अरुणिमा सिन्हा की वो दास्तान जो मौत को भी हरा गई
रात के करीब आठ बज रहे थे। कैंप चार से एवरेस्ट के शिखर की दूरी सिर्फ कुछ किलोमीटर थी, लेकिन यह दूरी किसी दूसरी दुनिया जैसी थी। हवा में ऑक्सीजन की मात्रा इतनी कम थी कि हर एक सांस के साथ छाती में तीखा दर्द हो रहा था।
तापमान शून्य से चालीस डिग्री नीचे गिर चुका था। इस ऊंचाई पर खून जमने लगता है, दिमाग काम करना बंद कर देता है और इंसानी शरीर खुद को अंदर से खाने लगता है। इसे एवरेस्ट का ‘डेथ ज़ोन’ कहते हैं, यानी वो जगह जहां मौत हर पल आपके कंधे पर हाथ रखकर चलती है। इस बर्फीले नरक के बीच एक भारतीय लड़की खड़ी थी, जिसके हौसले के सामने दुनिया का सबसे ऊंचा पहाड़ भी छोटा नजर आ रहा था।
अरुणिमा सिन्हा ने अपने कृत्रिम पैर को बर्फ पर मजबूती से टिकाया और आगे कदम बढ़ाया। उनके शेरपा ने उनका हाथ पकड़कर रोकने की कोशिश की और फुसफुसाया कि ऑक्सीजन खत्म होने वाली है, वापस मुड़ जाओ। लेकिन अरुणिमा की आंखों में जो चमक थी, वो एवरेस्ट की बर्फ से भी ज्यादा ठंडी और मजबूत थी।
उन्होंने पीछे मुड़ने के लिए यह सफर शुरू नहीं किया था। उनके दिमाग में एक ही बात गूंज रही थी कि अगर आज कदम पीछे हटाए, तो किस्मत फिर कभी आगे बढ़ने का मौका नहीं देगी।
सफर की शुरुआत इस खूबसूरत रात से बिल्कुल अलग थी। कुछ साल पहले तक अरुणिमा एक राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल खिलाड़ी थीं, जिनका भविष्य बेहद सुनहरा दिख रहा था। लेकिन साल 2011 की एक काली रात ने सब कुछ बदल कर रख दिया।
पद्मावत एक्सप्रेस में कुछ लुटेरों ने उनके गले की सोने की चेन छीनने की कोशिश की। अरुणिमा ने एक खिलाड़ी की तरह मुकाबला किया, हार नहीं मानी। लेकिन लुटेरों ने उन्हें चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया। वह दूसरी पटरी पर गिरीं और तभी सामने से आ रही एक और ट्रेन उनके बाएं पैर के ऊपर से गुजर गई।
पूरी रात वह तड़पती रहीं, पैंतालीस ट्रेनें उनके कटे हुए पैर के ऊपर से गुजर गईं। कीड़े उनके जख्मों को चाट रहे थे, लेकिन वह कुछ नहीं कर सकीं। जब सुबह उन्हें अस्पताल ले जाया गया, तो डॉक्टरों को उनका पैर काटना पड़ा। दिल्ली के एम्स अस्पताल में जब वह बेड पर लेटी थीं, तो अखबारों में उनके बारे में तरह-तरह की बातें लिखी जा रही थीं।
कोई इसे आत्महत्या का प्रयास कह रहा था तो कोई कुछ और। समाज की इस हमदर्दी और तानों ने अरुणिमा के अंदर एक चिंगारी सुलगा दी। उन्होंने अस्पताल के बेड पर ही तय कर लिया था कि वह दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर भारत का तिरंगा फहराएंगी।
लोग हंस रहे थे। जिस लड़की का एक पैर नकली हो और दूसरे पैर में लोहे की रॉड डाली गई हो, वो एवरेस्ट फतह करने का सपना देख रही थी। लेकिन अरुणिमा ने अस्पताल से निकलते ही सबसे पहला काम किया बछेंद्री पाल से मुलाकात करने का।
बछेंद्री पाल ने उनकी आंखों में वो पागलपन देखा जो एक पर्वतारोही के लिए सबसे जरूरी होता है। उन्होंने अरुणिमा से कहा था कि तुमने इस हालत में एवरेस्ट जाने का फैसला किया, तुमने तो अपने अंदर एवरेस्ट को उसी दिन फतह कर लिया था, अब बस दुनिया को तारीख बताना बाकी है।
ट्रेनिंग शुरू हुई तो मुश्किलें भी सामने आईं। जब बाकी पर्वतारोही पहाड़ों पर चढ़ना शुरू करते, तो अरुणिमा का नकली पैर छिल जाता था, उससे खून बहने लगता था। पैर की लोहे की रॉड हिलती थी तो असहनीय दर्द होता था। लोग दो घंटे में जो चढ़ाई पूरी करते, अरुणिमा को उसमें सात घंटे लगते थे। लेकिन उन्होंने कभी रोकर हार नहीं मानी। हर सुबह वह नए जोश के साथ खड़ी होती थीं।
एवरेस्ट के रास्ते पर खौफनाक मंजर
