मूर्खों की फेहरिस्त : अकबर-बीरबल की कहानी
बादशाह अकबर घुड़सवारी के बहुत शौकीन थे और अच्छे घोड़ों के लिए बड़ी रकम देने से पीछे नहीं हटते थे। दूर देशों से व्यापारी अच्छे-अच्छे घोड़े लेकर दरबार में आते थे और बादशाह अपनी पसंद के घोड़े खरीद लेते थे। जो घोड़े पसंद नहीं आते थे, उन्हें सेना के लिए ले लिया जाता था। इस तरह घोड़ों का व्यापार दरबार में नियमित रूप से चलता रहता था।
एक दिन एक नया घोड़ा व्यापारी दरबार में आया और उसने दो बेहद सुंदर घोड़े पेश किए। उसने कहा कि अगर बादशाह आधी कीमत पेशगी दे दें तो वह ऐसे सौ और घोड़े लाकर दे सकता है। बादशाह अकबर उन घोड़ों से इतने प्रभावित हुए कि बिना ज्यादा
जांच-पड़ताल के तुरंत पेशगी देने का आदेश दे दिया।
दरबारियों को यह फैसला ठीक नहीं लगा, लेकिन कोई कुछ बोल नहीं सका। सभी की नजरें बीरबल पर टिक गईं कि वह कुछ कहेगा। बीरबल ने शांत स्वर में कहा कि आपने मुझे शहर के मूर्खों की सूची बनाने को कहा था, और उसमें आपका नाम सबसे ऊपर आ गया है। यह सुनते ही बादशाह का चेहरा गुस्से से लाल हो गया और पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया।
बादशाह ने नाराज़ होकर पूछा कि बीरबल ने ऐसा क्यों कहा। बीरबल ने विनम्रता से समझाया कि बिना जानकारी के किसी अनजान व्यापारी को इतनी बड़ी रकम देना जोखिम भरा है, वह धोखा भी दे सकता है। यह सुनकर बादशाह को अपनी गलती समझ में आ गई और उन्होंने तुरंत पेशगी रोकने का आदेश दिया।
इसके बाद बादशाह मुस्कुराए और बोले कि अब उनका नाम उस सूची से हटा दिया जाए। पूरा दरबार राहत से भर गया और सभी ने बीरबल की बुद्धिमानी की जमकर प्रशंसा की।
मोती बोने की कला : अकबर-बीरबल की कहानी
एक दिन बादशाह अकबर के दरबार में जोरदार हंगामा हो रहा था। सभी दरबारी बीरबल के खिलाफ नारे लगा रहे थे—“बीरबल बदमाश है, पापी है, इसे दंड दो।” माहौल इतना गंभीर हो गया कि बादशाह भी प्रभावित हो गए।
भारी जनमत देखकर अकबर ने आदेश दिया कि बीरबल को सूली पर चढ़ा दिया जाए। जब दंड का दिन तय हुआ, तब बीरबल ने अपनी अंतिम इच्छा के रूप में कुछ कहने की अनुमति मांगी। बादशाह ने अनुमति दे दी।
बीरबल ने कहा कि उसने सब कुछ सिखा दिया, लेकिन “मोती बोने की कला” नहीं सिखा पाया। यह सुनकर अकबर चकित हुए और बोले कि यदि यह कला सच में है, तो उसे सीखने तक बीरबल को जीवनदान दिया जाए।
बीरबल ने कुछ दरबारियों के महलों की ओर इशारा करते हुए कहा कि इन्हें ढहा दिया जाए, क्योंकि इसी भूमि में मोती उग सकते हैं। महल तोड़ दिए गए और वहां जौ बो दिए गए। कुछ दिनों बाद बीरबल ने घोषणा की कि अगली सुबह यहां मोती उगेंगे।
अगले दिन ओस की बूंदें जौ के पौधों पर चमक रही थीं। बीरबल ने कहा कि जो निर्दोष होगा वही इन “मोती” को ले सकता है, लेकिन यदि कोई दोषी हुआ तो यह सब पानी बन जाएगा। कोई आगे नहीं आया और बादशाह को समझ आ गया कि निर्णय सोच-समझकर ही लेना चाहिए।
मोम का शेर : अकबर-बीरबल की कहानी
सालों पहले राजा एक-दूसरे को संदेशों के साथ पहेलियाँ भी भेजते थे। एक दिन एक राजा का दूत मुगल दरबार में पिंजरे में बंद एक शेर लेकर पहुँचा और पहेली दी कि बिना पिंजरा या शेर छुए उसे बाहर निकाला जाए, और यह काम केवल एक ही प्रयास में करना होगा। यह सुनकर बादशाह अकबर चिंतित हो गए।
