महाभारत कुरुक्षेत्र का महायुद्ध अपने अंतिम चरण में पहुँच चुका था। अठारह दिनों तक चले इस भीषण युद्ध ने धरती को रक्त से लाल कर दिया था। कौरवों की विशाल सेना लगभग समाप्त हो चुकी थी और उनके सभी महान योद्धा एक-एक करके युद्धभूमि में गिर चुके थे। अब दुर्योधन अकेला रह गया था। अपने समस्त भाइयों, मित्रों और सेनापतियों की मृत्यु के बाद भी उसके भीतर का अहंकार समाप्त नहीं हुआ था। वह गदा लेकर युद्धभूमि में उतरा और भीमसेन को ललकारने लगा।
दोनों महाबली योद्धाओं के बीच भयंकर गदा युद्ध प्रारंभ हुआ। दुर्योधन ने अपनी पूरी शक्ति से प्रहार किए और पाण्डव सेना के अनेक सैनिकों को मार गिराया, किन्तु अंततः भीमसेन ने अपनी प्रतिज्ञा स्मरण करते हुए उसकी जंघा पर प्रहार किया। उस प्रहार से दुर्योधन भूमि पर गिर पड़ा और उसका अंत निश्चित हो गया।
दुर्योधन की ऐसी दशा देखकर अश्वत्थामा क्रोध और प्रतिशोध की अग्नि में जल उठा। उसे अपने पिता द्रोणाचार्य की मृत्यु का दुःख पहले से ही भीतर-ही-भीतर खाए जा रहा था।
उसने मन में ठान लिया कि वह किसी भी प्रकार पाण्डवों को असहनीय पीड़ा देगा। रात का समय था। युद्ध समाप्त हो चुका था और पाण्डवों का शिविर गहरी नींद में डूबा हुआ था। उसी अंधेरी रात में अश्वत्थामा कृपाचार्य और कृतवर्मा को साथ लेकर चोरी-छिपे पाण्डव शिविर में घुस गया। वहाँ उसने सोते हुए वीर योद्धाओं पर अचानक हमला कर दिया। किसी को संभलने का अवसर तक नहीं मिला और देखते ही देखते अनेक महारथी उसके हाथों मारे गए।
अश्वत्थामा का क्रोध इतना भयानक हो चुका था कि उसने धर्म और मर्यादा की सारी सीमाएँ तोड़ दीं। उसने द्रौपदी के पाँचों पुत्रों को, जिन्हें उपपाण्डव कहा जाता था, सोते समय ही निर्दयता से मार डाला। वह उनके सिर काटकर दुर्योधन के पास ले गया, यह सोचकर कि दुर्योधन प्रसन्न होगा। लेकिन जब दुर्योधन ने यह सुना कि अश्वत्थामा ने निहत्थे और सोते हुए बालकों की हत्या की है, तब उसे भी यह कर्म अधर्मपूर्ण लगा।
उसने अश्वत्थामा के इस पापपूर्ण कार्य की निंदा की। उधर जब द्रौपदी को अपने पुत्रों की हत्या का समाचार मिला, तब उसका हृदय शोक से फट पड़ा। वह विलाप करते हुए भूमि पर गिर पड़ी और पूरा शिविर दुःख में डूब गया।
द्रौपदी का विलाप सुनकर अर्जुन के भीतर भीषण क्रोध जाग उठा। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे अश्वत्थामा का सिर काटकर द्रौपदी के चरणों में रखेंगे। श्रीकृष्ण स्वयं अर्जुन के सारथी बने और दोनों अश्वत्थामा का पीछा करने निकल पड़े। जब अश्वत्थामा ने देखा कि अर्जुन उसका पीछा करते हुए निकट आ रहे हैं और कहीं भी उसे बचने का मार्ग नहीं मिल रहा, तब भयभीत होकर उसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया।
वह ब्रह्मास्त्र अत्यंत भयानक और प्रलयंकारी था। अश्वत्थामा उसे चलाना तो जानता था, परंतु उसे वापस लेने की विद्या उसे नहीं आती थी। देखते ही देखते आकाश अग्नि के तेज से भर गया और पृथ्वी काँप उठी।
उस प्रचंड अग्नि को अपनी ओर आता देखकर अर्जुन चिंतित हो उठे। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि यह कैसी दिव्य अग्नि है और इससे रक्षा कैसे संभव होगी। तब श्रीकृष्ण ने कहा कि यह अश्वत्थामा का छोड़ा हुआ ब्रह्मास्त्र है और इसका सामना केवल दूसरे ब्रह्मास्त्र से ही किया जा सकता है। श्रीकृष्ण की आज्ञा पाकर अर्जुन ने आचमन किया, मंत्रों का स्मरण किया और स्वयं भी ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया।
