दिल्ली का सुल्तान भाग 1
दिल्ली की धुंधली और ठंडी रात में, जब इंडिया गेट की बत्तियाँ भी धुंधली नज़र आने लगती हैं, तब असल खेल शुरू होता है। कबीर खन्ना, जो दिल्ली की अंडरवर्ल्ड की दुनिया में ‘सुल्तान’ के नाम से जाना जाता है, अपनी काले रंग की मर्सिडीज की पिछली सीट पर बैठा शहर की रौशनी को देख रहा था।
उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी, जो उसके अंदर चल रहे तूफानों को छिपाने के लिए काफी थी। पिछले दस सालों में, कबीर ने दिल्ली की गलियों को खून से सींचा था ताकि वह आज उस मकाम पर पहुँच सके जहाँ कानून भी उसके सामने झुकने से पहले दो बार सोचता है।
उसके पास ताकत है, पैसा है, और एक ऐसी वफादार फौज है जो एक इशारे पर अपनी जान दे सकती है, लेकिन इस सत्ता के सिंहासन के नीचे दबे राज़ उसे चैन से सोने नहीं देते। आज की रात उसे अपने सबसे पुराने वफादार, आरव, के साथ एक सीक्रेट मीटिंग करनी थी, क्योंकि उसे खबर मिली थी कि उसकी ही संगठन के भीतर कोई गद्दार पनप रहा है।
कबीर का फोन बजता है, जो किसी अनजान नंबर से था और यह एक खतरे की घंटी थी क्योंकि उसका नंबर सिर्फ चुनिंदा लोगों के पास ही होता है। फोन उठाते ही दूसरी तरफ से खामोशी थी, सिर्फ भारी साँसों की आवाज़ आ रही थी, जिससे कबीर समझ गया कि यह कोई साधारण कॉल नहीं बल्कि एक धमकी है।
उसने शांत लहजे में बस इतना कहा कि जो भी तुम हो, मेरी दिल्ली में पैर रखने से पहले अपने कफन का नाप ले लेना, क्योंकि सुल्तान का शिकार करने वाले अक्सर खुद शिकार बन जाते हैं। उसने फोन काटकर कार की खिड़की से बाहर देखा, जहाँ पुराना दिल्ली का इलाका अपनी पुरानी इमारतों और संकरी गलियों के साथ खड़ा था।
उसके जीवन में वफादारी की कीमत अक्सर खून से चुकाई जाती थी, और आज की रात उसे एक ऐसे गद्दार का पता लगाना था जिसने उसके पिता की मौत के बाद से उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था।
तभी उसकी गाड़ी एक सुनसान गोदाम के सामने रुकती है, जहाँ साया वर्मा इंतजार कर रही थी, जो कबीर की दुनिया से बिल्कुल अलग एक कॉलेज लेक्चरर थी। सिया से कबीर की मुलाकात छह महीने पहले एक बारिश वाली रात में हुई थी, जब उसने उसे कुछ गुंडों से बचाया था, और तब से वह कबीर के जीवन का वह 15 प्रतिशत हिस्सा बन गई थी जो उसे इंसान बनाए रखता था।
कबीर गाड़ी से बाहर निकलता है और ठंडी हवा उसके कोट को उड़ा रही थी, उसे पता था कि सिया का यहाँ आना बहुत खतरनाक हो सकता है। सिया दौड़कर कबीर के पास आती है, उसकी आँखों में फिक्र साफ झलक रही थी, लेकिन कबीर ने उसे पीछे धकेलते हुए कहा कि उसे यहाँ नहीं आना चाहिए था क्योंकि यह जगह अब मौत का अखाड़ा बनने वाली है।
सिया ने कबीर का हाथ थामते हुए बस इतना कहा कि वह उसे अकेले इस आग में नहीं जलने दे सकती, लेकिन कबीर को पता था कि अगर उसके दुश्मनों को इस रिश्ते की भनक लग गई, तो वे सिया को उसका सबसे बड़ा कमज़ोर पहलू बना देंगे।
अंदर गोदाम के भीतर, आरव पहले से ही मौजूद था, जिसके चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान थी लेकिन उसकी आँखों में कबीर के लिए नफरत और जलन साफ झलक रही थी। कबीर अंदर कदम रखता है और पूरे कमरे में एक अजीब सी खामोशी छा जाती है, जहाँ आरव के साथ खड़े दस सशस्त्र लोग पूरी तरह से तैयार थे।
कबीर ने आरव की ओर देखते हुए कहा कि जिस थाली में खाया उसी में छेद करने की हिम्मत तो बहुतों में होती है, लेकिन उसे निभाने के लिए कलेजा चाहिए होता है। आरव ने एक ठंडी हंसी हंसते हुए कहा कि दिल्ली का सुल्तान अब बूढ़ा हो रहा है और उसे अपनी गद्दी उन लोगों को सौंप देनी चाहिए जो कबीर से कहीं ज्यादा क्रूर और महत्वाकांक्षी हैं।
