नियति भाग 1
एक पुरानी कहावत है कि हवा में उछाला गया पत्थर घूमकर वहीं गिरता है जहाँ से उसे फेंका गया था, बस हम कभी-कभी उसके वापस आने का इंतजार नहीं कर पाते। एक छोटे से शहर के किनारे बसा हुआ वह पुराना लकड़ी का गोदाम और उससे सटा हुआ अनाज का व्यापार कई लोगों की किस्मत का गवाह था। इस पूरे कारोबार को संभालने वाला शख्स था प्रीतम।
प्रीतम शहर का एक ऐसा प्रतिष्ठित व्यापारी था जिसके बारे में लोग कहते थे कि उसकी जुबान ही उसका सबसे बड़ा सिक्का है। वह बेहद दयालु, दूसरों के सुख-दुख में खड़े होने वाला और न्यायप्रिय इंसान था। जब भी किसी गरीब किसान की फसल खराब होती या किसी के घर में पैसों की तंगी होती, प्रीतम बिना किसी स्वार्थ के उसकी मदद के लिए आगे आता था।
उसका मानना था कि हम दुनिया को जो देते हैं, वही कई गुना होकर हमारे पास वापस आता है। लेकिन प्रीतम की यह अच्छाई हर किसी को रास नहीं आती थी, खासकर उसके अपने ही सगे साले राहुल को।
राहुल एक ऐसा इंसान था जिसकी आँखें हमेशा दूसरों की तरक्की देखकर लाल हो जाती थीं। वह प्रीतम के ही व्यापार में उसका मैनेजर था, लेकिन उसके मन में हमेशा यह मलाल रहता था कि सारी इज्जत और सारा मुनाफा प्रीतम के हिस्से में क्यों जाता है।
राहुल के लिए पैसा ही सब कुछ था, और उसे हासिल करने के लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता था। वह अक्सर प्रीतम की पीठ पीछे अनाज में मिलावट करने की कोशिश करता या फिर किसानों के हिस्से के पैसों में हेराफेरी करने के बहाने ढूंढता, लेकिन प्रीतम की पैनी नजर और ईमानदारी के आगे उसकी एक नहीं चलती थी।
राहुल को लगता था कि प्रीतम की वजह से उसकी खुद की तरक्की रुकी हुई है, और यही जलन धीरे-धीरे एक गहरी नफ़रत और लालच में बदलती चली गई। वह बस एक ऐसे मौके की तलाश में था जहाँ वह प्रीतम को रास्ते से हटाकर पूरे साम्राज्य पर कब्जा कर सके।
इसी दौरान इस कहानी में एंट्री होती है कुनिका की, जो राहुल की सगी बहन और प्रीतम की पत्नी थी। कुनिका स्वभाव से बेहद सीधी और अपने परिवार के प्रति समर्पित महिला थी। वह अपने पति की ईमानदारी का सम्मान करती थी, लेकिन अपने भाई राहुल के प्रति उसका एक स्वाभाविक अंधा मोह था।
राहुल बचपन से ही अपनी बातों से कुनिका को प्रभावित कर लेता था, और इस बार भी उसने अपनी इसी कला का इस्तेमाल करने का फैसला किया। राहुल ने धीरे-धीरे कुनिका के कान भरने शुरू कर दिए कि प्रीतम सारा पैसा दान-पुण्य में उड़ा रहा है और एक दिन उनका अपना भविष्य अंधकार में डूब जाएगा।
शुरुआत में कुनिका ने इन बातों पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब राहुल ने कुछ फर्जी कागजात और झूठी कहानियों का सहारा लिया, तो कुनिका के मन में भी अपने भविष्य को लेकर एक अनजाना डर बैठने लगा। वह अनजाने में अपने ही पति के खिलाफ रची जा रही एक बड़ी साजिश का हिस्सा बनने की राह पर चल पड़ी थी।
एक शाम जब आसमान में काले बादल छाए हुए थे और तेज हवाएं चल रही थीं, राहुल ने अपने जीवन का सबसे बड़ा और खौफनाक कदम उठाने की साजिश रची। उसने गोदाम के पिछले हिस्से में जानबूझकर शॉर्ट सर्किट का नाटक किया और वहाँ रखे सूखे अनाज के बोरों के पास आग लगा दी।
उसका मकसद सिर्फ नुकसान पहुंचाना नहीं था, बल्कि वह चाहता था कि प्रीतम इस आग की चपेट में आ जाए या फिर इस बड़े नुकसान के सदमे से कभी उबर न पाए। आग इतनी तेजी से फैली कि देखते ही देखते पूरा गोदाम लपटों से घिर गया।
