आगरा कौन सा रास्ता जाता है — अकबर-बीरबल की कहानी
मुगल सम्राट अकबर को शिकार खेलने का अत्यंत शौक था। चाहे राजकाज कितना भी व्यस्त क्यों न हो, वे शिकार के लिए समय निकाल ही लेते थे। वे केवल एक बादशाह ही नहीं, बल्कि अपने समय के बेहतरीन घुड़सवारों और कुशल शिकारियों में भी गिने जाते थे। तेज़ रफ्तार घोड़े पर जंगलों और पहाड़ियों के बीच दौड़ लगाना उन्हें बहुत पसंद था। कई बार तो वे शिकार के उत्साह में इतनी दूर निकल जाते कि साथ चल रही सेना भी पीछे छूट जाती।
एक दिन अकबर कुछ सैनिकों के साथ शिकार खेलने जंगल की ओर निकले। जंगल घना था और शिकार की तलाश में वे अपने घोड़े को तेजी से दौड़ाते चले गए। हिरण का पीछा करते-करते उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि वे अपनी मुख्य सेना से बहुत दूर निकल आए हैं। जब तक उन्हें एहसास हुआ, तब तक शाम ढलने लगी थी। सूरज की लालिमा धीरे-धीरे अंधेरे में बदल रही थी।
अब अकबर के साथ केवल कुछ सैनिक ही बचे थे। सभी थके हुए थे, भूख और प्यास से परेशान थे, और सबसे बड़ी चिंता यह थी कि वे रास्ता भटक चुके थे। चारों ओर जंगल और सुनसान रास्ते दिखाई दे रहे थे। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि राजधानी आगरा किस दिशा में है।
अकबर ने अपने सैनिकों के साथ आगे बढ़ना जारी रखा। कुछ दूर चलने के बाद उन्हें एक तिराहा दिखाई दिया। तीन अलग-अलग दिशाओं में सड़कें जा रही थीं। यह देखकर सभी के मन में थोड़ी आशा जगी कि शायद अब सही रास्ता मिल जाए। लेकिन नई समस्या सामने थी— आखिर इन तीन रास्तों में से आगरा जाने वाला रास्ता कौन-सा है?
सभी सैनिक आपस में चर्चा करने लगे, मगर कोई निश्चित उत्तर नहीं दे पाया। अकबर भी गहरी सोच में पड़ गए। तभी उनकी नज़र सड़क के किनारे खड़े एक किशोर लड़के पर पड़ी। वह दूर खड़ा बड़ी उत्सुकता से उन्हें देख रहा था। उसके चेहरे पर डर नहीं, बल्कि हल्की मुस्कान थी।
सैनिकों ने तुरंत उसे पकड़कर अकबर के सामने लाकर खड़ा कर दिया। अकबर ने गंभीर आवाज़ में पूछा, “ऐ लड़के, बताो आगरा के लिए कौन-सी सड़क जाती है?”
लड़के ने राजा की ओर देखा और अचानक मुस्कुरा दिया। फिर बड़ी सहजता से बोला, “हुजूर, सड़क कहीं नहीं जाती।”
उसका उत्तर सुनकर सैनिक चौंक गए। कुछ सैनिकों को लगा कि यह लड़का बादशाह का मजाक उड़ा रहा है। लेकिन लड़का बिना डरे आगे बोला, “जनाब, रास्ते कभी नहीं चलते। चलना तो इंसानों को पड़ता है। अगर सड़क खुद चल सकती, तो वह आगरा क्यों जाती?”
इतना कहकर वह खिलखिलाकर हँस पड़ा।
सैनिकों ने डरते हुए अकबर की ओर देखा। वे जानते थे कि बादशाह को गुस्सा आ गया तो लड़के की खैर नहीं। लेकिन आश्चर्य की बात यह हुई कि अकबर नाराज़ होने के बजाय मुस्कुरा पड़े। उन्हें लड़के की बुद्धिमानी और निडरता बहुत पसंद आई।
अकबर ने शांत स्वर में पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”
लड़के ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, “मेरा नाम महेश दास है, महाराज।”
फिर उसने मासूमियत से पूछा, “लेकिन आप कौन हैं?”
