किसकी दाढ़ी की आग — अकबर-बीरबल की कहानी
अकबर को अपने दरबारियों की बुद्धि और स्वभाव को परखने का बड़ा शौक था। वे अक्सर दरबार में ऐसे प्रश्न पूछते थे जिनका उत्तर देना आसान नहीं होता था। कई बार उनके सवाल सीधे दिखाई देते थे, लेकिन उनके पीछे कोई गहरी बात छिपी होती थी। दरबारियों को हमेशा डर रहता था कि कहीं गलत उत्तर देकर वे बादशाह को नाराज़ न कर दें, इसलिए अधिकांश लोग वही जवाब देने की कोशिश करते थे जिससे अकबर प्रसन्न हो जाएँ।
एक दिन दरबार सजा हुआ था। सभी मंत्री, वज़ीर और सभासद अपनी-अपनी जगह पर बैठे हुए थे। बातचीत के दौरान अचानक अकबर के मन में एक विचित्र प्रश्न आया। उन्होंने सभी दरबारियों की ओर देखते हुए पूछा, “मान लो कि किसी कारण से यहाँ मौजूद सब लोगों की दाढ़ी में आग लग जाए और उस आग में मेरी दाढ़ी भी शामिल हो, तो बताओ तुम सबसे पहले किसकी दाढ़ी की आग बुझाओगे?”
प्रश्न सुनते ही पूरा दरबार कुछ क्षणों के लिए शांत हो गया। सभी समझ गए कि बादशाह उनके मन की सच्चाई जानना चाहते हैं। लेकिन किसी में भी सच बोलने का साहस नहीं था। सभी दरबारियों ने लगभग एक साथ सिर झुकाकर कहा, “जहाँपनाह, सबसे पहले हम आपकी दाढ़ी की आग बुझाएँगे।”
अकबर सबकी बातें सुनते रहे, लेकिन उनके चेहरे से ऐसा लग रहा था कि वे इन उत्तरों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। तभी उनकी नज़र बीरबल पर गई, जो अब तक शांत बैठे मुस्कुरा रहे थे।
अकबर ने पूछा, “और बीरबल, तुम क्या करोगे? सबसे पहले किसकी दाढ़ी की आग बुझाओगे?”
बीरबल ने बिना घबराए बड़े शांत स्वर में उत्तर दिया, “जहाँपनाह, सबसे पहले मैं अपनी दाढ़ी की आग बुझाऊँगा। उसके बाद ही किसी और की ओर ध्यान दूँगा।”
यह सुनते ही दरबार में हलचल मच गई। कुछ दरबारियों को लगा कि बीरबल ने बहुत स्वार्थी उत्तर दिया है। लेकिन अकबर अचानक मुस्कुरा उठे। फिर वे ज़ोर से हँसे और बोले, “सच तो यही है। बाकी सब लोग हमें खुश करने के लिए झूठ बोल रहे थे। वास्तविकता यह है कि संकट आने पर हर व्यक्ति सबसे पहले अपनी रक्षा के बारे में सोचता है।”
अकबर आगे बोले, “यदि कोई स्वयं सुरक्षित नहीं रहेगा, तो वह दूसरों की सहायता भी कैसे कर पाएगा? बीरबल ने वही उत्तर दिया है जो एक सच्चा और ईमानदार व्यक्ति देगा।”
पूरा दरबार चुप हो गया। सभी समझ चुके थे कि बीरबल ने एक बार फिर अपनी साफगोई और बुद्धिमानी से बादशाह का दिल जीत लिया है।
इस प्रकार अकबर ने उस दिन दरबारियों को यह सीख दी कि सच्चाई कभी-कभी सुनने में कठोर लग सकती है, लेकिन वही सबसे वास्तविक और बुद्धिमानी भरा उत्तर होता है।
किसकी नेमत — अकबर-बीरबल की कहानी
अकबर को अक्सर भेष बदलकर अपने राज्य का हाल जानने निकलने की आदत थी। वे कभी साधारण व्यापारी बन जाते, तो कभी किसी मुसाफिर का रूप धारण कर लेते। ऐसा करने से उन्हें आम लोगों की जिंदगी और उनके विचारों को नजदीक से समझने का अवसर मिलता था। कई बार उनके साथ बीरबल भी होते, जिनकी बुद्धिमानी और हाजिरजवाबी हर परिस्थिति को रोचक बना देती थी।
