गाँव की हवेली में आरव

“उस हवेली का दरवाज़ा रात 2 बजे खुद खुलता था… और अंदर से आती थी बच्चों के रोने की आवाज़!”

Join WhatsApp
Join Now
Join Facebook
Join Now

बरसात की वह रात आज भी उत्तर प्रदेश के छोटे से गाँव “भैरवपुर” के लोगों को सोने नहीं देती थी। गाँव के चारों तरफ फैले घने बांस के जंगल, बीच में बहती सूखी पड़ चुकी नदी, और नदी के उस पार बनी पुरानी हवेली… सब कुछ किसी बुरे सपने जैसा लगता था। उस हवेली को लोग “काली हवेली” कहते थे। कहते हैं कि वहाँ पिछले पचास सालों से कोई इंसान ज़िंदा नहीं रह पाया। जो भी गया… या तो पागल होकर लौटा, या फिर उसकी लाश मिली। लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि हर अमावस्या की रात हवेली के अंदर से औरतों के चीखने और बच्चों के रोने की आवाज़ें आती थीं।

गाँव वाले उस जगह का नाम तक लेने से डरते थे। शाम ढलते ही हर घर के दरवाज़े बंद हो जाते, और कोई भी नदी पार करने की हिम्मत नहीं करता। बच्चों को डराने के लिए माँएँ कहती थीं— “सो जा वरना काली हवेली वाली औरत आ जाएगी…” और बच्चे डर के मारे काँपने लगते। लेकिन गाँव में रहने वाला 27 साल का पत्रकार “आरव” इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

उसे लगता था कि ये सब सिर्फ अंधविश्वास है, लोगों की बनाई कहानियाँ हैं। वह शहर से अपने बीमार पिता को देखने गाँव लौटा था, लेकिन लौटते ही उसे हवेली के पीछे छुपे उस रहस्य के बारे में पता चला जिसने पूरे गाँव को दशकों से डराकर रखा था।

एक रात आरव अपने पुराने दोस्त मुकेश के साथ चाय की दुकान पर बैठा था। दुकान के बाहर बारिश हो रही थी और बिजली बार-बार चमक रही थी। तभी दुकान के बूढ़े मालिक रामलाल ने धीरे से कहा— “बाबू… अगर जान प्यारी है ना… तो उस हवेली के पास मत जाना।” उसकी काँपती आवाज़ सुनकर आरव मुस्कुरा दिया। उसने मज़ाक उड़ाते हुए कहा— “क्या वहाँ सच में भूत रहते हैं?” यह सुनते ही दुकान पर बैठे बाकी लोग अचानक चुप हो गए। कुछ लोगों ने तो डर के मारे अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया। रामलाल ने बीड़ी का लंबा कश लिया और फुसफुसाया— “भूत नहीं बाबू… उससे भी बुरा कुछ है वहाँ…”

उस रात आरव को नींद नहीं आई। उसके दिमाग में बार-बार वही शब्द घूम रहे थे— “उससे भी बुरा…” आखिर ऐसा क्या था उस हवेली में? अगले दिन उसने गाँव के कई बुज़ुर्गों से बात की, लेकिन कोई खुलकर कुछ बताने को तैयार नहीं हुआ। हर कोई बस इतना कहता— “वहाँ मौत रहती है।” तभी एक बूढ़ी औरत ने काँपते हाथों से आरव को एक पुरानी तस्वीर दी। तस्वीर में वही हवेली थी, लेकिन उसके सामने खड़ा था एक आदमी जिसके चेहरे पर अजीब मुस्कान थी। बूढ़ी औरत ने डरते हुए कहा— “ये ठाकुर विराज सिंह था… उस हवेली का मालिक… जिसने अपनी पत्नी और बच्चों को जिंदा दीवार में चुनवा दिया था…”

आरव की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। उसने पूछा— “लेकिन क्यों?” बूढ़ी औरत की आँखों में डर उतर आया। वह धीरे से बोली— “क्योंकि वो इंसान नहीं था… वो तंत्र साधना करता था। अमर होना चाहता था।” यह कहकर वह औरत अचानक रोने लगी। उसके होंठ काँप रहे थे। “उस रात पूरी हवेली से चीखें आ रही थीं… बच्चों की चीखें… और फिर अचानक सब शांत हो गया। अगले दिन जब गाँव वाले पहुँचे… हवेली के सारे दरवाज़े अंदर से बंद थे… लेकिन ठाकुर कहीं नहीं मिला।”