अकबर उसकी साफगोई देखकर प्रसन्न हुए। उन्होंने अपनी उंगली से एक कीमती अंगूठी उतारी और महेश दास की ओर बढ़ाते हुए कहा, “तुम हिंदुस्तान के सम्राट अकबर से बात कर रहे हो।”
यह सुनते ही लड़का एक पल के लिए चौंक गया। उसने तुरंत आदरपूर्वक सिर झुका लिया। अकबर ने मुस्कुराते हुए कहा, “तुम बहुत निडर और बुद्धिमान हो। मुझे ऐसे लोग पसंद हैं। कभी मेरे दरबार में आना और यह अंगूठी दिखाना। इसे देखकर मैं तुम्हें पहचान लूँगा।”
इसके बाद अकबर ने कहा, “अब हमें यह भी बता दो कि आगरा पहुँचने के लिए कौन-सा रास्ता लेना चाहिए।”
महेश दास ने विनम्रता से सही रास्ता बता दिया। अकबर और उनके सैनिक उसी दिशा में आगे बढ़ गए। महेश दास देर तक वहीं खड़ा हिंदुस्तान के महान सम्राट को जाता हुआ देखता रहा।
समय बीतने के साथ यही चतुर और निडर बालक आगे चलकर बीरबल के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यही अकबर और बीरबल की पहली मुलाकात थी, जिसने इतिहास में मित्रता, बुद्धिमानी और हाजिरजवाबी की एक नई मिसाल कायम की।
आदमी एक, खूबियाँ तीन — अकबर-बीरबल की कहानी
एक दिन अकबर अपने प्रिय मंत्री बीरबल के साथ शाही बाग़ में बैठे बातचीत कर रहे थे। मौसम बड़ा सुहावना था। चारों ओर हरियाली फैली हुई थी, फव्वारों का पानी धीमे-धीमे बह रहा था और पक्षियों की मधुर आवाज़ वातावरण को और भी आनंदमय बना रही थी। ऐसे ही हल्के-फुल्के माहौल में अकबर के मन में एक अजीब सवाल आया।
उन्होंने मुस्कुराते हुए बीरबल से पूछा, “बीरबल, क्या इस संसार में ऐसा कोई आदमी भी हो सकता है जो अलग-अलग जानवरों जैसी भाषा बोल सके?”
बीरबल ने तुरंत उत्तर देने के बजाय हल्की मुस्कान के साथ कहा, “जहाँपनाह, केवल हो ही नहीं सकता, बल्कि मैं ऐसे एक व्यक्ति को जानता भी हूँ। वह आदमी तोते की तरह बोल सकता है, शेर की तरह बोल सकता है और गधे की तरह भी बोल सकता है।”
अकबर यह सुनकर चौंक पड़े। उन्हें विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने आश्चर्य से पूछा, “क्या सचमुच ऐसा आदमी मौजूद है?”
बीरबल ने आत्मविश्वास से कहा, “जी हुज़ूर, बिल्कुल।”
अकबर की उत्सुकता बढ़ गई। उन्होंने तुरंत आदेश दिया, “तो फिर कल उसे हमारे दरबार में पेश किया जाए। हम भी देखना चाहते हैं कि वह आदमी कैसे अलग-अलग भाषाएँ बोलता है।”
अगले दिन दरबार सजा। सभी दरबारी उत्सुक थे कि आखिर बीरबल कौन-सा नया तमाशा दिखाने वाले हैं। थोड़ी देर बाद बीरबल एक साधारण से आदमी को अपने साथ लेकर दरबार में पहुँचे। वह व्यक्ति देखने में बिल्कुल आम इंसान जैसा था। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि उसमें ऐसी कौन-सी विशेषता है।
दरबार शुरू होने से पहले ही बीरबल ने उसे चोरी-छिपे शराब की एक छोटी बोतल पिला दी थी। थोड़ी ही देर में उस आदमी पर हल्का नशा चढ़ने लगा। अब वह लड़खड़ाते कदमों से अकबर के सामने खड़ा था। उसे यह भी समझ आ गया था कि वह बादशाह के दरबार में शराब पीकर आ गया है और यदि बादशाह को क्रोध आ गया, तो उसे कड़ी सज़ा मिल सकती है।
डर के मारे वह तुरंत हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा। वह बार-बार अकबर की तारीफ करने लगा और कहने लगा, “जहाँपनाह, आप महान हैं… आप जैसा दयालु बादशाह पूरी दुनिया में नहीं… मुझ गरीब पर रहम कीजिए…”
उसकी मीठी-मीठी बातें सुनकर दरबारियों को हँसी आने लगी। तभी बीरबल मुस्कुराए और बोले, “हुज़ूर, देखिए… डर और लालच में यह आदमी जिस तरह मीठी-मीठी बातें कर रहा है, यही तोते की भाषा है। जैसे तोता लोगों की बातों की नकल करता है और सबको खुश करने की कोशिश करता है, वैसे ही यह भी आपकी खुशामद कर रहा है।”
अकबर ने सिर हिलाकर बात स्वीकार की। उन्हें बीरबल की व्याख्या रोचक लगी।
इसके बाद बीरबल ने उस आदमी को शराब की एक और बोतल पिला दी। अब उसका नशा काफी बढ़ चुका था। उसका डर धीरे-धीरे खत्म होने लगा। इस बार वह अकबर के सामने सीना तानकर खड़ा हो गया। उसकी आवाज़ में अकड़ आ गई थी।
वह ऊँची आवाज़ में बोला, “तो क्या हुआ अगर आप पूरे राज्य के बादशाह हैं? मैं भी अपने घर का बादशाह हूँ। मैं किसी से नहीं डरता!”
