चाँद पर खरगोश

चाँद पर खरगोश-अद्भुत दानवीरता की जातक कथा

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जातक कथाएँ प्राचीन भारत की वे अमूल्य और प्रेरणादायक कहानियाँ हैं, जिनमें भगवान बुद्ध के पूर्व जन्मों का वर्णन मिलता है। इन कथाओं में बुद्ध कभी राजा, कभी पशु-पक्षी, कभी साधु तो कभी सामान्य मनुष्य के रूप में जन्म लेकर संसार को सत्य, करुणा, दया, त्याग, बुद्धिमत्ता और सदाचार का संदेश देते हैं। जातक कथाएँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि जीवन जीने की सही राह भी दिखाती हैं। इन कहानियों में छिपी शिक्षाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी हजारों वर्ष पहले थीं। बच्चों से लेकर बड़ों तक, हर आयु का व्यक्ति इन कथाओं से प्रेरणा और जीवन की गहरी सीख प्राप्त कर सकता है।

आज हम आपके सामने ऐसी ही अद्भुत और प्रेरणादायक जातक कथाएँ प्रस्तुत करने जा रहे हैं, जो आपको ज्ञान, नैतिकता, बुद्धिमत्ता और जीवन के अनमोल सत्य से परिचित कराएँगी। इन कथाओं के माध्यम से आप न केवल रोचक घटनाओं का आनंद लेंगे, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली गहरी शिक्षाएँ भी प्राप्त करेंगे।

चाँद पर खरगोश : अद्भुत दानवीरता की जातक कथा

बहुत समय पहले गंगा नदी के शांत किनारे पर फैला एक घना और सुंदर वन था। उस वन में अनेक प्रकार के पशु-पक्षी निवास करते थे। उन्हीं के बीच एक अत्यंत बुद्धिमान, दयालु और शांत स्वभाव का खरगोश भी रहता था। वह साधारण खरगोशों की तरह केवल अपने भोजन और सुरक्षा की चिंता नहीं करता था, बल्कि उसके मन में सदैव दूसरों के कल्याण की भावना रहती थी। उसी वन में उसके तीन घनिष्ठ मित्र भी रहते थे—एक चंचल बंदर, एक चालाक सियार और एक ऊदबिलाव। चारों मित्रों में गहरी मित्रता थी और वे प्रतिदिन साथ बैठकर जीवन, धर्म और पुण्य के विषय में बातें किया करते थे।

एक दिन संध्या के समय जब चारों मित्र गंगा तट के पास बैठे थे, तब चर्चा दान और पुण्य के विषय पर होने लगी। उसी समय खरगोश ने कहा कि संसार में सबसे बड़ा धर्म दूसरों की सहायता करना है। बंदर ने उसकी बात का समर्थन किया और बोला कि यदि मनुष्य या प्राणी सच्चे मन से दान करे तो उसका जीवन सफल हो जाता है। धीरे-धीरे बात बढ़ी और उन्होंने निश्चय किया कि आने वाले उपोसथ के दिन वे सभी परम-दान करेंगे। बौद्ध परंपरा में उपोसथ का दिन अत्यंत पवित्र माना जाता है। ऐसा विश्वास था कि उस दिन किया गया दान अनंत पुण्य प्रदान करता है।

अगली सुबह उपोसथ का पावन दिन आ पहुँचा। सूरज की पहली किरणों के साथ ही चारों मित्र अपने-अपने घरों से बाहर निकले ताकि वे दान के लिए कुछ उत्तम वस्तु प्राप्त कर सकें। ऊदबिलाव गंगा किनारे घूम रहा था। अचानक उसकी दृष्टि नदी के तट पर रखी सात लाल रंग की बड़ी मछलियों पर पड़ी। उसने आसपास देखा, पर वहाँ कोई दिखाई नहीं दिया। उसने सोचा कि ये मछलियाँ किसी जरूरतमंद को दान देने के लिए उत्तम रहेंगी। वह तुरंत उन्हें उठाकर अपने घर ले आया।

