अग्नि-समाधि

अग्नि-समाधि — मुंशी प्रेमचंद

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मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य के महान कहानीकार और उपन्यासकार थे, जिन्होंने समाज की सच्चाइयों, गरीबी, किसानों की पीड़ा और नैतिक मूल्यों पर आधारित अनेक प्रेरणादायक कहानियाँ लिखीं। उनकी लेखनी सरल लेकिन गहरी होती थी। उनकी चुनिंदा सीख देने वाली कहानियाँ आज हम आपके सामने प्रस्तुत कर रहे हैं, जो जीवन को समझने की नई दृष्टि देती हैं।

अग्नि-समाधि — मुंशी प्रेमचंद

गाँव का रहने वाला पयाग पहले बहुत मेहनती और सीधा आदमी था। वह दिन-रात मजदूरी करता, खेतों में काम करता और अपनी पत्नी रुक्मिन के साथ किसी तरह घर चलाता था। लेकिन धीरे-धीरे उसका उठना-बैठना साधु-संतों के साथ होने लगा।

सत्संग की जगह उसे गाँजा, चरस और भंग की लत लग गयी। अब उसे मेहनत से घृणा होने लगी और दिनभर साधुओं की धूनी के पास बैठकर चिलम भरना ही उसका सबसे बड़ा सुख बन गया। वहाँ भजन, धुआँ और नशे के बीच उसे ऐसा लगता जैसे वह किसी दूसरी दुनिया में पहुँच गया हो। घर लौटने पर जब भूख, गरीबी और जिम्मेदारियाँ सामने आतीं, तो उसे अपना जीवन बोझ जैसा लगने लगता।

रुक्मिन अपने पति की इस आदत से बहुत दुखी रहती थी। वह खुद जंगल से लकड़ियाँ काटकर बाजार में बेचती, मजदूरी करती और घर का खर्च चलाती थी। दूसरी ओर पयाग अपनी चौकीदारी की मामूली नौकरी और रुक्मिन की कमाई को भी नशे में उड़ा देता था। पहले दोनों पति-पत्नी मेहनती और खुशमिजाज थे, लेकिन अब घर में अक्सर झगड़े होने लगे थे।

रुक्मिन समझाती कि अगर नशे की इतनी चाह है तो काम भी करो, लेकिन पयाग हर बार उसे धमकाता कि एक दिन घर छोड़ देगा। एक दिन पैसे को लेकर दोनों में इतना बड़ा विवाद हुआ कि पयाग सचमुच घर से चला गया और कई दिनों तक वापस नहीं लौटा।

रुक्मिन चिंता में पागल-सी हो गयी। उसने पूरे गाँव में उसे ढूँढा, लेकिन कहीं पता नहीं चला। अगली सुबह वह थाने जाने की तैयारी कर रही थी कि तभी पयाग लौटता दिखाई दिया। मगर उसके साथ एक दूसरी औरत भी थी। वह औरत शर्म से घूँघट निकाले पयाग के पीछे-पीछे चल रही थी।

उसे देखते ही रुक्मिन का दिल बैठ गया। फिर भी उसने अपने दर्द को दबाकर उस स्त्री को घर के भीतर ले लिया। पयाग ने बताया कि उसका नाम कौशल्या है, जिसे लोग सिलिया कहते हैं, और अब वह घर के काम में हाथ बँटाएगी। बाहर से शांत दिखने वाली रुक्मिन अंदर ही अंदर टूट चुकी थी, लेकिन उसने अपने मन का दुख किसी पर जाहिर नहीं होने दिया।

कुछ दिनों तक रुक्मिन ने सिलिया को कोई काम नहीं करने दिया। वह खुद मजदूरी करती और घर भी संभालती। गाँव वाले उसकी सहनशीलता और त्याग की तारीफ करते थे। लेकिन धीरे-धीरे सिलिया को यह महसूस होने लगा कि घर में उसका कोई सम्मान नहीं है। उसने भी कमाने का फैसला कर लिया।

