अधूरी मोहब्बत part-1
यह कहानी मेरी ज़िंदगी के उस हिस्से की है जिसे मैंने सालों तक अपने दिल के सबसे गहरे कोने में छुपा कर रखा था। मेरा नाम आरव है और आज मैं अपनी ज़िंदगी की उस सबसे बड़ी भूल और एहसास को कबूल करने जा रहा हूँ जिसने मुझे पूरी तरह बदल दिया। सब कुछ तब शुरू हुआ जब मैं दिल्ली के एक नामी कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए जर्मनी के म्यूनिख शहर पहुँचा था।
वहाँ की कड़कड़ाती ठंड और अजनबी चेहरों के बीच खुद को साबित करने की होड़ में मैं अक्सर बहुत अकेला महसूस करता था। उसी अकेलेपन के दौर में मेरी मुलाकात यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में अहाना से हुई जो मूल रूप से मुंबई की रहने वाली थी लेकिन पिछले तीन साल से जर्मनी में ही रह रही थी। अहाना की आँखों में एक अजीब सी चमक और बातों में एक बेबाक अपनापन था जिसने मुझे पहली ही नज़र में अपना दीवाना बना लिया था।
हमारी दोस्ती बहुत जल्दी गहरी हो गई और हम म्यूनिख की सड़कों पर घंटों घूमते हुए अपने सपनों और डर को एक-दूसरे से साझा करने लगे। अहाना मेरे लिए केवल एक दोस्त नहीं बल्कि उस अनजाने देश में मेरा घर बन चुकी थी जिसके साथ मैं पूरी तरह से खुद को सहज महसूस करता था।
एक शाम जब हम दोनों इसार नदी के किनारे बैठे ढलते सूरज को देख रहे थे, तब मैंने उसके कांपते हाथों को थामकर अपने प्यार का इज़हार कर दिया था। अहाना ने मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा और उसकी आँखों में आए आँसू इस बात की गवाही दे रहे थे कि वह भी मुझसे उतना ही प्यार करती थी। वह पल मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत और मुकम्मल पल था जहाँ मुझे लगा था कि अब दुनिया की कोई भी ताकत हमें अलग नहीं कर सकती।
लेकिन किस्मत के पास हमारे लिए कुछ और ही योजनाएँ थीं जो हमारी इस हँसती-खेलती दुनिया को पूरी तरह से तहस-नहस करने वाली थीं। पढ़ाई खत्म होते ही मुझे एक बहुत बड़ी ग्लोबल कंसल्टेंसी फर्म से नौकरी का ऑफर मिला लेकिन उसकी शर्त यह थी कि मुझे तुरंत लंदन शिफ्ट होना पड़ेगा।
जब मैंने यह बात अहाना को बताई तो उसके चेहरे का रंग उड़ गया क्योंकि उसकी खुद की नौकरी जर्मनी में ही पक्की हो चुकी थी और वह वहाँ से नहीं हिल सकती थी। “आरव, क्या यह लॉन्ग-डिस्टेंस रिलेशनशिप हमारे बीच काम कर पाएगा?” अहाना ने रुआंसे गले से मुझसे पूछा था जिसके जवाब में मैंने उसे गले लगाते हुए वादा किया था कि दूरी कभी हमारे प्यार को कम नहीं कर पाएगी। इस तरह मैं अपने करियर के बड़े सपने आँखों में सजाकर लंदन आ गया और अहाना म्यूनिख में ही रह गई, जहाँ से हमारे बीच की दूरियों की असली परीक्षा शुरू होनी थी।
लंदन की तेज़-तर्रार और व्यस्त ज़िंदगी ने धीरे-धीरे मुझे अपने आगोश में लेना शुरू कर दिया जहाँ काम के दबाव में मेरे पास सांस लेने तक की फुर्सत नहीं होती थी। शुरुआत में हम दोनों रोज़ घंटों वीडियो कॉल पर बात करते थे लेकिन धीरे-धीरे वे कॉल केवल कुछ मिनटों के टेक्स्ट मैसेज में सिमटने लगे।
