समय का तराजू भाग 1
एक छोटे से शहर के किनारे बसा वह पुराना मकान हमेशा से ही दो दोस्तों की खिलखिलाहट और सपनों का गवाह रहा था। उस घर में रहने वाले दोनों नौजवानों के पास वैसे तो दुनिया का कोई बड़ा ऐश-ओ-आराम नहीं था, लेकिन उनकी दोस्ती को देखने वाले अक्सर यही कहते थे कि ऐसी गहरी और सच्ची दोस्ती विरले ही देखने को मिलती है। इस कहानी के दो मुख्य किरदार थे—अभिजीत और नकुल।
दोनों ने एक ही कॉलेज से पढ़ाई पूरी की थी और अब ज़िंदगी की उस दहलीज पर खड़े थे, जहाँ से इंसान को अपने करियर और भविष्य के लिए संघर्ष करना पड़ता है। अभिजीत स्वभाव से बेहद शांत, ईमानदार और दूसरों की मदद करने के लिए हमेशा तत्पर रहने वाला लड़का था। वह इस बात पर गहरा विश्वास रखता था कि इंसान जैसा बोता है, उसे वैसा ही काटना पड़ता है।
दूसरी तरफ, नकुल का मिजाज पूरी तरह से अलग था; वह महत्वाकांक्षी, चालाक और किसी भी कीमत पर जल्द से जल्द अमीर बनने का सपना देखने वाला इंसान था। नकुल का मानना था कि आज की दुनिया में सीधे रास्ते से चलने वाले हमेशा भूखे मरते हैं, इसलिए अगर तरक्की चाहिए, तो सही और गलत के चक्कर में पड़ने के बजाय मौका मिलते ही चौका मार देना चाहिए।
उन दिनों शहर में एक बहुत बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनी ने अपना एक नया प्रोजेक्ट शुरू करने की घोषणा की थी, और उस कंपनी को कुछ नए और ऊर्जावान सुपरवाइज़रों की ज़रूरत थी। दोनों दोस्तों ने वहाँ आवेदन किया, लेकिन किस्मत से नौकरी सिर्फ एक को ही मिलनी थी। जब इंटरव्यू का नतीजा आया, तो अभिजीत की ईमानदारी और उसके बेहतरीन काम के तरीकों को देखकर कंपनी ने उसे चुन लिया।
यह बात नकुल को अंदर ही अंदर चुभ गई, हालांकि उसने ऊपर से मुस्कुराते हुए अभिजीत को बधाई दी। नकुल ने अभिजीत के गले मिलते हुए कहा, “बधाई हो मेरे भाई! तूने तो कमाल कर दिया। आखिरकार हम दोनों में से किसी एक को तो अच्छी शुरुआत मिली।” अभिजीत ने नकुल का हाथ थामते हुए बड़ी सादगी से जवाब दिया, “शुक्रिया नकुल, लेकिन यह नौकरी सिर्फ मेरी नहीं है।
जब मुझे पहली सैलरी मिलेगी, तो हम दोनों मिलकर एक नया बिजनेस आइडिया सोचेंगे और तुझे भी इस नौकरी से बेहतर काम दिलाऊंगा। हम दोनों हमेशा साथ ही आगे बढ़ेंगे।” अभिजीत की बातें सुनकर नकुल ने हामी तो भर दी, लेकिन उसके दिमाग में कुछ और ही खिचड़ी पक रही थी। उसे अपनी काबिलियत पर पूरा भरोसा था और उसे लगता था कि अभिजीत ने उसकी किस्मत का हक छीना है।
महीने बीतते गए और अभिजीत ने अपनी कड़ी मेहनत से कंपनी के मालिक, दयाल साहब का दिल जीत लिया। दयाल साहब एक बहुत ही नेकदिल और बुजुर्ग इंसान थे, जिनका कोई वारिस नहीं था। वे अभिजीत को न केवल एक कर्मचारी बल्कि अपने बेटे की तरह मानने लगे थे।
एक दिन, दयाल साहब ने अभिजीत को अपने केबिन में बुलाया और एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपी। उन्होंने एक बड़ी तिजोरी की चाबी अभिजीत के हाथ में देते हुए कहा, “अभिजीत, इस तिजोरी में कंपनी के अगले प्रोजेक्ट के लिए पचास लाख रुपये कैश रखे हैं। कल सुबह मुझे यह रकम शहर के मुख्य बैंक में जमा करानी है। आज रात यह चाबी तुम्हारे पास रहेगी।
