प्रेमचंद

अनिष्ट संकेतों में डूबी प्रेम कथा-मुंशी प्रेमचंद

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अनिष्ट संकेतों में डूबी प्रेम कथा- मुंशी प्रेमचंद

चाँदनी रात अपनी पूरी सुंदरता के साथ धरती पर बिखरी हुई थी। ठंडी हवाएँ महल की विशाल छत को स्पर्श करती हुई गुजर रही थीं। उसी शांत वातावरण में कुँवर अमरनाथ अपनी पत्नी मनोरमा के साथ बैठे थे। अमरनाथ बुंदेलखंड जाने की तैयारी कर चुके थे, जहाँ भयंकर अकाल ने लोगों का जीवन तबाह कर दिया था।

उन्होंने प्रेम से मनोरमा को समझाते हुए कहा कि वह जल्दी लौट आएँगे, इसलिए उसे घबराने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन मनोरमा का मन किसी अनजाने भय से काँप रहा था। उसकी आँखों में बेचैनी साफ दिखाई देती थी। उसने धीमे स्वर में कहा कि वह भी उनके साथ जाना चाहती है, क्योंकि उनके बिना यह घर उसे सूना और भयावह लगेगा।

अमरनाथ ने मुस्कराकर उसे समझाया कि वहाँ का जीवन बहुत कठिन है। चारों ओर जंगल, पहाड़ और वीरान रास्ते हैं। कभी घोड़ों पर सफर करना पड़ता है तो कभी भूखे-प्यासे गाँवों में घूमना पड़ता है। उन्होंने कहा कि वह यह सब सह नहीं पाएगी। लेकिन मनोरमा ने गर्व से उत्तर दिया कि स्त्रियाँ केवल कोमल नहीं होतीं, उनमें अपार धैर्य और साहस भी होता है।

वह बोली कि यदि समय आ जाए तो स्त्री आग में भी कूद सकती है। उसकी बातें सुनकर अमरनाथ कुछ क्षणों के लिए मौन हो गए। उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि मनोरमा का प्रेम केवल मोह नहीं, बल्कि गहरी आत्मीयता और समर्पण है।

मनोरमा का स्वभाव अत्यंत संवेदनशील था। अमरनाथ कुछ देर के लिए भी उसकी आँखों से ओझल हो जाते तो उसके मन में तरह-तरह की आशंकाएँ जन्म लेने लगतीं। जब भी वह शिकार खेलने जाते, मनोरमा का मन घबराने लगता कि कहीं घोड़ा बेकाबू न हो जाए या कोई दुर्घटना न घट जाए।

उसी चिंता से भरे स्वर में उसने कहा कि उसे हर समय किसी अनिष्ट की आशंका सताती रहती है। अमरनाथ ने हँसकर कहा कि वह विलासप्रिय व्यक्ति हैं और इतना प्रेम करके वह अपने ऊपर अन्याय कर रही है। मगर मनोरमा की निगाहें मानो कह रही थीं कि वह उन्हें संसार से अधिक समझती है।

उधर बुंदेलखंड में अकाल ने भयावह रूप ले लिया था। लोग पेड़ों की छाल खाकर जीवित रहने का प्रयास कर रहे थे। भूख ने इंसान और पशु का भेद मिटा दिया था। छोटे-छोटे बच्चे मुट्ठी भर अनाज के बदले बेच दिए जाते थे। चारों ओर मृत्यु और निराशा का वातावरण था। जब यह समाचार अमरनाथ ने पढ़े तो उनका हृदय द्रवित हो उठा। वह काशी सेवा समिति के प्रमुख कार्यकर्ताओं में थे। उन्होंने तुरंत कई युवकों को साथ लिया और सहायता कार्य के लिए बुंदेलखंड रवाना हो गए। जाते समय उन्होंने मनोरमा से वादा किया कि प्रतिदिन पत्र लिखेंगे और जल्द लौट आएँगे।

शुरुआत के कुछ दिनों तक उनके पत्र नियमित आते रहे। हर पत्र मनोरमा के लिए जैसे जीवन का सहारा बन जाता था। वह पत्र पढ़कर प्रसन्न हो उठती और कुछ समय के लिए उसकी चिंता दूर हो जाती। लेकिन धीरे-धीरे पत्र आने में देर होने लगी। कई बार लगातार दो-दो दिन तक कोई समाचार नहीं मिलता। अब मनोरमा का मन और अधिक व्याकुल रहने लगा। वह कभी कमरे में बैठती, कभी छत पर चली जाती, कभी बगीचे में अकेली घंटों घूमती रहती। उसके चेहरे की हँसी गायब हो चुकी थी। किताबें, संगीत और मनोरंजन की सारी वस्तुएँ उसे निरर्थक लगने लगी थीं।

