भूतिया हवेली का इश्क

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रात के ग्यारह बज चुके थे। शहर की चमकती रोशनी पीछे छूट गई थी, और अब सिर्फ सन्नाटा था। नेहा कार की खिड़की से बाहर झाँक रही थी। उसके चेहरे पर घबराहट साफ झलक रही थी। “अरे यार, ये रास्ता सही है ना? इतनी अंधेरी सड़क, लग रहा है जैसे कब्रिस्तान में घुस गए हो!” नेहा ने अपने दोस्त रोहन से कहा, जो ड्राइविंग सीट पर था।

रोहन ने हँसते हुए कहा, “अरे डर मत, नेहा। ये पुरानी हवेली है, जहाँ हमारा ग्रुप स्टे करने वाला है। पार्टी होगी, मस्ती होगी। तू तो हमेशा एडवेंचर की बात करती है।” लेकिन नेहा को अच्छा नहीं लग रहा था। वो इस ट्रिप पर क्यों आई, ये सोचकर ही पछता रही थी। रोहन से उसकी मुलाकात कॉलेज में हुई थी। दोनों के बीच वो वाली स्पार्क थी – नजरें मिलतीं तो दिल धक्-धक् करता। लेकिन रोहन हमेशा दोस्ती की लाइन क्रॉस नहीं करता था। नेहा को लगता, शायद ये ट्रिप कुछ बदल दे।

भूतिया हवेली Part I

कार रुकी तो सामने एक विशाल हवेली खड़ी थी। पुरानी, जर्जर, दीवारों पर लटकती बेलें और खिड़कियों से झाँकते काले परदे। आसपास जंगल जैसा घना इलाका, न दूर कोई घर, न सड़क। ग्रुप के बाकी चार दोस्त – मनीष, प्रिया, विक्की और श्रुति – पहले से ही वहाँ पहुँच चुके थे। “वेलकम टू हॉन्टेड हेवन!” विक्की ने चिल्लाकर कहा, और सब हँस पड़े। लेकिन नेहा की हँसी में डर घुला था।

हवेली का मालिक कोई अमीर जमींदार था, जो 50 साल पहले रहस्यमयी तरीके से गायब हो गया था। लोकल लोग कहते थे, रात को यहाँ अजीब आवाजें आती हैं – औरत की हँसी, कदमों की आहट। लेकिन ग्रुप को ये सब बकवास लग रहा था। “चलो अंदर चलें,” रोहन ने नेहा का हाथ थाम लिया। नेहा का दिल तेज़ धड़का। रोहन का स्पर्श इतना गर्म था, जैसे कोई जादू हो। वो मुस्कुराई, लेकिन अंदर ही अंदर सिहरन हो रही थी।

हवेली के अंदर धूल उड़ रही थी। फर्नीचर पुराना, लटकते स्पाइडर वेब्स। ग्रुप ने टॉर्च जलाकर कमरे तलाशे। नीचे का हॉल बड़ा था, बीच में एक पुराना ग्रैंड पियानो। प्रिया ने मस्ती में पियानो दबाया, तो एक धुन बज उठी – खुद-ब-खुद! सब सन्न रह गए। “ये… ये कैसे?” मनीष ने हकलाते हुए कहा। विक्की ने हँसकर कहा, “विंड का कमाल होगा। चलो, बैग्स रखते हैं।”

रात के 12 बजे पार्टी शुरू हुई। बीयर, म्यूजिक, डांस। नेहा और रोहन कोने में बैठे बातें कर रहे थे। “तू जानती है, नेहा, तुझसे मिलने के बाद मेरा हर दिन स्पेशल हो गया,” रोहन ने धीरे से कहा। नेहा शरमा गई। “रोहन, तू तो हमेशा मस्ती करता रहता है। सीरियस हो जा कभी।” रोहन ने उसका हाथ पकड़ा, “सीरियस हूँ। तू मेरी लाइफ का वो हिस्सा है जो मिसिंग था।” नेहा की आँखें चमक उठीं। वो झुककर रोहन के करीब आई, उनके होंठ लगभग मिलने वाले थे…

