अकबर बीरबल

अकबर बीरबल-किस नदी का पानी सबसे अच्छा

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अकबर बीरबल-किस नदी का पानी सबसे अच्छा

एक दिन अकबर का दरबार सजा हुआ था। दरबार में सभी मंत्री, विद्वान और सभासद उपस्थित थे। उस दिन बादशाह का मन कुछ अलग प्रकार के प्रश्न पूछने का था। वे अक्सर दरबारियों की बुद्धि और समझ की परीक्षा लेने के लिए ऐसे सवाल किया करते थे, जिनमें केवल सामान्य ज्ञान ही नहीं बल्कि चतुराई और गहरी सोच की भी आवश्यकता होती थी।

कुछ देर तक बातचीत चलती रही, फिर अकबर ने अचानक दरबारियों की ओर देखते हुए पूछा, “बताइए, संसार में किस नदी का पानी सबसे अच्छा माना जाता है?”

प्रश्न सुनते ही दरबार में बैठे लगभग सभी दरबारियों ने बिना सोचे-समझे एक साथ उत्तर दिया, “जहाँपनाह, गंगा नदी का पानी सबसे अच्छा होता है।”
दरबारियों को विश्वास था कि यही सही उत्तर है, क्योंकि गंगा को पवित्र और पूजनीय माना जाता था। लेकिन उसी समय अकबर की नज़र बीरबल पर पड़ी। वे शांत बैठे थे और उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया था।

अकबर ने आश्चर्य से पूछा, “बीरबल, तुम चुप क्यों हो? क्या तुम बाकी दरबारियों की बात से सहमत नहीं हो?”
बीरबल विनम्रता से बोले, “जहाँपनाह, मेरी राय में सबसे अच्छा पानी यमुना नदी का होता है।”
बीरबल का यह उत्तर सुनते ही पूरा दरबार हैरान रह गया। कई दरबारी एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। अकबर भी आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने कहा, “बीरबल, यह कैसी बात कर रहे हो? तुम्हारे धर्मग्रंथों में तो गंगा को सबसे पवित्र और श्रेष्ठ माना गया है। फिर तुम यमुना के पानी को सबसे अच्छा कैसे बता सकते हो?”

बीरबल हल्के से मुस्कुराए। वे समझ चुके थे कि अब समय आ गया है अपने उत्तर का अर्थ समझाने का। उन्होंने आदरपूर्वक कहा, “जहाँपनाह, मैं गंगा की तुलना साधारण पानी से कैसे कर सकता हूँ? गंगा का जल तो हमारे लिए अमृत के समान माना जाता है। जब किसी चीज़ को अमृत का दर्जा दिया जाए, तो उसे केवल पानी कहना उचित नहीं होगा। इसलिए यदि केवल पानी की बात की जाए, तो यमुना का पानी सबसे अच्छा कहा जा सकता है।”

कुछ क्षणों के लिए पूरा दरबार शांत हो गया। अकबर ध्यान से बीरबल की बात सुनते रहे। फिर उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई। वे समझ चुके थे कि बीरबल ने कितनी बुद्धिमानी से उत्तर दिया है। उन्होंने गंगा का सम्मान भी बनाए रखा और अपने जवाब को भी चतुराई से सही सिद्ध कर दिया।

दरबारियों के पास अब कोई उत्तर नहीं था। सभी को मानना पड़ा कि बीरबल ने एक बार फिर अपनी हाजिरजवाबी और गहरी बुद्धि से सबको प्रभावित कर दिया है।

अकबर ने प्रसन्न होकर कहा, “बीरबल, तुम्हारी सोच सचमुच सबसे अलग है। तुम साधारण प्रश्नों में भी ऐसा उत्तर ढूँढ़ लेते हो, जो सभी को सोचने पर मजबूर कर देता है।”

इस प्रकार बीरबल ने अपनी चतुराई से एक साधारण प्रश्न को भी ज्ञान और बुद्धिमत्ता की मिसाल बना दिया।

कुएं का पानी — अकबर-बीरबल की कहानी

एक बार एक किसान बहुत परेशान था क्योंकि उसके खेतों में पानी की बहुत कमी थी और फसल सूख रही थी। वह कई दिनों से अपने खेत के आसपास पानी का कोई साधन ढूंढ रहा था। इसी तलाश में एक दिन उसे अपने खेत के पास एक पुराना लेकिन भरा हुआ कुआं दिखाई दिया। कुआं देखकर किसान बहुत खुश हो गया क्योंकि उसे लगा कि अब उसकी सारी परेशानियाँ खत्म हो जाएँगी और फसल को समय पर पानी मिल सकेगा।

अगले ही दिन वह बाल्टी लेकर कुएं पर पहुँचा और जैसे ही उसने पानी निकालने के लिए बाल्टी नीचे डाली, तभी एक आदमी वहाँ आ गया और उसने सख्त आवाज़ में कहा कि यह कुआं उसका है और वह इससे पानी नहीं निकाल सकता। उस आदमी ने कहा कि अगर पानी चाहिए तो पहले कुआं खरीदना होगा।

