अकबर-बीरबल

ऊँट की गर्दन — अकबर-बीरबल की कहानी

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ऊँट की गर्दन — अकबर-बीरबल की कहानी

अकबर अपने दरबार में बीरबल की बुद्धिमानी, हाजिरजवाबी और चतुराई के इतने प्रशंसक थे कि अक्सर उनकी बातों से प्रसन्न होकर उन्हें इनाम देने की घोषणा कर दिया करते थे। दरबार में जब भी कोई कठिन समस्या बीरबल अपनी सूझबूझ से हल कर देते या अपनी चतुर बुद्धि से सभी को प्रभावित कर देते, तब अकबर खुशी-खुशी उन्हें पुरस्कार देने का वचन दे देते थे।

एक बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। दरबार में बीरबल ने अपनी समझदारी से एक जटिल समस्या का समाधान कर दिया था। अकबर इतने प्रसन्न हुए कि सबके सामने उन्होंने बीरबल को एक बड़ी धनराशि इनाम में देने की घोषणा कर दी। दरबारियों ने भी बादशाह की उदारता की प्रशंसा की और बीरबल को बधाइयाँ दीं।

लेकिन दिन बीतते गए। एक सप्ताह गुजरा, फिर दूसरा, फिर कई और दिन निकल गए। अकबर राजकाज में इतने व्यस्त हो गए कि उन्हें अपना किया हुआ वादा याद ही नहीं रहा। उधर बीरबल भी सीधे मुँह इनाम माँगने वालों में से नहीं थे। वे जानते थे कि बादशाह भूल चुके हैं, लेकिन उन्हें यह भी समझ नहीं आ रहा था कि अकबर को बिना नाराज़ किए उनका वादा कैसे याद दिलाया जाए।

बीरबल कई दिनों तक सोचते रहे। वे चाहते थे कि बात भी समझ आ जाए और उन्हें सीधे तौर पर कुछ माँगना भी न पड़े। आखिर एक दिन उन्हें अवसर मिल ही गया।
उस शाम अकबर यमुना नदी के किनारे सैर करने निकले। मौसम बड़ा मनमोहक था। ठंडी हवा चल रही थी और डूबते सूरज की लालिमा नदी के पानी पर चमक रही थी। बीरबल भी हमेशा की तरह उनके साथ थे। दोनों धीरे-धीरे चलते हुए बातें कर रहे थे।

तभी अकबर की नज़र पास में घूम रहे एक ऊँट पर पड़ी। ऊँट अपनी लंबी टेढ़ी गर्दन के साथ आराम से चल रहा था। उसे देखकर अकबर के मन में अचानक एक सवाल आया। उन्होंने मुस्कुराकर बीरबल से पूछा, “बीरबल, क्या तुम बता सकते हो कि ऊँट की गर्दन इतनी मुड़ी हुई क्यों होती है?”

बीरबल समझ गए कि यही सही अवसर है। उन्होंने तुरंत विनम्रता से उत्तर दिया, “जहाँपनाह, कहते हैं कि ऊँट पहले सीधी गर्दन वाला जानवर था। लेकिन एक बार उसने किसी से एक बड़ा वादा किया और फिर उसे निभाना भूल गया। उसके इस भूल जाने से भगवान नाराज़ हो गए और सज़ा के रूप में उसकी गर्दन टेढ़ी कर दी।”

अकबर ध्यान से बीरबल की बात सुनते रहे। बीरबल आगे बोले, “लोग कहते हैं कि जो व्यक्ति अपना वचन देकर उसे भूल जाता है, भगवान उसकी गर्दन भी ऊँट की तरह मोड़ देते हैं। वादा भूलना बहुत बड़ी भूल मानी जाती है।”

इतना सुनते ही अकबर कुछ क्षण के लिए चुप हो गए। अचानक उन्हें अपना वही अधूरा वादा याद आ गया जो उन्होंने कई दिन पहले बीरबल से किया था। उन्हें समझते देर नहीं लगी कि बीरबल ने कितनी चतुराई से बिना सीधे कुछ कहे उन्हें उनकी भूल का एहसास करा दिया है।

अकबर पहले तो कुछ पल गंभीर रहे, फिर ज़ोर से हँस पड़े। उन्होंने तुरंत बीरबल से कहा, “चलो, अभी महल वापस चलते हैं। हमें अपनी गर्दन ऊँट जैसी नहीं करवानी।”