मुझे तुम पर खुद से भी ज्यादा भरोसा है।” अभिजीत ने बहुत ही आदर के साथ वह चाबी ले ली और तय किया कि वह उस रात ऑफिस में ही रुककर पैसों की रखवाली करेगा। उसने यह बात अपने सबसे पक्के दोस्त नकुल को भी फोन पर बता दी, क्योंकि वह नकुल से कभी कोई बात नहीं छुपाता था। नकुल ने जब पचास लाख रुपये की बात सुनी, तो उसके मन का लालच अचानक जाग उठा। उसके दिमाग में आया कि यह वही मौका है, जिसका वह सालों से इंतज़ार कर रहा था। इतने पैसों से वह अपनी पूरी ज़िंदगी बदल सकता था और उसे फिर कभी किसी के सामने हाथ फैलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
रात के करीब बारह बजे, जब पूरा ऑफिस खाली हो चुका था और केवल एक बूढ़ा चौकीदार बाहर सो रहा था, नकुल चुपके से ऑफिस के पिछले दरवाज़े से अंदर दाखिल हुआ। अभिजीत उस समय सोफे पर बैठा एक फाइल पढ़ रहा था। अचानक अपने सामने नकुल को देखकर वह चौंक गया और मुस्कुराते हुए बोला, “नकुल? तुम इस वक्त यहाँ क्या कर रहे हो? सब ठीक तो है न?” नकुल के चेहरे पर एक अजीब सी बेरुखी थी, जो अभिजीत ने पहले कभी नहीं देखी थी।
नकुल ने बिना किसी भूमिका के कहा, “अभिजीत, मुझे वो तिजोरी की चाबी दे दो। उन पैसों पर तुम्हारा या दयाल साहब का कोई हक नहीं है। उन पैसों से मेरी किस्मत बदलेगी।” अभिजीत को लगा कि नकुल मज़ाक कर रहा है, उसने हंसते हुए कहा, “क्या बकवास कर रहे हो नकुल? यह कंपनी का पैसा है, मेरा या तुम्हारा नहीं। चलो, घर चलो, सुबह बात करेंगे।”
लेकिन नकुल के सिर पर तो लालच का भूत सवार था। उसने अपनी जेब से एक लोहे की रॉड निकाली और चिल्लाया, “मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूँ! सीधे-सीधे चाबी मेरे हवाले कर दो, वरना आज हमारी दोस्ती का अंत बहुत बुरा होगा!” अभिजीत यह देखकर सन्न रह गया कि उसका सबसे प्यारा दोस्त, जिसे वह अपना भाई मानता था, चंद रुपयों के लिए उस पर हमला करने को तैयार था।
दोनों के बीच तीखी बहस होने लगी। अभिजीत ने नकुल को समझाने की बहुत कोशिश की, “नकुल, होश में आओ! यह गलत रास्ता तुम्हें बर्बाद कर देगा। कर्मों का हिसाब यहीं चुकाना पड़ता है।” लेकिन नकुल ने उसकी एक न सुनी। उसने गुस्से में आकर लोहे की रॉड से अभिजीत के सिर पर जोरदार वार कर दिया। अभिजीत लहूलुहान होकर फर्श पर गिर पड़ा। वह बेहोशी की हालत में नकुल को देखता रहा, जिसने उसकी जेब से चाबी निकाली, तिजोरी खोली और सारे पैसे एक बैग में भर लिए।
नकुल ने एक बार भी पीछे मुड़कर अपने मरणासन्न दोस्त की तरफ नहीं देखा और पैसों का बैग लेकर अंधेरे में गायब हो गया। जब सुबह पुलिस और दयाल साहब ऑफिस पहुँचे, तो उन्होंने अभिजीत को खून से लथपथ पाया। अस्पताल में डॉक्टरों ने बड़ी मुश्किल से अभिजीत की जान तो बचा ली, लेकिन उस हमले की वजह से अभिजीत के पैरों ने काम करना बंद कर दिया और वह हमेशा के लिए व्हीलचेयर पर आ गया।
इतना ही नहीं, पुलिस की तफ्तीश में नकुल का कहीं कोई सुराग नहीं मिला, और दयाल साहब को लगा कि शायद अभिजीत भी इस साज़िश में शामिल था, क्योंकि चाबी उसी के पास थी। हालांकि, अभिजीत की हालत देखकर उन्होंने उस पर केस नहीं किया, लेकिन उसे नौकरी से निकाल दिया। अभिजीत पूरी तरह से टूट चुका था—उसकी दोस्ती, उसकी नौकरी, उसकी सेहत सब कुछ एक ही रात में खत्म हो गया था। उसने रोते हुए आसमान की तरफ देखा और कहा, “भगवान, मैंने कभी किसी का बुरा नहीं किया, फिर मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? क्या कर्मों का कोई इंसाफ नहीं है?”