इसी बीच मेरी ऑफिस की टीम में कबीर नाम के एक नए सीनियर एसोसिएट की एंट्री हुई जो भारत में मेरे ही शहर का रहने वाला था और बहुत ही जिंदादिल इंसान था। कबीर के साथ काम करते हुए मुझे लंदन की तन्हाई थोड़ी कम लगने लगी क्योंकि वह अक्सर मुझे वीकेंड्स पर बाहर ले जाता और मेरा मूड ठीक करने की कोशिश करता था। एक रात जब मैं काम के तनाव में बहुत परेशान था और अहाना का फोन लगातार व्यस्त आ रहा था, तब कबीर ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा, “आरव, जिंदगी को इतना संजीदा मत लो, जो सामने है उसका मज़ा लेना सीखो।”
कबीर की उस बात ने मेरे दिमाग में एक अजीब सी कशमकश पैदा कर दी और मुझे लगने लगा कि अहाना मुझसे दूर जाकर अपनी दुनिया में खुश है। उस रात जब अहाना का वापस फोन आया तो मैंने बहुत ही रूखेपन से बात की और हमारे बीच पहली बार एक तीखी बहस हो गई जो आगे चलकर रोज़ का सिलसिला बन गई।
मैं अपनी नौकरी के तनाव और अकेलेपन का गुस्सा अहाना पर निकालने लगा था जबकि वह बेचारी हर बार मुझे समझने और संभालने की कोशिश करती थी। मुझे लगने लगा था कि हमारी मोहब्बत अब एक ज़िम्मेदारी बन चुकी है जिसे मैं ढो रहा हूँ और इसी सोच ने मुझे अंदर से खोखला करना शुरू कर दिया था। मैंने धीरे-धीरे अहाना के मैसेज का जवाब देना बंद कर दिया और खुद को कबीर के साथ लंदन की नाइटलाइफ़ और पार्टियों में पूरी तरह से व्यस्त कर लिया ताकि मुझे अहाना की याद न आए।
अधूरी मोहब्बत part- 2

मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मोड़ और मेरी वो भूल जिसे मैं कभी माफ नहीं कर पाया, वो एक वीकेंड पर लंदन के एक पब में घटित हुई। कबीर और मैं एक प्रोजेक्ट की कामयाबी का जश्न मना रहे थे जहाँ मैंने बहुत ज़्यादा शराब पी ली थी और होश खो बैठा था। उसी मदहोशी की हालत में जब अहाना का वीडियो कॉल आया, तो मैंने फोन उठाकर उसके रोते हुए चेहरे को देखने के बजाय उस पर चिल्लाना शुरू कर दिया।
“अहाना, मुझे इस रिश्ते से घुटन होने लगी है, तुम प्लीज मुझे अब और परेशान मत करो और अपनी ज़िंदगी जियो,” यह कहकर मैंने बिना उसकी बात सुने फोन काट दिया और कबीर की तरफ देखकर हंसने लगा। कबीर ने मुझे रोकने की कोशिश की और कहा कि मैं बहुत बड़ी गलती कर रहा हूँ, लेकिन उस वक्त मेरे अहंकार और नशे ने मेरे सोचने-समझने की शक्ति को पूरी तरह खत्म कर दिया था।
अगली सुबह जब मेरा नशा उतरा तो मुझे अपने किए पर बेहद पछतावा हुआ और मैंने तुरंत अहाना को फोन मिलाया लेकिन उसका नंबर पूरी तरह से बंद आ रहा था। मैंने म्यूनिख में उसके दोस्तों को फोन किया तो मुझे पता चला कि अहाना कई दिनों से बहुत बीमार थी और वह मुझे सरप्राइज देने के लिए लंदन आने का वीज़ा लगवा रही थी।