दोनों ब्रह्मास्त्र जब आकाश में टकराए तो भयंकर अग्नि प्रकट हुई। ऐसा लगने लगा मानो तीनों लोक जल उठेंगे। प्रजा भयभीत हो गई और चारों ओर विनाश का वातावरण छा गया। जब अर्जुन ने देखा कि इन अस्त्रों के कारण संसार संकट में पड़ रहा है, तब उन्होंने अपनी दिव्य विद्या से दोनों ब्रह्मास्त्रों को शांत कर दिया। इसके बाद वे तेजी से अश्वत्थामा की ओर बढ़े और उसे पकड़कर रस्सियों से बाँध लिया।
अश्वत्थामा अब पराजित और अपमानित अवस्था में अर्जुन के सामने खड़ा था। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि जिसने सोते हुए और निहत्थे बालकों की हत्या की हो, वह मृत्यु के योग्य है। धर्म के अनुसार स्त्रियों, बच्चों, निहत्थों और सोए हुए मनुष्यों का वध करना महापाप माना गया है। इसलिए अर्जुन को अपनी प्रतिज्ञा पूरी करते हुए अश्वत्थामा का वध कर देना चाहिए।
किन्तु अर्जुन का हृदय दया और धर्म से भरा हुआ था। वे जानते थे कि अश्वत्थामा उनके गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र है। इसलिए उन्होंने उसे मारने के स्थान पर बाँधकर शिविर में द्रौपदी के सामने प्रस्तुत किया। जब द्रौपदी ने अपने पुत्रों के हत्यारे को उस दशा में देखा, तब उसका कोमल हृदय करुणा से भर उठा।
उसने कहा कि यदि अश्वत्थामा को मार भी दिया जाए, तो उसके मृत पुत्र वापस नहीं लौटेंगे। साथ ही यदि गुरु पुत्र का वध होगा, तो द्रोणाचार्य की पत्नी कृपी को भी वही दुःख सहना पड़ेगा जो वह स्वयं भोग रही है। द्रौपदी के इन धर्मयुक्त और करुणा से भरे वचनों को सुनकर वहाँ उपस्थित सभी लोग उसकी प्रशंसा करने लगे।
भीमसेन अब भी क्रोध से भरे हुए थे और अश्वत्थामा को जीवित छोड़ना नहीं चाहते थे, लेकिन अर्जुन ने धर्म का मार्ग चुना। उन्होंने अपनी तलवार से अश्वत्थामा के सिर के बाल काट डाले और उसके मस्तक की दिव्य मणि निकाल ली। वह मणि ही उसकी शक्ति और तेज का स्रोत थी। मणि निकलते ही उसका तेज समाप्त हो गया और वह अत्यंत अपमानित एवं दुर्बल दिखाई देने लगा। अर्जुन ने उसे उसी अपमानित अवस्था में शिविर से बाहर निकाल दिया। इस प्रकार अर्जुन ने अपनी प्रतिज्ञा भी निभाई और गुरु पुत्र की हत्या का पाप भी अपने ऊपर नहीं लिया।
इसके बाद पाण्डव अपने मृत स्वजनों को जल अर्पित करने के लिए गंगा तट पर पहुँचे। धृतराष्ट्र, गांधारी, कुन्ती और समस्त स्त्रियाँ शोक में डूबी हुई थीं। उसी समय एक और भयावह घटना घटी।
अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा भयभीत अवस्था में दौड़ती हुई श्रीकृष्ण के पास आई। वह काँपती हुई बोली कि कोई प्रज्वलित अग्निबाण उसके गर्भ को जलाने आ रहा है। उसने भगवान से अपने गर्भस्थ शिशु की रक्षा करने की प्रार्थना की। तब श्रीकृष्ण तुरंत समझ गए कि अश्वत्थामा ने पाण्डव वंश को समाप्त करने के लिए पुनः ब्रह्मास्त्र चला दिया है।
श्रीकृष्ण ने तत्काल अपनी योगमाया और दिव्य शक्ति से उत्तरा के गर्भ की रक्षा की। ब्रह्मास्त्र की अग्नि से गर्भस्थ शिशु बुरी तरह प्रभावित हुआ, किन्तु भगवान ने अपने तप और दिव्य तेज से उसे पुनर्जीवन प्रदान किया। वही बालक आगे चलकर राजा परीक्षित के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जिसने पाण्डव वंश को आगे बढ़ाया। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने पाण्डव कुल को पूर्ण विनाश से बचा लिया और धर्म की ज्योति को आगे बढ़ने का मार्ग प्रदान किया।