तभी ऊपर से एक तेज़ चीख सुनाई दी। “क्या था वो?” श्रुति डर गई। सब ऊपर भागे। पहली मंजिल का गलियारा अंधेरा था। एक कमरे का दरवाजा खुला था। अंदर एक पुराना मिरर, जिसके आगे खून के धब्बे। “ये… ब्लड?” प्रिया ने चिल्लाया। विक्की ने टॉर्च डाली, लेकिन कुछ नहीं। “हैलुसिनेशन होगा। थकान है सबको।”

सब नीचे लौट आए, लेकिन नेहा को नींद नहीं आ रही थी। वो बेडरूम में लेटी थी, जो हवेली के सबसे ऊपरी हिस्से में था। रोहन उसके कमरे के बगल में था। आधी रात को उसे लगा, कोई फुसफुसा रहा है। “नेहा… नेहा…” आवाज़ इतनी करीब थी, जैसे बिस्तर के पास। वो चौंककर उठी। कमरे में ठंडी हवा बह रही थी। खिड़की बंद थी ना? नेहा ने टॉर्च जलाई। मिरर में उसका चेहरा दिखा, लेकिन… पीछे कोई साया? लंबे बालों वाली औरत, सफेद साड़ी में। नेहा चीखी।

रोहन दौड़कर आया। “क्या हुआ?” नेहा ने काँपते हुए कहा, “वो… वो औरत… मिरर में!” रोहन ने चेक किया, कुछ नहीं। “ड्रीम होगा। सो जा। मैं यहीं हूँ।” वो नेहा को गले लगा लिया। नेहा को सुकून मिला। रोहन की गोद में सिर रखकर वो सो गई। लेकिन रात के 2 बजे फिर वही आवाज़ – “नेहा… आ जा मेरे पास…” इस बार रोहन भी सुन गया। दोनों बाहर निकले। गलियारे में ठंडी हवा। अचानक लाइटें झपकने लगीं।

ग्रुप इकट्ठा हो गया। “ये क्या हो रहा है?” मनीष ने कहा। विक्की ने कहा, “चलो चेक करते हैं। शायद कोई जानवर।” लेकिन नीचे हॉल में पियानो फिर बज रहा था। धुन पुरानी, उदास – जैसे कोई प्रेम गीत। नेहा को याद आया, हवेली की कहानी। जमींदार की बीवी राधा थी, जो प्रेग्नेंट थी। जमींदार ने उसे छोड़ दिया था किसी दूसरी औरत के लिए। राधा ने सुसाइड कर लिया, लेकिन आत्मा हवेली में भटकती है। वो उन लड़कियों को अपना बनाना चाहती है जो यहाँ आती हैं।

“ये सब बकवास है,” रोहन ने कहा, लेकिन उसकी आवाज़ काँप रही थी। नेहा ने कहा, “रोहन, हमें जाना चाहिए।” तभी प्रिया चीखी। वो गायब हो गई! सबने तलाशा, लेकिन कहीं नहीं। अचानक प्रिया की आवाज़ ऊपर से आई, “हेल्प… यहाँ आओ…” ग्रुप ऊपर भागा। प्रिया एक कमरे में थी, बेहोश। उसके गले पर नीले निशान – जैसे किसी ने गला दबाया हो।

सुबह होने को थी। ग्रुप डरा हुआ था। नेहा रोहन से चिपकी हुई थी। “रोहन, मुझे डर लग रहा है। तू मेरे साथ रहना।” रोहन ने कहा, “हाँ, मैं हूँ ना। कुछ नहीं होगा।” लेकिन नेहा को लग रहा था, राधा की आत्मा उसे बुला रही है। क्यों? क्योंकि रोहन पर उसका क्रश था, और राधा को जलन हो रही थी?

दिन भर ग्रुप ने हवेली एक्सप्लोर की। पुरानी डायरी मिली – राधा की। उसमें लिखा था, “मेरा रोहन मुझे छोड़ गया। मैं कभी नहीं जाऊँगी। जो भी मेरी तरह प्यार करेगी, उसे मैं अपने साथ ले लूँगी।” नेहा की साँसें थम गईं। रोहन? जमींदार का नाम भी रोहन था!