एक दिन अकबर और बीरबल साधारण वेश पहनकर शहर से दूर एक गाँव की ओर निकल पड़े। दोनों रास्ते में चलते हुए गाँव की गलियों, खेतों और वहाँ के लोगों का हाल देख रहे थे। घूमते-घूमते वे एक सुनसान रास्ते पर पहुँचे, जहाँ एक दुबला-पतला कुत्ता बैठा हुआ था। उसके सामने सूखी और काली पड़ चुकी रोटी का एक टुकड़ा पड़ा था। लगता था कि वह रोटी कई दिनों पुरानी थी। कुत्ता उसी सूखी रोटी को बड़े चाव से चबा-चबाकर खा रहा था, मानो उसे कोई स्वादिष्ट भोजन मिल गया हो।
यह दृश्य देखकर अकबर के मन में अचानक मजाक सूझा। वे अक्सर बीरबल की हाजिरजवाबी की परीक्षा लेने के लिए ऐसी बातें कह दिया करते थे। मुस्कुराते हुए उन्होंने बीरबल से कहा, “बीरबल, देखो… वह कुत्ता काली को खा रहा है।”
असल में ‘काली’ बीरबल की माता का नाम था। अकबर यह बात जानते थे और मजाक में उन्होंने रोटी के काले रंग को बीरबल की माता के नाम से जोड़ दिया।
बीरबल तुरंत समझ गए कि बादशाह दिल्लगी कर रहे हैं। लेकिन वे भी अपनी बुद्धि और चतुराई के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने बिना नाराज़ हुए, बड़ी सहजता से उत्तर दिया, “जहाँपनाह, उनके लिए वही जिंदगी और नेमत है।”
यह सुनते ही अकबर कुछ क्षण के लिए चुप हो गए। क्योंकि ‘नेमत’ उनकी माता का नाम था। बीरबल ने बड़ी चतुराई से उसी अंदाज़ में जवाब दिया था, जैसे अकबर ने मजाक किया था।
अकबर समझ गए कि बीरबल ने बिना सीमा लाँघे उन्हें उसी भाषा में उत्तर दे दिया है। वे बीरबल की हाजिरजवाबी पर मुस्कुरा उठे और आगे कुछ न बोले।
इस प्रकार बीरबल ने एक बार फिर अपनी बुद्धिमानी से साबित कर दिया कि वे किसी भी परिस्थिति में तुरंत और संतुलित उत्तर देने की कला जानते थे।
तीन रुपये, तीन चीजें — अकबर-बीरबल की कहानी
एक दिन अकबर के दरबार में एक मंत्री उदास बैठा था। अकबर ने उसकी उदासी का कारण पूछा। मंत्री ने कहा, “जहाँपनाह, आप सभी महत्वपूर्ण काम बीरबल को सौंप देते हैं, इसलिए हमें अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर नहीं मिलता।”
यह सुनकर अकबर ने एक चुनौती दी। उन्होंने मंत्री को तीन रुपये दिए और कहा, “इन तीन रुपयों को तीन अलग-अलग चीजों पर बराबर-बराबर खर्च करो, यानी हर चीज पर एक रुपया।”
फिर शर्त रखी गई कि पहली चीज इस दुनिया की होनी चाहिए, दूसरी चीज उस दुनिया की होनी चाहिए, और तीसरी न इस दुनिया की होनी चाहिए और न उस दुनिया की।
मंत्री बाजार गया, बहुत कोशिश की लेकिन उसे ऐसी कोई चीज नहीं मिली जो इस शर्त के अनुसार खरीदी जा सके। वह थक-हारकर वापस दरबार में लौट आया।
अब वही कार्य अकबर ने बीरबल को दिया।
बीरबल ने चुनौती स्वीकार की और कुछ ही समय में समस्या का समाधान कर दिया। उन्होंने तीनों रुपयों का उपयोग समझदारी से किया और दरबार में लौटकर विवरण सुनाया।