उधर सियार भोजन की तलाश में वन के बाहर तक निकल गया। वहाँ उसे एक झोपड़ी दिखाई दी, जिसके बाहर दही से भरी एक हांडी और मांस का एक बड़ा टुकड़ा रखा हुआ था। सियार उन्हें चुपके से उठा लाया और मन ही मन प्रसन्न होने लगा कि आज वह एक महान दानवीर कहलाएगा।

इसी बीच बंदर उछलता-कूदता एक सुंदर आम के बाग में जा पहुँचा। वहाँ पेड़ों पर पके हुए मीठे आम लटक रहे थे। उसने बड़े आनंद से आमों का एक बड़ा गुच्छा तोड़ा और उसे लेकर वापस अपने घर लौट आया। तीनों मित्र अपने-अपने दान को देखकर बहुत प्रसन्न थे। उन्हें विश्वास था कि उनका दान अत्यंत श्रेष्ठ है।

किन्तु चौथा मित्र खरगोश गहरी चिंता में डूबा हुआ था। वह केवल घास-पात खाता था और उसके पास ऐसा कुछ भी नहीं था जिसे दान देकर किसी याचक को संतुष्ट किया जा सके। वह सोचने लगा, “यदि मैं किसी को घास दूँगा तो उससे उसका क्या भला होगा? सच्चा दान वही है जिससे किसी प्राणी को वास्तविक संतोष मिले।” लंबे विचार के बाद उसके मन में एक अद्भुत संकल्प उत्पन्न हुआ। उसने निश्चय किया कि यदि कोई याचक उसके पास आएगा, तो वह स्वयं अपने शरीर को ही दान में दे देगा। उसे लगा कि संसार में अपने प्राणों से बढ़कर कोई वस्तु नहीं होती और जो अपने प्राणों का त्याग कर दे, उससे बड़ा दानवीर कोई नहीं हो सकता।

खरगोश का यह महान त्याग-संकल्प इतना पवित्र और अलौकिक था कि उसका प्रभाव संपूर्ण ब्रह्माण्ड में फैल गया। देवताओं के राजा सक्क, जिन्हें वैदिक परंपरा में इन्द्र कहा जाता है, उनके सिंहासन तक उस पुण्य की शक्ति पहुँच गई। उनका आसन अचानक तप्त होने लगा। सक्क आश्चर्यचकित हो उठे। उन्होंने ध्यान लगाया और जाना कि पृथ्वी पर एक छोटा-सा खरगोश अपने प्राणों का दान करने का निश्चय कर चुका है। यह जानकर वे अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने सोचा कि इस अद्भुत दानवीरता की परीक्षा अवश्य लेनी चाहिए।


सक्क तुरंत एक वृद्ध सन्यासी का रूप धारण कर पृथ्वी पर उतर आए। सबसे पहले वे ऊदबिलाव के पास पहुँचे और भोजन की याचना की। ऊदबिलाव ने बड़ी श्रद्धा से उन्हें वे सातों मछलियाँ अर्पित कर दीं। सक्क ने उसकी प्रशंसा की, लेकिन दान स्वीकार नहीं किया। इसके बाद वे सियार के घर गए। सियार ने तुरंत दही की हांडी और मांस का टुकड़ा उनके सामने रख दिया। सक्क ने उसकी भी सराहना की, परंतु दान ग्रहण नहीं किया।

फिर वे बंदर के पास पहुँचे। बंदर ने प्रसन्न होकर मीठे आमों का गुच्छा उन्हें भेंट कर दिया। सक्क ने उसकी भी प्रशंसा की, लेकिन वहाँ से भी बिना कुछ लिए आगे बढ़ गए।

अंत में वे खरगोश के पास पहुँचे। खरगोश ने जैसे ही उस वृद्ध सन्यासी को देखा, वह आदरपूर्वक उनके सामने झुक गया और बोला, “हे महात्मन! मेरे पास आपको देने के लिए कोई उत्तम भोजन नहीं है। मैं केवल घास-पात खाता हूँ। परंतु यदि आप चाहें, तो मैं स्वयं को आपके भोजन के रूप में अर्पित कर सकता हूँ।”