दरबार में सभी सोच में पड़ गए, पर कोई समाधान नहीं दे सका। बीरबल उस समय दरबार में नहीं थे, इसलिए बादशाह और भी परेशान हो गए। कई दरबारियों और जादूगरों ने कोशिश की, लेकिन कोई भी पिंजरे से शेर को बाहर निकालने में सफल नहीं हुआ। शाम तक दरबार में निराशा छा गई।
तभी बीरबल दरबार में लौट आए। अकबर ने पूरी समस्या उन्हें बताई और मदद मांगी। बीरबल ने तुरंत कहा कि वे कोशिश करेंगे और उन्होंने दो गर्म लोहे की छड़ों की मांग की। अकबर ने तुरंत व्यवस्था कर दी, क्योंकि बीरबल पर उन्हें पूरा विश्वास था।
बीरबल ने बिना पिंजरा छुए गर्म लोहे की छड़ें अंदर डालीं और शेर पर रख दीं। शेर तुरंत पिघलने लगा क्योंकि वह असली नहीं बल्कि मोम का बना था। कुछ ही देर में मोम पिघलकर बाहर आ गया और पहेली हल हो गई।
बाद में बीरबल ने बताया कि ध्यान से देखने पर ही समझ आ गया था कि यह मोम का शेर है। अकबर प्रसन्न हुए और दरबार में बीरबल की बुद्धिमानी की खूब प्रशंसा हुई।
यह हुजूर का दिया है : अकबर-बीरबल की कहानी
सर्दियों का मौसम धीरे-धीरे खत्म हो रहा था और धूप में हल्की गर्माहट बढ़ने लगी थी। मौसम बहुत ही सुहावना था, इसलिए बादशाह अकबर और बीरबल अपने-अपने घोड़ों पर सवार होकर प्रकृति के नज़ारे देखने के लिए निकल पड़े। रास्ते में चारों तरफ हरियाली, हवा की ठंडक और सुंदर दृश्य देखकर दोनों का मन प्रसन्न हो रहा था।
इसी बीच अकबर ने मुस्कुराते हुए फारसी में कहा—“असप पिदर शुमास्त।” यह वाक्य सुनने में साधारण था, लेकिन इसके दो अर्थ निकलते थे। एक अर्थ यह था कि “यह घोड़ा तुम्हारे पिता का है” और दूसरा अर्थ यह कि “यह घोड़ा तुम्हारा पिता है।” बादशाह ने यह बात एक तरह से चतुराई दिखाने के लिए कही थी।
बीरबल तुरंत समझ गए कि बादशाह शब्दों के दोहरे अर्थ से खेल रहे हैं और उन्हें उलझाना चाहते हैं। उन्होंने बिना देर किए उसी शैली में जवाब दिया—“दाद-ए-हुजूरस्त।” इसका अर्थ था कि “यह हुजूर का दिया हुआ है।” बीरबल ने बड़े सम्मान और चतुराई के साथ ऐसा उत्तर दिया कि बात वहीं संतुलित हो गई।
यह जवाब सुनकर बादशाह अकबर मुस्कुरा उठे। उन्हें समझ आ गया कि बीरबल ने उनके चालाक प्रश्न का भी सम्मानजनक और सटीक उत्तर दे दिया है। दरबार में एक बार फिर बीरबल की बुद्धिमानी की प्रशंसा हुई और बादशाह उसके जवाब से प्रसन्न हो गए।
राखपत और रखापत : अकबर-बीरबल की कहानी
एक बार दिल्ली दरबार में बादशाह अकबर अपने नवरत्नों के साथ बैठे हुए थे। बातचीत के दौरान उन्होंने सभी से पूछा कि सबसे बड़ा “पत” यानी शहर कौन सा है। यह सवाल सुनते ही दरबार में अलग-अलग जवाब आने लगे।
पहले नवरत्न ने कहा सोनीपत सबसे बड़ा है, दूसरे ने पानीपत को श्रेष्ठ बताया। तीसरे ने कहा कि दलपत से बड़ा कोई नहीं, जबकि चौथे ने दिल्लीपत यानी दिल्ली को सबसे बड़ा शहर बताया। हर कोई अपनी-अपनी समझ के अनुसार उत्तर दे रहा था।
अब बादशाह अकबर ने बीरबल की ओर देखा और कहा कि तुम भी अपना उत्तर दो। बीरबल शांत भाव से बोले कि सबसे बड़ा पत “राखपत” है और दूसरा बड़ा पत “रखापत” है। यह सुनकर सभी दरबारी हैरान रह गए क्योंकि ये नाम किसी शहर के नहीं लग रहे थे।