बीरबल हल्का-सा मुस्कुराए और दोनों महल लौट आए। महल पहुँचते ही अकबर ने सबसे पहला काम यह किया कि उन्होंने बीरबल के लिए घोषित की गई पूरी पुरस्कार राशि तुरंत मंगवाई और अपने हाथों से उन्हें दे दी।
इनाम देते हुए अकबर हँसकर बोले, “बीरबल, अब तो मेरी गर्दन ऊँट जैसी नहीं मुड़ेगी।”

यह सुनकर बीरबल भी मुस्कुरा उठे। दरबार में उपस्थित सभी लोग अकबर और बीरबल की इस मजेदार बातचीत पर हँस पड़े।

इस प्रकार बीरबल ने अपनी बुद्धिमानी और हाजिरजवाबी से बिना सीधे माँगे अपना पुरस्कार प्राप्त कर लिया और एक बार फिर साबित कर दिया कि चतुराई से कही गई बात का असर सबसे गहरा होता है।

कल, आज और कल — अकबर-बीरबल की कहानी

एक दिन अकबर अपने दरबार में बैठे हुए थे। दरबार हमेशा की तरह विद्वानों, मंत्रियों और दरबारियों से भरा हुआ था। बातचीत के दौरान अकबर के मन में एक गहरा और विचारपूर्ण प्रश्न आया। वे अक्सर अपने दरबारियों की बुद्धि की परीक्षा लिया करते थे, इसलिए उन्होंने उसी समय एक अनोखी चुनौती रखने का निश्चय किया।

अकबर ने ऊँची आवाज़ में घोषणा की, “जो व्यक्ति हमारे तीन प्रश्नों का सही उत्तर देगा, उसे भारी इनाम दिया जाएगा।”

दरबार में तुरंत सन्नाटा छा गया। सभी उत्सुकता से बादशाह की ओर देखने लगे। तब अकबर ने अपने प्रश्न पूछे—
“ऐसी कौन-सी चीज़ है जो आज भी है और कल भी रहेगी?”
“ऐसी कौन-सी चीज़ है जो आज भी नहीं है और कल भी नहीं होगी?”
“और ऐसी कौन-सी चीज़ है जो आज तो है, लेकिन कल नहीं रहेगी?”

अकबर ने आगे कहा, “इन प्रश्नों के केवल उत्तर ही नहीं, बल्कि उनके उदाहरण भी देने होंगे।”
सभी दरबारी सोच में पड़ गए। प्रश्न सुनने में सरल लग रहे थे, लेकिन उनका सही अर्थ समझना आसान नहीं था। कोई भी तुरंत उत्तर नहीं दे पाया। दरबार में धीमी-धीमी फुसफुसाहट शुरू हो गई, लेकिन किसी के पास संतोषजनक जवाब नहीं था।

तभी बीरबल मुस्कुराते हुए उठे और बोले, “जहाँपनाह, मैं आपके तीनों प्रश्नों का उत्तर दे सकता हूँ। लेकिन इसके लिए आपको मेरे साथ नगर का भ्रमण करना होगा। केवल शब्दों में नहीं, उदाहरणों के माध्यम से ही इन प्रश्नों का सही अर्थ समझाया जा सकता है।”

अकबर तुरंत तैयार हो गए। अगले ही पल दोनों ने साधारण वेश धारण किया और पहचान छिपाने के लिए सूफियों जैसा पहनावा पहनकर नगर की ओर निकल पड़े।

कुछ देर बाद वे शहर के व्यस्त बाजार में पहुँचे। वहाँ दुकानों की भीड़, लोगों की आवाजाही और व्यापार की हलचल थी। बीरबल अकबर को लेकर एक बड़े व्यापारी की दुकान पर गए। व्यापारी धनवान होने के साथ-साथ दानशील स्वभाव का भी माना जाता था।
बीरबल ने उससे कहा, “हम गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए एक मदरसा बनवाना चाहते हैं। यदि आप इस नेक काम के लिए हमें एक हजार रुपये दे दें, तो बड़ी कृपा होगी।”