सक्क यह सुनकर भीतर से द्रवित हो उठे, लेकिन उन्होंने अपनी परीक्षा जारी रखी। उन्होंने कहा, “यदि तुम्हारा यही निश्चय है, तो आग जलाओ ताकि तुम्हारा मांस पक सके।” खरगोश बिना किसी भय के तैयार हो गया। सक्क ने अपनी मायावी शक्ति से एक बड़ी अंगीठी प्रकट कर दी, जिसमें अग्नि प्रज्वलित होने लगी।

खरगोश धीरे-धीरे उस अग्नि के पास पहुँचा। आग में कूदने से पहले उसने अपने शरीर को तीन बार झटका ताकि उसके रोमों में छिपे छोटे-छोटे जीव आग में जलकर मर न जाएँ। इतनी भयानक घड़ी में भी उसे अपने प्राणों की नहीं, बल्कि उन सूक्ष्म जीवों की चिंता थी। फिर उसने शांत मन और प्रसन्न चेहरे के साथ अग्नि में छलांग लगा दी।

किन्तु आश्चर्य! वह अग्नि साधारण आग नहीं थी। वह सक्क की मायावी परीक्षा थी। आग ने खरगोश को तनिक भी नहीं जलाया। खरगोश उसी प्रकार सुरक्षित बाहर आ गया। उसकी दया, त्याग और दानवीरता देखकर सक्क की आँखें श्रद्धा से भर उठीं। उन्होंने अपना वास्तविक दिव्य रूप प्रकट किया। पूरा वन उनके तेज से प्रकाशित हो उठा।
सक्क ने भाव-विभोर होकर कहा, “हे महान आत्मा! मैंने युगों में ऐसी दानवीरता न देखी है और न सुनी है। तुम्हारा त्याग सदैव संसार को प्रेरणा देता रहेगा।”

इसके बाद सक्क चंद्रलोक पहुँचे। उन्होंने चाँद के एक पर्वत को अपने दिव्य हाथों से मसलकर वहाँ खरगोश की आकृति बना दी। फिर उन्होंने आकाश में घोषणा की, “जब तक इस चंद्रमा पर खरगोश का यह निशान रहेगा, तब तक संसार तुम्हारी महान दानवीरता और त्याग को याद करता रहेगा।”
तभी से लोगों का विश्वास है कि चाँद पर जो आकृति दिखाई देती है, वह उसी महान दानी खरगोश की है, जिसने दूसरों के सुख के लिए स्वयं को भी अर्पित करने में संकोच नहीं किया।

बुद्धि का चमत्कार : जातक कथा

बहुत समय पहले की बात है। एक छोटे-से गांव में रामसिंह नाम का एक गरीब किसान अपनी पत्नी कमला और अपने इकलौते बेटे सुन्दर के साथ रहता था। रामसिंह दिन-रात मेहनत-मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पालता था। उसके पास न अपनी खेती थी और न ही धन-दौलत। मिट्टी और पसीने से भरी उसकी जिंदगी कठिनाइयों से घिरी हुई थी, फिर भी उसके हृदय में एक बड़ा सपना पलता था। वह चाहता था कि उसका बेटा सुन्दर पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बने और वह जीवन जिए जिसकी उसने कभी कल्पना की थी।

सुन्दर बचपन से ही तेज बुद्धि और समझदार स्वभाव का लड़का था। गांव के पंडित कस्तूरीलाल के पास जाकर वह शिक्षा ग्रहण करता था। पढ़ाई में उसकी विशेष रुचि थी और वह हमेशा अपनी कक्षा में अच्छे अंक लाता था। गांव के लोग उसकी प्रशंसा करते नहीं थकते थे। जब भी कोई रामसिंह से कहता कि उसका बेटा बहुत होनहार है, तब गर्व से उसका सीना चौड़ा हो जाता था। उसे विश्वास था कि एक दिन उसका बेटा उसकी गरीबी और संघर्ष भरी जिंदगी को बदल देगा।