वह सुबह-सुबह चक्की चलाने लगी, गाँव की औरतों से मेलजोल बढ़ाया और घास काटने तथा अनाज पीसने का काम पकड़ लिया। उसकी मेहनत और चालाकी से घर में पहले से ज्यादा पैसे आने लगे। पयाग भी अब उसी की तरफ झुकने लगा, क्योंकि वह ज्यादा कमाकर देती थी। इससे रुक्मिन का अधिकार धीरे-धीरे कम होता गया और दोनों औरतों के बीच मनमुटाव बढ़ने लगा।

एक दिन सिलिया घास काटकर लाई और नहाने चली गयी। इसी बीच रुक्मिन ने उसकी थोड़ी घास छिपा दी। लौटकर जब सिलिया ने घास कम देखी, तो वह आग-बबूला हो गयी और गालियाँ देने लगी। आखिरकार रुक्मिन से भी सहन न हुआ और उसने सिलिया को थप्पड़ मार दिए। पूरे मोहल्ले में हंगामा मच गया। शाम को जब पयाग थाने से लौटा, तो सिलिया ने रो-रोकर सारी बात उसे बता दी। पहले से ही गुस्से में भरा पयाग आपा खो बैठा और उसने रुक्मिन को बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया। रुक्मिन चोट खाकर भी उसे कोसती रही। उसकी आवाज में दर्द से ज्यादा टूटे हुए दिल की आग थी। देर रात वह चुपचाप घर छोड़कर कहीं चली गयी।

उधर खेतों में फसल पक चुकी थी। उन दिनों पयाग रात में खेतों की रखवाली करने मड़ैया में सोता था। उसी रात वह चिलम पीते हुए खेतों की ओर जा रहा था कि अचानक उसने दूर आग की लपटें उठती देखीं। उसकी मड़ैया जल रही थी। चारों ओर सूखी फसल फैली हुई थी और तेज हवा चल रही थी।

अगर आग फैल जाती, तो पूरे गाँव की मेहनत राख हो जाती। पयाग बिना कुछ सोचे आग की तरफ दौड़ा। उसने जलती हुई मड़ैया को अपनी लाठी पर उठाया और उसे खेतों से दूर ले जाने के लिए पागलों की तरह भागने लगा। जलती हुई फूस उसके शरीर पर गिर रही थी, हाथ और चेहरा जल रहे थे, लेकिन उसे अपनी जान की नहीं, गाँव की फसल की चिंता थी।

भागते-भागते आग उसकी लाठी तक पहुँच गयी। मड़ैया उसके सिर पर गिरने ही वाली थी। तभी अचानक अँधेरे में से रुक्मिन दौड़ती हुई आयी। उसने बिना एक पल सोचे जलती हुई मड़ैया अपने हाथों पर उठा ली, ताकि पयाग बच जाए। पयाग वहीं बेहोश होकर गिर पड़ा। रुक्मिन जलती हुई आग को लेकर खेत के किनारे तक पहुँच गयी, लेकिन तब तक उसके हाथ, चेहरा और कपड़े बुरी तरह जल चुके थे। आखिरकार वह वहीं गिर पड़ी और आग की लपटों में समा गयी। उसने अपने प्राण देकर पूरे गाँव की फसल और अपने पति की जान बचा ली।

जब पयाग को होश आया, तो उसने राख के बीच रुक्मिन की अधजली देह देखी। वह फूट-फूटकर रो पड़ा। गाँव वाले उसे घर ले गये और कई दिनों तक उसका इलाज होता रहा, लेकिन वह भी ज्यादा दिन जीवित न रह सका। शरीर को आग ने जितना जलाया था, उससे कहीं ज्यादा उसकी आत्मा को पछतावे और शोक ने जला दिया था। अंत में वही दुःख उसकी मृत्यु का कारण बन गया।

अधिकार-चिन्ता — मुंशी प्रेमचंद

टामी एक बड़ा, ताकतवर और डरावना दिखने वाला कुत्ता था। उसकी भारी आवाज सुनकर लोग सहम जाते थे और उसका शरीर इतना विशाल था कि अँधेरे में वह किसी छोटे गधे जैसा दिखाई देता था। लेकिन उसकी असली कमजोरी यह थी कि वह स्वभाव से बेहद डरपोक था। लड़ाई-झगड़े से हमेशा बचता था। मोहल्ले के दूसरे कुत्ते जब उसे चुनौती देते, तब भी वह पूरे साहस से लड़ने के बजाय किसी तरह अपनी जान बचाने की कोशिश करता। एक बार बाजार के कई कुत्तों ने उसे घेर लिया। उसने कुछ देर मुकाबला जरूर किया, मगर जब हालात बिगड़ते देखे तो दुम दबाकर समझौते का रास्ता ढूँढने लगा। उस दिन के बाद उसने खुले संघर्ष से हमेशा दूरी बना ली।