उस शाम आरव अकेला नदी के किनारे खड़ा हवेली को देख रहा था। सूरज डूब चुका था और आसमान में काले बादल छा गए थे। हवेली दूर से किसी विशाल काले राक्षस की तरह दिखाई दे रही थी। टूटी खिड़कियाँ, दीवारों पर उगी काई, और हवेली के ऊपर मंडराते कौवे… सब कुछ इतना डरावना था कि एक पल के लिए आरव भी असहज हो उठा। तभी अचानक उसे लगा जैसे हवेली की सबसे ऊपर वाली खिड़की में कोई खड़ा उसे देख रहा है। सफेद चेहरा… लंबा काला बाल… और चमकती हुई लाल आँखें।

आरव का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने आँखें मलीं, लेकिन अगली ही बिजली चमकते ही वह चेहरा गायब हो चुका था। उसी समय पीछे से किसी ने उसका कंधा पकड़ लिया। डर के मारे वह लगभग चिल्ला पड़ा। पीछे मुड़कर देखा तो मुकेश था। उसने घबराई आवाज़ में कहा— “पागल हो गया है क्या? यहाँ अकेले क्या कर रहा है?” आरव ने उसे खिड़की वाली बात बताई, लेकिन मुकेश का चेहरा सफेद पड़ गया। वह तुरंत बोला— “चल यहाँ से… अभी… इसी वक्त…”

दोनों तेज़ी से गाँव की तरफ लौटने लगे। रास्ते में मुकेश अचानक रुक गया। उसका चेहरा पसीने से भीग चुका था। उसने काँपती आवाज़ में कहा— “आरव… मैं तुझे एक बात बताना चाहता हूँ… लेकिन कसम खा कि तू किसी को नहीं बताएगा।” आरव ने हामी भरी। मुकेश ने धीरे-धीरे बताया कि पाँच साल पहले उसका छोटा भाई सोनू और उसके तीन दोस्त अमावस्या की रात हवेली में गए थे। वे लोग सुबह तक वापस नहीं लौटे। अगले दिन गाँव वालों ने उन्हें हवेली के पीछे वाले पुराने कुएँ में पाया… लेकिन उनकी हालत देखकर हर कोई काँप उठा था।

“उनके शरीर पर अजीब निशान थे…” मुकेश की आवाज़ टूट रही थी। “जैसे किसी ने नाखूनों से पूरा शरीर फाड़ दिया हो… और उनकी आँखें… उनकी आँखें गायब थीं…” यह कहते-कहते उसकी साँसें तेज़ हो गईं। “सिर्फ सोनू जिंदा था… लेकिन वो बार-बार एक ही बात बोल रहा था— ‘वो दीवारों के अंदर रहते हैं… वो भूखे हैं…’ और फिर उसने खुद अपनी जीभ काट ली…” यह सुनकर आरव के हाथ ठंडे पड़ गए।

उस रात जब आरव अपने घर पहुँचा, तो बाहर तेज़ तूफान शुरू हो चुका था। खिड़कियाँ अपने आप हिल रही थीं और दूर कहीं कुत्ते लगातार रो रहे थे। वह अपने कमरे में बैठा हवेली के बारे में नोट्स लिख रहा था कि तभी अचानक बिजली चली गई। पूरा घर अंधेरे में डूब गया। तभी उसे ऊपर वाली मंज़िल से किसी के चलने की आवाज़ सुनाई दी। “ठक… ठक… ठक…” जैसे कोई भारी चीज़ घसीटते हुए चल रहा हो।

आरव ने टॉर्च उठाई और धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। ऊपर पहुँचते ही ठंडी हवा का झोंका उसके चेहरे से टकराया। सामने वाला कमरा खुला हुआ था जबकि उसने उसे बंद किया था। कमरे के अंदर घुप अंधेरा था। तभी टॉर्च की रोशनी दीवार पर पड़ी… और आरव की साँस रुक गई। दीवार पर खून से लिखा था— “मत जाओ हवेली में…”

उसका दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि उसे खुद अपनी साँसें सुनाई दे रही थीं। वह पीछे हटने लगा, तभी अचानक कमरे के अंदर से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई। बहुत धीमी… लेकिन बेहद दर्दनाक। आरव डरते हुए अंदर बढ़ा। कमरे में कोई नहीं था। लेकिन तभी उसकी नज़र कमरे के कोने में पड़े पुराने आईने पर गई। आईने में उसे अपना प्रतिबिंब नहीं दिख रहा था… बल्कि एक औरत खड़ी थी।