किसान पहले तो चौंक गया, लेकिन फिर उसने सोचा कि कुआं अगर उसका हो गया तो उसे हमेशा पानी मिलता रहेगा और उसे बार-बार किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इसलिए दोनों के बीच सौदा तय हुआ और किसान ने किसी तरह पैसे जुटाने का वादा कर दिया।
किसान के पास इतने पैसे नहीं थे, लेकिन उसने मेहनत करके अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से मदद ली और किसी तरह तय रकम जमा कर ली। वह बहुत उत्साहित था और पूरी रात उसे नींद नहीं आई क्योंकि उसे लग रहा था कि अब उसकी सारी समस्याओं का हल मिलने वाला है।

अगली सुबह वह पैसे लेकर उस आदमी के पास पहुँचा और उसे कुएं की पूरी कीमत देकर कुआं खरीद लिया। अब कुआं उसका हो चुका था, इसलिए वह तुरंत पानी निकालने लगा। लेकिन जैसे ही उसने बाल्टी नीचे डाली, वह आदमी फिर बोला कि पानी अभी भी उसका है, उसने सिर्फ कुआं बेचा है, पानी नहीं।

यह सुनकर किसान पूरी तरह परेशान हो गया और न्याय के लिए दरबार में गया जहाँ अकबर न्याय करते थे।

अकबर ने पूरी बात सुनी और उस आदमी को दरबार में बुलाया। जब दोनों सामने आए तो अकबर ने पूछा कि जब कुआं बेच दिया गया है तो पानी क्यों नहीं लेने दिया जा रहा।

आदमी ने बड़ी चालाकी से कहा, “जहाँपनाह, मैंने सिर्फ कुआं बेचा है, पानी नहीं।”
अकबर इस तर्क को सुनकर कुछ देर के लिए सोच में पड़ गए क्योंकि बात सुनने में सही लग रही थी, लेकिन मामला उलझा हुआ था। उन्होंने तुरंत बीरबल को बुलाया।

बीरबल ने पूरी कहानी ध्यान से सुनी और फिर हल्की मुस्कान के साथ उस आदमी से कहा, “ठीक है, तुमने कुआं बेचा है, पानी नहीं। लेकिन अब बताओ कि तुम्हारा पानी उस कुएं के अंदर क्या कर रहा है? अगर कुआं तुम्हारा नहीं है, तो फौरन अपना पानी बाहर निकालो।”

बीरबल की यह बात सुनते ही वह आदमी घबरा गया और समझ गया कि उसकी चालाकी अब काम नहीं करेगी। वह तुरंत माफी मांगने लगा और स्वीकार किया कि कुएं के साथ पानी पर भी किसान का ही अधिकार है।

अकबर ने बीरबल की बुद्धिमानी की प्रशंसा की और उस व्यक्ति पर धोखाधड़ी के लिए जुर्माना लगाया।
इस प्रकार बीरबल ने अपनी चतुराई से न्याय करते हुए सच्चाई को सामने ला दिया और यह सिद्ध किया कि चालाकी कभी भी सच्चाई से बड़ी नहीं हो सकती।

खाने के बाद लेटना — अकबर-बीरबल की कहानी

एक बार अकबर और बीरबल के बीच एक पुरानी कहावत को लेकर चर्चा हुई थी। बीरबल ने अकबर को समझाते हुए कहा था कि “खाकर लेट जा और मारकर भाग जा” जैसे लोग अपने काम में चतुर और समझदार होते हैं और जीवन में अनावश्यक परेशानियों से बच जाते हैं। अकबर को यह बात सुनने में थोड़ी अजीब लगी थी, लेकिन उन्होंने उस समय कुछ नहीं कहा था।

कुछ समय बाद अकबर के मन में वही बात फिर से याद आ गई। उस दिन दोपहर का समय था और वे अपने महल में बैठे हुए थे। अचानक उन्हें लगा कि बीरबल तो शायद हमेशा खाना खाने के बाद आराम से लेट जाते होंगे। उन्होंने सोचा कि क्यों न आज यह साबित किया जाए कि बीरबल की बात सही नहीं है और उन्हें किसी न किसी स्थिति में पकड़ा जाए।

इसी विचार के साथ अकबर ने एक सेवक को बुलाया और उसे आदेश दिया कि वह तुरंत बीरबल को दरबार में बुलाए। सेवक तुरंत बीरबल के पास पहुँचा और बादशाह का संदेश सुनाया।

बीरबल ने संदेश सुनते ही समझ लिया कि यह कोई सामान्य बुलावा नहीं है, बल्कि इसके पीछे कोई परीक्षा या योजना हो सकती है। उन्होंने शांत होकर कहा, “ठीक है, मैं अभी कपड़े बदलकर आपके साथ चलता हूँ।”