शाम ढली। ग्रुप ने भागने का प्लान बनाया। लेकिन कार स्टार्ट नहीं हो रही। जंगल में फोन सिग्नल नॉट। रात हुई। फिर वही आवाज़ – “रोहन… मेरा रोहन…” नेहा ने रोहन को रोका, “मत जाना!” लेकिन रोहन ने कहा, “प्रिया को चेक करता हूँ।” वो गया, और…

भूतिया हवेली का इश्क

भूतिया हवेली Part II

रोहन गया और पलक झपकते ही गायब! नेहा की चीख हवेली में गूँज उठी। “रोहन! रोहन कहाँ हो?” ग्रुप वाले दौड़े। विक्की ने टॉर्च घुमाई, लेकिन गलियारा खाली। सिर्फ हवा में ठंडक और राधा की हँसी – हल्की, कर्कश। “वो… वो ले गई!” श्रुति रोने लगी। मनीष ने कहा, “क्या बकवास? रोहन कहीं छुपा होगा। ढूँढो!” लेकिन नेहा जानती थी – राधा ने अपना रोहन वापस ले लिया।

नेहा का दिल टूट रहा था। रोहन के बिना ये हवेली कब्र बन चुकी थी। प्रिया अभी भी बेहोश थी। नेहा ने उसे जगाया। “प्रिया, क्या हुआ था? किसने गला दबाया?” प्रिया काँपते हुए बोली, “वो औरत… सफेद साड़ी वाली। उसने कहा, ‘रोहन मेरा है। तू दूर रह!’ नेहा, वो तुझे जलन की नजर से देख रही थी।” नेहा को झुरझुरी लगी। राधा की डायरी याद आई – “मेरा रोहन…” क्या वो नेहा को अपना समझ रही थी? या खत्म कर देगी?

ग्रुप ने फैसला किया – हवेली के सबसे नीचे, बेसमेंट में जाना। वहाँ जमींदार का सीक्रेट रूम था, लोकल स्टोरी के मुताबिक। शायद राधा का राज खुल जाए। सीढ़ियाँ कर्कश थीं, हर कदम पर धूल उड़ती। नीचे अंधेरा गहरा। टॉर्च की रोशनी में दीवारों पर पेंटिंग्स – राधा और रोहन (जमींदार) की। राधा खूबसूरत, लेकिन आँखों में पागलपन। विक्की ने एक पुराना लॉकर खोला। अंदर चिट्ठियाँ। नेहा ने पढ़ी:

“मेरे प्यारे रोहन, तूने मुझे धोखा दिया। वो दूसरी औरत… मैं तुझे कभी नहीं छोड़ूँगी। हमारा बच्चा भी तेरे साथ रहेगा। राधा।”

नेहा के हाथ काँपे। बच्चा? तभी फर्श हिल गया। नीचे से पानी की आवाज़ – जैसे कोई कुआँ हो। मनीष ने चिल्लाया, “भागो!” लेकिन देर हो चुकी। दरवाजा पटक से बंद। अंधेरा। नेहा को किसी ने हाथ पकड़ा – ठंडा, नरम। “रोहन?” लेकिन वो राधा थी! “तू मेरी तरह प्यार करती है ना? आ, मेरे रोहन के पास चल।” नेहा छुड़ाई, लेकिन राधा की पकड़ मजबूत।

उसके दिमाग में फ्लैशबैक: कॉलेज का पहला दिन। रोहन ने नेहा को कॉफी दी थी। “तू अलग है, नेहा।” धीरे-धीरे बातें, लेट नाइट चैट्स। नेहा को रोहन से प्यार हो गया था। लेकिन अब वो प्यार ही उसकी जान लेने वाला था। राधा फुसफुसाई, “वो मेरा था। तू भी बन जा। हम तीनों साथ रहेंगे।”

विक्की ने किसी तरह लाइटर जलाया। बेसमेंट में एक छोटा सा चैंबर – राधा का शव! सूखा, लेकिन साड़ी वही सफेद। उसके पास एक लॉकेट – रोहन का नाम उकेरा। नेहा ने छुआ, तो विजन आया। राधा की आखिरी रात: जमींदार रोहन दूसरी शादी कर रहा था। राधा ने जहर खाया, लेकिन आत्मा कुएँ में समा गई। “मुझे मुक्ति दे… अपना प्यार छोड़,” राधा की आवाज़ गूँजी।