कबीर मुस्कुराया और बोला कि शेर जब बूढ़ा भी हो जाए, तो वह शिकार करना नहीं भूलता, वह बस अपने अगले वार का इंतजार करता है ताकि दुश्मन को उसकी औकात पता चल सके।
तभी गोदाम का मुख्य द्वार तेजी से खुलता है और कबीर के वफादार आदमी अंदर दाखिल होते हैं, जिससे आरव के गुंडों के चेहरे पर डर की लकीरें उभर आती हैं। कबीर ने अपनी बंदूक निकालते हुए कहा कि आरव, तुमने मेरी वफादारी को मेरी कमजोरी समझ लिया, यही तुम्हारी सबसे बड़ी भूल है।
गोलियों की आवाज से गोदाम गूंज उठा और धुआं फैल गया, जहाँ कबीर और आरव के बीच एक आमने-सामने की जंग छिड़ गई। सिया एक कोने में दुबकी हुई यह सब देख रही थी, उसका दिल तेजी से धड़क रहा था क्योंकि उसने आज तक सिर्फ कबीर के उस रूप को देखा था जो एक रक्षक था, लेकिन आज वह कबीर को एक शिकारी के रूप में देख रही थी।
अंत में, आरव जमीन पर गिरता है, कबीर उसके पास जाता है और आरव कहता है कि उसके मरने से यह खेल खत्म नहीं होगा, क्योंकि कबीर के अपने ही परिवार के लोग अब उसके खिलाफ साजिश रच रहे हैं।
दिल्ली का सुल्तान भाग 2

आरव की मौत के बाद, दिल्ली की हवाओं में एक और साजिश की बू आने लगी थी, कबीर को अब अपने उन लोगों पर भी शक होने लगा था जिन्हें वह अपना खून मानता था।
उसने अपनी पूरी खुफिया टीम को सक्रिय कर दिया ताकि यह पता चल सके कि कौन-कौन इस गद्दारी में शामिल है, और उसे जो जानकारी मिली उसने उसके होश उड़ा दिए। उसके चचेरे भाई, समीर, ने ही आरव के साथ मिलकर कबीर को खत्म करने की योजना बनाई थी, और वे उसके व्यापार को अंदर से खोखला कर रहे थे।
कबीर को यह अहसास हुआ कि उसने अब तक जिन लोगों को पाला था, वे असल में सांप बनकर उसके आस्तीन में छिपे हुए थे, और अब उसे बिना किसी दया के सबको खत्म करना था। उसने फैसला किया कि अब वह किसी को भी माफ नहीं करेगा, चाहे वह उसका अपना सगा भाई ही क्यों न हो, क्योंकि सत्ता के इस खेल में इमोशन के लिए कोई जगह नहीं होती।
अगले ही दिन, कबीर एक आलीशान रेस्टोरेंट में समीर के साथ बैठा था, जहाँ बाहर उसके बॉडीगार्ड्स पूरे इलाके को घेरे हुए थे। कबीर ने बहुत ही शांत लहजे में समीर से पूछा कि क्या उसे याद है कि बचपन में उन्होंने एक-दूसरे से क्या वादा किया था, लेकिन समीर ने बस अपनी नजरें नीची कर लीं।
कबीर ने समीर को एक फाइल दी जिसमें उसके द्वारा किए गए सारे गद्दारी के सबूत थे, और उसे देखते ही समीर के पसीने छूटने लगे। समीर ने गिड़गिड़ाते हुए माफी मांगनी चाही, लेकिन कबीर की आँखों में अब कोई दया नहीं थी, उसने बस इतना कहा कि खून से बड़ा कोई रिश्ता नहीं होता, पर विश्वास से बड़ा कुछ नहीं होता और उसने विश्वास को बेच दिया है।
कबीर ने उसे आखिरी मौका दिया कि वह दिल्ली छोड़कर चला जाए और कभी वापस न आए, क्योंकि अगर दोबारा उसका सामना हुआ तो वह अपनी बंदूक चलाने से नहीं हिचकिचाएगा।
सिया, जो अभी भी कबीर के साथ अपने संबंधों को लेकर उलझन में थी, उसने देखा कि कबीर अब पहले से भी ज्यादा कठोर हो गया है। उसने कबीर से मिलने का फैसला किया और उसे यह समझाने की कोशिश की कि सत्ता पाने के चक्कर में वह खुद को कहीं खो न दे।
जब सिया और कबीर एक पुराने मंदिर के पीछे मिल रहे थे, तो सिया ने कहा कि वह कबीर के साथ एक साधारण जिंदगी चाहती है, जहाँ खून और गोलियों का कोई नामो-निशान न हो। कबीर ने सिया का चेहरा अपने हाथों में लेते हुए कहा कि यह दुनिया उसे कभी भी एक साधारण इंसान नहीं रहने देगी, और अगर वह उसके साथ रही, तो हमेशा खतरे में रहेगी।
