जोनास साल्क

जोनास साल्क: पोलियो वैक्सीन

10
Join WhatsApp
Join Now
Join Facebook
Join Now

जोनास साल्क: पोलियो वैक्सीन

बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में दुनिया एक ऐसे अदृश्य दुश्मन से जूझ रही थी, जो हंसते-खेलते बच्चों को हमेशा के लिए अपंग बना देता था या उनकी जान ले लेता था। इस भयानक दुश्मन का नाम था पोलियोमाइलाइटिस, जिसे आम बोलचाल में लोग पोलियो कहते थे। हर साल गर्मियों का मौसम आते ही दुनिया भर के परिवारों में एक अजीब सा खौफ फैल जाता था।

माता-पिता अपने बच्चों को बाहर भेजने, स्विमिंग पूल में नहाने या भीड़-भाड़ वाले इलाकों में जाने से रोकने लगते थे। यह बीमारी इतनी बेरहम थी कि किसी को भी नहीं पता था कि अगला शिकार कौन सा बच्चा होगा। इस बीमारी से पीड़ित बच्चे अक्सर बिस्तर पर असहाय पड़ जाते थे और कुछ को सांस लेने के लिए ‘आयरन लंग’ नाम की एक भारी-भरकम मशीन के अंदर हफ्तों गुजारने पड़ते थे। इस खौफनाक माहौल के बीच न्यूयॉर्क के एक साधारण परिवार में जन्मे एक लड़के की किस्मत में इतिहास बदलना लिखा था।

जोनास साल्क, जो एक बेहद शांत और गंभीर स्वभाव के थे, विज्ञान की दुनिया में कुछ ऐसा करने का सपना देख रहे थे जो मानवता को इस भयानक त्रासदी से हमेशा के लिए मुक्ति दिला सके।

जोनास साल्क का जन्म 28 अक्टूबर 1914 को न्यूयॉर्क शहर में एक यहूदी अप्रवासी परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता बहुत अमीर नहीं थे, लेकिन वे शिक्षा के महत्व को अच्छी तरह समझते थे और चाहते थे कि उनका बेटा जीवन में कुछ बड़ा करे।

साल्क बचपन से ही अन्य बच्चों से थोड़े अलग थे; उनकी रुचि खेल-कूद से ज्यादा किताबों में और प्रकृति के रहस्यों को समझने में थी। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद न्यूयॉर्क के सिटी कॉलेज से स्नातक किया और फिर न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन से मेडिकल की डिग्री हासिल की।

दिलचस्प बात यह है कि साल्क का इरादा कभी भी एक आम डॉक्टर बनकर सिर्फ मरीजों का इलाज करने और पैसे कमाने का नहीं था। वे चिकित्सा अनुसंधान यानी मेडिकल रिसर्च की दुनिया में उतरना चाहते थे, जहां वे ऐसी दवाइयां या टीके खोज सकें जिससे एक साथ लाखों-करोड़ों लोगों की जान बचाई जा सके। इसी लगन ने उन्हें वायरोलॉजी यानी वायरस के अध्ययन की तरफ आकर्षित किया, जो उस समय विज्ञान की एक उभरती हुई शाखा थी।

चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई पूरी करने के बाद जोनास साल्क ने इन्फ्लुएंजा यानी फ्लू के टीके पर काम करना शुरू किया। मिशिगन यूनिवर्सिटी में अपने गुरु थॉमस फ्रांसिस जूनियर के साथ मिलकर उन्होंने फ्लू का एक सफल टीका विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस सफलता ने साल्क को वैज्ञानिक बिरादरी में एक नई पहचान दी और उनके भीतर यह विश्वास जगाया कि वायरस से होने वाली बीमारियों को टीकों के जरिए नियंत्रित किया जा सकता है। साल 1947 में साल्क को पिट्सबर्ग यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ मेडिसिन में वायरस रिसर्च लेबोरेटरी का निदेशक नियुक्त किया गया।

यह उनके जीवन का एक बहुत बड़ा मोड़ था क्योंकि अब उनके पास अपनी खुद की प्रयोगशाला थी और वे अपने विचारों को आजमाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र थे।

