अकबर-बीरबल की कहानी-कितनी माताएँ
एक दिन अकबर और बीरबल हमेशा की तरह महल से बाहर सैर करने निकले। मौसम सुहावना था और दोनों आपस में बातें करते हुए धीरे-धीरे रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे। अकबर को बीरबल के साथ समय बिताना बहुत पसंद था, क्योंकि बीरबल हर साधारण बात में भी कोई गहरी सीख छिपा देते थे।
चलते-चलते वे एक बगीचे के पास पहुँचे। वहाँ सड़क किनारे एक हरा-भरा तुलसी का पौधा लगा हुआ था। जैसे ही बीरबल की नज़र उस पर पड़ी, वे तुरंत रुक गए। उन्होंने श्रद्धा से हाथ जोड़कर तुलसी के पौधे को प्रणाम किया और सिर झुका दिया।
अकबर यह देखकर थोड़ा आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने मुस्कुराकर पूछा, “बीरबल, यह क्या कर रहे हो? किसे प्रणाम कर रहे हो?”
बीरबल ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “जहाँपनाह, यह मेरी माता हैं।”
अकबर को यह बात अजीब लगी। वे बोले, “एक पौधा तुम्हारी माता कैसे हो सकता है?”
बीरबल ने विनम्रता से कहा, “हमारे यहाँ तुलसी को माता का दर्जा दिया जाता है। लोग श्रद्धा और सम्मान से इसकी पूजा करते हैं।”
अकबर ने इसे मज़ाक समझा। उन्होंने हँसते हुए कहा, “तुम लोगों की कितनी माताएँ होती हैं?”
इतना कहकर उन्होंने तुलसी के पौधे को पकड़कर जमीन से उखाड़ दिया और एक ओर फेंक दिया।
बीरबल ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उनके मन में अकबर को उत्तर देने की एक बुद्धिमानी भरी तरकीब आ गई।
दोनों आगे बढ़ते रहे।
थोड़ी दूर जाने पर रास्ते में बिच्छूपत्ती का एक झाड़ दिखाई दिया। वह ऐसा पौधा था जिसे छूने से शरीर में तेज खुजली होने लगती थी।
उसे देखते ही बीरबल अचानक झुक गए और बड़े आदर से दंडवत प्रणाम करते हुए बोले, “जय हो, बाप मेरे!”
अकबर यह देखकर चौंक गए। उन्होंने हँसते हुए कहा, “अब यह कौन-सा नया तमाशा है?”
बीरबल गंभीर बनकर बोले, “जहाँपनाह, ये हमारे पिता हैं।”
अकबर को यह बात और भी मजेदार लगी। वे बोले, “अच्छा! तो अब झाड़ भी पिता बनने लगे?”
इतना कहकर उन्होंने गुस्से और मजाक में उस झाड़ को दोनों हाथों से पकड़कर उखाड़ना शुरू कर दिया।
लेकिन जैसे ही उनके हाथ उस पौधे से छुए, कुछ ही क्षणों में उनके पूरे शरीर में तेज खुजली होने लगी। अकबर बेचैन होकर इधर-उधर हाथ रगड़ने लगे।
जितना वे खुजलाते, उतनी ही खुजली बढ़ती जाती।
अब अकबर घबरा गए। उन्होंने परेशान होकर कहा, “बीरबल! यह क्या हो गया? पूरे शरीर में आग जैसी खुजली हो रही है!”
बीरबल ने शांत स्वर में कहा, “जहाँपनाह, आपने मेरी माता तुलसी का अपमान किया था, इसलिए ये पिता जी आपसे नाराज़ हो गए।”
अकबर अब सचमुच परेशान हो चुके थे। वे बोले, “अच्छा-अच्छा, अब मजाक छोड़ो और जल्दी कोई उपाय बताओ।”
बीरबल मुस्कुराए और बोले, “उपाय तो है, लेकिन उसके लिए हमारी एक और माता की सहायता लेनी पड़ेगी।”
अकबर तुरंत बोले, “जो करना है जल्दी करो!”
थोड़ी दूर आगे जाने पर उन्हें एक गाय खड़ी दिखाई दी। बीरबल ने हाथ जोड़कर कहा, “जहाँपनाह, यह हमारी गौमाता हैं। इनसे प्रार्थना कीजिए कि आपकी पीड़ा दूर करें।”
अकबर के पास कोई और उपाय भी नहीं था। उन्होंने तुरंत हाथ जोड़ दिए। उसी समय गाय ने गोबर कर दिया।
बीरबल बोले, “इसका लेप शरीर पर कर लीजिए, खुजली शांत हो जाएगी।”
मजबूरी में अकबर ने वैसा ही किया। आश्चर्य की बात यह हुई कि थोड़ी ही देर में उनकी खुजली कम होने लगी और उन्हें राहत महसूस हुई।
अब अकबर ने राहत की साँस ली, लेकिन तुरंत बोले, “बीरबल, अब क्या हम इसी हालत में महल लौटेंगे?”
