एकतरफा इश्क़

एकतरफा इश्क़,वो किसी और की हो गई…

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एकतरफा इश्क़ part-1

सचिन के लिए दौड़ना सिर्फ़ एक खेल नहीं था, बल्कि अपनी अंतरात्मा से बात करने का एक ज़रिया था। यूनिवर्सिटी के सिंथेटिक ट्रैक पर जब उसके जूते पड़ते थे, तो दुनिया की सारी आवाज़ें पीछे छूट जाती थीं।

लेकिन पिछले दो सालों से उस ट्रैक पर एक ऐसी आवाज़ गूंज रही थी, जिसने उसकी पूरी ज़िंदगी की लय बदल दी थी। वह आवाज़ रोशनी की थी, जो यूनिवर्सिटी की सर्वश्रेष्ठ बाधा दौड़ (हर्डल्स) की एथलीट थी। रोशनी जब ट्रैक पर उतरती, तो ऐसा लगता था मानो हवा ने अपना रुख़ बदल लिया हो और सचिन बस दूर खड़े होकर उसे देखता रहता था।

रोशनी के प्रति सचिन का झुकाव कोई साधारण आकर्षण नहीं था, बल्कि यह एक गहरा, मौन समर्पण था जो समय के साथ और गहरा होता गया। वह रोज़ सुबह सूरज उगने से पहले मैदान पर पहुँच जाता था ताकि रोशनी को वॉर्म-अप करते हुए देख सके। रोशनी की हर कामयाबी पर सचिन का दिल गर्व से भर जाता था, भले ही उन कामयाबियों में उसका कोई सीधा योगदान नहीं था। उसने कभी अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरोने की हिम्मत नहीं की क्योंकि उसे डर था कि कहीं यह पवित्र रिश्ता एकतरफ़ा इज़हार के बोझ तले दबकर टूट न जाए।

विश्वविद्यालय के खेल उत्सव की तैयारियाँ ज़ोरों पर थीं और दोनों ही अपने-अपने इवेंट्स के लिए दिन-रात पसीना बहा रहे थे। सचिन ४०० मीटर की दौड़ में हिस्सा ले रहा था, जबकि रोशनी हमेशा की तरह १०० मीटर बाधा दौड़ की मुख्य दावेदार थी। एक शाम जब पूरा मैदान खाली हो चुका था, रोशनी ट्रैक के किनारे बैठी अपनी एंकल इंजरी से जूझ रही थी। सचिन ने जब उसे दर्द में देखा, तो उससे रहा नहीं गया और वह बिना कुछ सोचे प्राथमिक चिकित्सा किट लेकर उसके पास पहुँच गया।

वह पहली बार था जब दोनों के बीच खेल से इतर कोई लंबी बातचीत हुई थी और सचिन का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। रोशनी ने उसकी मदद के लिए आभार जताया और मुस्कुराते हुए कहा कि तुम हमेशा मैदान पर इतनी ख़ामोशी से क्यों रहते हो। सचिन ने बस मुस्कुराकर अपनी भावनाएं छुपा लीं, लेकिन उस रात वह सो नहीं सका क्योंकि रोशनी की वह मुस्कान उसकी आँखों में बस गई थी। उसे लगा कि शायद इस ख़ामोशी के पीछे छुपा उसका प्यार कभी न कभी रोशनी के दिल तक अपनी राह बना ही लेगा।

आने वाले हफ़्तों में उनके बीच की दोस्ती थोड़ी और गहरी हो गई, जो सचिन के लिए किसी ख़ूबसूरत ख़वाब जैसी थी। वे दोनों अब अक्सर प्रैक्टिस के बाद एक साथ जूस कॉर्नर पर बैठने लगे थे, जहाँ रोशनी अपने सपनों और उम्मीदों के बारे में बातें करती थी। सचिन बस एक सच्चे श्रोता की तरह उसकी हर बात सुनता और मन ही मन भगवान से उसकी हर दुआ कुबूल होने की मन्नत मांगता। इस दौरान सचिन को कई बार लगा कि वह अपने दिल का हाल कह दे, पर रोशनी की आँखों में सिर्फ़ अपने करियर के प्रति जूनून देखकर वह रुक जाता था।

