भाग्य का घूमता चक्र भाग 1
एक पुराने शहर की तंग गलियों में बसा एक छोटा सा बाज़ार हमेशा चहल-पहल से भरा रहता था। इसी बाज़ार के एक कोने में एक पुरानी मगर बड़ी बर्तनों की दुकान थी, जिसके मालिक का नाम राहुल था। राहुल स्वभाव से बेहद महत्वाकांक्षी, चालाक और पैसों के पीछे भागने वाला इंसान था। उसके लिए रिश्तों और भावनाओं की कोई कीमत नहीं थी, सिवाय उस मुनाफे के जो वह हर रोज़ कमाता था।
उसने व्यापार में हमेशा दूसरों को गिराकर आगे बढ़ने की नीति अपनाई थी। उसी दुकान पर पिछले दस सालों से प्रीतम काम करता था। प्रीतम एक सीधा-साधा, ईमानदार और बेहद दयालु बुजुर्ग था, जो राहुल के पिता के समय से उस दुकान की रीढ़ की हड्डी बना हुआ था। प्रीतम के लिए दुकान सिर्फ काम की जगह नहीं थी, बल्कि उसका मंदिर थी। वह ग्राहकों के साथ हमेशा सच्चाई और प्यार से पेश आता था।
उसी शहर के दूसरे कोने में कुनिका नाम की एक युवती रहती थी। कुनिका एक अनाथ आश्रम और गरीब बच्चों के लिए एक छोटा सा स्कूल चलाती थी। वह स्वभाव से शांत, गंभीर और दूसरों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहने वाली महिला थी। उसकी ज़िंदगी का एक ही मकसद था कि वह उन मासूम बच्चों को एक बेहतर भविष्य दे सके जो समाज द्वारा ठुकराए जा चुके थे।
कुनिका अक्सर राहुल की दुकान से बच्चों के आश्रम के लिए बड़े बर्तन और रसोई का सामान खरीदने आती थी। राहुल हमेशा कुनिका को देखते ही अपने बर्तनों के दाम बढ़ा देता था, क्योंकि वह जानता था कि कुनिका मोल-भाव नहीं करेगी और बच्चों के लिए चुपचाप पैसे दे देगी। प्रीतम को राहुल की यह हरकत बिल्कुल पसंद नहीं आती थी, और वह कई बार पीठ पीछे कुनिका को सही दाम बताकर राहुल के लालच का पर्दाफाश होने से बचाता था।
एक दिन, शहर में एक बड़ा टेंडर निकला। सरकार को एक बहुत बड़े अनाथालय और कम्युनिटी किचन के लिए हज़ारों बर्तनों की ज़रूरत थी। यह डील लाखों रुपये की थी और जो भी इसे जीतता, उसकी किस्मत चमकने वाली थी। राहुल को जैसे ही इस बारे में पता चला, उसकी आंखों में लालच चमक उठा।
उसने तय कर लिया कि वह किसी भी कीमत पर यह टेंडर हासिल करके रहेगा। संयोग से, कुनिका को भी इस टेंडर के बारे में पता चला, लेकिन उसका मकसद मुनाफा कमाना नहीं था। वह चाहती थी कि अगर उसकी संस्था को यह टेंडर मिल जाए, तो वह उन पैसों से बच्चों के लिए एक परमानेंट स्कूल की इमारत बनवा सकेगी। दोनों ने अपनी-अपनी तरफ से आवेदन कर दिया।
राहुल को जब पता चला कि कुनिका भी इस रेस में शामिल है, तो उसने प्रीतम से कहा कि वह कुनिका के आश्रम जाकर उनकी कोटेशन और फाइलों की चोरी करे। प्रीतम ने साफ मना कर दिया और कहा कि वह ऐसा पाप कभी नहीं करेगा। राहुल को प्रीतम की यह ईमानदारी बहुत चुभी।
उसने गुस्से में आकर प्रीतम पर चोरी का झूठा आरोप लगा दिया और उसे पूरी मार्केट के सामने बेइज्जत करके नौकरी से निकाल दिया। प्रीतम ने रोते हुए राहुल से कहा कि उसने जीवन भर उसके परिवार की सेवा की है और यह बदनामी उसकी जान ले लेगी, लेकिन राहुल का दिल नहीं पसीजा। उसने प्रीतम को धक्का देकर दुकान से बाहर निकाल दिया और कहा कि तुम्हारी ईमानदारी से मेरा घर नहीं चलता।
बेघर और बदनाम होने के बाद प्रीतम रोता हुआ सड़क पर बैठ गया। तभी वहां से कुनिका गुज़र रही थी। उसने प्रीतम को इस हालत में देखा तो तुरंत अपनी गाड़ी रोकी और उसे सहारा देकर अपने आश्रम ले आई। जब प्रीतम ने रोते हुए पूरी बात बताई, तो कुनिका की आंखों में आंसू आ गए।
उसने प्रीतम को सांत्वना दी और कहा कि आप कहीं नहीं जाएंगे, आज से आप हमारे इस बड़े परिवार के मुखिया हैं और आप ही हमारे आश्रम की रसोई संभालेंगे। प्रीतम को कुनिका की दयालुता में भगवान का रूप दिखा। उसने मन ही मन फैसला कर लिया कि वह अब अपना पूरा जीवन इस आश्रम और कुनिका की भलाई के लिए समर्पित कर देगा।
इस बीच, राहुल ने चालाकी और रिश्वत के बल पर टेंडर के अधिकारियों को अपने पक्ष में कर लिया। उसने नकली और घटिया क्वालिटी के बर्तनों के सैंपल दिखाकर असली टेंडर हासिल कर लिया। जब कुनिका को पता चला कि उसे टेंडर नहीं मिला, तो वह थोड़ी निराश ज़रूर हुई, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी।