महाभारत कर्ण का महान युद्ध
महाभारत का युद्ध अपने सबसे भयानक और निर्णायक चरण में पहुँच चुका था। भीष्म पितामह के बाद जब गुरु द्रोणाचार्य भी युद्धभूमि में मारे गए, तब कौरव सेना का मनोबल पूरी तरह टूटने लगा। दुर्योधन अपने सबसे बड़े सहारों को खो चुका था और भीतर से भय तथा शोक में डूब गया था। ऐसे कठिन समय में कर्ण ने कौरव सेना की बागडोर अपने हाथों में ली।
वह जानता था कि अब इस युद्ध का परिणाम उसी के पराक्रम पर निर्भर है। दूसरी ओर पाण्डव सेना का नेतृत्व अर्जुन कर रहे थे। दोनों ही महान धनुर्धर थे और संपूर्ण आर्यावर्त उनकी वीरता का लोहा मानता था। इसलिए सभी की दृष्टि उस महान संग्राम पर टिक गई थी, जहाँ अंततः कर्ण और अर्जुन आमने-सामने आने वाले थे।
युद्ध के प्रारंभिक दिनों में कर्ण ने अपने अद्भुत पराक्रम से पाण्डव सेना में हाहाकार मचा दिया। उसने भीम, नकुल, सहदेव और युधिष्ठिर तक को कई बार युद्ध में परास्त किया, लेकिन माता कुन्ती को दिए अपने वचन के कारण उसने किसी भी पाण्डव का वध नहीं किया। वह केवल अर्जुन से अंतिम निर्णायक युद्ध चाहता था।
सत्रहवें दिन वह समय आ ही गया जब कुरुक्षेत्र की धरती पर दो महान योद्धा—कर्ण और अर्जुन—एक-दूसरे के सामने खड़े हुए। दोनों के रथों के चारों ओर भयंकर युद्ध होने लगा। आकाश बाणों से ढक गया और धरती अस्त्रों की टक्कर से काँपने लगी। देवता, ऋषि और समस्त योद्धा इस युद्ध को विस्मय से देख रहे थे।
कर्ण के हाथ में उसका दिव्य “विजय धनुष” था, जिसे उसके गुरु भगवान परशुराम ने उसे प्रदान किया था। वह धनुष अत्यंत शक्तिशाली था और स्वयं विश्वकर्मा द्वारा निर्मित माना जाता था। दूसरी ओर अर्जुन के रथ की लगाम स्वयं भगवान श्रीकृष्ण संभाल रहे थे।
दुर्योधन ने इस संतुलन को बनाए रखने के लिए पाण्डवों के मामा शल्य को कर्ण का सारथी बनने के लिए राजी किया था। शल्य युद्धकला और रथ संचालन में अत्यंत निपुण थे। युद्ध के दौरान जब अर्जुन के बाण कर्ण के रथ से टकराते, तो उसका रथ कई गज पीछे चला जाता। लेकिन जब कर्ण के बाण अर्जुन के रथ पर लगते, तब भी वह केवल थोड़ा ही पीछे खिसकता। यह देखकर अर्जुन को आश्चर्य हुआ।
तब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि कर्ण के रथ पर केवल कर्ण और शल्य का भार है, जबकि अर्जुन के रथ पर स्वयं वे और ध्वज पर विराजमान पवनपुत्र हनुमान भी उपस्थित हैं। इसके बावजूद कर्ण के बाण उनके रथ को पीछे धकेल देते हैं, यही उसके पराक्रम का प्रमाण है। कर्ण बार-बार अर्जुन के धनुष की प्रत्यंचा काट देता, लेकिन अर्जुन पलभर में नई प्रत्यंचा चढ़ाकर पुनः युद्ध शुरू कर देता।
यह देखकर स्वयं कर्ण भी अर्जुन की प्रशंसा करने लगा और शल्य से बोला कि अब उसे समझ आ गया है कि अर्जुन को संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर क्यों कहा जाता है। दोनों योद्धाओं ने अपने समस्त दिव्य अस्त्रों और युद्धकौशल का प्रयोग किया और युद्ध और भी भीषण होता गया।

युद्ध के मध्य कर्ण ने अपने सबसे घातक अस्त्र “नागास्त्र” का प्रयोग किया। वह अस्त्र सीधे अर्जुन का सिर धड़ से अलग करने के उद्देश्य से छोड़ा गया था। उसी समय भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य बुद्धि से अर्जुन के रथ को थोड़ा भूमि में धँसा दिया।