एक दिन मैदान पर एक नया मोड़ आया जब नेशनल लेवल के कोच और एथलीट कबीर ने यूनिवर्सिटी के कैंप में एंट्री ली। कबीर न केवल एक बेहतरीन धावक था बल्कि उसका व्यक्तित्व भी बेहद आकर्षक था जो किसी को भी प्रभावित कर सकता था। रोशनी कबीर की खेल तकनीक और उसकी उपलब्धियों से बेहद प्रभावित थी और जल्द ही दोनों के बीच एक अलग ही बॉन्डिंग दिखने लगी। सचिन ने जब रोशनी को कबीर के साथ हँसते और बातें करते देखा, तो उसके सीने में एक अजीब सी टीस उठी, जिसे वह चाहकर भी नाम नहीं दे पा रहा था।

सचिन के लिए अब हर सुबह मैदान पर जाना एक मानसिक और भावनात्मक परीक्षा जैसा बनता जा रहा था। वह देखता कि कैसे कबीर रोशनी को हर्डल्स पार करने की नई तकनीकें सिखा रहा था और रोशनी की आँखों में कबीर के लिए एक अलग ही चमक थी। वह चमक वैसी ही थी, जैसी सचिन की आँखों में रोशनी को देखते वक़्त हुआ करती थी, और यह अहसास सचिन के लिए बेहद आत्मघाती था। फिर भी, उसने अपने खेल पर इसका असर नहीं पड़ने दिया और अपनी पूरी हताशा को अपनी दौड़ की रफ़्तार में झोंकना शुरू कर दिया।

खेल उत्सव के ठीक दो दिन पहले यूनिवर्सिटी में एक विदाई और शुभकामना समारोह का आयोजन किया गया था जहाँ सभी एथलीट इकट्ठा हुए थे। सचिन ने हिम्मत जुटाई और एक ख़ास ब्रेसलेट ख़रीदा, जिस पर ‘विनर’ लिखा हुआ था, जिसे वह रोशनी को अपने दिल की बात के साथ देना चाहता था। समारोह के दौरान जब वह रोशनी को ढूंढते हुए ऑडिटोरियम के पीछे वाले लॉन की तरफ़ गया, तो वहाँ का नज़ारा देखकर उसके पैर ज़मीन से बिल्कुल चिपक गए। रोशनी और कबीर वहाँ खड़े थे और कबीर ने रोशनी का हाथ थाम रखा था, जिसे रोशनी बेहद ख़ुशी से स्वीकार कर रही थी।

सचिन ने देखा कि कबीर ने रोशनी के सामने अपने प्यार का इज़हार किया था और रोशनी के चेहरे की लालिमा सब कुछ बयां कर रही थी। रोशनी ने कबीर से कहा कि वह भी पिछले कुछ समय से कबीर को पसंद करने लगी थी और इस नेशनल मीट के बाद वे अपने परिवारों को बताएंगे। यह सुनते ही सचिन के हाथ से वह छोटा सा गिफ़्ट बॉक्स छूटकर घास पर गिर गया और उसका दिल कांच की तरह चकनाचूर हो गया। वह बिना कोई आवाज़ किए चुपचाप वहाँ से पीछे हट गया, मानो उसका पूरा अस्तित्व ही उस अंधेरे में कहीं विलीन हो गया हो।

एकतरफा इश्क़ part-2

एकतरफा इश्क़

उस रात सचिन अपने हॉस्टल के कमरे में फूट-फूट कर रोया, क्योंकि उसका वह एकतरफ़ा महल ताश के पत्तों की तरह ढह चुका था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी इस बेइंतहा मोहब्बत का क्या करे, जो अब कभी मुकम्मल नहीं हो सकती थी। उसने महसूस किया कि एकतरफ़ा प्यार की सबसे बड़ी त्रासदी यही होती है कि इसमें आपको टूटने का हक़ तो होता है, पर शिकायत का कोई अधिकार नहीं होता। उसने तय किया कि वह खेल उत्सव में भाग नहीं लेगा और वापस अपने घर लौट जाएगा क्योंकि वह रोशनी को किसी और के साथ नहीं देख सकता था।