उसने प्रीतम से कहा कि शायद भगवान की कुछ और ही मर्जी है। राहुल अपनी जीत पर बहुत घमंड कर रहा था। उसने बाज़ार में मिठाई बांटी और प्रीतम की तरफ देखकर हंसा, मानो वह कह रहा हो कि तुम्हारी ईमानदारी हार गई और मेरी चालाकी जीत गई। लेकिन राहुल यह भूल गया था कि समय का पहिया हमेशा घूमता रहता है, और कर्म का हिसाब कभी अधूरा नहीं रहता।
भाग्य का घूमता चक्र भाग 2

टेंडर मिलने के बाद राहुल ने मुनाफे के लालच में आकर बेहद घटिया और मिलावटी धातुओं से बने बर्तनों की सप्लाई शुरू कर दी। उसने सोचा कि किसी को क्या ही पता चलेगा। उधर, प्रीतम ने आश्रम की रसोई को इतनी कुशलता से संभाला कि वहां का खाना और व्यवस्था देखकर शहर के कई बड़े दानदाता आकर्षित होने लगे।
कुनिका की निस्वार्थ भावना और प्रीतम के अनुभव ने मिलकर आश्रम को एक नई पहचान दे दी। एक दिन, शहर में एक बहुत बड़ा हादसा हुआ। राहुल द्वारा सप्लाई किए गए बर्तनों में बने खाने की वजह से एक बड़े सरकारी कार्यक्रम में सैकड़ों लोग फूड पॉइज़निंग का शिकार हो गए। जांच बैठी, तो पता चला कि बर्तनों में भारी मात्रा में खतरनाक केमिकल और लेड का इस्तेमाल किया गया था, जो गर्म होने पर खाने में घुल जाता था।
पुलिस और प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई करते हुए राहुल की दुकान और गोदाम को सील कर दिया। राहुल को गिरफ्तार कर लिया गया और उस पर भारी जुर्माना लगाया गया। उसकी सारी संपत्ति, जो उसने बरसों के लालच से बनाई थी, ज़ब्त कर ली गई। राहुल के जो दोस्त और करीबी कल तक उसकी चाटुकारिता करते थे, उन्होंने रातों-रात उससे मुंह मोड़ लिया। राहुल पूरी तरह से बर्बाद हो चुका था और जेल की सलाखों के पीछे अपने कर्मों पर रो रहा था। जब कोर्ट में अंतिम फैसला आया, तो राहुल की दुकान और बची हुई ज़मीन को नीलाम करने का आदेश दिया गया ताकि पीड़ितों को मुआवज़ा दिया जा सके।
नीलामी के दिन, शहर के कई बड़े लोग इकट्ठा हुए थे। राहुल को भी पुलिस की कस्टडी में वहां लाया गया था। वह बेबसी से अपनी उस दुकान को बिकते देख रहा था जिसे उसके पिता ने खून-पसीने से सींचा था। तभी वहां एक बड़ी गाड़ी रुकी और उसमें से कुनिका और प्रीतम उतरे। प्रीतम को देखकर राहुल ने अपनी नज़रें झुका लीं, उसे अपने किए पर बेहद शर्मिंदगी महसूस हो रही थी। नीलामी शुरू हुई और सबसे ऊंची बोली कुनिका ने लगाई। कुनिका ने राहुल की वह पूरी दुकान और संपत्ति खरीद ली। राहुल को लगा कि अब कुनिका और प्रीतम उससे अपना बदला लेंगे और उसकी बची-खुची इज़्ज़त भी मिट्टी में मिला देंगे।
नीलामी खत्म होने के बाद, कुनिका राहुल के पास आई। राहुल ने कांपती आवाज़ में कहा कि तुम लोग जीत गए, मुझे मेरे कर्मों की सजा मिल गई है, अब और क्या देखना बाकी है? कुनिका ने मुस्कुराते हुए राहुल के हाथ में एक कानूनी दस्तावेज़ थमाया।
राहुल ने जब उसे खोलकर देखा, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह उस दुकान के मालिकाना हक के कागज़ात थे, जो अब राहुल की पत्नी और बच्चों के नाम ट्रांसफर कर दिए गए थे। कुनिका ने कहा कि मुझे इस टेंडर के पैसों से जो मुनाफा हुआ और जो दान मिला, उससे मैंने यह दुकान इसलिए खरीदी ताकि आपके मासूम परिवार को सड़क पर न आना पड़े। आपकी गलती की सजा आपके बच्चों को नहीं मिलनी चाहिए।
राहुल फूट-फूट कर रोने लगा। उसने प्रीतम के पैर पकड़ लिए और माफी मांगने लगा कि उसने एक फरिश्ते का अपमान किया था। प्रीतम ने उसे उठाकर गले से लगा लिया और कहा कि बेटा, कर्म कभी किसी को नहीं छोड़ता। तुमने जो बोया था, वही काटा, लेकिन कुनिका ने जो दया बोई थी, आज उसने तुम्हें एक नया जीवन दिया है।
राहुल को समझ आ गया था कि असली जीत पैसों या चालाकी की नहीं, बल्कि इंसानियत और कर्मों की होती है। कुनिका ने उस दुकान का एक हिस्सा गरीब बच्चों के वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर के लिए रख लिया, और राहुल को एक नया मौका मिला कि वह अब ईमानदारी से अपनी ज़िंदगी की शुरुआत कर सके। न्याय और कर्म का यह ऐसा अनूठा फैसला था जिसने हर किसी को भीतर तक झकझोर कर रख दिया था।
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प्रस्तुति: Saying Central Team