इसी दौरान ‘नेशनल फाउंडेशन फॉर इन्फैंटाइल पैरालिसिस’ (जिसे बाद में मार्च ऑफ डाइम्स के नाम से जाना गया) ने साल्क से संपर्क किया। इस संस्था का उद्देश्य पोलियो के खिलाफ एक प्रभावी हथियार खोजना था और उन्होंने साल्क को इस जानलेवा वायरस पर शोध करने के लिए एक बड़ा प्रोजेक्ट और फंड सौंप दिया।

अदृश्य दुश्मन से सीधी जंग

जब जोनास साल्क ने पोलियो पर अपना शोध शुरू किया, तब वैज्ञानिक जगत में इस बात को लेकर काफी मतभेद थे कि एक प्रभावी टीका कैसे बनाया जाए। उस समय के अधिकांश बड़े वैज्ञानिक और शोधकर्ता इस बात के समर्थक थे कि टीका हमेशा ‘जीवित लेकिन कमजोर किए गए’ वायरस (लाइव-अटेनुएटेड वायरस) से ही बनाया जाना चाहिए। उनका मानना था कि केवल जीवित वायरस ही मानव शरीर में स्थायी प्रतिरक्षा यानी इम्युनिटी पैदा कर सकता है।

लेकिन साल्क इस पारंपरिक सोच से पूरी तरह सहमत नहीं थे; उन्हें लगता था कि जीवित वायरस का इस्तेमाल करना बेहद जोखिम भरा हो सकता है। अगर वह कमजोर किया गया वायरस शरीर के भीतर जाकर फिर से शक्तिशाली हो गया, तो वह टीका लगाने वाले व्यक्ति को ही पोलियो का शिकार बना सकता था।

साल्क ने एक अलग और क्रांतिकारी रास्ता चुनने का फैसला किया, जिसे ‘किल्ड-वायरस’ या मृत वायरस तकनीक कहा जाता था। उनका विचार था कि अगर वायरस को रसायनों के जरिए पूरी तरह मार दिया जाए, तो वह बीमारी फैलाने की क्षमता खो देगा लेकिन शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली उसे पहचानकर एंटीबॉडी बनाना सीख जाएगी।

साल्क का यह नया विचार वैज्ञानिक समुदाय में कई लोगों को हजम नहीं हो रहा था और उनकी इस सोच की काफी आलोचना भी की जा रही थी। लेकिन साल्क अपने इरादों के पक्के थे और उन्होंने अपनी प्रयोगशाला में दिन-रात एक करके काम करना शुरू कर दिया।

पोलियो वायरस के मुख्य रूप से तीन अलग-अलग प्रकार (टाइप 1, टाइप 2 और टाइप 3) थे, जिसका मतलब था कि साल्क को एक ऐसा टीका तैयार करना था जो इन तीनों प्रकारों के खिलाफ समान रूप से प्रभावी हो। उन्होंने वायरस को प्रयोगशाला में बंदरों के गुर्दे की कोशिकाओं पर विकसित किया और फिर फॉर्मलाडेहाइड नाम के रसायन का उपयोग करके वायरस को पूरी तरह निष्क्रिय या ‘मृत’ कर दिया।

यह प्रक्रिया बेहद जटिल और संवेदनशील थी क्योंकि अगर वायरस को मारने में थोड़ी सी भी कमी रह जाती, तो टीका जानलेवा साबित हो सकता था। साल्क और उनकी समर्पित टीम ने प्रयोगशाला में हजारों परीक्षण किए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि टीका पूरी तरह सुरक्षित है और शरीर में जाते ही यह पोलियो से लड़ने वाली एंटीबॉडी को सक्रिय कर देता है।

प्रयोगशाला में बंदरों पर किए गए शुरुआती परीक्षणों के नतीजे बेहद उत्साहजनक रहे; जिन बंदरों को यह मृत वायरस का टीका दिया गया, उनके शरीर में पोलियो के खिलाफ मजबूत प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो गई और उन्हें कोई नुकसान भी नहीं हुआ।

इस सफलता ने साल्क के हौसले को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया, लेकिन असली चुनौती अभी बाकी थी। जानवरों पर सफल परीक्षण के बाद अब इस टीके का परीक्षण इंसानों पर किया जाना था, जो कि एक बेहद संवेदनशील और नैतिक रूप से कठिन कदम था। साल्क को अपने आविष्कार पर इतना गहरा भरोसा था कि उन्होंने इतिहास का सबसे साहसी और चौंकाने वाला कदम उठाने का फैसला किया।

