अकबर-बीरबल

अकबर का साला — अकबर-बीरबल की कहानी

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अकबर-बीरबल से जुड़ी अनेक कथाएँ लोक परंपरा में प्रचलित हैं, जिनकी ऐतिहासिक सत्यता पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उनमें छिपा ज्ञान और नैतिक संदेश सदैव उपयोगी माना जाता है। इन कथाओं से बीरबल की तेज बुद्धि और तुरंत सोचने की क्षमता सामने आती है। ऐसी ही 50 कहानियाँ हम आपके साथ साझा कर रहे हैं।

अकबर का साला — अकबर-बीरबल की कहानी

मुगल बादशाह अकबर के दरबार में बीरबल की बुद्धिमानी और हाजिरजवाबी की चर्चा दूर-दूर तक होती थी। दरबार का हर व्यक्ति जानता था कि बीरबल जैसा चतुर, सूझबूझ वाला और परिस्थिति को पलभर में समझ लेने वाला व्यक्ति पूरे राज्य में दूसरा नहीं था। लेकिन एक व्यक्ति ऐसा था जिसे बीरबल की यह प्रतिष्ठा बिल्कुल पसंद नहीं थी। वह था अकबर का साला। उसे हमेशा लगता था कि दरबार में बीरबल की जगह उसे होना चाहिए। वह खुद को किसी भी तरह बीरबल से कम नहीं समझता था और मौका मिलते ही अकबर से वज़ीर बनने की इच्छा जताता रहता था।

अकबर अपने साले की आदतों से अच्छी तरह परिचित थे। वे जानते थे कि केवल रिश्तेदारी के कारण किसी को राज्य का महत्वपूर्ण पद नहीं दिया जा सकता। मगर दूसरी ओर वे अपनी प्रिय बेगम को भी नाराज़ नहीं करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने सीधे मना करने के बजाय एक ऐसी परीक्षा लेने का निश्चय किया, जिससे साले को स्वयं अपनी योग्यता का अंदाज़ा हो जाए।

एक दिन अकबर ने अपने साले को दरबार में बुलाया। उनके सामने कोयले से भरी एक बड़ी बोरी रखी हुई थी। अकबर ने मुस्कुराते हुए कहा, “अगर तुम सच में बीरबल की जगह लेने योग्य हो, तो पहले यह साबित करके दिखाओ। इस बोरी में जो कोयला भरा है, उसे हमारे राज्य के सबसे चालाक और लालची व्यापारी सेठ दमड़ीलाल को बेचकर दिखाओ। यदि तुम यह काम कर गए, तो मैं तुम्हें दरबार का वज़ीर बना दूँगा।”

यह सुनते ही अकबर का साला हैरान रह गया। उसे समझ नहीं आया कि भला साधारण कोयले की बोरी कोई क्यों खरीदेगा, वह भी सेठ दमड़ीलाल जैसा कंजूस और धूर्त आदमी। फिर भी वज़ीर बनने की लालसा में वह बोरी उठाकर बाजार की ओर चल पड़ा।

कुछ देर बाद वह सेठ दमड़ीलाल की विशाल दुकान पर पहुँचा। सेठ अपनी गद्दी पर बैठा हिसाब-किताब कर रहा था। अकबर के साले ने बड़े आत्मविश्वास से कहा, “सेठ जी, मेरे पास बहुत बढ़िया माल है। इसे खरीद लीजिए।”
सेठ ने बोरी खुलवाकर देखी तो उसमें केवल साधारण कोयला था। वह जोर से हँस पड़ा और बोला, “क्या तुम मुझे मूर्ख समझते हो? बाजार में ऐसा कोयला मुफ्त में मिल जाए, तब भी मैं न लूँ। इसके बदले एक पैसा भी नहीं दूँगा।”

अकबर के साले ने बहुत कोशिश की, तरह-तरह से समझाया, लेकिन सेठ टस से मस नहीं हुआ। उल्टा उसने उसे खूब खरी-खोटी सुनाई। आखिरकार हारकर वह मायूस चेहरा लिए महल लौट आया और अकबर के सामने अपनी असफलता स्वीकार कर ली।
अकबर ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने तुरंत बीरबल को बुलवाया और वही बोरी उनकी ओर बढ़ाते हुए बोले, “बीरबल, क्या तुम यह कोयला सेठ दमड़ीलाल को बेच सकते हो?”