बीरबल हँसते हुए बोले, “नहीं जहाँपनाह, हमारी एक और माता आपकी सहायता करेंगी।”
इतना कहकर उन्होंने सामने बहती हुई पवित्र गंगा नदी की ओर इशारा किया और बोले, “वह देखिए, गंगा माता। आप ‘हर-हर गंगे’ कहकर इसमें स्नान कर लीजिए।”
अकबर तुरंत नदी की ओर बढ़े। उन्होंने गंगा में स्नान किया और कुछ ही देर में उनका शरीर पूरी तरह साफ और तरोताजा हो गया।
नदी से बाहर निकलते हुए अकबर मुस्कुराए और बोले, “बीरबल, अब मैं समझ गया कि तुम लोग तुलसी को माता, गाय को माता और गंगा को माता क्यों कहते हो। ये सब वास्तव में लोगों के जीवन के लिए कल्याणकारी हैं और सम्मान के योग्य हैं।”
बीरबल ने विनम्रता से सिर झुका दिया।
उस दिन अकबर ने समझा कि कई परंपराओं के पीछे केवल आस्था ही नहीं, बल्कि प्रकृति, जीवन और समाज के प्रति सम्मान की भावना भी छिपी होती है।
किसका अफसर — अकबर-बीरबल की कहानी
एक दिन अकबर का दरबार सजा हुआ था। दरबार में सभी मंत्री, वज़ीर और दरबारी अपनी-अपनी जगह पर बैठे हुए थे। हमेशा की तरह माहौल हल्का-फुल्का और बातचीत से भरा हुआ था। उसी दरबार में अकबर के प्रसिद्ध वज़ीर अबुल फ़ज़ल भी मौजूद थे। वे विद्वान व्यक्ति थे, लेकिन कभी-कभी मज़ाक-मज़ाक में दूसरों को नीचा दिखाने की कोशिश भी कर देते थे।
उस दिन बातचीत के दौरान अबुल फ़ज़ल ने सोचा कि क्यों न बीरबल की हाजिरजवाबी की परीक्षा ली जाए। उन्होंने मुस्कुराते हुए व्यंग्य भरे स्वर में बीरबल से कहा, “बीरबल, सुना है कि बादशाह ने तुम्हें सुअरों और कुत्तों का अफसर नियुक्त किया है।”
दरबार में बैठे कुछ लोग यह सुनकर मुस्कुराने लगे। अबुल फ़ज़ल को लगा कि इस मजाक से शायद बीरबल असहज हो जाएंगे या कोई सीधा-सादा उत्तर देंगे। लेकिन बीरबल अपनी तेज बुद्धि और हाजिरजवाबी के लिए प्रसिद्ध थे। वे तुरंत मुस्कुराए और बिना एक पल गंवाए शांत स्वर में बोले, “बहुत अच्छा! यदि ऐसा है, तो फिर आपको भी मेरी आज्ञा माननी पड़ेगी, क्योंकि आप भी उसी श्रेणी में आते हैं।”
बीरबल का यह उत्तर सुनते ही पूरा दरबार ठहाकों से गूंज उठा। अकबर अपनी हँसी रोक नहीं पाए और जोर से हँस पड़े। अबुल फ़ज़ल समझ गए कि उन्होंने बीरबल को नीचा दिखाने की कोशिश में खुद ही अपने ऊपर व्यंग्य करा लिया है।
शर्मिंदगी के कारण उनका चेहरा उतर गया और वे चुपचाप सिर झुकाकर बैठ गए। वहीं दरबार के सभी लोग एक बार फिर बीरबल की चतुराई और तुरंत जवाब देने की कला की प्रशंसा करने लगे।
किसका नौकर कौन — अकबर-बीरबल की कहानी

एक दिन अकबर और बीरबल दरबार के कामकाज से थोड़ा समय निकालकर अकेले बैठे बातचीत कर रहे थे। दोनों के बीच अक्सर किसी न किसी विषय पर मजेदार बहस छिड़ जाती थी। अकबर को बीरबल की बुद्धिमानी और हाजिरजवाबी को परखने में बड़ा आनंद आता था, जबकि बीरबल भी अपनी चतुराई से बादशाह को मुस्कुराने पर मजबूर कर देते थे।
उस दिन बातचीत का विषय खाने-पीने की चीजों पर आ गया। तभी अकबर ने बड़े स्वाद लेकर बैंगन की सब्जी की तारीफ करनी शुरू कर दी। वे बोले, “बीरबल, बैंगन जैसी स्वादिष्ट सब्जी शायद ही कोई दूसरी हो। इसका स्वाद भी अच्छा होता है और यह हर तरह से उपयोगी भी है।”
बीरबल तुरंत मुस्कुराकर बोले, “बिल्कुल जहाँपनाह, आपने सही फरमाया। बैंगन सचमुच बहुत गुणकारी सब्जी है। इसकी सब्जी स्वादिष्ट होती है, भरता भी लाजवाब बनता है और यह स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक मानी जाती है।”