उन्होंने किसी और पर इस टीके का परीक्षण करने से पहले, खुद पर, अपनी पत्नी डोना और अपने तीनों बेटों पर इस प्रायोगिक टीके का इंजेक्शन लगाया। यह एक ऐसा क्षण था जब एक वैज्ञानिक का पूरा करियर और एक पिता का पूरा परिवार दांव पर लगा था। सौभाग्य से, टीका पूरी तरह सुरक्षित रहा और साल्क के पूरे परिवार के खून में पोलियो के खिलाफ भारी मात्रा में एंटीबॉडी पाई गईं।

इतिहास का सबसे बड़ा मानवीय परीक्षण

पारिवारिक परीक्षण के सफल होने के बाद साल्क ने अपने निष्कर्षों को दुनिया के सामने रखा, जिससे पूरे अमेरिका में उम्मीद की एक नई लहर दौड़ गई। लेकिन विज्ञान की दुनिया में किसी भी दवा या टीके को तब तक अंतिम मंजूरी नहीं मिलती, जब तक कि उसका परीक्षण एक बहुत बड़े जनसमूह पर न कर लिया जाए।

साल 1954 में इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे व्यापक चिकित्सा परीक्षण शुरू हुआ, जिसे ‘फ्रांसिस फील्ड ट्रायल’ के नाम से जाना जाता है। इस ऐतिहासिक परीक्षण का नेतृत्व साल्क के पुराने गुरु डॉ. थॉमस फ्रांसिस जूनियर को सौंपा गया ताकि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी बनी रहे।

इस परीक्षण में अमेरिका, कनाडा और फिनलैंड के लगभग 18 लाख बच्चों ने भाग लिया, जिन्हें इतिहास में ‘पोलियो पायनियर्स’ के नाम से याद किया जाता है। यह एक अभूतपूर्व मानवीय प्रयास था जिसमें लाखों डॉक्टरों, नर्सों, स्कूल के शिक्षकों और समाजसेवियों ने स्वेच्छा से अपना योगदान दिया ताकि इस अदृश्य महामारी को हमेशा के लिए खत्म किया जा सके।

इस विशाल परीक्षण की प्रक्रिया बेहद व्यवस्थित और सख्त वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित थी, जिसमें ‘डबल-ब्लाइंड’ पद्धति का उपयोग किया गया था। इसका मतलब यह था कि आधे बच्चों को साल्क की असली वैक्सीन दी जा रही थी, जबकि बाकी के आधे बच्चों को एक साधारण नमक का पानी (प्लेसबो) दिया जा रहा था।

सबसे दिलचस्प बात यह थी कि न तो टीका लगाने वाले डॉक्टरों को पता था और न ही टीका लगवाने वाले बच्चों या उनके माता-पिता को कि किसे असली वैक्सीन मिल रही है और किसे सिर्फ नमक का पानी। इस तरह के सख्त परीक्षण की आवश्यकता इसलिए थी ताकि परिणामों में किसी भी तरह का मानवीय भ्रम या पक्षपात न हो सके।

परीक्षण शुरू होने के बाद पूरे एक साल तक वैज्ञानिक डेटा इकट्ठा करते रहे और दुनिया भर के लोग अपनी सांसें रोककर इस बात का इंतजार कर रहे थे कि क्या साल्क की यह दवा वाकई बच्चों को अपंग होने से बचा पाएगी। जोनास साल्क के लिए यह एक साल मानसिक रूप से बेहद तनावपूर्ण था क्योंकि पूरी दुनिया की उम्मीदों का बोझ उनके कंधों पर टिका हुआ था।

आखिरकार वह ऐतिहासिक दिन आ ही गया जिसका पूरी मानवता को बेसब्री से इंतजार था। 12 अप्रैल 1955 को मिशिगन यूनिवर्सिटी के रैखम ऑडिटोरियम में एक विशाल प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई, जहां डॉ. थॉमस फ्रांसिस ने परीक्षण के अंतिम नतीजों की घोषणा की।

