहद गोपनीय शाही खजाने के रक्षक थे जिसे अंग्रेजों से छुपाकर कहीं दफन किया गया था। प्रोफेसर ने जैसे ही उस तहखाने के ठिकाने का नाम लेना चाहा, अचानक बाहर से एक गोली चली और प्रोफेसर रहमान वहीं ढेर हो गए।

बशारत अपनी जान बचाकर वहां से भागा और सीधे तारिक के पास पहुंचा, लेकिन वहां जो मंजर उसने देखा, उसने उसके पैरों तले से जमीन खिसका दी। तारिक के आलीशान बंगले के ड्राइंग रूम में वही नीलम की अंगूठी वाला अजनबी बैठा हुआ था और तारिक उसके सामने बेहद अदब से हाथ बांधे खड़ा था।

बशारत समझ गया कि जिस दोस्त को वह अपना हमदर्द समझ रहा था, वह असल में भेड़ियों के उस झुंड का हिस्सा था जो उसके वालिद के खजाने के पीछे पड़ा था। बशारत को अपनी तरफ आता देख तारिक ने फौरन अपनी जेब से पिस्तौल निकाल ली और मुस्कुराते हुए कहा कि खेल अब खत्म होने वाला है और बशारत को चुपचाप वह आखिरी सुराग सौंप देना चाहिए।

तभी घर से माहिरा का फोन आया कि कुछ नकाबपोश बदमाशों ने अम्मी को बंधक बना लिया है और अगर एक घंटे के भीतर वह पासा और खत लेकर अमीनाबाद के पुराने इमामबाड़े के मलबे के पास नहीं पहुंचा, तो वे अम्मी को जान से मार देंगे।

बशारत के पास सोचने का वक्त नहीं था, उसने दिमागी खेल खेलते हुए तारिक को झांसा दिया कि असली चाबी पासा नहीं बल्कि उसके घर में छुपा एक नक्शा है जो सिर्फ उसे पता है। तारिक खजाने के लालच में अंधा हो चुका था, उसने बशारत को अपनी गाड़ी में बिठाया और दोनों तेजी से उस तयशुदा ठिकाने की तरफ निकल पड़े जहां अम्मी और माहिरा मौत के साए में थीं।

अमीनाबाद के उस वीरान और अंधेरे इमामबाड़े के खंडहर में जब वे पहुंचे, तो वहां बशारत की अम्मी और बहन को कुर्सियों से बांधा गया था और चारों तरफ हथियारबंद लोग खड़े थे। तारिक ने बशारत की पीठ पर पिस्तौल टिकाते हुए कहा कि अब नाटक बंद करो और वह आखिरी सुराग बाहर निकालो जिससे उस खजाने का दरवाजा खुलेगा।

बशारत ने ठंडी सांस ली और मुस्कुराते हुए अपनी जेब से वही हाथीदांत का पासा निकाला और उसे फर्श पर फेंक दिया, लेकिन तभी उसकी अम्मी जुबैदा बेगम ने एक ऐसा खुलासा किया जिसने वहां मौजूद हर शख्स के होश उड़ा दिए।

अम्मी ने रोते हुए कहा कि बशारत, ये लोग जिस खजाने को ढूंढ रहे हैं, वह कोई सोना-चांदी नहीं बल्कि बीस साल पुराना एक गुनाह का दस्तावेज है जिसमें शहर के बड़े-बड़े सफेदपोशों और खुद तारिक के वालिद के कत्ल का राज छुपा है।

जुबैदा बेगम ने बताया कि अमजद अली ने उस गुनाह को छुपाने के लिए नहीं बल्कि उसे बेनकाब करने के लिए वह सबूत छुपाया था और यह तारिक खुद अपने बाप के कातिलों का मोहरा बना हुआ है। यह सुनते ही तारिक के हाथ कांपने लगे और वह अजनबी घबराकर पीछे हटने लगा, क्योंकि असली खेल तो अब शुरू हुआ था जब पुलिस की गाड़ियों के सायरन की आवाजें चारों तरफ गूंज उठीं, जिसे बशारत ने वहां आने से पहले ही खुफिया तौर पर इत्तला कर दी थी।

मुखौटों के पीछे का सच

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प्रस्तुति: Saying Central Team


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