व्यापारी ने बिना अधिक सोच-विचार किए अपने मुनीम को पैसे देने का आदेश दे दिया। तभी बीरबल ने अचानक कहा, “लेकिन एक शर्त है। जितने रुपये आप देंगे, उतनी ही बार मैं आपके सिर पर जूता मारूँगा। हर एक रुपये के बदले एक जूता पड़ेगा। यदि आप तैयार हों तभी हम धन लेंगे।”

यह सुनते ही दुकान में खड़े नौकर और कर्मचारी क्रोधित हो गए। एक नौकर तो गुस्से में आगे बढ़ आया, लेकिन व्यापारी ने उसे रोक दिया। फिर शांत स्वर में बोला, “यदि यह धन सचमुच नेक काम में लगने वाला है, तो मैं यह अपमान भी सहने को तैयार हूँ।”

इतना कहकर उसने अपना सिर झुका दिया।
यह देखकर अकबर आश्चर्यचकित रह गए। लेकिन बीरबल बिना कुछ कहे वहाँ से बाहर निकल आए।
कुछ दूर आने के बाद बीरबल बोले, “जहाँपनाह, यही आपके पहले प्रश्न का उत्तर है। इस व्यापारी के पास आज धन भी है और अच्छे कर्म करने की नीयत भी। उसके ये नेक काम भविष्य में भी उसके साथ रहेंगे। लोग उसे सम्मान से याद करेंगे और ईश्वर भी उससे प्रसन्न होंगे। अर्थात जो आज उसके पास है, वह कल भी रहेगा।”

अकबर ध्यान से उनकी बातें सुनते रहे।
इसके बाद दोनों आगे बढ़े। रास्ते में उन्हें एक भिखारी दिखाई दिया। एक दयालु व्यक्ति उसे बहुत सारा भोजन देकर गया था। भोजन उसकी आवश्यकता से कहीं अधिक था।

बीरबल उस भिखारी के पास गए और बोले, “भाई, हम भी भूखे हैं। यदि संभव हो तो थोड़ा भोजन हमें भी दे दो।”
भिखारी तुरंत गुस्से में चिल्लाने लगा, “भागो यहाँ से! खुद मेहनत नहीं करते और दूसरों से माँगने चले आते हो!”

उसका व्यवहार देखकर अकबर हैरान रह गए।
तब बीरबल बोले, “जहाँपनाह, यही आपके दूसरे प्रश्न का उत्तर है। इस भिखारी के पास आज कुछ भी अच्छा नहीं है— न उदारता, न दया, न अच्छे कर्म। और यदि इसका व्यवहार ऐसा ही रहा, तो भविष्य में भी इसके पास कुछ अच्छा नहीं होगा। यानी जो आज नहीं है, वह कल भी नहीं होगा।”

अकबर ने सहमति में सिर हिलाया।
इसके बाद दोनों नगर से बाहर की ओर बढ़े। थोड़ी दूर एक पेड़ के नीचे एक तपस्वी ध्यान में लीन बैठा था। उसके चेहरे पर शांति थी और वह संसार के मोह-माया से दूर दिखाई देता था।

बीरबल उसके पास गए और उसके सामने कुछ धन रख दिया। तपस्वी ने आँखें खोलीं और तुरंत कहा, “इसे यहाँ से हटा लो। मुझे धन, वैभव और लालच से कोई मतलब नहीं। मैं यह सब स्वीकार नहीं कर सकता।”

दोनों वहाँ से आगे बढ़े तो बीरबल बोले, “जहाँपनाह, यही आपके तीसरे प्रश्न का उत्तर है। आज इस तपस्वी के पास धन-दौलत और सांसारिक सुख नहीं हैं, क्योंकि उसने स्वयं उन्हें त्याग दिया है। लेकिन उसके तप, त्याग और अच्छे कर्मों का फल उसे भविष्य में अवश्य मिलेगा। अर्थात जो आज नहीं है, वह कल हो सकता है।”

अकबर अब बीरबल की गहरी बुद्धि से अत्यंत प्रभावित हो चुके थे।

तब बीरबल मुस्कुराकर बोले, “और जहाँपनाह, एक चौथा उदाहरण आप स्वयं हैं। आपने अपने जीवन में अच्छे कर्म किए हैं, तभी आज आपको इतना बड़ा राज्य, सम्मान और वैभव प्राप्त हुआ है। यदि आप आगे भी न्याय, ईमानदारी और दया के साथ शासन करते रहेंगे, तो यह सम्मान भविष्य में भी बना रहेगा। लेकिन यदि आप सही मार्ग छोड़ देंगे, तो यह सब भी एक दिन समाप्त हो सकता है।”