बीरबल हल्का-सा मुस्कुराए। उन्होंने बोरी की ओर देखा और शांत स्वर में बोले, “जहाँपनाह, पूरी बोरी बेचने की क्या आवश्यकता है? मैं तो इस कोयले के एक छोटे से टुकड़े के बदले भी दस हज़ार रुपये लेकर आ सकता हूँ।”
दरबार में बैठे सभी लोग चौंक गए। अकबर का साला भी आश्चर्य से बीरबल को देखने लगा। अकबर मुस्कुराए और बोले, “ठीक है, हमें तुम्हारी बुद्धि पर भरोसा है।”

बीरबल तुरंत बाजार की ओर निकल पड़े। सबसे पहले वे एक प्रसिद्ध दर्जी के पास गए और मखमल का बेहद कीमती कुर्ता सिलवाया। फिर उन्होंने अपने गले में चमकदार मोतियों और नकली हीरों की मालाएँ डलवाईं। पैरों में महंगी जूतियाँ पहनीं और अपने पूरे रूप को किसी विदेशी अमीर व्यापारी जैसा बना लिया। इसके बाद उन्होंने उस कोयले को बारीक पीसकर बिल्कुल सुरमे जैसा महीन चूर्ण तैयार करवाया और उसे एक सुंदर चमचमाती डिब्बी में भरवा लिया।

अब बीरबल ने अपना भेष पूरी तरह बदल लिया। वे खुद को बगदाद से आए हुए एक धनी शेख के रूप में प्रस्तुत करने लगे। उन्होंने शहर के सबसे बड़े मेहमानखाने में ठहरकर यह खबर फैलवा दी कि बगदाद से एक महान शेख आए हैं, जो ऐसा अद्भुत सुरमा बेचते हैं जिसे आँखों में लगाने पर इंसान अपने मृत पूर्वजों को देख सकता है। इतना ही नहीं, यदि पूर्वजों ने कहीं धन छिपाकर रखा हो, तो वे उसका स्थान भी बता देते हैं।

यह विचित्र खबर देखते ही देखते पूरे नगर में फैल गई। लोग आश्चर्य और उत्सुकता से उस शेख के बारे में बातें करने लगे। जब यह बात सेठ दमड़ीलाल तक पहुँची, तो उसके मन में लालच जाग उठा। उसने सोचा, “मेरे पूर्वजों ने भी अवश्य कहीं खजाना छिपाकर रखा होगा। यदि यह सुरमा सच निकला, तो मैं अपार धन का मालिक बन जाऊँगा।”

लालच में अंधा होकर वह तुरंत बीरबल के पास पहुँचा, जिन्हें वह असली शेख समझ रहा था। सेठ ने आदरपूर्वक कहा, “हुजूर, मुझे आपका वह चमत्कारी सुरमा चाहिए।”
बीरबल ने गंभीरता से उत्तर दिया, “यह साधारण सुरमा नहीं है। इसे तैयार करने में वर्षों की विद्या लगी है। इसकी एक डिब्बी की कीमत बीस हज़ार रुपये है।”
सेठ ने तुरंत मोलभाव शुरू कर दिया। काफी देर तक बहस चलती रही। आखिरकार दोनों के बीच दस हज़ार रुपये में सौदा तय हो गया। लेकिन सेठ बहुत चालाक था। उसने कहा, “मैं अभी इसी समय सुरमा लगाकर देखूँगा। यदि मुझे अपने पूर्वज दिखाई नहीं दिए, तो मैं अपने पैसे वापस ले लूँगा।”

बीरबल ने तुरंत हामी भर दी और बोले, “क्यों नहीं? चलिए शहर के मुख्य चौराहे पर चलते हैं, ताकि सब लोग इस चमत्कार को अपनी आँखों से देख सकें।”
कुछ ही देर में चौराहे पर भारी भीड़ जमा हो गई। हर कोई उस अद्भुत सुरमे का कमाल देखने को उत्सुक था। बीरबल ने ऊँची आवाज़ में घोषणा की, “ध्यान से सुनो! यह सुरमा केवल उसी व्यक्ति पर असर करता है जो वास्तव में अपने माता-पिता की सच्ची संतान हो। यदि किसी के परिवार में कभी बेईमानी या छल हुआ होगा, तो उसे कुछ दिखाई नहीं देगा।”