उस समय बीरबल ने एक चुस्त और तंग पाजामा पहना हुआ था। उसे पहनने में सुविधा के लिए उन्हें थोड़ी देर के लिए लेटना पड़ा, ताकि वे ठीक से कपड़े पहन सकें। लेकिन बीरबल जानते थे कि यही क्षण अकबर के सवाल का जवाब बनने वाला है।
कुछ समय बाद वे तैयार होकर सेवक के साथ दरबार की ओर चल पड़े।

दरबार पहुँचते ही अकबर ने मुस्कुराते हुए पूछा, “बोलो बीरबल, आज भी खाना खाने के बाद लेटे थे या नहीं?”
बीरबल ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “हाँ जहाँपनाह, मैं लेटा था।”

अकबर का चेहरा गंभीर हो गया। उन्होंने तुरंत कहा, “इसका मतलब तुमने हमारे आदेश का पालन नहीं किया। हमने तुम्हें खाना खाने के तुरंत बाद बुलाया था, फिर तुम लेटे क्यों?”

बीरबल बिना किसी घबराहट के बोले, “जहाँपनाह, मैंने आपके आदेश की अवहेलना नहीं की है। मैं तो कपड़े पहनने की तैयारी कर रहा था और उसी कारण थोड़ी देर लेटना पड़ा था। आप चाहें तो आपके भेजे हुए सेवक से पूछ सकते हैं। मैं तो खाना खाने के बाद सीधा आपके पास ही आ रहा हूँ।”

यह सुनकर अकबर कुछ पल के लिए चुप हो गए। फिर उन्हें बात की चालाकी समझ आ गई और वे मुस्कुराने लगे।

दरबार में मौजूद सभी लोग भी बीरबल की इस चतुराई पर मुस्कुरा उठे। एक बार फिर साबित हो गया कि बीरबल किसी भी स्थिति को अपनी बुद्धि से सरल और अपने पक्ष में बदलने की कला जानते थे।

छोटा बांस, बड़ा बांस — अकबर-बीरबल की कहानी

एक दिन अकबर और बीरबल महल के बाग में सैर कर रहे थे। मौसम अच्छा था और दोनों हल्की-फुल्की बातचीत करते हुए टहल रहे थे। बीरबल अपने स्वभाव के अनुसार किसी मजेदार किस्से से अकबर का मनोरंजन कर रहे थे और अकबर मुस्कुराते हुए उनकी बातों का आनंद ले रहे थे।

चलते-चलते अकबर की नज़र घास पर पड़े एक छोटे से बांस के टुकड़े पर पड़ी। उनके मन में अचानक शरारती विचार आया कि क्यों न बीरबल की बुद्धि की एक और परीक्षा ली जाए।

उन्होंने वह बांस का टुकड़ा उठाया और बीरबल को दिखाते हुए कहा, “बीरबल, क्या तुम बिना इसे काटे इस बांस के टुकड़े को छोटा कर सकते हो?”
यह सवाल सुनते ही बीरबल एक पल के लिए रुक गए। वे समझ गए कि यह सवाल सीधा नहीं है, बल्कि इसमें चतुराई से जवाब देने की परीक्षा छिपी हुई है। अकबर के चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, जिससे साफ था कि वे मजाक के मूड में हैं।

बीरबल ने आसपास देखा और पास से गुजरते एक माली के हाथ में लंबा बांस देखा। उनके दिमाग में तुरंत एक विचार आया।

वे माली के पास गए और उससे वह लंबा बांस ले लिया। फिर उन्होंने अकबर के हाथ से वह छोटा बांस का टुकड़ा भी ले लिया।
अब बीरबल ने दोनों को एक साथ पकड़कर कहा, “जहाँपनाह, अब देखिए।”

उन्होंने लंबा बांस एक तरफ दिखाया और छोटा टुकड़ा उसके पास रख दिया। फिर मुस्कुराकर बोले, “अब यह टुकड़ा अपने आप छोटा दिख रहा है, बिना काटे ही।”
अकबर पहले कुछ क्षण चुप रहे, फिर उन्हें बात की चतुराई समझ आ गई। बड़े बांस के सामने छोटा टुकड़ा और भी छोटा दिखाई दे रहा था, और प्रश्न का उत्तर अपने आप मिल गया था।

अकबर मुस्कुरा पड़े और बोले, “बीरबल, तुम हर बार शब्दों से ज्यादा समझ से जवाब देते हो।”
बीरबल हल्के से मुस्कुराए और फिर दोनों अपनी सैर जारी रखते हुए आगे बढ़ गए।

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अकबर-बीरबल की रोचक और मनोरंजक कहानी बुद्धिमत्ता, हाजिरजवाबी और चतुराई का अनोखा संगम है। जानिए कैसे बीरबल अपनी सूझबूझ से कठिन प्रश्नों का समाधान करते हैं और सभी को जीवन की महत्वपूर्ण सीख देते हैं।

लेखक / मूल रचनाकार: अकबर बीरबल
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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