इतना ही नहीं, बीरबल अपनी ओर से भी बैंगन की तारीफ में कई बातें जोड़ने लगे। वे इतने विश्वास से उसकी प्रशंसा कर रहे थे कि मानो संसार में बैंगन से बेहतर कोई सब्जी ही न हो।
अकबर यह सब सुनकर मुस्कुरा रहे थे। तभी उनके मन में एक शरारती विचार आया। उन्होंने सोचा कि क्यों न आज बीरबल की परीक्षा ली जाए और देखा जाए कि वे अपनी बात पर कितने टिके रहते हैं।
कुछ देर बाद अकबर ने अचानक अपना स्वर बदल लिया और बोले, “लेकिन सच कहें तो बैंगन कोई खास सब्जी भी नहीं है। कई लोग कहते हैं कि इसे खाने से शरीर में बीमारियाँ बढ़ती हैं। इसका अधिक सेवन स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं होता।”
अब अकबर ध्यान से बीरबल का चेहरा देखने लगे। लेकिन बीरबल बिना घबराए तुरंत बोले, “जी जहाँपनाह, आपने बिल्कुल ठीक कहा। बैंगन अधिक खाने से कई प्रकार की परेशानियाँ हो सकती हैं। कुछ वैद्य तो इसे नुकसानदायक भी मानते हैं।”
इतना सुनते ही अकबर हैरान रह गए। उन्होंने आश्चर्य से कहा, “वाह बीरबल! यह कैसी बात है? अभी थोड़ी देर पहले तो तुम बैंगन की इतनी तारीफ कर रहे थे और अब उसकी बुराई करने लगे। जब हमने उसकी प्रशंसा की, तब तुमने भी प्रशंसा की और अब जब हमने उसकी आलोचना की, तो तुम भी उसकी बुराई करने लगे। आखिर ऐसा क्यों?”
बीरबल ने विनम्रता से मुस्कुराते हुए सिर झुकाया और बड़े शांत स्वर में बोले, “जहाँपनाह, मैं आपका नौकर हूँ… बैंगन का नहीं।”
बीरबल का यह उत्तर सुनते ही अकबर ज़ोर से हँस पड़े। वे समझ गए कि बीरबल ने बड़ी चतुराई से उनका प्रश्न भी टाल दिया और अपनी वफादारी भी जाहिर कर दी।
दरबार में बैठे लोग भी बीरबल की हाजिरजवाबी की प्रशंसा करने लगे। इस प्रकार एक साधारण-सी बातचीत भी अकबर और बीरबल की बुद्धि और हास्य का सुंदर उदाहरण बन गई।
मासूम सज़ा : अकबर-बीरबल की कहानी
एक दिन बादशाह अकबर दरबार में आए तो वे बहुत गुस्से में थे। उन्होंने दरबारियों से पूछा कि किसी ने उनकी मूंछें नोचने की हिम्मत की है, उसे क्या सज़ा दी जानी चाहिए। यह सुनकर दरबारियों ने तरह-तरह की कठोर सजाएँ सुझाईं—किसी ने फांसी, किसी ने सूली, तो किसी ने सिर कलम करने की बात कही।
बादशाह और अधिक क्रोधित हो गए, लेकिन फिर उन्होंने बीरबल से राय पूछी। बीरबल ने शांत होकर कहा कि इस अपराधी को सज़ा नहीं, बल्कि इनाम देना चाहिए। यह सुनकर पूरा दरबार हैरान रह गया।
बीरबल ने आगे कहा कि यह काम किसी बाहरी व्यक्ति का नहीं, बल्कि बादशाह के छोटे शहजादे का ही हो सकता है, जो उनकी गोद में खेलते-खेलते यह शरारत कर बैठा होगा। इसलिए उसे दंड नहीं बल्कि मिठाई रूपी “मासूम सज़ा” मिलनी चाहिए।
यह सुनकर अकबर की नाराजगी तुरंत खत्म हो गई और वे जोर से हंस पड़े। दरबारी भी समझ गए कि बिना सच्चाई जाने कठोर सज़ा की बात करना जल्दबाज़ी होती है, और बीरबल ने फिर अपनी बुद्धिमानी साबित कर दी।
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अकबर-बीरबल की रोचक और मनोरंजक कहानी बुद्धिमत्ता, हाजिरजवाबी और चतुराई का अनोखा संगम है। जानिए कैसे बीरबल अपनी सूझबूझ से कठिन प्रश्नों का समाधान करते हैं और सभी को जीवन की महत्वपूर्ण सीख देते हैं।
लेखक / मूल रचनाकार: अकबर बीरबल
प्रस्तुति: Saying Central Team