भीड़ में खुसुर-पुसुर शुरू हो गई। सेठ दमड़ीलाल के चेहरे का रंग उड़ने लगा। अब वह असमंजस में फँस चुका था। यदि वह कहे कि उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा, तो लोग उसके परिवार पर शक करेंगे। उसकी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाएगी।

इतना कहकर बीरबल ने सेठ की आँखों में वह सुरमा लगा दिया। सेठ ने आँखें बंद कीं, फिर धीरे-धीरे खोलीं। स्वाभाविक था कि उसे कुछ भी दिखाई नहीं दिया। मगर अब उसके पास सच बोलने का साहस नहीं था। अपनी इज्जत बचाने के लिए उसने तुरंत मुस्कुराने का नाटक किया और बोला, “वाह! अद्भुत… मैंने अपने पूर्वजों को देख लिया।”

भीड़ आश्चर्य से उसकी बातें सुनने लगी। सेठ ने बिना देर किए दस हज़ार रुपये बीरबल को थमा दिए और वहाँ से जल्दी-जल्दी निकल गया, ताकि कोई उससे ज्यादा सवाल न पूछे।
बीरबल सीधे महल पहुँचे और अकबर को पूरी घटना विस्तार से सुनाई। यह सुनते ही अकबर ज़ोर से हँस पड़े। दरबारियों के चेहरे भी खिल उठे। अकबर का साला शर्म से सिर झुकाए खड़ा रहा। उसे समझ आ चुका था कि केवल ऊँचे सपने देखने से कोई बीरबल जैसा बुद्धिमान नहीं बन जाता।

उस दिन के बाद उसने कभी भी बीरबल की जगह लेने की बात नहीं की। वहीं अकबर और बीरबल एक-दूसरे की ओर देखकर मंद-मंद मुस्कुराते रहे, क्योंकि एक बार फिर बुद्धि ने लालच और अहंकार पर जीत हासिल कर ली।

अब तो आन पड़ी है — अकबर-बीरबल की कहानी

एक समय की बात है। अकबर अपने दरबार में बैठे हुए थे। उनका स्वभाव बड़ा हँसमुख था और वे अक्सर दरबारियों तथा नगरवासियों के साथ मज़ाक किया करते थे। कभी किसी की बुद्धि की परीक्षा लेते, तो कभी किसी को अजीब आदेश देकर उसकी प्रतिक्रिया देखते। दरबार में बैठे लोग भी जानते थे कि बादशाह का मन कब किस बात से प्रसन्न हो जाए, कहना कठिन है।

एक दिन अकबर ने अचानक नगर के सभी बड़े सेठों और व्यापारियों को दरबार में बुलवा भेजा। आदेश मिलते ही नगर के प्रतिष्ठित व्यापारी डरते-डरते दरबार में उपस्थित हुए। सबके मन में उत्सुकता थी कि आखिर बादशाह ने उन्हें किस काम के लिए बुलाया है।

जब सभी सेठ दरबार में इकट्ठा हो गए, तब अकबर ने गंभीर स्वर में कहा, “आज से तुम लोगों को रात में नगर की पहरेदारी करनी होगी। राज्य की सुरक्षा केवल सैनिकों का काम नहीं है। अब व्यापारी लोग भी रात-रात भर जागकर नगर की रखवाली करेंगे।”
बादशाह की बात सुनते ही सभी सेठों के चेहरों का रंग उड़ गया। वे लोग जीवनभर व्यापार करते आए थे। किसी ने कभी रात में पहरा नहीं दिया था। कोई तेल बेचता था, कोई गुड़, कोई कपड़ा, तो कोई मसालों का व्यापारी था। उन्हें यह भी नहीं मालूम था कि पहरेदार किस प्रकार गश्त लगाते हैं, चोरों से कैसे निपटते हैं या रातभर जागकर नगर की रक्षा कैसे की जाती है।

लेकिन बादशाह का आदेश टालना आसान नहीं था। इसलिए वे लोग सिर झुकाकर वहाँ से लौट तो आए, मगर सबके मन में घबराहट थी। कई व्यापारी आपस में कहने लगे, “हमसे यह काम नहीं होगा। रातभर जागना ही कठिन है, ऊपर से चोर-उचक्कों का डर अलग। यदि कहीं कोई घटना हो गई तो हम क्या करेंगे?”
आखिर परेशान होकर सभी सेठ बीरबल के पास पहुँचे। उन्होंने बीरबल को सारी बात बताई और हाथ जोड़कर बोले, “दीवान जी, हमें बचाइए। हम व्यापार करने वाले लोग हैं। पहरेदारी हमारे बस की बात नहीं। यदि बादशाह का आदेश नहीं माना, तो दंड मिलेगा।”