जब मुझे यह मालूम हुआ कि वह अपनी बीमारी की हालत में भी सिर्फ मुझसे मिलने के लिए तड़प रही थी और मैंने उसे इतनी बेरहमी से ठुकरा दिया, तो मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। कबीर ने जब मेरी यह हालत देखी तो उसने मुझे समझाया, “आरव, तुमने जो किया वह बहुत गलत था, तुम्हें तुरंत म्यूनिख जाकर उससे माफी मांगनी चाहिए।” मैं बिना एक पल गंवाए पहली उपलब्ध फ्लाइट पकड़कर म्यूनिख के लिए रवाना हो गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
म्यूनिख पहुँचकर जब मैं अहाना के अपार्टमेंट पर गया तो वहाँ ताला लटका हुआ था और पड़ोसियों से पता चला कि वह अपनी नौकरी छोड़कर हमेशा के लिए भारत वापस लौट चुकी है। मैं टूटकर उसी सीढ़ी पर बैठ गया जहाँ कभी हम दोनों बैठकर आइसक्रीम खाया करते थे और अपनी नादानी पर फूट-फूट कर रोने लगा।
मुझे समझ आ चुका था कि मैंने अपने करियर और झूठे अहंकार के चक्कर में दुनिया की सबसे अनमोल चीज़ यानी अहाना के सच्चे प्यार को हमेशा के लिए खो दिया था। कबीर लंदन से लगातार मुझे फोन पर ढांढस बंधा रहा था लेकिन मेरा दिल जानता था कि मैंने एक ऐसा गुनाह किया है जिसकी कोई माफी नहीं हो सकती। मैं वापस लंदन लौटा तो ज़रूर लेकिन मेरा शरीर वहाँ था और मेरी रूह म्यूनिख और भारत के बीच कहीं भटक रही थी।
इस घटना के दो साल बाद जब मेरा ट्रांसफर वापस इंडिया के मुंबई ऑफिस में हुआ, तो मेरे दिल में एक धुंधली सी उम्मीद थी कि शायद मैं अहाना को एक बार फिर ढूंढ पाऊँगा। मुंबई आने के बाद मैंने अहाना की तलाश शुरू की और बहुत मशक्कत के बाद मुझे पता चला कि वह नरीमन पॉइंट के पास एक एनजीओ में बच्चों को पढ़ाती है।
एक शाम मैं हिम्मत जुटाकर उस एनजीओ के बाहर खड़ा हो गया और जैसे ही अहाना बाहर आई, उसे देखकर मेरी सांसें थम गईं क्योंकि वह पहले से बहुत शांत और गंभीर लग रही थी। उसने जब मुझे देखा तो उसकी आँखों में न तो कोई गुस्सा था और न ही कोई नफरत, बल्कि एक अजीब सी खामोशी थी जो मुझे अंदर तक चीर गई। मैंने आगे बढ़कर उससे हाथ जोड़कर माफी मांगी और कहा, “अहाना, मैं अपनी गलती पर रोज़ मरता हूँ, प्लीज मुझे एक मौका दे दो।”
अहाना ने बहुत ही शालीनता से मेरी तरफ देखा और धीमी आवाज़ में कहा, “आरव, मैंने तुम्हें बहुत पहले ही माफ कर दिया था क्योंकि नफरत को दिल में रखकर जिया नहीं जा सकता, लेकिन हम अब कभी एक नहीं हो सकते।” उसने मुझे बताया कि उस घटना ने उसे अंदर से इतना मजबूत बना दिया है कि अब वह किसी और पर निर्भर नहीं रहना चाहती और अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ चुकी है।
अहाना की वह बातें सुनकर मुझे अहसास हुआ कि कुछ गलतियाँ ऐसी होती हैं जिनका सुधार कभी नहीं हो सकता और समय कभी पीछे नहीं लौटता। आज मैं अपनी इस कहानी के ज़रिए हर उस युवा को यह बताना चाहता हूँ कि करियर और काम अपनी जगह हैं, लेकिन जो इंसान आपसे सच्चा प्यार करता है उसे कभी अपनी व्यस्तता या अहंकार की बलि मत चढ़ने देना।
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