जैसे ही उन्होंने माइक पर आकर यह शब्द कहे कि “यह टीका सुरक्षित है, प्रभावी है और शक्तिशाली है,” पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। आंकड़ों से साफ हो गया था कि साल्क की वैक्सीन पोलियो के सबसे खतरनाक रूपों के खिलाफ 80 से 90 प्रतिशत तक प्रभावी साबित हुई थी। यह खबर जंगल की आग की तरह पूरी दुनिया में फैल गई; चर्चों की घंटियां बजने लगीं, लोग सड़कों पर निकलकर खुशियां मनाने लगे और फैक्ट्रियों में काम कुछ देर के लिए रोक दिया गया।

जोनास साल्क रातों-रात एक राष्ट्रीय नायक बन गए और दुनिया भर के अखबारों में उनकी तस्वीरें छपने लगीं। सदियों से मानवता को डराने वाले एक भयानक अभिशाप का अंत अब विज्ञान के हाथों हो चुका था।

मानवता के लिए एक महान त्याग

जोनास साल्क
जोनास साल्क

पोलियो वैक्सीन की सफलता की घोषणा के बाद जोनास साल्क को एक टीवी इंटरव्यू के लिए आमंत्रित किया गया, जहां मशहूर पत्रकार एडवर्ड आर. मरो ने उनसे एक ऐसा सवाल पूछा जो इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज हो गया।

मरो ने साल्क से पूछा कि “इस बेहद सफल और क्रांतिकारी पोलियो वैक्सीन का पेटेंट आखिरकार किसके पास है या इसका मालिक कौन है?” साल्क ने बिना किसी हिचकिचाहट के और चेहरे पर एक बेहद सौम्य मुस्कान लाते हुए जवाब दिया, “ठीक है, मैं तो कहूंगा कि इसका मालिक पूरी दुनिया के लोग हैं। इसका कोई पेटेंट नहीं है।

क्या आप सूरज का पेटेंट करा सकते हैं?” साल्क का यह एक वाक्य उनकी महान सोच, निस्वार्थ भावना और मानवता के प्रति उनके असीम प्रेम को बयां करने के लिए काफी था। वे चाहते तो इस वैक्सीन का पेटेंट कराकर उस समय के हिसाब से अरबों डॉलर कमा सकते थे और दुनिया के सबसे अमीर व्यक्तियों की सूची में शामिल हो सकते थे, लेकिन उन्होंने व्यावसायिक लाभ के ऊपर इंसानी जिंदगियों को चुना।

साल्क के इस फैसले का मतलब यह था कि दुनिया की कोई भी दवा कंपनी इस टीके को बिना किसी रॉयल्टी या कानूनी अड़चन के बेहद सस्ते दामों पर बना सकती थी।

उनका मानना था कि यदि वैक्सीन पर किसी एक व्यक्ति या कंपनी का एकाधिकार हो गया, तो यह गरीब देशों के बच्चों तक कभी नहीं पहुंच पाएगी और पैसे की कमी के कारण लाखों बच्चे हमेशा के लिए अपंग होते रहेंगे।

साल्क के इस महान और अभूतपूर्व त्याग की वजह से पोलियो की वैक्सीन बहुत ही कम समय में दुनिया के कोने-कोने तक पहुंच गई और अमीर-गरीब का भेद मिटाकर हर बच्चे को सुरक्षा का यह कवच मिलने लगा। उनके इस कदम ने पूरी दुनिया के डॉक्टरों और वैज्ञानिकों को एक नई प्रेरणा दी कि विज्ञान का असली मकसद व्यापार करना नहीं बल्कि पीड़ित मानवता की सेवा करना है।

हालांकि, इस फैसले के कारण उन्हें कुछ व्यावसायिक आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा, लेकिन आम जनता की नजरों में उनका स्थान किसी भगवान से कम नहीं था।

वैक्सीन के आने के बाद के वर्षों में दुनिया भर में पोलियो के मामलों में नाटकीय रूप से गिरावट देखने को मिली। अकेले अमेरिका में जहां हर साल हजारों बच्चे इस बीमारी की चपेट में आते थे, वहां कुछ ही सालों में यह संख्या घटकर उंगलियों पर गिनने लायक रह गई।