उस औरत का चेहरा बुरी तरह जला हुआ था। उसकी आँखों से खून बह रहा था और होंठ पूरी तरह फटे हुए थे। वह धीरे-धीरे मुस्कुरा रही थी। अचानक उसने अपना हाथ उठाया और आईने के अंदर से ही दीवार की तरफ इशारा किया। अगले ही पल आईना जोर से टूट गया। पूरा कमरा काँच के टुकड़ों से भर गया। आरव चीखता हुआ नीचे भागा। उसकी हालत खराब हो चुकी थी। लेकिन उसके मन में अब एक ही सवाल था— “वो औरत कौन थी… और उसने दीवार की तरफ क्यों इशारा किया?”

अगली सुबह आरव ने उसी कमरे की दीवार तोड़ने का फैसला किया। उसने मजदूर बुलाए, लेकिन जैसे ही उन्होंने काम शुरू किया, एक मजदूर अचानक जोर-जोर से चिल्लाने लगा। उसकी आँखें उलट गईं और वह पागलों की तरह बोलने लगा— “उन्हें बाहर मत निकालो… वो जाग जाएँगे…” फिर उसने हथौड़ा उठाकर खुद के सिर पर मारना शुरू कर दिया। बाकी मजदूर डरकर भाग गए। पूरा कमरा सन्नाटे में डूब गया।

आरव अब खुद दीवार तोड़ने लगा। जैसे-जैसे प्लास्टर टूट रहा था, कमरे में अजीब सड़ी हुई बदबू फैलती जा रही थी। उसका दिल बैठता जा रहा था। अचानक दीवार के अंदर से किसी इंसानी हाथ की उंगलियाँ दिखाई दीं। आरव के हाथ काँप गए। उसने तेजी से बाकी हिस्सा तोड़ा… और अगले ही पल उसकी चीख निकल गई।

दीवार के अंदर तीन छोटे बच्चों के कंकाल खड़े थे… जैसे उन्हें जिंदा ही दीवार में चुन दिया गया हो। उनकी खाली आँखों के गड्ढे सीधे आरव की तरफ देख रहे थे। लेकिन सबसे डरावनी बात अभी बाकी थी। उन कंकालों के बीच एक पुरानी डायरी रखी थी… जिस पर खून से लिखा था—

“अमावस्या की रात दरवाज़ा फिर खुलेगा… और इस बार उन्हें नया शरीर चाहिए…”

उसी समय पूरे घर की दीवारें अचानक काँपने लगीं। ऊपर से बच्चों के हँसने की आवाज़ आने लगी। फिर किसी औरत की डरावनी चीख पूरे घर में गूँज उठी। आरव घबराकर पीछे हटा… लेकिन तभी उन कंकालों में से एक का सिर धीरे-धीरे उसकी तरफ घूम गया…

…और उसकी खाली आँखों के गड्ढों से ताज़ा खून बहने लगा।

गाँव की हवेली में आरव

Part 2 गाँव “भैरवपुर”

कमरे की हवा अचानक इतनी ठंडी हो गई कि आरव की साँसें धुएँ की तरह बाहर निकलने लगीं। उसके सामने खड़े उन तीनों बच्चों के कंकाल अब धीरे-धीरे हिल रहे थे। उनकी गर्दनें टेढ़ी होकर उसकी तरफ मुड़ चुकी थीं और खाली आँखों के गड्ढों से लगातार ताज़ा खून टपक रहा था। पूरे कमरे में बच्चों की धीमी हँसी गूँज रही थी, लेकिन वह हँसी मासूम नहीं थी… उसमें ऐसा दर्द था जो किसी इंसान को पागल कर दे। आरव डर के मारे पीछे हटते हुए दीवार से टकरा गया। तभी अचानक उन कंकालों के पीछे अंधेरे में किसी औरत की परछाई उभरी।

