महाभारत

महाभारत पाण्डवों का राज्य और श्रीकृष्ण

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महाभारत: तेरह वर्षों का वनवास और अज्ञातवास पूर्ण करने के बाद पाण्डवों के जीवन में एक नया मोड़ आया। विराट नगर में रहते हुए उन्होंने अपनी पहचान गुप्त रखी थी, लेकिन जब राजा विराट के राज्य पर आक्रमण हुआ और अर्जुन ने अकेले ही कौरव सेना को पराजित कर दिया, तब पाण्डवों ने स्वयं को प्रकट कर दिया। अपने राज्य की रक्षा और पाण्डवों के अद्भुत पराक्रम को देखकर राजा विराट अत्यंत प्रसन्न हुए।

उन्हें यह जानकर गर्व हुआ कि इतने महान वीर उनके महल में रह रहे थे। उन्होंने पाण्डवों का बड़े सम्मान के साथ स्वागत किया और अपनी पुत्री उत्तरा का विवाह अर्जुन पुत्र अभिमन्यु के साथ करने का निर्णय लिया।

अभिमन्यु और उत्तरा का विवाह अत्यंत भव्य और दिव्य समारोह के रूप में सम्पन्न हुआ। इस शुभ अवसर पर द्वारिका से भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और यादव वंश के अनेक वीर उपस्थित हुए। साथ ही आर्यावर्त के अनेक राजा-महाराजा भी विवाह में सम्मिलित हुए। पूरा विराट नगर उत्सव और आनंद से भर उठा।

इस विवाह ने पाण्डवों और विराट राज्य के संबंधों को और अधिक मजबूत कर दिया। विवाह के पश्चात् पाण्डवों ने यह विचार किया कि अब समय आ गया है कि वे अपना खोया हुआ राज्य वापस माँगें, क्योंकि उन्होंने द्यूतसभा में हुए समझौते के अनुसार अपना वनवास और अज्ञातवास पूर्ण कर लिया था।

धर्मराज युधिष्ठिर युद्ध नहीं चाहते थे। वे चाहते थे कि न्याय और धर्म के अनुसार उनका राज्य उन्हें शांति से वापस मिल जाए। इसलिए उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को अपना दूत बनाकर हस्तिनापुर भेजा। जब श्रीकृष्ण धृतराष्ट्र की सभा में पहुँचे, तब उनका अत्यंत सम्मानपूर्वक स्वागत किया गया।

सभा में भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, विदुर, कृपाचार्य और अनेक महर्षि उपस्थित थे। भगवान श्रीकृष्ण ने शांत किंतु दृढ़ स्वर में कहा कि पाण्डवों ने अपना वचन निभाया है। उन्होंने बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास पूर्ण किया है, इसलिए अब कौरवों को भी धर्म का पालन करते हुए पाण्डवों को उनका आधा राज्य लौटा देना चाहिए।

श्रीकृष्ण की बात सुनकर सभा में उपस्थित भीष्म, विदुर, द्रोणाचार्य और महर्षि परशुराम जैसे महान लोगों ने भी धृतराष्ट्र को यही सलाह दी कि न्याय का मार्ग अपनाना ही उचित होगा। वे जानते थे कि यदि अब भी दुर्योधन नहीं माना, तो भयंकर युद्ध निश्चित है। किन्तु दुर्योधन के हृदय में अहंकार और द्वेष इतना भर चुका था कि उसने किसी की बात नहीं मानी।

वह क्रोध से भरकर बोला कि राज्य पर केवल उसका अधिकार है। उसने कहा कि उसके पिता धृतराष्ट्र ज्येष्ठ होने के बावजूद अंधत्व के कारण राजा नहीं बन सके और पाण्डु ने राज्य प्राप्त कर लिया। इसलिए अब वह किसी भी परिस्थिति में पाण्डवों को भूमि का एक छोटा सा टुकड़ा भी नहीं देगा।

दुर्योधन ने सभा में घमंड से कहा कि यदि पाण्डवों को राज्य चाहिए, तो उन्हें युद्ध करके लेना होगा। उसकी यह कठोर और अन्यायपूर्ण बात सुनकर सभा में उपस्थित सभी लोग दुःखी हो उठे। धृतराष्ट्र स्वयं भीतर से भयभीत थे, लेकिन पुत्रमोह के कारण वे दुर्योधन को रोक नहीं सके।

जब भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि अब शांति का कोई मार्ग शेष नहीं है, तब वे हस्तिनापुर से लौटकर पाण्डवों के पास आए और उन्हें सारी स्थिति बताई। इसके साथ ही यह स्पष्ट हो गया कि अब महाभारत का महान युद्ध अवश्य होगा। दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी सेनाएँ और मित्र राजाओं को एकत्र करना प्रारंभ कर दिया।

युद्ध की तैयारी के बीच एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना घटी। दुर्योधन ने सोचा कि यदि उसे भगवान श्रीकृष्ण और उनकी विशाल नारायणी सेना का साथ मिल जाए, तो विजय निश्चित हो जाएगी। इसी उद्देश्य से वह द्वारिका पहुँचा। उसी समय अर्जुन भी श्रीकृष्ण से सहायता लेने के लिए वहाँ पहुँचे। जब दोनों पहुँचे, तब भगवान श्रीकृष्ण विश्राम कर रहे थे।