समय का तराजू भाग 2

वक्त का पहिया अपनी रफ्तार से घूमता रहा और इस भयानक हादसे को पूरे बीस साल बीत गए। इन बीस सालों में बहुत कुछ बदल चुका था। नकुल उन पैसों को लेकर एक दूसरे बड़े राज्य के महानगर में भाग गया था, जहाँ उसने अपना नाम बदलकर एक नया बिजनेस शुरू किया था। वह अब शहर के सबसे अमीर और रसूखदार लोगों में गिना जाता था।
उसके पास आलीशान बंगला, गाड़ियाँ और हर तरह की सुख-सुविधा थी। नकुल को लगता था कि वह अपने अतीत से बहुत आगे निकल आया है और कर्म जैसी चीजें सिर्फ कमजोर लोगों के दिलासे के लिए होती हैं। लेकिन नियति अपना जाल बहुत खामोशी से बुनती है। नकुल का एक इकलौता बेटा था, राहुल, जिससे वह अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता था। नकुल ने अपने जीवन की सारी कमाई और खुशियाँ अपने इसी बेटे के नाम कर रखी थीं।
लेकिन अचानक एक दिन, एक भयंकर कार एक्सीडेंट में राहुल गंभीर रूप से घायल हो गया। जब उसे अस्पताल ले जाया गया, तो डॉक्टरों ने बताया कि राहुल के रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई है और देश में सिर्फ एक ही ऐसा डॉक्टर है जो इस तरह के पेचीदा ऑपरेशन को अंजाम देकर उसे दोबारा पैरों पर खड़ा कर सकता है। उस डॉक्टर का नाम था—डॉक्टर आलोक, जो शहर के एक बड़े चैरिटी अस्पताल के मुख्य सर्जन थे।
नकुल बिना एक पल गंवाए उस चैरिटी अस्पताल की तरफ भागा। वहाँ चारों तरफ गरीब और जरूरतमंद मरीजों की भीड़ लगी थी। नकुल ने अपने रसूख और पैसे की धौंस दिखाते हुए रिसेप्शन पर चिल्लाना शुरू किया, “मुझे अभी के अभी डॉक्टर आलोक से मिलना है! मैं उन्हें मुंह मांगी रकम देने को तैयार हूँ, बस मेरे बेटे का ऑपरेशन आज ही होना चाहिए।”
तभी पीछे से एक बेहद शांत और गंभीर आवाज़ आई, “पैसा हर चीज़ नहीं खरीद सकता मिस्टर नकुल, यहाँ सभी मरीज हमारे लिए एक समान हैं।” जैसे ही नकुल ने मुड़कर देखा, उसके पैरों तले की ज़मीन खिसक गई।
व्हीलचेयर पर बैठे एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति, जिनके चेहरे पर गहरे तजुर्बे और शांति की लकीरें थीं, डॉक्टर आलोक के केबिन से बाहर आ रहे थे। वे कोई और नहीं, बल्कि अभिजीत थे। हालांकि अभिजीत खुद डॉक्टर नहीं थे, लेकिन बीस साल पहले दयाल साहब की मृत्यु के बाद, दयाल साहब को अपनी गलती का एहसास हुआ था और उन्होंने अपनी वसीयत में अपनी सारी संपत्ति अभिजीत के नाम कर दी थी।
अभिजीत ने उस संपत्ति का उपयोग खुद के ऐश-ओ-आराम के लिए नहीं किया, बल्कि उसने एक बहुत बड़ा चैरिटी अस्पताल खोला और देश-विदेश के बेहतरीन डॉक्टरों (जिनमें डॉक्टर आलोक भी शामिल थे) को यहाँ लाकर गरीबों के मुफ्त इलाज का इंतजाम किया। अभिजीत इस पूरे ट्रस्ट के चेयरमैन थे।
नकुल अपनी आँखों पर यकीन नहीं कर पा रहा था। बीस साल बाद, वही अभिजीत जिसे उसने अपाहिज और बर्बाद करके छोड़ दिया था, आज उसके सामने जीवन और मृत्यु का फैसला करने वाली जगह पर बैठा था। नकुल का चेहरा डर और शर्म से पीला पड़ गया। वह कांपती आवाज़ में बोला, “अभिजीत… तुम? तुम यहाँ?” अभिजीत ने नकुल को ध्यान से देखा।
उसकी आँखों में न तो कोई गुस्सा था और न ही कोई बदले की भावना। अभिजीत ने बहुत ही धीमे से कहा, “हाँ नकुल, मैं वही अभिजीत हूँ। वक्त ने आज हमें फिर एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ तुम माँगने वाले हो और मैं… खैर, मैं तो सिर्फ एक ज़रिया हूँ।” नकुल तुरंत अभिजीत के पैरों में गिर पड़ा और फूट-फूटकर रोने लगा, “मुझे माफ कर दो भाई! मैंने तुम्हारे साथ बहुत बड़ा धोखा किया था।