वह वही जली हुई औरत थी जिसे उसने आईने में देखा था। इस बार उसका चेहरा और भी भयानक लग रहा था। उसकी त्वचा जगह-जगह से फटी हुई थी, आँखें पूरी तरह सफेद हो चुकी थीं, और उसके होंठों के बीच से कीड़े रेंग रहे थे। लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि वह औरत हवा में खड़ी थी… उसके पैर जमीन को छू ही नहीं रहे थे। उसने धीरे-धीरे अपना सिर टेढ़ा किया और फुसफुसाई— “उन्हें बाहर क्यों निकाला…?” उसकी आवाज़ किसी इंसान जैसी नहीं थी। ऐसा लग रहा था जैसे कई मरी हुई आवाज़ें एक साथ बोल रही हों।

अचानक कमरे का दरवाज़ा जोर से बंद हो गया। पूरा घर काँपने लगा। छत से मिट्टी गिरने लगी और दीवारों के अंदर से चीखों की आवाज़ें आने लगीं। ऐसा लग रहा था जैसे सैकड़ों लोग दीवारों में कैद होकर मदद माँग रहे हों। आरव ने पूरी ताकत से दरवाज़ा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह हिल भी नहीं रहा था। तभी पीछे से किसी छोटे बच्चे की आवाज़ आई— “भैया… हमें बहुत दर्द हो रहा है…” उसकी आवाज़ इतनी मासूम थी कि एक पल के लिए आरव का डर कम हो गया। उसने धीरे से पीछे मुड़कर देखा।

तीनों कंकाल अब बच्चे बन चुके थे।

👉 भूतिया हवेली का इश्क एक ऐसी हवेली… जहाँ आधी रात के बाद सिर्फ चीखें नहीं, अधूरा प्यार भी भटकता है।

उनके शरीर पर मिट्टी लगी हुई थी, आँखों से खून बह रहा था, और उनके हाथों में जंग लगी लोहे की जंजीरें थीं। उनमें से एक छोटा लड़का धीरे-धीरे आरव के पास आया। उसका चेहरा पूरी तरह सड़ा हुआ था लेकिन उसकी आँखों में दर्द साफ दिखाई दे रहा था। उसने काँपते हाथ से आरव की शर्ट पकड़ ली और बोला— “वो फिर आ रहा है…” तभी अचानक पूरे कमरे की बत्तियाँ अपने आप जलने-बुझने लगीं। बच्चों के चेहरे विकृत होने लगे। उनकी मुस्कान धीरे-धीरे डरावनी हँसी में बदल गई।

और अगले ही पल तीनों बच्चों ने एक साथ चीख मारी— “भागो…!”

कमरे की दीवार अचानक बीच से फट गई। अंदर से काले धुएँ का गुबार बाहर निकला और उसी धुएँ के बीच एक लंबा आदमी दिखाई दिया। उसकी ऊँचाई लगभग सात फीट थी। उसने काला धोती-कुर्ता पहना हुआ था और उसके पूरे शरीर पर राख लगी थी। उसकी आँखें लाल आग की तरह चमक रही थीं। उसके हाथ में इंसानी हड्डियों से बना एक त्रिशूल था। उसे देखते ही कमरे का तापमान और नीचे गिर गया। आरव की टाँगें काँपने लगीं क्योंकि वह समझ चुका था— यही ठाकुर विराज सिंह था।

वह आदमी धीरे-धीरे मुस्कुराया। उसके पीले दाँतों के बीच से खून बह रहा था। उसने भारी आवाज़ में कहा— “पचास साल बाद… आखिर किसी ने दरवाज़ा खोल ही दिया…” उसकी आवाज़ सुनते ही पूरा कमरा थरथराने लगा। आरव पीछे हटने लगा, लेकिन तभी अचानक उसके पैरों के नीचे से काले हाथ निकल आए। वे हाथ जमीन से बाहर आ रहे थे और उसके पैरों को पकड़कर नीचे खींच रहे थे। आरव चीख उठा। उसे महसूस हो रहा था जैसे सैकड़ों ठंडे हाथ उसकी त्वचा नोच रहे हों।

तभी अचानक वह जली हुई औरत ठाकुर के सामने आ गई। उसकी आँखों में नफरत जल रही थी। वह चीखी— “तूने मेरे बच्चों को मारा… अब मैं तुझे कभी वापस नहीं आने दूँगी!” यह सुनते ही ठाकुर का चेहरा गुस्से से विकृत हो गया। उसने जोर से त्रिशूल जमीन पर मारा। पूरे कमरे में काली ऊर्जा फैल गई। दीवारें फटने लगीं। बच्चों की चीखें इतनी तेज़ हो गईं कि आरव के कानों से खून निकलने लगा।