एक रात उसने अत्यंत भयावह स्वप्न देखा। उसने देखा कि अमरनाथ नंगे सिर और नंगे पैर दरवाजे पर खड़े रो रहे हैं। स्वप्न इतना सजीव था कि वह चीखते हुए उठ बैठी और भागकर दरवाजे तक पहुँची। बाहर सन्नाटा था, मगर उसका हृदय तेज़ी से धड़क रहा था। उसी समय उसने मुनीम को जगाकर अमरनाथ के नाम तार भेजवाया। पूरा दिन बीत गया, लेकिन कोई उत्तर नहीं आया। दूसरा दिन भी गुजर गया।

मनोरमा ने खाना-पीना छोड़ दिया। वह हर आहट पर चौक जाती और दौड़कर पूछती— “क्या कोई जवाब आया?” उसकी आँखों में भय स्थायी रूप से बस गया था। अपने मन की शंका मिटाने के लिए वह स्वप्नों से जुड़ी पुस्तकें पढ़ने लगी। नौकरानियाँ उसे समझातीं कि स्वप्न में किसी को नंगे पैर देखना शुभ माना जाता है, लेकिन उसका मन किसी भी दिलासे से शांत नहीं होता था।

पाँचवें दिन मोहल्ले में एक ज्योतिषी आया। आसपास की स्त्रियाँ उसके पास अपनी किस्मत जानने पहुँचीं। मनोरमा ने भी उसे बुलवाया और अपने स्वप्न का अर्थ पूछा। ज्योतिषी पहले तो उलझन में पड़ा रहा, मगर अंत में उसने डरावने शब्दों में कहा कि उसके पति पर बड़ा संकट आने वाला है और उनका घर उजड़ सकता है। यह सुनते ही मनोरमा के शरीर में जैसे प्राण ही न रहे। वह काँपती हुई जमीन पर गिर पड़ी।

ज्योतिषी अपनी गलती समझ गया और तुरंत उपाय बताने लगा, लेकिन अब मनोरमा के मन में केवल एक ही विचार था— उसे तुरंत अमरनाथ के पास जाना है। उसने उसी शाम बुंदेलखंड जाने की तैयारी कर ली। स्टेशन पहुँचकर उसने अमरनाथ को तार भेजा कि वह आ रही है। कई रातों की जागी हुई थी, इसलिए ट्रेन में बैठते ही उसे नींद आ गई। मगर वह नींद भी भयावह स्वप्नों से भरी थी। उसने देखा कि एक टूटी हुई नाव भयंकर समुद्र में डूबने को है और उसमें अमरनाथ अकेले बैठे रो रहे हैं। वह चीख मारकर उठ बैठी। उसका शरीर पसीने से भीग चुका था।

कुछ देर बाद फिर उसकी आँख लग गई। इस बार उसने देखा कि एक ऊँचे पर्वत पर अमरनाथ अकेले बैठे हैं। चारों ओर काले बादल और बिजली की भयंकर गर्जना हो रही है। अचानक एक तेज़ चमक हुई और अमरनाथ उसकी आँखों के सामने गायब हो गए। मनोरमा फिर चीखते हुए जागी और हाथ जोड़कर ईश्वर से प्रार्थना करने लगी कि किसी भी प्रकार उसके पति की रक्षा करें। उसकी आँखों से आँसू लगातार बहते रहे। मगर थकान इतनी अधिक थी कि सुबह होने से पहले उसे फिर झपकी आ गई।

इस बार उसने देखा कि अमरनाथ घोड़े पर एक संकरे पुल से गुजर रहे हैं। नीचे उफनती नदी बह रही है और घोड़ा बेकाबू होकर उछल रहा है। भयभीत होकर मनोरमा चिल्लाने लगी— “घोड़े से उतर जाओ!” उसी घबराहट में उसकी आँख खुली। ट्रेन किसी स्टेशन से गुजर रही थी। उसने खिड़की से बाहर देखा तो प्लेटफॉर्म पर सचमुच अमरनाथ खड़े दिखाई दिए। उसके मन में स्वप्न और वास्तविकता एक हो चुके थे। उसे लगा कि अमरनाथ अभी गिर पड़ेंगे। वह उन्हें पकड़ने के लिए दौड़ी और अचेत अवस्था में ट्रेन का दरवाजा खोलकर बाहर निकल गई। अगले ही क्षण एक जोरदार धक्का लगा और उसकी चेतना समाप्त हो गई।