बीरबल बोले, “पहला रुपया मैंने मिठाई पर खर्च किया, जो इस दुनिया की चीज है। दूसरा रुपया मैंने एक गरीब फकीर को दान कर दिया, जिसका फल मुझे स्वर्ग में मिलेगा, यानी वह उस दुनिया की चीज है। तीसरा रुपया मैंने जुए में लगाया और हार गया, इसलिए वह न इस दुनिया का रहा और न उस दुनिया का।”
यह सुनकर पूरा दरबार शांत हो गया, फिर मुस्कुराहट में बदल गया।
अकबर ने भी बीरबल की चतुराई की प्रशंसा की और कहा कि असली बुद्धिमानी वही है जो कठिन शर्तों को भी सरल सोच से हल कर दे।
तीन सवाल — अकबर-बीरबल की कहानी

एक दिन अकबर के दरबार में बीरबल की बुद्धिमानी की चर्चा हो रही थी। कई दरबारी उनके ज्ञान और हाज़िरजवाबी से प्रभावित थे, लेकिन एक मंत्री के मन में ईर्ष्या और महत्वाकांक्षा थी। वह चाहता था कि किसी तरह बीरबल की प्रतिष्ठा को चुनौती देकर स्वयं महामंत्री बन जाए।
उस मंत्री ने एक योजना बनाई। उसने अकबर के सामने प्रस्ताव रखा कि वह बीरबल से तीन कठिन प्रश्न पूछेगा, और यदि बीरबल उनका उत्तर दे दे तो वह उसकी बुद्धिमानी स्वीकार करेगा, और यदि नहीं दे सका तो उसे चापलूस माना जाए।
अकबर ने यह शर्त स्वीकार कर ली।
मंत्री के तीन प्रश्न थे—
आकाश में कितने तारे हैं?
पृथ्वी का केंद्र कहाँ है?
इस संसार में स्त्री और पुरुष कितने हैं?
अब यह चुनौती सीधे बीरबल के सामने रखी गई।
बीरबल शांत थे, उन्होंने घबराने के बजाय चतुराई से जवाब देने की तैयारी की।
पहले प्रश्न के लिए उन्होंने एक भेड़ मंगवाई और कहा, “जितने बाल इस भेड़ के शरीर पर हैं, उतने ही तारे आकाश में हैं। चाहो तो गिनकर देख लो।”
दरबार में हल्की मुस्कान फैल गई और मंत्री चुप हो गया।
दूसरे प्रश्न के लिए बीरबल ने जमीन पर कुछ निशान बनाए और एक लोहे की छड़ लेकर उसे एक निश्चित जगह गाड़ दिया। फिर बोले, “जहाँपनाह, पृथ्वी का केंद्र यहीं है, आप चाहें तो जाँच सकते हैं।”
अकबर भी इस उत्तर की चतुराई पर मुस्कुरा दिए।
अब तीसरा प्रश्न सबसे कठिन था। बीरबल ने गंभीर होकर कहा, “जहाँपनाह, इस संसार में कुछ लोग न पूरी तरह पुरुष हैं और न ही पूरी तरह स्त्री की श्रेणी में आते हैं। उनमें से कुछ आपके दरबार में भी मौजूद हैं, जैसे यह मंत्री जी।”
यह सुनते ही दरबार में सन्नाटा छा गया। बीरबल ने आगे कहा, “यदि आप चाहें तो इन्हें हटवा दीजिए, फिर मैं सटीक संख्या बता दूँगा।”
मंत्री घबरा गया, उसका चेहरा पीला पड़ गया। वह तुरंत बोल पड़ा, “बस-बस! मुझे मेरे सवालों का जवाब मिल गया, मैं बीरबल की बुद्धिमानी स्वीकार करता हूँ।”
अकबर यह सब देखकर मुस्कुरा उठे। दरबार में एक बार फिर साबित हो गया कि सच्ची बुद्धिमानी केवल सवालों में नहीं, बल्कि परिस्थितियों को समझकर दिए गए उत्तर में होती है।
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अकबर-बीरबल की रोचक और मनोरंजक कहानी बुद्धिमत्ता, हाजिरजवाबी और चतुराई का अनोखा संगम है। जानिए कैसे बीरबल अपनी सूझबूझ से कठिन प्रश्नों का समाधान करते हैं और सभी को जीवन की महत्वपूर्ण सीख देते हैं।
लेखक / मूल रचनाकार: अकबर बीरबल
प्रस्तुति: Saying Central Team