आरव किसी तरह खुद को छुड़ाकर कमरे से बाहर भागा। वह सीढ़ियाँ उतरते हुए गिर पड़ा, लेकिन रुका नहीं। बाहर तूफान अपने चरम पर था। आसमान में लगातार बिजली चमक रही थी। उसे महसूस हो रहा था कि कोई उसके पीछे दौड़ रहा है। उसने पीछे मुड़कर देखा… और उसका खून जम गया। हवेली के हर दरवाज़े और खिड़की में जले हुए चेहरे दिखाई दे रहे थे। दर्जनों नहीं… सैकड़ों चेहरे। वे सब उसे घूर रहे थे।

आरव भागते-भागते नदी तक पहुँचा, लेकिन तभी उसे सामने मुकेश दिखाई दिया। मुकेश पूरी तरह भीगा हुआ था और उसकी आँखों में अजीब डर था। उसने हाँफते हुए कहा— “आरव… गाँव में सब मर रहे हैं…” यह सुनकर आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई। दोनों तेजी से गाँव की तरफ भागे। लेकिन वहाँ पहुँचते ही उनका दिल दहल गया।

पूरा गाँव अंधेरे में डूबा हुआ था। हर घर का दरवाज़ा खुला था। गलियों में सन्नाटा फैला था। लेकिन जमीन पर खून के निशान थे… बहुत सारे खून के निशान। तभी अचानक दूर मंदिर की घंटी अपने आप बजने लगी। “टन… टन… टन…” उस आवाज़ में इतना डर था कि मुकेश रोने लगा। दोनों मंदिर की तरफ दौड़े। मंदिर के अंदर जो दृश्य था… उसे देखकर आरव की आत्मा काँप उठी।

मंदिर की दीवारों पर इंसानी खून से अजीब चिन्ह बने हुए थे। फर्श पर गाँव वालों की लाशें पड़ी थीं। कुछ के सिर कटे हुए थे, कुछ की आँखें गायब थीं। और उन सबके बीच में बैठा था गाँव का पुजारी… लेकिन वह अब इंसान नहीं लग रहा था। उसका शरीर पूरी तरह काला पड़ चुका था। उसकी गर्दन उल्टी दिशा में मुड़ी हुई थी। वह लगातार हँस रहा था।

पुजारी ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया और बोला— “वो जाग चुका है…” फिर उसने अपनी उँगली मंदिर के पीछे की तरफ उठा दी। वहाँ एक छोटा दरवाज़ा था जो पहले कभी नहीं देखा गया था। दरवाज़े के अंदर से लाल रोशनी बाहर आ रही थी। आरव और मुकेश डरते हुए अंदर गए। जैसे-जैसे वे नीचे उतर रहे थे, सड़ी हुई लाशों की बदबू बढ़ती जा रही थी। नीचे पहुँचकर उन्होंने जो देखा… उससे उनकी चीख निकल गई।

वहाँ एक विशाल तहखाना था। दीवारों पर सैकड़ों इंसानी कंकाल टंगे थे। बीच में एक बड़ा काला कुआँ था… वही कुआँ जिसके बारे में गाँव वाले बात करते थे। लेकिन सबसे भयानक दृश्य अभी बाकी था। उस कुएँ के अंदर हजारों हाथ हिल रहे थे। जैसे कोई अंदर फँसा बाहर निकलने की कोशिश कर रहा हो। अचानक कुएँ के अंदर से बच्चों की आवाज़ आई— “हमें बचाओ…”

मुकेश डर के मारे पीछे हट गया। लेकिन तभी कुएँ से एक लंबा काला हाथ बाहर निकला और उसने मुकेश का पैर पकड़ लिया। मुकेश चीखने लगा। आरव उसे खींचने की कोशिश करने लगा, लेकिन अगले ही पल दर्जनों हाथ कुएँ से बाहर निकल आए। वे सब मुकेश को नीचे खींच रहे थे। मुकेश रोते हुए चिल्लाया— “मुझे मत छोड़ना…!” लेकिन कुछ सेकंड बाद उसका शरीर अंधेरे में गायब हो गया। सिर्फ उसकी चीखें सुनाई देती रहीं।