दरबार में सन्नाटा छा गया। सैनिक भी चौकन्ने हो गए। लेकिन बीरबल शांत खड़े मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने अकबर की ओर देखकर कहा, “जहाँपनाह, अब यह शेर की भाषा बोल रहा है। शराब के नशे ने इसके भीतर झूठी बहादुरी भर दी है। अब इसे किसी का डर नहीं लग रहा, इसलिए यह शेर की तरह दहाड़ रहा है।”
अकबर को यह उदाहरण और भी मजेदार लगा। वे हँस पड़े।
लेकिन बीरबल अभी रुके नहीं। उन्होंने उस आदमी को जबरदस्ती शराब की एक और बोतल पिला दी। अब वह पूरी तरह नशे में चूर हो चुका था। उसकी आँखें लाल हो गई थीं, पैर काँप रहे थे और शरीर का संतुलन बिगड़ चुका था।
कुछ ही देर में वह आदमी लड़खड़ाकर ज़मीन पर गिर पड़ा। फिर वहीं लेटे-लेटे हाथ-पैर हवा में चलाने लगा और उसके मुँह से अजीब-अजीब, बेसिर-पैर की आवाज़ें निकलने लगीं। उसकी बातों का कोई अर्थ नहीं रह गया था।
यह देखकर पूरा दरबार हँसी से गूंज उठा।
तब बीरबल ने विनम्रता से कहा, “जहाँपनाह, अब यह गधे की भाषा बोल रहा है। जैसे गधा बिना समझे ऊल-जुलूल आवाज़ें निकालता रहता है, वैसे ही अब यह आदमी भी बेसमझ होकर अनाप-शनाप बोल रहा है।”
अकबर बीरबल की बुद्धिमानी और हाजिरजवाबी से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने माना कि बीरबल साधारण बातों को भी इतने रोचक और चतुर तरीके से समझाते हैं कि हर कोई प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता।
बादशाह ने खुश होकर बीरबल को इनाम दिया और पूरा दरबार उनकी चतुराई की प्रशंसा करने लगा।
ईश्वर अच्छा ही करता है — अकबर-बीरबल की कहानी

बीरबल केवल अपनी बुद्धिमानी और हाजिरजवाबी के लिए ही प्रसिद्ध नहीं थे, बल्कि वे एक अत्यंत धार्मिक, सज्जन और ईश्वर में गहरी आस्था रखने वाले व्यक्ति भी थे। उनका विश्वास था कि संसार में जो कुछ भी होता है, वह अंततः मनुष्य के भले के लिए ही होता है। वे प्रतिदिन नियमित रूप से ईश्वर की आराधना करते थे और मानते थे कि सच्ची श्रद्धा इंसान को मानसिक शक्ति, धैर्य और सही सोच प्रदान करती है।
दरबार में अक्सर वे लोगों को समझाते हुए कहा करते थे, “ईश्वर कभी किसी का बुरा नहीं करता। कई बार परिस्थितियाँ हमें दुखद लगती हैं, लेकिन समय बीतने पर समझ आता है कि वही घटना हमारे लिए किसी बड़े संकट से रक्षा करने वाली थी। भगवान कभी-कभी थोड़ी पीड़ा देकर इंसान को किसी भारी मुसीबत से बचा लेते हैं।”
हालाँकि दरबार में सभी लोग उनकी बातों से सहमत नहीं होते थे। कुछ दरबारी बीरबल की बातों को केवल दार्शनिक ज्ञान समझते थे और उन्हें लगता था कि हर घटना में अच्छाई ढूँढना संभव नहीं।
एक दिन दरबार में बैठे एक दरबारी ने बीरबल की बातों का मज़ाक उड़ाने का निश्चय किया। वह थोड़ा नाराज़ भी था क्योंकि पिछली शाम उसके साथ एक दुर्घटना हो गई थी। उसने सबके सामने अपना हाथ दिखाते हुए कहा, “बीरबल, तुम हमेशा कहते रहते हो कि ईश्वर जो करता है, अच्छे के लिए करता है। लेकिन देखो, कल शाम जब मैं जानवरों के लिए चारा काट रहा था, तब अचानक मेरी छोटी उंगली कट गई। अब बताओ, इसमें क्या भलाई छिपी है?”