उस लालच ने मुझे अंधा कर दिया था। मुझे मेरे कर्मों की सज़ा दे दो, मुझे जेल भेज दो, लेकिन मेरे बेटे को बचा लो। वह बेकसूर है। डॉक्टर आलोक सिर्फ तुम्हारी बात मानेंगे। प्लीज, मेरे बच्चे की जान और उसके पैर बचा लो!” नकुल की हालत देखकर अस्पताल का स्टाफ हैरान था कि इतना अमीर आदमी एक व्हीलचेयर पर बैठे इंसान के सामने इस तरह गिड़गिड़ा रहा था।
अभिजीत ने गहरी सांस ली और नकुल को सहारा देकर उठाने का इशारा किया। उसने कहा, “नकुल, कर्मों का न्याय बहुत अजीब होता है। तुमने मुझसे मेरे पैर छीने थे, और आज कुदरत ने तुम्हें उसी दर्द के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। लेकिन अगर मैं आज तुम्हारे बेटे का इलाज रोकने का आदेश दे दूँ, तो मुझमें और तुममें क्या फर्क रह जाएगा?
तुम्हारा बेटा बेकसूर है, और एक पिता का दर्द मैं समझ सकता हूँ।” अभिजीत ने तुरंत डॉक्टर आलोक को बुलाया और कहा, “डॉक्टर साहब, इस बच्चे का ऑपरेशन तुरंत शुरू कीजिए। इसके इलाज का सारा खर्च हमारा ट्रस्ट उठाएगा।” नकुल यह सुनकर अवाक रह गया। उसने जिस इंसान की ज़िंदगी तबाह की थी, वही इंसान आज उसके बेटे को नई ज़िंदगी दे रहा था। नकुल को समझ आ गया था कि असली न्याय बदला लेने में नहीं, बल्कि सामने वाले को उसकी गलती का ऐसा एहसास कराने में है कि उसकी रूह कांप जाए।
ऑपरेशन थियेटर के बाहर कई घंटे बीत गए। नकुल लगातार हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना कर रहा था और बार-बार अभिजीत की तरफ देख रहा था, जो शांति से अपनी व्हीलचेयर पर बैठा हुआ था। आखिरकार, ऑपरेशन थियेटर का दरवाज़ा खुला और डॉक्टर आलोक मुस्कुराते हुए बाहर आए। उन्होंने कहा, “बधाई हो, ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा।
बच्चा अब खतरे से बाहर है और कुछ ही महीनों में वह अपने पैरों पर चलने लगेगा।” यह सुनते ही नकुल की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने अभिजीत की तरफ देखा, लेकिन इस बार उसकी आँखों में सिर्फ कृतज्ञता और आत्मग्लानि थी। नकुल ने अपनी जेब से एक चेकबुक निकाली और अपनी संपत्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा उस अस्पताल के नाम लिखने लगा। लेकिन अभिजीत ने उसका हाथ रोक दिया और बड़ी आत्मीयता से कहा, “नकुल, इस कागज़ के टुकड़े से तुम अपने गुनाहों का प्रायश्चित नहीं कर सकते।
अगर सच में बदलना चाहते हो, तो अपनी इस दौलत का इस्तेमाल उन लोगों की मदद के लिए करो जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत है। कर्म कभी किसी का कर्ज नहीं रखता। जो तुमने बीस साल पहले बोया था, उसका कड़वा फल तुमने आज चख लिया, और जो दया मैंने आज दिखाई है, उम्मीद है उसका बीज तुम्हारे भीतर एक अच्छा इंसान पैदा करेगा।” नकुल ने रोते हुए हामी भरी और तय किया कि वह अपनी बाकी की ज़िंदगी इंसानी सेवा में लगा देगा। कर्मा ने अपना चक्र पूरा कर लिया था, जहाँ लालच की हार हुई थी और त्याग तथा क्षमा की सबसे बड़ी जीत हुई थी।
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प्रस्तुति: Saying Central Team