दुर्योधन जाकर उनके सिरहाने बैठ गया, जबकि अर्जुन विनम्रता से उनके चरणों के पास बैठ गए। कुछ समय बाद जब श्रीकृष्ण की आँख खुली, तब उनकी पहली दृष्टि अर्जुन पर पड़ी। उन्होंने मुस्कराकर अर्जुन से उनके आने का कारण पूछा।

इतने में दुर्योधन भी बोल उठा और कहने लगा कि वह पहले आया था, इसलिए सहायता माँगने का पहला अधिकार उसी का है। भगवान श्रीकृष्ण ने दोनों की बात सुनकर मुस्कराते हुए कहा कि वे दोनों की सहायता करेंगे, लेकिन एक को उनकी विशाल नारायणी सेना मिलेगी और दूसरे को वे स्वयं मिलेंगे।

साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि वे युद्ध में शस्त्र नहीं उठाएँगे। अब निर्णय दोनों को करना था। दुर्योधन के मन में केवल सेना का लोभ था, जबकि अर्जुन के हृदय में भगवान के प्रति श्रद्धा और विश्वास था।

अर्जुन ने बिना किसी संकोच के भगवान श्रीकृष्ण को चुन लिया। उन्होंने कहा कि उन्हें सेना नहीं चाहिए, वे केवल श्रीकृष्ण का साथ चाहते हैं। यह सुनकर दुर्योधन भीतर ही भीतर अत्यंत प्रसन्न हुआ, क्योंकि उसे वही मिला जिसकी उसे इच्छा थी—श्रीकृष्ण की विशाल सेना। वह खुशी-खुशी द्वारिका से चला गया।

उसके जाने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से पूछा कि जब वे युद्ध में शस्त्र भी नहीं उठाएँगे, तब भी अर्जुन ने उन्हें क्यों चुना। अर्जुन ने विनम्रता से उत्तर दिया कि जहाँ भगवान होते हैं, वहीं धर्म और विजय होती है। उन्होंने कहा कि उनकी सबसे बड़ी इच्छा यह है कि भगवान स्वयं उनके सारथी बनें।

अर्जुन की श्रद्धा और प्रेम से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने उनका सारथी बनना स्वीकार कर लिया। यह केवल एक सारथी और योद्धा का संबंध नहीं था, बल्कि यह धर्म और सत्य का साथ था। एक ओर दुर्योधन के पास विशाल सेना थी, तो दूसरी ओर पाण्डवों के साथ स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण थे। उसी क्षण से यह निश्चित हो गया था कि अंततः विजय धर्म की ही होगी।

महाभारत कीचक वध और अर्जुन

पाण्डव अपने अज्ञातवास के अंतिम वर्ष में मत्स्य देश के राजा विराट के यहाँ भिन्न-भिन्न रूप धारण करके रह रहे थे। धर्मराज युधिष्ठिर “कंक” नाम से राजसभा में मंत्री बने हुए थे, भीमसेन “बल्लभ” नामक रसोइए के रूप में कार्य कर रहे थे, अर्जुन “वृहन्नला” बनकर राजकुमारी उत्तरा को नृत्य-संगीत सिखा रहे थे, नकुल अश्वशाला और सहदेव गौशाला की देखभाल कर रहे थे। द्रौपदी “सैरन्ध्री” के रूप में महारानी सुदेष्णा की दासी बनकर रह रही थीं। इस प्रकार दस महीने शांति से बीत गए, किन्तु एक दिन ऐसी घटना घटी जिसने पूरे विराट नगर को हिला दिया।

राजा विराट का साला कीचक अत्यंत बलशाली, घमंडी और कामुक स्वभाव का व्यक्ति था। राज्य की सेना का प्रधान होने के कारण वह अपने बल पर अत्यधिक अहंकार करता था। एक दिन जब उसकी दृष्टि सैरन्ध्री बनी द्रौपदी पर पड़ी, तो वह उस पर मोहित हो गया। उसकी आँखों में वासना साफ झलक रही थी।

द्रौपदी ने उसकी कुदृष्टि को तुरंत पहचान लिया और भयभीत हो उठीं। उन्होंने महारानी सुदेष्णा और राजा विराट दोनों को चेतावनी दी कि कीचक उनके प्रति अनुचित भाव रखता है और यदि उसने सीमा लाँघी, तो उनके पाँच गंधर्व पति उसका अंत कर देंगे। किन्तु कीचक के प्रभाव और भय के कारण किसी ने द्रौपदी की बात को गंभीरता से नहीं लिया।

धीरे-धीरे कीचक का साहस बढ़ता गया। वह अवसर मिलते ही द्रौपदी को अकेले में परेशान करने का प्रयास करता। अंततः दुखी और अपमानित होकर द्रौपदी ने भीमसेन को सारी बात बताई। द्रौपदी की आँखों में आँसू और अपमान की अग्नि देखकर भीमसेन का क्रोध भड़क उठा।