परिणामस्वरूप वह नागास्त्र अर्जुन के सिर के स्थान पर उसके मुकुट को भेदता हुआ निकल गया। अर्जुन का प्राण बच गया। उस नागास्त्र में उपस्थित अश्वसेन नामक नाग ने कर्ण से कहा कि वह उसे पुनः प्रयोग करे ताकि इस बार अर्जुन निश्चित रूप से मारा जाए। लेकिन कर्ण ने माता कुन्ती को दिए अपने वचन का स्मरण करते हुए ऐसा करने से इनकार कर दिया। वह छल से विजय प्राप्त नहीं करना चाहता था।
धीरे-धीरे युद्ध निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया। तभी धरती माता के श्राप के कारण कर्ण के रथ का पहिया भूमि में धँस गया। कर्ण उसे निकालने के लिए रथ से नीचे उतरा। उसी समय उसे अपने गुरु परशुराम का श्राप भी याद आया, जिसके कारण वह दिव्य अस्त्रों के मंत्र भूलने लगा था। उसने अर्जुन से कहा कि युद्ध के नियमों के अनुसार उसे कुछ समय दिया जाए ताकि वह अपने रथ का पहिया निकाल सके।
वह धर्म और मर्यादा की बात करने लगा। तभी भगवान श्रीकृष्ण का स्वर कठोर हो उठा। उन्होंने कर्ण को उसके पुराने कर्मों की याद दिलाई। श्रीकृष्ण बोले कि जब अभिमन्यु को अनेक महारथियों ने मिलकर अन्यायपूर्वक मारा था, तब उसका धर्म कहाँ था? जब द्रौपदी का अपमान पूरी सभा में किया गया, तब उसका धर्म कहाँ चला गया था?
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि यही वह क्षण है जिसका वे वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे थे। यदि आज कर्ण को नहीं रोका गया, तो पाण्डवों की विजय असंभव हो जाएगी। श्रीकृष्ण के शब्द सुनकर अर्जुन ने अपने दिव्य अस्त्र का संधान किया और एक प्रचंड बाण कर्ण की ओर छोड़ दिया। वह बाण वज्र के समान वेग से गया और कर्ण का सिर धड़ से अलग कर दिया।
जैसे ही कर्ण भूमि पर गिरा, उसके शरीर से एक तेजस्वी ज्योति निकली और सूर्यदेव में समाहित हो गई। ऐसा प्रतीत हुआ मानो सूर्य का अंश पुनः अपने मूल स्वरूप में लौट गया हो। कर्ण के पतन के साथ ही कौरवों की सबसे बड़ी शक्ति समाप्त हो गई।
कर्ण की मृत्यु के बाद कौरव सेना पूरी तरह टूट गई। इसके बाद मद्रदेश के राजा शल्य को कौरव सेना का सेनापति बनाया गया। शल्य वीर और पराक्रमी योद्धा थे, लेकिन अब युद्ध की दिशा बदल चुकी थी।
पाण्डव सेना उत्साह से भर उठी थी जबकि कौरव पक्ष निराशा में डूब चुका था। शल्य ने आधे दिन तक भीषण युद्ध किया और अनेक पाण्डव सैनिकों का वध किया, किन्तु अंततः धर्मराज युधिष्ठिर स्वयं उनके सामने आए। दोनों के बीच घोर युद्ध हुआ और दोपहर होते-होते युधिष्ठिर ने शल्य का वध कर दिया। शल्य के मारे जाने के बाद कौरव सेना पूरी तरह पराजित हो गई और दुर्योधन का अंत भी निकट आ पहुँचा।
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महाभारत भारतीय संस्कृति का महान महाकाव्य है। इसमें कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध, धर्म-अधर्म, सत्य, कर्तव्य और मानव जीवन के मूल्यों का वर्णन किया गया है। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित यह ग्रंथ भारतीय इतिहास, दर्शन और नैतिक शिक्षा का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।
लेखक / मूल रचनाकार: वेद व्यास
प्रस्तुति: Saying Central Team