प्रीतम जब अपनी जान जोखिम में डालकर अंदर फंसे एक बूढ़े मजदूर को बचाने के लिए भागा, तो राहुल ने चुपके से बाहर से गोदाम का मुख्य दरवाजा बंद कर दिया। आग की लपटों के बीच प्रीतम चिल्लाता रहा, लेकिन राहुल ने उसकी आवाज को अनसुना कर दिया और खुद को बेकसूर दिखाने के लिए जोर-जोर से रोने का नाटक करने लगा।
उस भयानक रात ने सब कुछ बदलकर रख दिया। प्रीतम उस आग से किसी तरह बच तो गया, लेकिन उसका पूरा शरीर बुरी तरह झुलस गया और उसकी याददाश्त का एक बड़ा हिस्सा चला गया। वह अपनी पहचान तक भूल चुका था और मानसिक रूप से बेहद कमजोर हो चुका था।
राहुल ने इस स्थिति का पूरा फायदा उठाया। उसने कुनिका को पूरी तरह अपने वश में कर लिया और चालाकी से सारे व्यापार और संपत्ति के कागजात अपने नाम करवा लिए। जब कुनिका ने प्रीतम के इलाज की बात की, तो राहुल ने बड़ी बेरहमी से कहा कि अब इस पागल और अपाहिज इंसान पर पैसा खर्च करना बेवकूफी होगी।
लालच में अंधी हो चुकी और भाई की बातों में फंसी कुनिका ने भी अपने उस पति का साथ छोड़ दिया जिसने कभी उसे अपनी पलकों पर बिठाकर रखा था। प्रीतम को शहर के एक सरकारी अस्पताल के बाहर लावारिस छोड़ दिया गया, जहाँ से वह भटकते हुए कहीं दूर चला गया। राहुल अब उस पूरे साम्राज्य का इकलौता मालिक बन चुका था, और उसे लगता था कि उसने अपनी तकदीर खुद बदल ली है।
नियति भाग 2

वक्त का पहिया कभी एक जगह नहीं रुकता, वह घूमता है और अक्सर उन लोगों को कुचल देता है जो खुद को समय से बड़ा समझने की भूल कर बैठते हैं। इस घटना को पूरे दस साल बीत चुके थे। राहुल अब शहर का सबसे बड़ा और अमीर व्यवसायी बन चुका था, लेकिन उसका घमंड और उसका क्रूर स्वभाव भी सातवें आसमान पर पहुंच चुका था।
उसने किसानों का शोषण करना शुरू कर दिया था और मिलावटी अनाज बेचकर करोड़ों रुपये कमाए थे। लेकिन कहते हैं कि पाप का घड़ा जब भर जाता है, तो उसमें से निकलने वाला पानी सबसे पहले अपने ही घर को डुबोता है।
राहुल का एक इकलौता बेटा था, जिससे वह अपनी जान से ज्यादा प्यार करता था और जिसके लिए उसने यह सारा साम्राज्य खड़ा किया था। अचानक एक दिन उसका बेटा एक ऐसी गंभीर और रहस्यमयी बीमारी की चपेट में आ गया जिसका इलाज शहर के किसी भी बड़े डॉक्टर के पास नहीं था।
राहुल ने अपने बेटे को बचाने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया। देश-विदेश के डॉक्टरों को बुलाया गया, लेकिन हर किसी ने हाथ खड़े कर दिए। इसी बीच राहुल के व्यापार पर भी संकट के बादल मंडराने लगे। सरकार ने उसके मिलावटी अनाज के गोदामों पर छापेमारी की और उसकी सारी संपत्ति को सील कर दिया।
जो लोग कभी राहुल के आगे-पीछे घूमते थे, उन्होंने रातों-रात उससे मुंह मोड़ लिया। राहुल की स्थिति यह हो गई कि उसके पास अपने बेटे की महंगी दवाइयां खरीदने के लिए भी पैसे नहीं बचे। कुनिका, जो कभी अपने भाई के बहकावे में आकर अपनी खुशहाल जिंदगी उजाड़ चुकी थी, अब दाने-दाने को मोहताज हो रही थी।
उसे रह-रहकर प्रीतम की याद आती थी और उसे समझ आ रहा था कि यह सब उनके किए गए पापों का ही नतीजा है। वह हर दिन भगवान से अपने किए की माफी मांगती थी, लेकिन वक्त हाथ से निकल चुका था।
एक दिन जब राहुल का बेटा अस्पताल में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहा था, डॉक्टरों ने कहा कि अब केवल एक ही रास्ता बचा है। शहर के बाहर एक छोटे से आश्रम में एक महात्मा रहते हैं, जो जड़ी-बूटियों के बहुत बड़े ज्ञानी हैं और उन्होंने कई ऐसे मरीजों को ठीक किया है जिन्हें डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया था।