पूरा दरबार उसकी ओर देखने लगा। कई दरबारियों को लगा कि इस बार शायद बीरबल के पास कोई उत्तर नहीं होगा। लेकिन बीरबल शांत रहे। कुछ क्षण सोचने के बाद उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “मुझे अब भी पूरा विश्वास है कि ईश्वर ने जो किया है, उसमें भी अवश्य कोई भलाई छिपी होगी।”
यह सुनकर वह दरबारी और अधिक क्रोधित हो गया। उसे लगा कि बीरबल उसकी पीड़ा को समझ ही नहीं रहे। उसने नाराज़ होकर कहा, “मेरी उंगली कट गई और तुम्हें इसमें भी अच्छाई दिखाई दे रही है!”
कुछ अन्य दरबारियों ने भी उसका समर्थन किया। उन्हें भी लगा कि इस घटना में कोई लाभ दिखाई नहीं देता।
तभी अकबर ने बातचीत में हस्तक्षेप किया। उन्होंने कहा, “बीरबल, हम भी ईश्वर पर विश्वास रखते हैं, लेकिन इस बार तुम्हारी बात समझ में नहीं आती। इस दरबारी की उंगली कट गई, इसमें भला कौन-सी अच्छी बात हो सकती है?”
बीरबल ने विनम्रता से मुस्कुराकर उत्तर दिया, “जहाँपनाह, अभी शायद हमें इसका कारण समझ नहीं आ रहा, लेकिन समय अवश्य बताएगा कि ईश्वर ने यह क्यों किया।”
दरबार समाप्त हो गया और यह बात धीरे-धीरे सब भूल गए।
करीब तीन महीने बाद वही दरबारी शिकार खेलने के लिए घने जंगल में गया। उसे शिकार का बहुत शौक था। जंगल में घूमते हुए उसने एक हिरण देखा और उसे पकड़ने के उत्साह में वह अपने साथियों से काफी दूर निकल गया। हिरण का पीछा करते-करते वह रास्ता भटक गया।
कुछ ही देर में वह आदिवासियों के एक समूह के हाथों पकड़ा गया। वे लोग अपने देवता को प्रसन्न करने के लिए मानव बलि चढ़ाने में विश्वास करते थे। दरबारी को पकड़कर वे अपने मंदिर में ले गए। वहाँ बलि की तैयारी शुरू हो गई। यह देखकर दरबारी भय से काँपने लगा। उसे लगा कि अब उसका अंत निश्चित है।
तभी आदिवासियों का पुजारी आगे आया। उसने बलि चढ़ाने से पहले उस दरबारी के शरीर का निरीक्षण करना शुरू किया। अचानक उसकी नज़र उसके हाथ पर गई और उसने देखा कि उसकी एक उंगली कटी हुई है।
पुजारी तुरंत पीछे हट गया और जोर से बोला, “रुको! इस आदमी की बलि नहीं दी जा सकती। हमारे देवता अधूरी बलि स्वीकार नहीं करेंगे। यदि किसी अपूर्ण शरीर वाले व्यक्ति की बलि दी गई, तो देवता क्रोधित हो जाएंगे और हमारे गाँव पर विपत्ति आ जाएगी।”
यह सुनते ही आदिवासियों ने उस दरबारी को तुरंत छोड़ दिया। उसकी जान बच गई।
डरा-सहमा
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अकबर-बीरबल की रोचक और मनोरंजक कहानी बुद्धिमत्ता, हाजिरजवाबी और चतुराई का अनोखा संगम है। जानिए कैसे बीरबल अपनी सूझबूझ से कठिन प्रश्नों का समाधान करते हैं और सभी को जीवन की महत्वपूर्ण सीख देते हैं।
लेखक / मूल रचनाकार: अकबर बीरबल
प्रस्तुति: Saying Central Team