वह कबरई स्टेशन था। अमरनाथ तार पाकर उसे लेने आए थे। उन्होंने अपनी पत्नी को ट्रेन से गिरते देखा और चीखते हुए उसकी ओर दौड़े, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। मनोरमा अपने प्रेम और भय की वेदी पर बलिदान हो चुकी थी। तीन दिन बाद अमरनाथ टूटे हुए हृदय के साथ घर लौटे। अब मनोरमा का स्वप्न सत्य बन चुका था। उन्होंने अपनी सारी संपत्ति काशी सेवा समिति को दान कर दी और संसार से विरक्त होकर नंगे सिर, नंगे पैर देश-विदेश भटकने लगे। उनका जीवन हमेशा के लिए शोक और स्मृतियों में डूब गया।

संघर्ष, स्वाभिमान और एक स्त्री का नया अनुभव

जेठ की तपती दोपहर में केवल कुछ राष्ट्रसेवकों को शर्बत पिलाने के अपराध में मेरे पति को एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुना दी गयी। उस दिन अदालत लोगों से भरी हुई थी। बाहर सैकड़ों देशभक्त बेचैनी से खड़े थे और भीतर अंग्रेज अफसर अपने कठोर चेहरे के साथ न्याय का ढोंग कर रहे थे। जब मेरे पति हथकड़ियों में जकड़े हुए अंदर लाए गए, तो मेरे भीतर जैसे तूफान उमड़ पड़ा।

आँखें आँसुओं से भर गयीं, मगर उसी क्षण गर्व का एक अद्भुत भाव भी मन में जाग उठा। वह शांत और तेजस्वी चेहरे के साथ खड़े थे, मानो सजा नहीं, सम्मान प्राप्त कर रहे हों। उनके ओठों पर हल्की मुस्कान थी और आँखों में स्वाभिमान की चमक। मुझे लगा कि उस अदालत, उन अफसरों और पुलिसवालों की कोई कीमत नहीं है। मेरा मन बार-बार चाहता था कि दौड़कर उनके चरणों में गिर जाऊँ।

जब अदालत से बाहर निकली, तो मन में निराशा नहीं, बल्कि एक विचित्र साहस भर चुका था। मैंने पाँच रुपये की मिठाई मँगवाकर स्वयंसेवकों में बाँटी और उसी शाम पहली बार कांग्रेस की सभा में शामिल हुई। केवल श्रोता बनकर नहीं, बल्कि मंच पर जाकर मैंने सत्याग्रह की प्रतिज्ञा भी ली। मुझे स्वयं आश्चर्य हो रहा था कि मेरे भीतर इतनी शक्ति कहाँ से आ गयी।

शायद जब इंसान अपना सबसे बड़ा सहारा खो देता है, तब उसके भीतर एक नया साहस जन्म लेता है। अब मुझे किसी बात का भय नहीं था। जो स्त्री अपने पति को देश के लिए जेल जाते देख चुकी हो, उसके लिए संसार की बाकी कठिनाइयाँ बहुत छोटी लगने लगती हैं।

अगले दिन मैंने अपने पिता और ससुर दोनों को तार भेजा। मन में आशा थी कि कम-से-कम संकट की इस घड़ी में परिवार साथ देगा। लेकिन दो दिनों तक कोई उत्तर नहीं आया। तीसरे दिन दोनों के पत्र मिले। ससुर ने साफ लिख भेजा कि वह सरकारी पेंशन पाते हैं और मुझे अपने पास रखकर अपनी पेंशन खतरे में नहीं डाल सकते। पिता ने भी लगभग वही बात दूसरे शब्दों में कही। उन्हें अपनी नौकरी और पदोन्नति की चिंता थी।

उन्होंने सहानुभूति तो जतायी, पर अपने घर बुलाने का साहस नहीं किया। उन पत्रों को पढ़कर मेरा हृदय टूट गया। मैंने दोनों पत्र फाड़ दिए। उस दिन पहली बार मुझे संसार के स्वार्थ का वास्तविक अनुभव हुआ। रिश्ते तब तक अपने लगते हैं, जब तक उनसे किसी को नुकसान न हो।