अकबर कुछ क्षण शांत रहे। वे समझ चुके थे कि बीरबल केवल प्रश्नों का उत्तर नहीं दे रहे थे, बल्कि जीवन का गहरा सत्य समझा रहे थे।
दरबार लौटने पर अकबर ने प्रसन्न होकर बीरबल को भरपूर इनाम दिया और कहा, “बीरबल, तुम केवल बुद्धिमान ही नहीं, बल्कि मनुष्य जीवन की सच्चाई को समझने वाले व्यक्ति भी हो।”

कवि और धनवान आदमी — अकबर-बीरबल की कहानी

एक नगर में एक प्रतिभाशाली कवि रहता था। वह बहुत सुंदर कविताएँ लिखता था। उसकी रचनाओं में भावनाएँ, ज्ञान और मधुर शब्दों का ऐसा मेल होता था कि जो भी सुनता, मंत्रमुग्ध हो जाता। लेकिन उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। वह अपनी कला के सहारे ही जीवन चलाने का प्रयास करता था। कई बार उसे उम्मीद रहती कि कोई धनवान व्यक्ति उसकी प्रतिभा से प्रसन्न होकर उसे पुरस्कार देगा, जिससे उसकी कुछ कठिनाइयाँ कम हो सकें।

एक दिन उसे पता चला कि नगर का एक बहुत बड़ा धनी व्यक्ति कला और साहित्य का शौकीन होने का दिखावा करता है। कवि ने सोचा कि यदि वह अपनी कविताएँ उसे सुनाए, तो शायद वह खुश होकर अच्छा इनाम दे देगा। यही सोचकर वह उस धनवान की विशाल हवेली में पहुँचा।

धनवान व्यक्ति बड़े आराम से अपनी गद्दी पर बैठा था। कवि ने विनम्रता से उसे प्रणाम किया और अपनी कविताएँ सुनानी शुरू कीं। उसने एक से बढ़कर एक सुंदर कविताएँ सुनाईं। कभी वीर रस, कभी प्रेम, तो कभी जीवन की सच्चाइयों पर आधारित रचनाएँ। धनवान व्यक्ति हर कविता पर सिर हिलाता और वाह-वाह करता रहा।

जब कवि ने अपनी प्रस्तुति समाप्त की, तो उसके मन में आशा जागी कि अब उसे अवश्य कुछ पुरस्कार मिलेगा। लेकिन वह धनवान व्यक्ति अत्यंत कंजूस था। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “कवि महाशय, आपकी कविताएँ सुनकर हमारा मन प्रसन्न हो गया। आप कल फिर आइए, हम आपको खुश कर देंगे।”

कवि यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने सोचा कि शायद कल उसे अच्छा इनाम मिलेगा। पूरे रास्ते वह तरह-तरह की कल्पनाएँ करता हुआ घर पहुँचा। उस रात वह बड़े उत्साह में सोया।
अगले दिन सुबह-सुबह वह फिर उसी हवेली में पहुँच गया। धनवान ने उसे देखते ही मुस्कुराकर कहा, “आओ कवि जी, बैठो।”

कवि उत्सुकता से उसकी ओर देखने लगा। तभी धनवान हँसते हुए बोला, “देखो, कल तुमने अपनी कविताएँ सुनाकर हमें खुश किया था। उसी तरह आज तुम्हें बुलाकर हमने भी तुम्हें खुश कर दिया। तुमने हमें कुछ नहीं दिया था, इसलिए हम भी तुम्हें कुछ नहीं दे रहे। अब हिसाब बराबर हो गया।”
यह सुनते ही कवि का चेहरा उतर गया। उसकी सारी उम्मीदें टूट गईं। उसे अपनी गरीबी से अधिक उस अपमान का दुख हुआ जो उसके साथ हुआ था। वह उदास मन से वहाँ से चला आया।