शांत स्वभाव होने के बावजूद टामी के दुश्मनों की कमी नहीं थी। मोहल्ले के कुत्ते उससे जलते थे क्योंकि वह बिना मेहनत किए मोटा-ताजा रहता था। बाजार के कुत्ते इसलिए नाराज रहते कि टामी हर जगह जाकर खाने का सामान साफ कर देता था। हलवाइयों की दुकानों के सामने पड़े पत्तल, कसाईखाने की हड्डियाँ और कूड़े में फेंकी गयी चीजें सब उसी के पेट में चली जाती थीं। इतनी दुश्मनी के बीच उसका जीवन कठिन होता जा रहा था। कई-कई दिन उसे भरपेट भोजन नहीं मिलता।

कभी स्वादिष्ट खाने के लालच में वह चोरी करने की कोशिश करता, लेकिन बदले में डंडे और पत्थर ही मिलते। धीरे-धीरे उसके मन में एक ऐसी जगह की कल्पना बनने लगी जहाँ न कोई दुश्मन हो, न भूख, न डर।

वह सोचता कि काश कोई ऐसा इलाका मिल जाए जहाँ खुले मैदान हों, शिकार की भरमार हो और उस पर किसी दूसरे का अधिकार न हो। वहाँ वह आराम से शिकार करे, खाए-पिए और चैन की नींद सोए। एक दिन इन्हीं कल्पनाओं में खोया वह गलियों से गुजर रहा था कि अचानक एक दूसरे इलाके के खूँखार कुत्ते से उसकी भिड़ंत हो गयी।

टामी ने बहुत विनती की कि उसे जाने दिया जाए, लेकिन वह कुत्ता नहीं माना। थोड़ी ही देर में आसपास के और कुत्ते भी जमा हो गये और सबने मिलकर टामी पर हमला कर दिया। जान बचाने के लिए टामी भागा और भागते-भागते एक नदी में कूद पड़ा। वह तैरता हुआ किसी तरह दूसरी तरफ पहुँच गया।

नदी के उस पार पहुँचते ही जैसे उसकी किस्मत बदल गयी। वहाँ चारों तरफ हरे-भरे मैदान फैले हुए थे। कहीं झरने बह रहे थे, कहीं पेड़ों की घनी छाया थी और हर ओर प्राकृतिक सुंदरता दिखाई देती थी। उस इलाके में कई भयंकर जंगली जानवर रहते थे, जिनकी शक्ल देखकर ही टामी काँप उठता था।

लेकिन वे जानवर आपस में ही लड़ते रहते थे और टामी की तरफ कोई ध्यान नहीं देता था। टामी ने चालाकी से काम लेना शुरू किया। जब दो जानवर लड़ते और उनमें से कोई घायल होकर गिर पड़ता, तो वह चुपके से उसके मांस का टुकड़ा उठाकर भाग जाता। धीरे-धीरे उसे बिना मेहनत के भरपूर भोजन मिलने लगा और उसका जीवन आराम से कटने लगा।

अच्छा भोजन और आराम मिलने से टामी का शरीर पहले से ज्यादा मजबूत और फुर्तीला हो गया। अब वह छोटे जानवरों का खुद भी शिकार करने लगा। जंगल के पशु उससे परेशान होने लगे, लेकिन टामी ने उन्हें आपस में लड़ाने की चाल चल दी। वह एक जानवर से जाकर कहता कि दूसरा तुम्हें मारने की योजना बना रहा है, और दूसरे से कहता कि पहला तुम्हारी बुराई करता है।

उसकी बातों में आकर जानवर आपस में लड़ पड़ते और टामी को फायदा होता। धीरे-धीरे बड़े-बड़े ताकतवर जानवर खत्म होने लगे और छोटे जीव डरकर उसके सामने झुकने लगे। अब टामी खुद को जंगल का राजा समझने लगा था।