ग्रुप ने भागने की कोशिश की। सीढ़ियाँ चढ़ते ही प्रिया गिर पड़ी। उसके पैरों पर खरोंचें – जैसे नाखूनों से। “वो पीछे है!” सब ऊपर पहुँचे, लेकिन हवेली का दरवाजा लॉक। बाहर बारिश शुरू। बिजली चमकी, तो खिड़की से दिखा – रोहन! जंगल में खड़ा, आँखें खाली। नेहा चिल्लाई, “रोहन!” लेकिन वो मुस्कुराया – राधा की मुस्कान।

रात के 3 बजे। ग्रुप हॉल में इकट्ठा। श्रुति रो रही थी। मनीष ने कहा, “हमें राधा को शांत करना होगा। उसकी डायरी में लिखा – ‘अगर कोई मेरा प्यार दोबारा दे तो मुक्ति मिलेगी।'” नेहा बोली, “कैसे? रोहन तो…” तभी रोहन अंदर आ गया। लेकिन वो रोहन नहीं था। आँखें सफेद, आवाज़ बदली। “नेहा… आ मेरे पास। राधा कहती है, तू मेरी बहन बनेगी।” नेहा पीछे हटी। रोहन ने बढ़कर गले लगाने की कोशिश की। विक्की ने धक्का दिया। रोहन गिरा, सिर फट गया। खून बहा, लेकिन वो उठा – ज़िंदा!

डर से सब बिखर गए। नेहा भागी, रोहन के कमरे में छुपी। वहाँ उसकी शर्ट पर खून के धब्बे। नेहा रोई। “रोहन, अगर तू सुन रहा है, मुझे बचा ले। मैं तुझसे प्यार करती हूँ। राधा को जाने दे।” अचानक रोहन आया – असली रोहन? “नेहा! मैं बेसमेंट में फँसा था। राधा ने मुझे कंट्रोल किया।” दोनों गले मिले। रोमांस का पल – किस, आँसू। लेकिन राधा की हँसी…

सुबह हुई। ग्रुप ने कार ठीक की। लेकिन प्रिया गायब। बाहर जंगल में उसका शव – गला दबा। नेहा रोई। रोहन ने कहा, “हम पुलिस को बताएँगे।” कार स्टार्ट हुई, लेकिन नेहा को मिरर में राधा दिखी – पीछे बैठी। “ये खत्म नहीं हुआ।”

ट्रिप से लौटे तो नेहा को बुखार। सपने आते – राधा रोहन को छीन लेती। एक रात नेहा जागी। रोहन सो रहा था। लेकिन उसके गले पर नीले निशान। नेहा चीखी। रोहन उठा, “क्या हुआ?” लेकिन उसकी आँखें… सफेद। “नेहा, अब तू भी हमारी हो।”

कुछ महीने बाद। नेहा अकेली। रोहन गायब। हवेली की कहानी फैल चुकी। लोकल्स कहते, एक नई लड़की भटक रही – नेहा। राधा ने अपना प्यार शेयर कर लिया। लेकिन क्या नेहा मुक्त हो पाएगी?

भूतिया हवेली Part 3

सूरज की पहली किरण हवेली की टूटी खिड़कियों से अंदर आई तो कमरा पीली, बीमार-सी रोशनी में नहा गया। नेहा अभी भी एक कोने में बैठी थी, आँखें सूजी हुई, चेहरा सफेद। रोहन के गायब होने के बाद से उसके अंदर जैसे कुछ टूट गया था। हवेली अब सिर्फ डरावनी जगह नहीं रही थी; वो उसके लिए एक ऐसा घाव बन गई थी, जो हर सांस के साथ और गहरा हो रहा था। 