उसने अपनी पूरी आपबीती अपने एक मित्र को सुनाई। मित्र को भी यह बात बहुत गलत लगी। वह सीधे बीरबल के पास पहुँचा और सारी घटना बता दी।
बीरबल ने ध्यान से पूरी बात सुनी। फिर हल्की मुस्कान के साथ बोले, “उस धनवान को उसकी गलती का एहसास कराना आवश्यक है। तुम वैसा ही करो जैसा मैं कहता हूँ।”

इसके बाद बीरबल ने एक योजना बनाई। उन्होंने कवि के मित्र से कहा कि वह उस धनवान से मित्रता बढ़ाए और कुछ दिनों बाद उसे अपने घर भोजन पर आमंत्रित करे। साथ ही कवि को भी बुलाया जाए। बीरबल स्वयं भी वहाँ उपस्थित रहने वाले थे।

योजना के अनुसार कुछ दिनों बाद दोपहर के समय भोज का कार्यक्रम रखा गया। नियत समय पर वह धनवान व्यक्ति बड़े उत्साह से वहाँ पहुँच गया। उसे उम्मीद थी कि शानदार दावत मिलेगी।

घर के भीतर बीरबल, कवि और कुछ अन्य लोग बैठकर बातचीत कर रहे थे। धनवान भी उनके साथ बैठ गया। समय धीरे-धीरे बीतने लगा। दोपहर ढलने लगी, लेकिन खाने-पीने की कोई तैयारी दिखाई नहीं दी। न कोई थाली आई, न पानी, न भोजन की सुगंध।
सभी लोग आराम से बातचीत में लगे रहे, मानो कोई भोज होना ही न हो।

अब धनवान की बेचैनी बढ़ने लगी। वह बार-बार इधर-उधर देखने लगा। आखिर जब उससे रहा नहीं गया, तो उसने पूछ ही लिया, “भोजन का समय तो बहुत पहले हो चुका। क्या हम यहाँ खाने के लिए नहीं बुलाए गए थे?”

तभी बीरबल ने अनजान बनते हुए कहा, “भोजन? कैसा भोजन?”
धनवान चौंक गया। उसने नाराज़ होकर कहा, “यह कैसी बात कर रहे हैं आप? आपने मुझे यहाँ खाने पर बुलाया था!”
बीरबल मुस्कुराए और बोले, “नहीं, आपको भोजन कराने के लिए नहीं बुलाया गया था। आपको यहाँ केवल खुश करने के लिए बुलाया गया था।”

इतना सुनते ही धनवान का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। वह क्रोधित होकर बोला, “यह तो मेरा अपमान है! किसी सम्मानित व्यक्ति के साथ ऐसा मजाक करना उचित नहीं। आपने मेरे साथ धोखा किया है।”

तभी बीरबल शांत स्वर में बोले, “यदि आपको यह व्यवहार गलत लग रहा है, तो सोचिए उस कवि को कितना दुख हुआ होगा, जिसके साथ आपने यही किया था। आपने भी उसे यह कहकर बुलाया था कि ‘कल आना, तुम्हें खुश कर देंगे।’ लेकिन अगले दिन आपने उसकी प्रतिभा का मजाक उड़ाया और उसे खाली हाथ लौटा दिया। आज हमने केवल आपको वही एहसास कराया है।”

यह सुनते ही धनवान व्यक्ति चुप हो गया। उसे अपनी गलती का एहसास हो चुका था। उसे समझ आ गया कि उसने एक गरीब कवि की भावनाओं को ठेस पहुँचाई थी।

उसने तुरंत कवि से क्षमा माँगी और उसे अच्छा-खासा इनाम देकर सम्मानपूर्वक विदा किया।
वहाँ बैठे सभी लोग बीरबल की बुद्धिमानी और न्यायप्रियता की प्रशंसा करने लगे। बीरबल ने एक बार फिर बिना कठोर दंड दिए केवल चतुराई से एक घमंडी और कंजूस व्यक्ति को उसकी गलती का एहसास करा दिया।

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अकबर-बीरबल की रोचक और मनोरंजक कहानी बुद्धिमत्ता, हाजिरजवाबी और चतुराई का अनोखा संगम है। जानिए कैसे बीरबल अपनी सूझबूझ से कठिन प्रश्नों का समाधान करते हैं और सभी को जीवन की महत्वपूर्ण सीख देते हैं।

लेखक / मूल रचनाकार: अकबर बीरबल
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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