एक रात रामसिंह अपनी पत्नी कमला के साथ बैठा था। मिट्टी के छोटे से घर में दीपक टिमटिमा रहा था। बाहर हल्की ठंडी हवा बह रही थी। उसी समय रामसिंह गंभीर स्वर में बोला, “सुन्दर की मां, मैं कई दिनों से एक बात सोच रहा हूं।”
कमला ने उत्सुकता से पूछा, “क्या बात है जी? कहीं आप सुन्दर के विवाह की बात तो नहीं सोच रहे?”
रामसिंह हल्का-सा मुस्कुराया और बोला, “अरे नहीं भागवान! अभी तो उसे अपने पैरों पर खड़ा होना है। मैं सोचता हूं कि क्यों न उसे शहर भेज दिया जाए? वहां जाकर वह कोई अच्छा काम सीख लेगा। गांव में तो बस मेहनत-मजदूरी ही है। पढ़ाई का लाभ तभी है जब वह कुछ बड़ा करे।”

कमला का चेहरा उदास हो गया। उसने धीमे स्वर में कहा, “लेकिन सुन्दर ने कभी शहर देखा तक नहीं। वहां वह रहेगा कहां? कौन उसकी मदद करेगा?”
रामसिंह बोला, “शहर में मेरा एक पुराना मित्र रामचन्द्र रहता है। वर्षों से मुलाकात नहीं हुई, मगर मुझे विश्वास है कि वह सुन्दर को सहारा देगा।”

ममता से भरी मां का दिल अपने बेटे को दूर भेजने के लिए तैयार नहीं था, लेकिन वह भी अपने बेटे का उज्ज्वल भविष्य चाहती थी। अंततः उसने भारी मन से हामी भर दी।
जब शाम को सुन्दर खेलकर घर लौटा, तब रामसिंह ने उसे अपने पास बैठाकर सारी बात बताई। यह सुनते ही सुन्दर की आंखों में चमक आ गई। वह स्वयं भी गांव से बाहर जाकर कुछ बड़ा करना चाहता था। उसने उत्साहित होकर कहा, “पिताजी, मैं भी यही चाहता था कि शहर जाकर कोई अच्छी नौकरी करूं और आपको सुख दूं। मैं अवश्य जाऊंगा।”

अगले दिन रामसिंह ने बेटे को जीवन की सीख दी, उसे अपने मित्र का पता समझाया और आशीर्वाद देकर शहर के लिए विदा कर दिया। मां की आंखें नम थीं, लेकिन बेटे के उज्ज्वल भविष्य की आशा उनके आंसुओं में भी चमक रही थी।
कई घंटों की यात्रा के बाद जब सुन्दर शहर पहुंचा, तो उसकी आंखें आश्चर्य से फैल गईं। ऊंची-ऊंची इमारतें, भीड़भाड़ वाली सड़कें, सजी हुई दुकानें और इक्के-तांगों की आवाजाही देखकर वह दंग रह गया। गांव का शांत वातावरण और शहर की चहल-पहल में जमीन-आसमान का अंतर था।

वह अपने पिता के मित्र रामचन्द्र के घर का पता पूछता हुआ वहां पहुंचा, लेकिन वहां जाकर उसे पता चला कि रामचन्द्र का वर्षों पहले देहांत हो चुका है और उसका परिवार भी कहीं चला गया है। यह सुनकर सुन्दर का दिल टूट गया। एक पल के लिए उसे लगा जैसे उसके सारे सपने बिखर गए हों।
लेकिन सुन्दर कमजोर दिल वाला नहीं था। उसने स्वयं को संभाला और मन ही मन कहा, “यदि मैं अभी हार मान लूंगा, तो मां-बाप की उम्मीदें टूट जाएंगी। मुझे कुछ बनकर ही लौटना है।”

वह एक सराय में ठहर गया और अगले दिन से नौकरी की तलाश में निकल पड़ा। जहां भी जाता, लोग उसकी बुद्धिमानी और विनम्रता से प्रभावित होते, लेकिन पहचान न होने के कारण उसे कोई काम नहीं मिलता। धीरे-धीरे उसके पास लाया हुआ पैसा भी समाप्त होने लगा। चिंता उसके चेहरे पर साफ दिखाई देने लगी।