अकबर ने तुरंत पूछा कि ये कौन से शहर हैं। बीरबल ने मुस्कुराते हुए समझाया कि राखपत का मतलब है “मैं आपकी बात रखूं” और रखापत का मतलब है “आप मेरी बात रखें।” असली बड़ा “पत” वही है जिसमें आपसी सम्मान और मेलजोल हो।
बीरबल ने आगे कहा कि अगर प्रेम और समझदारी है तो जंगल भी स्वर्ग जैसा है, और अगर वह नहीं है तो बड़ा नगर भी नरक बन जाता है। यह सुनकर बादशाह अकबर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने बीरबल को इनाम देकर सम्मानित किया।
राज्य में कौए कितने हैं : अकबर-बीरबल की कहानी

एक दिन बादशाह अकबर अपने मंत्री बीरबल के साथ महल के बाग में टहल रहे थे। चारों तरफ हरियाली थी और पेड़ों पर कौए उड़ रहे थे। तभी बादशाह के मन में एक अजीब सवाल आया और उन्होंने बीरबल से पूछा कि हमारे राज्य में कुल कितने कौए होंगे।
बीरबल कुछ देर सोचते रहे और फिर बड़ी आत्मविश्वास से बोले कि राज्य में कुल 95,463 कौए हैं। यह सुनकर अकबर हैरान हो गए और बोले कि तुम इतने भरोसे से यह कैसे कह सकते हो। बीरबल ने मुस्कुराते हुए कहा कि अगर विश्वास न हो तो खुद गिन लीजिए।
बादशाह ने फिर दूसरा सवाल किया कि अगर कौए इससे कम हों तो क्या मतलब होगा। बीरबल ने तुरंत जवाब दिया कि इसका मतलब है कुछ कौए अपने रिश्तेदारों से मिलने दूसरे राज्यों में गए हैं। अकबर यह सुनकर मुस्कुरा दिए।
फिर बादशाह ने पूछा कि अगर कौए इससे ज्यादा हों तो क्या होगा। बीरबल ने हंसकर कहा कि इसका मतलब है कुछ कौए दूसरे राज्यों से आपके राज्य में अपने रिश्तेदारों से मिलने आए हैं। यह सुनकर अकबर बीरबल की चतुराई से बहुत खुश हुए और मुस्कुराते रह गए।
रेत से चीनी अलग करना : अकबर-बीरबल की कहानी
एक बार बादशाह अकबर अपने दरबार में बीरबल और सभी मंत्रियों के साथ बैठे हुए थे। दरबार की कार्यवाही चल रही थी और लोग अपनी समस्याएं लेकर एक-एक करके आ रहे थे। तभी एक व्यक्ति हाथ में एक मर्तबान लेकर दरबार में पहुंचा।
बादशाह ने पूछा कि उसमें क्या है। उसने बताया कि इसमें रेत और चीनी का मिश्रण है। फिर उसने कहा कि वह बीरबल की बुद्धिमत्ता की परीक्षा लेना चाहता है और चाहता है कि बीरबल बिना पानी का उपयोग किए रेत में से चीनी के दाने अलग कर दें। यह सुनकर दरबार में सन्नाटा छा गया।
अकबर ने बीरबल से कहा कि अब तुम क्या करोगे। बीरबल मुस्कुराए और बोले कि यह तो बहुत आसान काम है। वह मर्तबान लेकर बगीचे में गए और रेत-चीनी के मिश्रण को एक आम के पेड़ के चारों ओर फैला दिया। यह देखकर वह व्यक्ति हैरान रह गया।
अगले दिन जब सभी बगीचे में पहुंचे तो देखा कि वहां केवल रेत बची थी। चीटियों ने चीनी के कणों को उठा लिया था और बाकी रेत वहीं रह गई थी। बीरबल ने कहा कि रेत और चीनी अलग हो चुके हैं। यह सुनकर सभी लोग हंस पड़े।
अकबर ने मजाक में कहा कि अगर अब चीनी चाहिए तो चीटियों के बिल में जाना पड़ेगा। दरबार में हंसी फैल गई और उस व्यक्ति को अपनी गलती का एहसास हो गया कि किसी की बुद्धिमत्ता की परीक्षा लेना हमेशा सही नहीं होता।
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अकबर-बीरबल की रोचक और मनोरंजक कहानी बुद्धिमत्ता, हाजिरजवाबी और चतुराई का अनोखा संगम है। जानिए कैसे बीरबल अपनी सूझबूझ से कठिन प्रश्नों का समाधान करते हैं और सभी को जीवन की महत्वपूर्ण सीख देते हैं।
लेखक / मूल रचनाकार: अकबर बीरबल
प्रस्तुति: Saying Central Team