बीरबल ने उनकी परेशानी सुनी और कुछ देर सोचकर हल्का-सा मुस्कुराए। फिर बोले, “चिंता मत करो। जैसा मैं कहता हूँ, वैसा ही करना। आज रात तुम सब नगर में पहरा देने निकलो, लेकिन एक अलग तरीके से।”
सेठ उत्सुक होकर उनकी ओर देखने लगे। तब बीरबल ने कहा, “तुम सब अपनी पगड़ियाँ उतारकर पैरों में बाँध लेना और पायजामे सिर पर लपेट लेना। फिर रातभर नगर की गलियों में घूमते हुए ऊँची आवाज़ में बस एक ही बात कहना— ‘अब तो आन पड़ी है… अब तो आन पड़ी है…।’”

पहले तो सेठों को यह उपाय बड़ा अजीब लगा। उन्हें समझ नहीं आया कि इससे क्या होगा। लेकिन बीरबल की बुद्धि पर उन्हें पूरा विश्वास था। इसलिए उन्होंने वैसा ही करने का निश्चय कर लिया।

रात होते ही नगर का दृश्य बड़ा विचित्र हो गया। सभी सेठ अपनी पगड़ियाँ पैरों में लपेटे हुए थे और पायजामे सिर पर बाँधे गलियों में घूम रहे थे। कोई मोटा व्यापारी लाठी लेकर चल रहा था, तो कोई डरते-डरते पीछे-पीछे आ रहा था। ऊपर से सब ऊँची आवाज़ में चिल्लाते जाते— “अब तो आन पड़ी है… अब तो आन पड़ी है…!”
नगर के लोग खिड़कियों और दरवाजों से झाँक-झाँककर यह अनोखा दृश्य देखने लगे। कुछ लोग हँस रहे थे, तो कुछ सोच रहे थे कि आखिर इन व्यापारियों को क्या हो गया है।

उधर उसी रात अकबर भी भेष बदलकर नगर का हाल देखने निकले। उन्हें आदत थी कि वे कभी-कभी आम लोगों के बीच जाकर राज्य की स्थिति स्वयं देखते थे। जब उन्होंने सेठों का यह अजीब रूप देखा, तो अपनी हँसी रोक नहीं पाए।
वे उनके पास गए और बनावटी आश्चर्य से बोले, “अरे भई, यह क्या तमाशा है? तुम लोगों ने यह कैसा वेश बना रखा है?”

तब सेठों के मुखिया ने हाथ जोड़कर विनम्रता से उत्तर दिया, “जहाँपनाह, हम लोग तो जन्म से व्यापार करना सीखकर बड़े हुए हैं। किसी ने तेल बेचना सीखा, किसी ने गुड़ तौलना, किसी ने कपड़ा नापना। पहरेदारी करना हमारे बस की बात नहीं। यदि हम इसी काम के योग्य होते, तो लोग हमें बनिया क्यों कहते?”
इतना सुनते ही अकबर समझ गए कि यह सब बीरबल की ही योजना है। बीरबल ने बिना सीधे विरोध किए इतनी चतुराई से व्यापारियों की असमर्थता उनके सामने रख दी थी कि बादशाह स्वयं भी मुस्कुरा उठे।
अकबर ने उसी समय अपना आदेश वापस ले लिया और कहा, “ठीक है, तुम लोगों को पहरेदारी करने की आवश्यकता नहीं है।”

सेठों ने राहत की साँस ली और मन ही मन बीरबल की बुद्धिमानी की प्रशंसा करने लगे। इस प्रकार बीरबल ने अपनी सूझबूझ से बिना किसी विवाद के व्यापारियों को बड़ी मुसीबत से बचा लिया।

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अकबर-बीरबल की रोचक और मनोरंजक कहानी बुद्धिमत्ता, हाजिरजवाबी और चतुराई का अनोखा संगम है। जानिए कैसे बीरबल अपनी सूझबूझ से कठिन प्रश्नों का समाधान करते हैं और सभी को जीवन की महत्वपूर्ण सीख देते हैं।

लेखक / मूल रचनाकार: अकबर बीरबल
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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