राहुल बिना एक पल गंवाए, अपनी बची-कुची जमापूंजी लेकर उस आश्रम की तरफ भागा। उसके साथ कुनिका भी थी, जिसकी आँखों के आंसू सूखने का नाम नहीं ले रहे थे। जब वे दोनों आश्रम पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि सफेद कपड़ों में एक बुजुर्ग व्यक्ति पीठ फेरकर कुछ दवाइयां कूट रहा था।
राहुल उसके पैरों में गिर पड़ा और रोते हुए बोला कि बाबा, मेरे इकलौते बेटे को बचा लीजिए, मेरे पापों की सजा मेरे मासूम बच्चे को मत दीजिए, मैं अपना सब कुछ हार चुका हूँ।
वह बुजुर्ग धीरे से घूमा, और जैसे ही राहुल और कुनिका ने उनका चेहरा देखा, दोनों के पैरों तले से जमीन खिसक गई। वह कोई और नहीं, बल्कि खुद प्रीतम थे। आग के उस हादसे के बाद उनकी याददाश्त चली गई थी, लेकिन एक सच्चे और भले इंसान के रूप में उनके कर्मों ने उन्हें मरने नहीं दिया था।
एक साधु ने उन्हें सहारा दिया था, और धीरे-धीरे उनकी याददाश्त तो वापस नहीं आई, लेकिन उन्होंने जड़ी-बूटियों का ज्ञान सीखकर लोगों की सेवा करना अपना धर्म बना लिया था। प्रीतम का चेहरा पूरी तरह शांत था, उनकी आँखों में न तो राहुल के लिए कोई नफ़रत थी और न ही कुनिका के लिए कोई शिकायत।
राहुल थर-थर कांपने लगा, उसे लगा कि प्रीतम अब उससे अपना बदला लेगा और उसके बेटे को तड़पने के लिए छोड़ देगा। उसने हाथ जोड़कर कहा कि प्रीतम, मुझे मार डालो, लेकिन मेरे बच्चे को बचा लो।
न्याय का देवता जब फैसला सुनाता है, तो वह किसी हथियार का इस्तेमाल नहीं करता, बल्कि इंसान के अपने ही कर्मों को उसका आइना बना देता है। प्रीतम ने राहुल को उठाकर खड़ा किया और बहुत ही सहज आवाज में कहा कि इस आश्रम के दरवाजे पर आने वाला हर व्यक्ति सिर्फ एक मरीज होता है, और एक वैद्य का धर्म कभी किसी से बदला लेना नहीं सिखाता। प्रीतम ने तुरंत अपनी बनाई हुई विशेष जड़ी-बूटी उठाई और राहुल के बेटे का इलाज करने के लिए अस्पताल चल पड़े।
अगले तीन दिनों तक प्रीतम बिना सोए, बिना कुछ खाए उस बच्चे के सिरहाने बैठे रहे और उसकी देखभाल करते रहे। धीरे-धीरे उस बच्चे की हालत में सुधार होने लगा और वह पूरी तरह ठीक हो गया। राहुल और कुनिका खिड़की के बाहर खड़े होकर अपनी आँखों से कर्म के इस अनूठे चक्र को देख रहे थे। जिस इंसान को उन्होंने आग में झोंककर मरने के लिए छोड़ दिया था, वही आज उनके कुल के दीपक को जीवनदान दे रहा था।
जब बच्चा पूरी तरह स्वस्थ हो गया, तो राहुल प्रीतम के सामने घुटनों के बल बैठ गया और रोते हुए बोला कि तुमने हमें बचाकर हमारी सजा और बढ़ा दी है प्रीतम, काश तुम हमसे बदला ले लेते तो हमारे मन का यह बोझ कम हो जाता।
प्रीतम ने मुस्कुराते हुए कहा कि राहुल, कर्म का हिसाब इंसान नहीं, समय करता है। तुमने जो बोया था, वह तुम्हें भुगतना पड़ा, और मैंने जो बोया था, वह मुझे इस रूप में मिला कि आज मैं किसी की जान बचा पाया। कुनिका ने रोते हुए प्रीतम के पैर छूने चाहे, लेकिन प्रीतम ने उसे रोक दिया और कहा कि अतीत को भूलकर अब एक नई शुरुआत करो, क्योंकि जिंदगी हमेशा सुधरने का एक मौका जरूर देती है।
राहुल ने अपनी बची हुई सारी जिंदगी उस आश्रम की सेवा में बिताने का फैसला किया और अपनी गलतियों का प्रायश्चित किया। न्याय की इस अदालत में जीत किसी इंसान की नहीं, बल्कि निस्वार्थ कर्म और धर्म की हुई थी, जिसने साबित कर दिया कि किस्मत का तराजू हमेशा बिल्कुल सही तोलता है।
अगर आपको ऐसी ही दिलचस्प और प्रेरणादायक कहानियाँ पढ़ना पसंद है, तो हमारे WhatsApp चैनल से जुड़िए — वहाँ रोज़ नई stories सबसे पहले मिलती हैं
प्रस्तुति: Saying Central Team