प्रिया का शव बाहर मिलने के बाद ग्रुप में कोई भी ठीक से बोल नहीं पा रहा था। श्रुति बार-बार काँपते हाथों से मुँह ढक लेती, मनीष गुस्से में दीवार पर मुक्का मारता, और विक्की अब तक अपनी हँसी खो चुका था। नेहा चुप थी, लेकिन उसकी चुप्पी में अजीब-सी बेचैनी थी। उसे बार-बार लग रहा था कि हवेली उसे देख रही है, समझ रही है, और किसी अनदेखे धागे से अपनी तरफ खींच रही है।

दोपहर के वक्त जब सब नीचे हॉल में इकट्ठा थे, तब फर्श के बीच वाले पुराने हिस्से से हल्की-सी चरमराहट सुनाई दी। विक्की ने झुककर धूल हटाई तो वहाँ लकड़ी का एक पतला ढक्कन दिखा। नीचे एक तंग सुरंग थी, जो हवेली के पुराने हिस्से की तरफ जाती थी। मनीष ने तुरंत मना किया, लेकिन नेहा उठ खड़ी हुई।

“अगर रोहन कहीं है,” उसने टूटी आवाज़ में कहा, “तो मुझे वहाँ जाना होगा।”

किसी के पास उसे रोकने की ताकत नहीं बची थी। सबने टॉर्च उठाई और नीचे उतर गए। सुरंग में हवा सड़ी हुई थी, जैसे सालों से वहाँ किसी ने सांस ही न ली हो। दीवारों पर नमी थी और कहीं-कहीं पुराने पंजों जैसे निशान। आगे बढ़ते हुए वे एक छोटे से कमरे में पहुँचे, जहाँ दीवार के साथ लगी एक लोहे की अलमारी थी। उसके ऊपर धूल नहीं थी, जैसे किसी ने हाल ही में छुआ हो।

नेहा ने काँपते हाथों से अलमारी खोली। अंदर एक पुरानी लाल चुनरी, एक टूटे हुए कंगन के टुकड़े और एक काला-सा ताबीज़ था। ताबीज़ उठाते ही नेहा की आँखों के सामने धुंध छा गई। उसे अचानक किसी औरत की धीमी, टूटी हुई साँसें सुनाई देने लगीं। फिर एक आवाज़ — बहुत करीब, बहुत साफ़।

भूतिया हवेली का इश्क

“वो मेरा था… और अब भी मेरा है।”

नेहा चीखकर पीछे हटी। कमरे में ठंडी हवा भर गई। मनीष ने टॉर्च घुमाई, लेकिन कुछ दिखाई नहीं दिया। तब दीवार पर लगी पुरानी लकड़ी अपने-आप खिसकी और उसके पीछे एक और कमरा खुल गया। उस कमरे में एक बड़ा-सा आईना टंगा था, लेकिन आईने में उनका प्रतिबिंब कुछ देर बाद आता था। पहले फर्श खाली दिखता, फिर नेहा का साया हिलता। सबके रोंगटे खड़े हो गए।

आईने के सामने राधा खड़ी थी।

सफेद साड़ी, भीगे बाल, फीका चेहरा, और आँखों में ऐसी जलन, जैसे सदियों से आग जल रही हो। इस बार वह सिर्फ डर नहीं दे रही थी, बल्कि दुख भी दे रही थी। नेहा ने देखा, राधा के पीछे रोहन खड़ा था — नहीं, उसका आधा चेहरा अंधेरे में था, और आँखें किसी जिंदा इंसान जैसी नहीं थीं। वह जैसे दो दुनियाओं के बीच फँसा हुआ था।

“रोहन!” नेहा ने दौड़कर आईने की तरफ हाथ बढ़ाया।

राधा हँसी। “नाम उसका मत ले। इस हवेली में नाम भी क़ैद हो जाते हैं।”

तभी मनीष ने हिम्मत करके ताबीज़ उठाया। ताबीज़ पकड़ते ही उसके हाथ जलने लगे, पर उसने गिराया नहीं। उसने पास पड़ी लाल चुनरी राधा के सामने फेंकी और जोर से बोला, “अगर तेरा प्यार सच्चा था, तो उसे बाँध मत! छोड़ दे!”