अगली सुबह जब सचिन मैदान पर अपनी किट बैग उठाने आया, तो उसकी मुलाक़ात सीधे रोशनी से हो गई जो बेहद उत्साहित दिख रही थी। रोशनी ने दौड़कर उसका हाथ पकड़ा और कहा कि सचिन तुम्हें कल मेरे फाइनल मैच में सबसे आगे खड़े होकर मेरा हौसला बढ़ाना होगा। रोशनी की आँखों में अपने लिए सिर्फ़ एक सच्चा दोस्त देखकर सचिन के भीतर का तूफ़ान शांत हो गया और उसने एक कड़वा सच स्वीकार कर लिया। उसने मन ही मन सोचा कि यदि उसका प्यार सच्चा है, तो वह रोशनी की इस बेदाग़ ख़ुशी को अपने स्वार्थ के लिए कम नहीं होने देगा।

सचिन ने हॉस्टल छोड़ने का इरादा बदल दिया और तय किया कि वह इस दर्द को अपनी कमज़ोरी नहीं बल्कि अपनी सबसे बड़ी ताक़त बनाएगा। उसने ४०० मीटर दौड़ के ट्रैक पर उतरने का फैसला किया और अपनी भावनाओं को एक नई दिशा देने के लिए खुद को झोंक दिया। जब आप किसी से निस्वार्थ प्रेम करते हैं, तो उसकी ख़ुशी ही आपका अंतिम लक्ष्य बन जाती है, भले ही उस ख़ुशी में आप शामिल न हों। सचिन ने इसी फलसफे को अपनी ज़िंदगी का मूलमंत्र बना लिया और अपनी रेस के लिए जी-तोड़ मेहनत शुरू कर दी।

खेल उत्सव का पहला दिन आया और पूरा स्टेडियम दर्शकों की आवाज़ों और तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था। रोशनी की १०० मीटर बाधा दौड़ का फाइनल सबसे पहले था और सचिन ठीक उसी जगह खड़ा था जहाँ रोशनी ने उसे रहने के लिए कहा था। जैसे ही गन शॉट की आवाज़ हुई, रोशनी हवा की रफ़्तार से दौड़ी और हर बाधा को बेहद ख़ूबसूरती से पार करते हुए पहला स्थान हासिल किया। गोल्ड मेडल जीतने के बाद रोशनी ने स्टेडियम में कबीर को गले लगाया, और दूर खड़े सचिन ने मुस्कुराते हुए उसके लिए तालियाँ बजाईं।

रोशनी की जीत ने सचिन के भीतर एक अजीब सा सुकून भर दिया था, मानो उसके एकतरफ़ा प्यार को उसकी तपस्या का फल मिल गया हो। अब बारी सचिन की ४०० मीटर दौड़ की थी, जिसके लिए वह स्टार्टिंग ब्लॉक पर जाकर खड़ा हुआ और अपनी आँखें बंद कर लीं। उसने अपने दिल में रोशनी के चेहरे को याद किया, उस दर्द को याद किया जिसने उसे पिछले कुछ दिनों में पूरी तरह तोड़ दिया था। उसने कसम खाई कि वह इस रेस को अपनी ज़िंदगी की सबसे बेहतरीन रेस बनाएगा, न कि किसी को पाने के लिए, बल्कि खुद को साबित करने के लिए।

जैसे ही रेस शुरू करने का इशारा हुआ, सचिन एक चीते की तरह ट्रैक पर दौड़ा और पहले २०० मीटर में ही उसने बढ़त बना ली। उसके पैर दर्द से चीख रहे थे और उसके फेफड़ों में हवा कम पड़ रही थी, लेकिन उसका इरादा फौलाद की तरह मजबूत था। उसने अपनी पूरी निराशा, अपना अधूरा प्यार और अपनी अंतहीन उम्मीदों को अपने जूतों की रफ़्तार में तब्दील कर दिया था। अंतिम १०० मीटर के स्ट्रेच पर जब वह पहुँचा, तो पूरा स्टेडियम खड़े होकर सिर्फ़ उसका नाम चिल्ला रहा था क्योंकि ऐसी दौड़ पहले कभी नहीं देखी गई थी।