आरव टूट चुका था। उसके सामने उसका दोस्त जिंदा निगल लिया गया था। तभी पीछे से वही जली हुई औरत प्रकट हुई। इस बार उसकी आँखों में आँसू थे। उसने काँपती आवाज़ में कहा— “अगर उसे रोकना है… तो हवेली को जलाना होगा… लेकिन याद रखना… जो आग वहाँ जलेगी… उसमें कोई एक ज़िंदा इंसान भी जलेगा…” यह सुनते ही आरव समझ गया कि इस अभिशाप को खत्म करने के लिए किसी की बलि देनी होगी।

बाहर अमावस्या की रात अपने आखिरी चरण में थी। हवेली के ऊपर काले बादल घूम रहे थे। पूरा गाँव अब मौत के सन्नाटे में डूब चुका था। आरव पेट्रोल लेकर हवेली पहुँचा। अंदर से लगातार चीखें आ रही थीं। जैसे पूरी हवेली जिंदा हो। उसने काँपते हाथों से हर कमरे में पेट्रोल फैलाया। तभी अचानक पीछे से भारी आवाज़ आई— “तू सोचता है मुझे रोक पाएगा…?”

आरव धीरे-धीरे मुड़ा। ठाकुर विराज सिंह उसके ठीक पीछे खड़ा था। उसकी आँखों में आग जल रही थी। उसके आसपास काली परछाइयाँ घूम रही थीं। उसने मुस्कुराते हुए कहा— “मैं मरकर भी नहीं मरा… क्योंकि इस हवेली की हर ईंट में मेरा खून मिला है…” फिर उसने अपना हाथ आरव की तरफ बढ़ाया। अगले ही पल आरव को महसूस हुआ जैसे कोई उसकी आत्मा शरीर से बाहर खींच रहा हो।

आरव दर्द से चीख उठा। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा। तभी उसे उन बच्चों की आवाज़ सुनाई दी— “अब खत्म करो इसे…” अचानक जली हुई औरत ने पीछे से ठाकुर को पकड़ लिया। वह पूरी ताकत से चीख रही थी। “भागो… अभी…!” आरव काँपते हुए उठा। उसने जेब से माचिस निकाली। लेकिन उसके हाथ इतने काँप रहे थे कि तीली जल ही नहीं रही थी।

उधर ठाकुर धीरे-धीरे उस औरत को चीर रहा था। उसकी चीखें पूरे हवेली में गूँज रही थीं। दीवारों से खून बहने लगा। छत से काले कीड़े गिरने लगे। आरव ने काँपते हुए आखिरी तीली जलाई… और पेट्रोल पर फेंक दी।

अगले ही पल पूरी हवेली आग की लपटों में घिर गई।

ठाकुर की ऐसी चीख निकली कि पूरा गाँव काँप उठा। आग तेजी से फैलने लगी। हवेली के अंदर कैद सारी आत्माएँ चीख रही थीं। लेकिन तभी आरव को एहसास हुआ कि उसका पैर किसी ने पकड़ रखा है। उसने नीचे देखा… जली हुई औरत मुस्कुरा रही थी। उसकी पकड़ बेहद मजबूत थी। उसने धीरे से कहा— “अब तू भी यहीं रहेगा…”

आरव की आँखें फैल गईं। चारों तरफ आग थी। बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा था।

और फिर…

पूरी हवेली एक भयानक धमाके के साथ ढह गई।

अगली सुबह गाँव वाले जब वहाँ पहुँचे, तो हवेली पूरी तरह राख बन चुकी थी। लेकिन राख के बीच उन्हें सिर्फ एक चीज़ मिली—

एक पुरानी डायरी…

जिसके पहले पन्ने पर ताज़ा खून से लिखा था—

“अभिशाप खत्म नहीं हुआ… नया दरवाज़ा फिर खुल चुका है…”

एक वसीयत… और पूरा परिवार दुश्मन बन गया। पढ़िए 👉 वसीयत

👉 अगर आपको ऐसी ही दिलचस्प कहानियाँ पढ़ना पसंद है, तो हमारे WhatsApp चैनल से जुड़िए — वहाँ रोज़ नई stories सबसे पहले मिलती हैं

आपको यह कहानी पसंद आई?

इसे रेट करने के लिए किसी स्टार पर क्लिक करें!

औसत श्रेणी 0 / 5. मतों की गिनती: 0

अभी तक कोई वोट नहीं! इस पोस्ट को रेटिंग देने वाले पहले व्यक्ति बनें।

Share:
WhatsApp
Facebook

Leave a Comment

QUOTE OF THE DAY

RECENT STORIES

SHORT STORIES

FEATURED STORIES

CATEGORIES