नेपाल के रास्ते जब अरुणिमा ने एवरेस्ट बेस कैंप में कदम रखा, तो लोग उन्हें हैरत से देख रहे थे। किसी को यकीन नहीं था कि एक पैर वाली लड़की इस खतरनाक चढ़ाई को पूरा कर पाएगी। बेस कैंप से ऊपर का सफर हर कदम पर एक नई परीक्षा था।
खुंबू आइसफॉल पार करते समय बड़ी-बड़ी बर्फ की चट्टानें हिल रही थीं। नीचे हजारों फीट गहरी खाइयां थीं, जहां एक गलत कदम का मतलब था हमेशा के लिए गायब हो जाना। अरुणिमा जब अपने कृत्रिम पैर को बर्फ पर रखतीं, तो वह फिसल जाता था।
पैर के स्टंप और प्रोस्थेटिक पैर के बीच घर्षण की वजह से असहनीय दर्द होता था, और कई बार उनका पैर खून से लथपथ हो जाता था। लेकिन वह रुकती नहीं थीं। उन्होंने अपने दिमाग को इस तरह से तैयार कर लिया था कि दर्द सिर्फ एक अहसास है, जिसे नजरअंदाज किया जा सकता है।
कैंप तीन से कैंप चार की तरफ बढ़ते हुए नजारे और भी खौफनाक होते गए। रास्ते में उन्हें उन पर्वतारोहियों के शव दिखने लगे जो कभी एवरेस्ट फतह करने निकले थे लेकिन कभी लौट नहीं पाए। बर्फ में जमे हुए वो शव जैसे आने वाले खतरों की चेतावनी दे रहे थे।
किसी का हाथ बर्फ से बाहर निकला हुआ था, तो किसी का चेहरा साफ दिखाई दे रहा था। अरुणिमा ने एक जगह देखा कि एक पर्वतारोही की लाश के पास ही उसकी ऑक्सीजन का खाली सिलेंडर पड़ा हुआ था।
इन दृश्यों ने उनके दिल में एक पल के लिए डर पैदा किया, लेकिन अगले ही पल उन्होंने खुद को संभाला। उन्होंने उन शवों से वादा किया कि वह उनके अधूरे सपनों की खातिर भी इस चोटी पर पहुंचकर दिखाएंगी।
जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ रही थी, शेरपा का भरोसा भी डगमगा रहा था। अरुणिमा की गति बाकी लोगों से कम थी क्योंकि उन्हें हर कदम फूंक-फूंक कर रखना पड़ता था। नकली पैर की वजह से संतुलन बनाना बेहद मुश्किल था। कई बार ढलान पर उनका पैर घूम जाता था और वह गिरने की कगार पर पहुंच जाती थीं।
लेकिन उनकी उंगलियों की पकड़ और रीढ़ की हड्डी का हौसला अडिग था। शेरपा लगातार उनसे वापस लौटने की मिन्नतें कर रहा था क्योंकि उसे पता था कि डेथ ज़ोन में ज्यादा देर रुकने का मतलब सिर्फ और सिर्फ मौत है। तूफान तेज हो रहा था, बर्फ की छोटी-छोटी सुइयां चेहरे पर आकर चुभ रही थीं।
चश्मे के अंदर भी बर्फ जम रही थी जिससे रास्ता देखना दूभर हो रहा था। लेकिन अरुणिमा के सामने सिर्फ एक ही लक्ष्य था—वो चोटी जहां पहुंचकर उन्हें साबित करना था कि एक इंसान की ताकत उसकी शारीरिक अक्षमता से कहीं बड़ी होती है।
तिरंगे का गौरव और मौत से सीधा मुकाबला

21 मई 2013 की सुबह। सूरज की पहली किरण ने एवरेस्ट की चोटी को छुआ। और ठीक उसी समय, सुबह के 10 बजकर 55 मिनट पर, अरुणिमा सिन्हा ने दुनिया के सबसे ऊंचे शिखर पर अपना कदम रख दिया। इतिहास रचा जा चुका था। वह दुनिया की पहली विकलांग महिला बन चुकी थीं जिसने एवरेस्ट पर फतह हासिल की थी।
उस पल में सारा दर्द, सारी तकलीफें और समाज के सारे ताने हवा में गायब हो गए। अरुणिमा ने अपने थैले से भारतीय तिरंगा निकाला और उसे पूरी ताकत से हवा में लहरा दिया। उन्होंने बर्फ पर घुटने टेके और भगवान का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने वहां कुछ तस्वीरें लीं और अपने शेरपा से एक वीडियो बनाने को कहा।
शेरपा झल्ला रहा था क्योंकि उन्हें पता था कि उनके पास वापस लौटने के लिए ऑक्सीजन नहीं बची है। लेकिन अरुणिमा चाहती थीं कि अगर वह इस पहाड़ से वापस जिंदा न लौट पाएं, तो यह वीडियो भारत के युवाओं तक पहुंचे और उन्हें यह संदेश दे कि कोई भी लक्ष्य इंसान के हौसले से बड़ा नहीं होता।