सचिन ने फिनिशिंग लाइन को पार किया और एक नया यूनिवर्सिटी रिकॉर्ड बनाते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिया। लाइन पार करते ही वह ट्रैक पर गिर गया, लेकिन उसकी आँखों में आँसू नहीं बल्कि एक अभूतपूर्व आत्म-संतुष्टि और विजय की चमक थी। रोशनी और कबीर दौड़ते हुए उसके पास आए और रोशनी ने उसे उठाते हुए कहा कि सचिन मुझे पता था कि तुम इतिहास रच दोगे। सचिन ने रोशनी की आँखों में देखा और उसे महसूस हुआ कि अब उसके दिल में कोई दर्द या जलन नहीं बची थी, बल्कि सिर्फ़ एक शुद्ध आदर था।

मैडल सेरेमनी के बाद शाम को जब सब जीत का जश्न मना रहे थे, सचिन अकेले उसी पुराने ट्रैक पर टहलने के लिए निकल गया। हवा ठंडी थी और आसमान में तारे टिमटिमा रहे थे, जो उसके जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत दे रहे थे। तभी पीछे से रोशनी आई और उसने सचिन को उसकी इस ऐतिहासिक जीत के लिए बधाई देते हुए एक चॉकलेट दी। सचिन ने मुस्कुराकर उसे स्वीकार किया और महसूस किया कि अब वह इस बंधन से पूरी तरह आज़ाद हो चुका है।

सचिन ने रोशनी से कहा कि तुम्हारी जीत देखकर मुझे जो ख़ुशी मिली, वह इस गोल्ड मेडल से कहीं बढ़कर है और मैं हमेशा तुम्हारी कामयाबी की दुआ करूँगा। रोशनी उसकी बातों की गहराई को पूरी तरह समझ नहीं पाई, लेकिन उसने महसूस किया कि सचिन के शब्द किसी संत की प्रार्थना जैसे पवित्र थे। दोनों ने एक-दूसरे से हाथ मिलाया और रोशनी कबीर की तरफ़ बढ़ गई, जो दूर खड़े होकर उसका इंतज़ार कर रहा था। सचिन ने उन्हें जाते हुए देखा और इस बार उसके चेहरे पर एक बेहद सुकून भरी और सच्ची मुस्कान थी।

इस एकतरफ़ा प्यार ने सचिन को एक अधूरा आशिक़ ज़रूर बनाया था, लेकिन उसने उसे एक मुकम्मल इंसान और एक महान एथलीट भी बना दिया था। उसने सीख लिया था कि प्यार का मतलब हमेशा किसी को पा लेना नहीं होता, बल्कि किसी को बिना किसी शर्त के चाहते रहना भी अपने आप में पूर्णता है। उसने अपनी भावनाओं को अपनी कला और अपने खेल में समाहित कर लिया था, जिससे उसका व्यक्तित्व पहले से कहीं ज़्यादा निखर उठा था। वह अब एक ऐसा धावक था जो किसी मंज़िल को पाने के लिए नहीं, बल्कि दौड़ने के उस पवित्र अनुभव के लिए दौड़ता था।

सिंथेटिक ट्रैक की उस लाल मिट्टी पर सचिन के जूतों के निशान हमेशा के लिए छप चुके थे, ठीक उसी तरह जैसे उसके दिल पर रोशनी का नाम छपा था। लेकिन अब वह नाम दर्द का सबब नहीं, बल्कि उसकी प्रेरणा का एक कभी न खत्म होने वाला स्रोत बन चुका था। उसने आसमान की तरफ़ देखा, एक गहरी सांस ली और अपनी ज़िंदगी के नए सफर की तरफ़ कदम बढ़ा दिए जहाँ उम्मीदें थीं, पर कोई उम्मीद नहीं थी। यह एकतरफा इश्क़ की वह आख़िरी दौड़ थी, जिसे हारकर भी सचिन ने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी जंग जीत ली थी।

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