सिया ने दृढ निश्चय के साथ कहा कि वह उसके साथ अपनी मौत से भी लड़ने को तैयार है, कबीर के दिल में पहली बार एक ऐसी कोमल भावना जागी जो पिछले दस सालों में दब गई थी।
उसी समय, कबीर के दुश्मनों ने उसे फंसाने के लिए एक आखिरी चाल चली, उन्होंने कबीर के सबसे बड़े गोदाम पर हमला कर दिया और उसे आग के हवाले कर दिया। कबीर को खबर मिलते ही वह वहां पहुँच गया, जहाँ चारों तरफ पुलिस और उसके दुश्मन घेरा बनाकर खड़े थे, यह एक बहुत बड़ी साजिश थी ताकि उसे कानून के शिकंजे में फंसाया जा सके।
कबीर ने अपनी बुद्धिमानी का इस्तेमाल करते हुए वहां से निकलने का रास्ता बनाया और अपनी पूरी ताकत झोंक दी, जिससे चारों तरफ अफरातफरी मच गई। उस भयंकर लड़ाई में कबीर का एक करीबी साथी मारा गया, जिससे कबीर पूरी तरह से आगबबूला हो गया और उसने अपने दुश्मनों को धूल चटाने की ठान ली।
उसने अपनी वफादार फौज के साथ एक जोरदार पलटवार किया और दुश्मनों को यह दिखा दिया कि दिल्ली की सत्ता अब भी उसी के हाथों में है।
लड़ाई खत्म होने के बाद, कबीर पूरी तरह से घायल था और वह खून से लथपथ होकर एक अंधेरी गली में बैठ गया, जहाँ सिया उसे ढूंढते हुए वहां पहुंची। सिया उसे इस हालत में देखकर रोने लगी, लेकिन कबीर ने उसे चुप कराया और कहा कि यह सब अब खत्म हो गया है और अब कोई उसका पीछा नहीं करेगा।
उसने सिया को अपनी तिजोरी की चाबियां दीं और कहा कि इसमें इतना धन है कि वह कहीं और जाकर नई जिंदगी शुरू कर सकती है। कबीर ने उसे दिल्ली से दूर चले जाने को कहा, क्योंकि उसे पता था कि वह अब भी खतरों के घेरे में है और वह नहीं चाहता कि सिया उसके अतीत की सजा भुगते। सिया जाने के लिए तैयार नहीं थी, लेकिन कबीर ने उसे अपनी कसम देकर विदा किया, और वह वहां से रोते हुए निकल गई।
कुछ समय बाद, दिल्ली की गलियों में यह खबर फैल गई कि कबीर खन्ना अब इस दुनिया में नहीं रहा, लेकिन वास्तव में उसने अपनी पहचान बदल ली थी। वह अब एक गुमनाम जिंदगी जी रहा था, जहाँ कोई उसे सुल्तान के नाम से नहीं जानता था, लेकिन उसके अंदर का राजा अब भी जीवित था।
उसने अपनी सत्ता का परित्याग कर दिया था, लेकिन उसने उन सभी लोगों को सबक सिखा दिया था जो उससे गद्दारी करने की सोच सकते थे। उसने अपनी सारी संपत्ति को एक अनाथालय के नाम कर दिया और कानून के शिकंजे से बचने के लिए खुद को मृत घोषित कर दिया। आज भी, कभी-कभी दिल्ली की पुरानी गलियों में लोग एक ऐसे आदमी की कहानी सुनाते हैं जिसने अपनी सत्ता, परिवार और अपनी दुनिया को अपनी शर्तों पर जिया।
अंत में, कबीर एक छोटे से गांव में अपनी जिंदगी के बचे हुए दिन शांति से बिता रहा था, और दूर से ही सिया को एक खुशहाल जिंदगी जीते हुए देखता रहता था। उसने अपने अतीत को पीछे छोड़ दिया था, लेकिन उसने जो सबक सीखे थे वे हमेशा उसके साथ थे, और उसकी रूह में अब भी वह सुल्तान वाली गरिमा बाकी थी।
उसने कभी भी उस जिंदगी को याद नहीं किया, क्योंकि उसे पता था कि जो उसने किया वह मजबूरी थी और उसने अपने तरीके से सब कुछ हासिल किया था। कबीर की यह कहानी अब भी दिल्ली की गलियों में एक सबक के रूप में कही जाती है कि सत्ता और वफादारी के बीच की रेखा बहुत बारीक होती है। वह अपने एकांत में खुश था, क्योंकि उसने आखिरकार अपनी आजादी पा ली थी, और यही उसकी सबसे बड़ी जीत थी जो किसी भी सिंहासन से बड़ी थी।
अगर आपको ऐसी ही दिलचस्प और प्रेरणादायक कहानियाँ पढ़ना पसंद है, तो हमारे WhatsApp चैनल से जुड़िए — वहाँ रोज़ नई stories सबसे पहले मिलती हैं
प्रस्तुति: Saying Central Team