अब मेरे सामने सबसे बड़ी समस्या थी कि मैं अकेली कहाँ जाऊँ और कैसे रहूँ। अगर मैं पुरुष होती, तो शायद किसी आश्रम में जाकर सेवा करती या मजदूरी करके अपना जीवन चला लेती। लेकिन एक स्त्री के लिए समाज की दीवारें बहुत ऊँची थीं। मुझे अपनी भूख या जीवन की चिंता नहीं थी, बल्कि इस बात का भय था कि कहीं कोई मेरी असहाय स्थिति का गलत लाभ न उठा ले। मैं अपने नारीत्व की रक्षा को लेकर लगातार डरी रहती थी। उसी चिंता में मैंने कमरे का दरवाजा भीतर से बंद कर लिया और सिरहाने एक बड़ा चाकू रख लिया। बाहर किसी की आहट होती, तो दिल जोर-जोर से धड़कने लगता।

एक दिन नीचे दो संदिग्ध आदमी खड़े दिखाई दिए। उनके चेहरे देखकर मन में शंका पैदा हुई कि शायद वे खुफिया विभाग के लोग हैं। थोड़ी देर बाद किसी ने दरवाजा खटखटाया। डर से मेरे हाथ काँपने लगे। मगर जब आवाज सुनी, तो राहत मिली। यह मेरे पति के मित्र बाबू ज्ञानचंद थे और उनके साथ उनकी पत्नी भी थीं। ज्ञानचंद एक स्कूल में अध्यापक थे— सरल, सज्जन और विनम्र। लेकिन उनकी पत्नी का व्यक्तित्व उनसे कहीं अधिक प्रभावशाली था।

वह आत्मविश्वास और दृढ़ता से भरी हुई महिला थीं। चेहरे पर ऐसा तेज था कि सामने वाला सहज ही प्रभावित हो जाए। उन्होंने आते ही मुझसे पूछा कि क्या घर से कोई लेने आ रहा है। जब मैंने सारी बात बताई, तो उन्होंने बिना देर किए कहा कि मैं उनके घर चलूँगी। मैंने संकोच से कहा कि मेरे पीछे खुफिया पुलिस लगी हुई है और मेरे कारण उन्हें परेशानी हो सकती है। मगर उन्होंने हँसकर कहा कि डरकर जीवन नहीं जिया जाता।

उन्होंने अपने पति को तुरंत ताँगा लाने भेज दिया। ज्ञानचंद बेचारे पत्नी के सामने कुछ सहमे-सहमे से रहते थे। ताँगे की संख्या को लेकर भी वह उनसे डाँट खा गए। उनकी बातचीत देखकर पहली बार मेरे चेहरे पर मुस्कान आयी। वह महिला बाहर से कठोर लगती थीं, लेकिन भीतर से अत्यंत दयालु थीं। उन्होंने मुझे छोटी बहन की तरह अपनाया और अपने घर ले गयीं।

उनके घर में मुझे ऐसा स्नेह मिला, जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। वह स्वयं सारे काम करतीं, मगर मुझे हाथ तक न लगाने देतीं। हर समय मेरे खाने-पीने और आराम का ध्यान रखतीं। उनके व्यवहार में कहीं भी दिखावा नहीं था। उन्होंने मुझे कभी यह एहसास नहीं होने दिया कि मैं किसी पर बोझ हूँ। धीरे-धीरे मेरा भय कम होने लगा। मगर कुछ दिनों बाद वही खुफिया विभाग के आदमी फिर उनके घर के आसपास घूमते दिखाई दिए। उन्हें देखकर मेरा मन फिर डर से भर गया। मुझे लगने लगा कि मेरी वजह से इस परिवार को भी संकट में पड़ना पड़ सकता है।

मैं बार-बार छज्जे पर जाकर उन लोगों को देखती और सोचती कि आखिर सरकार को मुझ जैसी अकेली स्त्री से क्या खतरा हो सकता है। मगर ज्ञानचंद की पत्नी हर बार हँसकर कहतीं कि ऐसे लोगों का काम केवल डराना है। उनकी निडरता देखकर मैं चकित रह जाती।

फिर भी मेरे मन की बेचैनी कम नहीं होती थी। मुझे लगने लगा था कि यह शांति अधिक दिनों तक रहने वाली नहीं है। और सचमुच, एक शाम जब ज्ञानचंद घर लौटे, तो उनके चेहरे पर घबराहट साफ दिखाई दे रही थी। उनकी आँखों में चिंता थी, मानो कोई नया संकट दरवाजे पर खड़ा हो।

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मुंशी प्रेमचंद की प्रेरणादायक और यथार्थवादी कहानी समाज, मानवता, नैतिकता और जीवन के गहरे सत्य को सरल भाषा में प्रस्तुत करती है। उनकी रचनाएँ पाठकों को सोचने, सीखने और बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देती हैं।

लेखक / मूल रचनाकार: मुंशी प्रेमचंद
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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