साल्क ने अपनी इस अपार सफलता और लोकप्रियता का उपयोग विज्ञान को और आगे बढ़ाने के लिए किया। साल 1963 में उन्होंने कैलिफोर्निया के ला जोला में ‘साल्क इंस्टीट्यूट फॉर बायोलॉजिकल स्टडीज’ की स्थापना की, जो आज भी दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्रों में से एक है। इस संस्थान में साल्क ने एक ऐसा माहौल तैयार किया जहां दुनिया भर के बेहतरीन दिमाग बिना किसी दबाव के कैंसर, एड्स और अन्य लाइलाज बीमारियों पर शोध कर सकें।

जोनास साल्क जीवन के अंतिम दिनों तक चिकित्सा अनुसंधान में सक्रिय रहे और वे हमेशा युवा वैज्ञानिकों को यह सिखाते रहे कि उनकी खोज का अंतिम लाभ समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति को मिलना चाहिए।

अमर विरासत और प्रेरणादायक अंत

जोनास साल्क का पूरा जीवन इस बात का जीवंत उदाहरण है कि कैसे एक व्यक्ति का दृढ़ संकल्प और निस्वार्थ सेवा भाव पूरी दुनिया का भविष्य बदल सकता है। उन्होंने विज्ञान को एक नया दृष्टिकोण दिया और यह साबित किया कि मानवता की भलाई के लिए किए गए कार्य कभी व्यर्थ नहीं जाते।

23 जून 1995 को 80 वर्ष की आयु में इस महान वैज्ञानिक ने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनके द्वारा दी गई पोलियो वैक्सीन आज भी दुनिया के करोड़ों बच्चों को एक स्वस्थ और खुशहाल जीवन दे रही है। भारत जैसे विशाल और घनी आबादी वाले देश में भी, साल्क की इसी बुनियादी सोच और बाद में विकसित की गई ओरल वैक्सीन के मिश्रण से साल 2014 में पोलियो को पूरी तरह से समाप्त करने में सफलता मिली।

आज दुनिया के गिने-चुने देशों को छोड़कर लगभग हर हिस्से से पोलियो का नामोनिशान मिट चुका है, जो साल्क के सपनों की जीत को दर्शाता है।

साल्क अक्सर कहा करते थे कि “हमारे जीवन का सबसे मुख्य उद्देश्य यह होना चाहिए कि हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अच्छे पूर्वज साबित हो सकें।” उनके इस विचार को उनके काम ने पूरी तरह सच कर दिखाया क्योंकि आज की पीढ़ी जिस पोलियो मुक्त दुनिया में सांस ले रही है, वह साल्क के उसी कठिन परिश्रम और महान त्याग की बदौलत ही संभव हो पाया है।

जब भी चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में किसी ऐसे आविष्कार की बात होगी जिसने बिना किसी लालच के पूरी मानव जाति को नया जीवन दिया, तो जोनास साल्क और उनकी पोलियो वैक्सीन की यह अद्भुत और प्रेरणादायक कहानी हमेशा सबसे पहले याद की जाएगी। उनका जीवन हमें सिखाता है कि असली सफलता और प्रसिद्धि धन-दौलत के अंबार से नहीं, बल्कि समाज को दिए गए आपके योगदान और लोगों के चेहरों पर लाई गई मुस्कान से मापी जाती है।

जोनास साल्क आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी विरासत हर उस बच्चे की हंसी में जिंदा है जो आज अपने पैरों पर बिना किसी डर के दौड़ रहा है।

अगर आपको ऐसी ही दिलचस्प और प्रेरणादायक कहानियाँ पढ़ना पसंद है, तो हमारे WhatsApp चैनल से जुड़िए — वहाँ रोज़ नई stories सबसे पहले मिलती हैं
प्रस्तुति: Saying Central Team

दिलचस्प कहानियों का सफर यहीं खत्म नहीं होता, ये भी ज़रूर पढ़ें:
Share:
WhatsApp
Facebook

Leave a Comment

Feature corner

चाणक्य नीति
Chanakya Neeti Explained

नीति और सफलता के अमूल्य सूत्र।

Book Summaries Explained

लोकप्रिय किताबों के मुख्य विचार।
Read More »

Child Psychology Explained

बच्चों की सोच और मनोविज्ञान।
Read More »

Moral Values Explained

छोटी कहानियाँ और नैतिक शिक्षा।

Inspirational Lives

महान व्यक्तियों के प्रेरणादायक जीवन।

CATEGORIES