कमरे में एक तेज़ धमाका हुआ। आईना दरक गया। राधा की चीख ऐसी थी जैसे किसी ने पुराने घाव को फिर से फाड़ दिया हो। दीवारें काँपने लगीं। रोहन अचानक आईने के भीतर से बाहर गिरा, ज़मीन पर लुढ़क गया। नेहा भागकर उसके पास पहुँची। वह बेहोश था, लेकिन सांस चल रही थी।

राधा अब सामने नहीं थी, सिर्फ उसका धुँधला-सा आकार बचा था। उसकी आवाज़ पूरे कमरे में गूँजी। “मुझे छोड़ा नहीं गया था… मुझे मिटा दिया गया था।”

नेहा के भीतर कुछ टूटकर जुड़ा। उसे समझ आ गया कि राधा सिर्फ जलन की आत्मा नहीं थी; वह धोखे और अकेलेपन का बोझ उठाए हुए एक अधूरा सच थी। नेहा ने रोहन का हाथ पकड़ा और कांपती आवाज़ में कहा, “तुझे जो दर्द मिला, उसने तुझे राक्षस बना दिया। लेकिन अब ये खत्म होना चाहिए।”

वह राधा की टूटी चुनरी लेकर जली हुई मोमबत्ती के पास गई। फिर बहुत धीरे से बोली, “जिसे प्यार मिला ही नहीं, उसे शांति मिलनी चाहिए।”

चुनरी ने आग पकड़ ली। उस पल हवेली के भीतर से ऐसा गर्जन उठा जैसे कोई पुरानी आत्मा आख़िरी बार साँस छोड़ रही हो। आईना पूरी तरह टूट गया। खिड़कियाँ एक साथ खुलीं, और तेज़ हवा के साथ राधा की परछाईं धुएँ की तरह बिखर गई।

सब गिर पड़े। जब धूल बैठी तो कमरा शांत था। बहुत शांत।

रोहन कुछ देर बाद उठा। उसकी आँखें अब सामान्य थीं, लेकिन चेहरा थका हुआ। वह नेहा को देखता रहा, जैसे उसे यकीन ही नहीं हो रहा हो कि वह अभी भी जिंदा है। नेहा ने रोते हुए उसे गले लगा लिया। इस बार उसके गले लगने में डर नहीं था — सिर्फ राहत थी, और बहुत सारी अधूरी बातें।

शाम होते-होते हवेली का दरवाज़ा अपने-आप खुल गया। जैसे किसी ने उन्हें जाने की इजाज़त दे दी हो। मनीष, श्रुति और विक्की बाहर निकले, लेकिन नेहा आख़िरी बार पीछे मुड़ी। अब हवेली वैसी नहीं लग रही थी जैसी पहले लगती थी। वह टूटी हुई थी, थकी हुई थी, और भीतर कहीं एक कहानी समाप्त हो चुकी थी।

रोहन ने उसका हाथ थामा। “चलो,” उसने कहा, “अब यहाँ कुछ बचा नहीं।”

नेहा ने एक लंबी साँस ली। उसने पहली बार इस बात को दिल से स्वीकार किया कि कुछ प्रेम बचाने लायक नहीं होते, कुछ आत्माएँ मुक्त होने के लिए ही भटकती हैं, और कुछ घावों का इलाज सिर्फ विदाई होती है।

वे सड़क पर उतर आए। पीछे हवेली अंधेरे में खो गई। न कोई हँसी, न कोई पुकार, न कोई साया। सिर्फ हवा में हल्की-सी सिसकी थी, जो धीरे-धीरे सन्नाटे में बदल गई।

कुछ महीने बाद नेहा और रोहन ने उस जगह के बारे में कभी बात नहीं की। लेकिन उन्होंने एक नया घर शुरू किया — ऐसा घर जहाँ खिड़कियाँ खुली रहतीं, रौशनी जलती रहती, और रातें डर से नहीं, चैन से गुजरतीं।

और पुरानी हवेली?

अब वहाँ सिर्फ जंगली बेलें थीं, टूटी दीवारें थीं, और एक खामोश आँगन।

कहते हैं, कभी-कभी आधा टूटा प्यार भी अगर सच में छोड़ दिया जाए, तो उसकी आत्मा भी मुक्त हो जाती है।  

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