शिखर पर पहुंचने की खुशी ज्यादा देर नहीं टिकी क्योंकि असली चुनौती अभी शुरू होने वाली थी। पहाड़ों में एक कहावत है कि शिखर पर पहुंचना सिर्फ आधा रास्ता है, असली परीक्षा तो सुरक्षित वापस नीचे उतरने में होती है। जैसे ही उन्होंने नीचे उतरना शुरू किया, अरुणिमा का ब्रिटिश मूल का कृत्रिम पैर पूरी तरह से ढीला हो गया। वह बर्फ पर फिसलने लगीं।
एक जगह तो उनका पैर पूरी तरह से अलग हो गया। उन्हें बर्फ पर बैठकर अपने हाथों के सहारे घिसटना पड़ा। वह एक हाथ से अपने नकली पैर को पकड़तीं और दूसरे हाथ से बर्फ को पकड़कर खुद को नीचे खींचतीं। इसी बीच वही हुआ जिसका डर था—उनका ऑक्सीजन सिलेंडर पूरी तरह खाली हो गया।
ऑक्सीजन खत्म होते ही अरुणिमा का शरीर सुन्न पड़ने लगा। फेफड़े हवा के लिए तड़पने लगे और आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। शेरपा ने चिल्लाकर कहा कि अब सब खत्म हो गया है। अरुणिमा बर्फ पर गिर पड़ीं। मौत उनके बिल्कुल करीब थी।
ऐसा लग रहा था कि एवरेस्ट की इस बर्फीली कब्र में एक और नाम जुड़ने वाला है। लेकिन तभी कुदरत ने एक चमत्कार किया। ऊपर से आ रहे एक ब्रिटिश पर्वतारोही ने देखा कि मौसम बहुत ज्यादा खराब हो रहा है, इसलिए उसने वापस लौटने का फैसला किया था। उसके पास दो ऑक्सीजन सिलेंडर थे।
उसने अपना एक अतिरिक्त सिलेंडर अरुणिमा की तरफ फेंक दिया। यह सिलेंडर अरुणिमा के लिए किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं था। शेरपा ने फुर्ती से उस सिलेंडर को अरुणिमा के मास्क से जोड़ा। जैसे ही जीवनदायिनी गैस उनके फेफड़ों में पहुंची, अरुणिमा की आंखों में फिर से जान आ गई।
असंभव को संभव बनाने की कहानी
नया सिलेंडर मिलने के बाद भी रास्ता आसान नहीं था। अरुणिमा का पैर बार-बार साथ छोड़ रहा था। उनके हाथों की उंगलियां ठंड के मारे नीली पड़ चुकी थीं और फ्रॉस्टबाइट का खतरा बढ़ गया था। लेकिन अब उनके अंदर एक अजीब सी ताकत आ चुकी थी।
मौत के मुंह से बाहर निकलने के बाद उन्हें यकीन हो गया था कि भगवान उन्हें किसी बड़े मकसद के लिए जिंदा रख रहा है। वह रेंगती रहीं, गिरती रहीं, संभलती रहीं और धीरे-धीरे नीचे के कैंपों की तरफ बढ़ती रहीं।
जब वह कैंप चार पर पहुंचीं, तो वहां मौजूद अनुभवी पर्वतारोहियों की आंखें फटी की फटी रह गईं। किसी को उम्मीद नहीं थी कि बिना ऑक्सीजन के डेथ ज़ोन में इतनी देर बिताने के बाद कोई इंसान, और वो भी एक कृत्रिम पैर के साथ, जिंदा वापस लौट सकता है।
बेस कैंप पहुंचने तक अरुणिमा के पैर की हालत बदतर हो चुकी थी, लेकिन उनके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो सिर्फ उन लोगों के चेहरे पर होती है जिन्होंने अपनी नियति को खुद बदला हो।
इस यात्रा ने अरुणिमा को सिर्फ एक पर्वतारोही नहीं बनाया, बल्कि उन्हें दुनिया भर के करोड़ों निराश लोगों के लिए प्रेरणा का एक ऐसा जलता हुआ दीया बना दिया जिसे कोई तूफान नहीं बुझा सकता था।
उन्होंने यह साबित कर दिया कि असली विकलांगता शरीर में नहीं, बल्कि इंसान के दिमाग में होती है। अगर दिमाग में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको रोक नहीं सकती।
आज अरुणिमा सिन्हा की यह कहानी भारत के हर उस युवा के दिलों में जोश भर देती है जो छोटी-छोटी मुश्किलों से हार मान लेते हैं।
ट्रेन हादसे की उस खौफनाक रात से लेकर एवरेस्ट के शिखर पर तिरंगा फहराने तक का सफर यह सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, अगर आपके पास अटूट इच्छाशक्ति है, तो आप अपने जीवन के सबसे ऊंचे एवरेस्ट को भी फतह कर सकते हैं।
अरुणिमा ने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी कमजोरी को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया, और यही एक सच्चे एडवेंचरर की असली पहचान होती है।
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प्रस्तुति: Saying Central Team