उसने जंगल के जानवरों पर अपना रौब जमाना शुरू कर दिया। वह बड़े गर्व से कहता कि भगवान ने उसे सबकी रक्षा करने के लिए भेजा है। बदले में वह कभी-कभी किसी छोटे जानवर का शिकार कर लेता था। डर के मारे बाकी जानवर भी उसकी बात मानने लगे। टामी अब पूरे जंगल में अकड़कर घूमता और खुद को सबसे बड़ा शासक समझता।

लेकिन जितना उसका अधिकार बढ़ता गया, उतनी ही उसकी चिंता भी बढ़ती गयी। उसे हर समय डर लगा रहता कि कहीं कोई दूसरा ताकतवर जीव आकर उसका राज न छीन ले।

धीरे-धीरे उसकी हालत ऐसी हो गयी कि वह चैन से सो भी नहीं पाता था। रात में जरा-सी आहट सुनते ही चौकन्ना हो जाता और इधर-उधर दौड़ने लगता। वह जंगल के जानवरों को डराता कि अगर कोई दूसरा शासक आ गया, तो तुम सबको नष्ट कर देगा। जानवर भी डर के मारे उसे भरोसा दिलाते कि वे हमेशा उसी के अधीन रहेंगे। लेकिन टामी के मन का भय खत्म नहीं हुआ। उसका हर पल इसी चिंता में गुजरने लगा कि कहीं उसका अधिकार कोई छीन न ले।

इसी बीच क्वार का महीना आया और टामी को अपने पुराने इलाके की याद सताने लगी। उसे अपने पुराने साथी और गलियों की आवारागर्दी याद आने लगी। आखिर एक दिन वह खुद को रोक न सका और नदी पार करके वापस पुराने मोहल्ले की तरफ चला गया।

लेकिन वहाँ पहुँचते ही उसका सारा घमंड टूटने लगा। उसका सिर झुक गया और दुम सिकुड़ गयी। तभी उसे एक मादा कुतिया दिखाई दी और वह उसके पीछे चल पड़ा। मादा ने उसकी हरकत पसंद नहीं की और जोर से भौंक उठी। उसकी आवाज सुनते ही कई दूसरे कुत्ते वहाँ आ पहुँचे और सबने मिलकर टामी पर हमला कर दिया। वह बुरी तरह घायल हो गया और किसी तरह जान बचाकर भाग सका।

उस घटना के बाद टामी के मन में डर और गहरा बैठ गया। अब उसे हर समय यही लगता कि दुश्मनों का कोई दल उसके जंगल पर हमला करने आने वाला है। वह दिन-रात नदी के किनारे चक्कर लगाता रहता। उसे न भूख की सुध रहती, न प्यास की। कई-कई दिन तक वह बिना आराम किए पहरा देता रहता। धीरे-धीरे उसका शरीर कमजोर पड़ने लगा। पैर काँपने लगे, आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा, लेकिन उसके मन की चिंता खत्म नहीं हुई।

आखिर लगातार भय, चिंता और अधिकार खोने के डर ने उसकी जान ले ली। सातवें दिन टामी नदी किनारे भूखा-प्यासा गिर पड़ा और वहीं उसकी मृत्यु हो गयी। उसकी मौत पर जंगल के किसी जानवर ने दुख नहीं जताया। न किसी ने उसके लिए आँसू बहाए, न कोई उसके पास आया। कई दिनों तक उसकी लाश पर गिद्ध और कौए मंडराते रहे। अंत में वहाँ सिर्फ उसकी हड्डियाँ बचीं। जिस अधिकार और सत्ता के लिए उसने पूरी जिंदगी डर और चालाकी में बितायी, अंत में वही चिंता उसकी मौत का कारण बन गयी।

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मुंशी प्रेमचंद की प्रेरणादायक और यथार्थवादी कहानी समाज, मानवता, नैतिकता और जीवन के गहरे सत्य को सरल भाषा में प्रस्तुत करती है। उनकी रचनाएँ पाठकों को सोचने, सीखने और बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देती हैं।

लेखक / मूल रचनाकार: मुंशी प्रेमचंद
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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