एक दिन थका-हारा वह सड़क किनारे एक पेड़ के नीचे बैठा था। तभी पास में बैठे दो राजकर्मचारियों की बातचीत उसके कानों में पड़ी। उनमें से एक का नाम रामवीर था, जो राजा का खजांची बन चुका था, जबकि दूसरा गंगाराम साधारण सिपाही ही था।
गंगाराम दुखी होकर बोला, “भाई रामवीर, हम दोनों साथ नौकरी में आए थे, मगर तू खजांची बन गया और मैं वहीं का वहीं रह गया। लगता है तेरी किस्मत बहुत अच्छी है।”

रामवीर मुस्कुराया और बोला, “किस्मत उन्हीं का साथ देती है जो बुद्धि और सूझबूझ से काम लेते हैं।”
फिर उसने सड़क किनारे पड़े एक मरे हुए चूहे की ओर इशारा करते हुए कहा, “देख उस चूहे को। लोग उसे देखकर घृणा कर रहे हैं, मगर कोई समझदार आदमी चाहे तो उसी चूहे से भी चार पैसे कमा सकता है।”

यह बात सुनकर सुन्दर के मन में हलचल मच गई। वह सोचने लगा कि आखिर कोई मरे हुए चूहे से पैसे कैसे कमा सकता है।
उसी समय एक तांगा वहां आकर रुका। उसमें बैठे एक सेठ की गोद से अचानक उसकी बिल्ली कूदकर पास की झाड़ियों में जा छिपी। सेठ घबरा गया और लोगों से मदद मांगने लगा। लेकिन बिल्ली गुस्से से गुर्रा रही थी और कोई उसके पास जाने की हिम्मत नहीं कर रहा था।

तभी सुन्दर के मन में बिजली-सी कौंधी। उसे रामवीर की बात याद आई। वह तुरंत दौड़कर उस मरे हुए चूहे के पास गया। उसने कहीं से एक रस्सी ली और चूहे की गर्दन में बांध दी।

फिर वह झाड़ियों के पास पहुंचा और लोगों से बोला, “आप सब पीछे हट जाइए, मैं बिल्ली को बाहर निकालता हूं।”
सभी उत्सुकता से उसे देखने लगे। सुन्दर ने रस्सी से बंधे चूहे को झाड़ियों के सामने लहराना शुरू किया। मोटे चूहे को देखकर बिल्ली का लालच जाग उठा। वह धीरे-धीरे गुर्राना बंद करके बाहर आने लगी। जैसे ही वह पूरी तरह बाहर आई, सुन्दर ने प्यार से उसे गोद में उठा लिया।

सेठ खुशी से झूम उठा। उसने तुरंत अपनी जेब से चांदी का एक चमचमाता सिक्का निकालकर सुन्दर को दे दिया।
भीड़ में खड़े लोग उसकी बुद्धिमानी की प्रशंसा करने लगे। कोई बोला, “वाह! इसे कहते हैं बुद्धि का कमाल।” दूसरा बोला, “यह लड़का एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा।”
सुन्दर उस सिक्के को हाथ में लेकर मुस्कुराया। वह समझ चुका था कि संसार में सफलता केवल भाग्य से नहीं मिलती, बल्कि बुद्धि, धैर्य और सूझबूझ से मिलती है। उसी दिन से उसने निश्चय कर लिया कि वह हर कठिनाई का सामना अपनी बुद्धि और साहस से करेगा।

कहते हैं कि आगे चलकर वही सुन्दर अपनी बुद्धिमानी और ईमानदारी के बल पर एक बड़ा व्यापारी बना और उसने अपने माता-पिता को वह सुख दिया जिसका उन्होंने जीवनभर सपना देखा था।
इस कथा से हमें शिक्षा मिलती है कि परिस्थिति चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हो, यदि मनुष्य धैर्य और बुद्धि से काम ले तो सफलता अवश्य उसके कदम चूमती है।

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जातक कथाएँ बुद्धिमत्ता, करुणा, सत्य, दया और नैतिक मूल्यों से भरपूर प्रेरणादायक कहानियाँ हैं। इन कथाओं के माध्यम से जीवन जीने की सही राह, अच्छे कर्मों का महत्व और मानवता का अमूल्य संदेश मिलता है।

रचनाकार: जातक कथाएँ
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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