उन्होंने तुरंत कीचक को दंड देने का निश्चय कर लिया। भीम ने द्रौपदी से कहा कि वह कीचक को आधी रात नृत्यशाला में मिलने का संदेश भेज दे। वहाँ उसके स्थान पर स्वयं भीम उपस्थित होंगे और उसी रात उस दुष्ट का अंत कर देंगे।

द्रौपदी ने योजना के अनुसार कीचक को संकेत दे दिया। कामांध कीचक प्रसन्न होकर रात्रि के समय नृत्यशाला में पहुँचा। वहाँ अंधेरे में एक स्त्री समान आकृति लेटी हुई दिखाई दी। वह समझा कि सैरन्ध्री उसका इंतजार कर रही है। जैसे ही वह उसके निकट पहुँचा और वासनापूर्ण बातें करने लगा, उसी क्षण भीमसेन क्रोध से दहाड़ते हुए उठ खड़े हुए। उन्होंने कहा कि सामने सैरन्ध्री नहीं, बल्कि उसकी मृत्यु खड़ी है। इतना सुनते ही कीचक भयभीत हो उठा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

भीमसेन ने कीचक को पकड़कर उस पर घूँसों और लातों की वर्षा कर दी। पूरी नृत्यशाला उनके भयंकर संघर्ष से काँप उठी। कीचक भी बलवान था, इसलिए उसने भी पूरा जोर लगाया, किन्तु भीमसेन के सामने उसकी शक्ति तिनके समान सिद्ध हुई। भीम उसे कभी दीवारों से पटकते, कभी भूमि पर घसीटते। अंत में उन्होंने अपनी विशाल भुजाओं से उसकी गर्दन मरोड़ दी और उसे पशु की भाँति मार डाला।

कीचक का शरीर पहचानने योग्य भी नहीं बचा। उसकी मृत्यु देखकर द्रौपदी के हृदय को वर्षों बाद कुछ शांति मिली। इसके बाद भीम और द्रौपदी चुपचाप अपने-अपने स्थान पर लौट गए ताकि किसी को उन पर संदेह न हो।

प्रातःकाल जब कीचक के मारे जाने का समाचार फैला, तब पूरे विराट नगर में हड़कंप मच गया। महारानी सुदेष्णा, राजा विराट और कीचक के भाई शोक और क्रोध से भर उठे। द्रौपदी ने सबके सामने कहा कि यह उसके गंधर्व पतियों का दंड है, क्योंकि कीचक ने उस पर बुरी दृष्टि डाली थी।

यह सुनकर कीचक के भाई और भी क्रोधित हो गए। उन्होंने निर्णय लिया कि सैरन्ध्री को भी कीचक की चिता के साथ जीवित जला दिया जाए। वे जबरदस्ती द्रौपदी को बाँधकर श्मशान की ओर ले जाने लगे। यह दृश्य देखकर पाण्डवों का हृदय क्रोध और वेदना से भर उठा, लेकिन अज्ञातवास के कारण वे खुलकर कुछ नहीं कर सकते थे।

किन्तु भीमसेन से यह अन्याय सहन नहीं हुआ। वे गुप्त रूप से श्मशान पहुँचे और एक विशाल वृक्ष उखाड़कर कीचक के भाइयों पर टूट पड़े। उनके प्रचंड प्रहारों से अनेक लोग वहीं मारे गए और बाकी भयभीत होकर भाग निकले। भीम ने द्रौपदी को मुक्त कराया और उन्हें सांत्वना देकर महल वापस भेज दिया।

इसके बाद वे स्वयं भी सामान्य रूप से अपने स्थान पर लौट आए ताकि किसी को उनकी पहचान का संदेह न हो। इस घटना के बाद विराट नगर के लोग सैरन्ध्री से भयभीत रहने लगे और समझने लगे कि उसके पीछे वास्तव में कोई अदृश्य शक्ति है।

कीचक के वध का समाचार शीघ्र ही हस्तिनापुर तक पहुँच गया। कीचक इतना पराक्रमी था कि कौरव और अन्य राजा भी उससे भय खाते थे। उसकी मृत्यु सुनकर दुर्योधन को संदेह हुआ कि पाण्डव अवश्य ही विराट नगर में छिपे हुए हैं। इसी संदेह के कारण कौरवों ने विराट राज्य की गौएँ हरण करने के उद्देश्य से आक्रमण कर दिया। उस समय राजा विराट और उनकी सेना राज्य से बाहर थे।

नगर की रक्षा का भार राजकुमार उत्तर पर आ पड़ा। लेकिन जब उसने कौरवों की विशाल सेना और भीष्म, द्रोण, कर्ण तथा दुर्योधन जैसे महारथियों का नाम सुना, तो उसका साहस टूट गया।

द्रौपदी ने राजकुमार उत्तर को कायरता छोड़कर युद्ध करने के लिए प्रेरित किया और सुझाव दिया कि वृहन्नला को सारथी बना लिया जाए। राजकुमार उत्तर तैयार हो गया और वृहन्नला को साथ लेकर युद्धभूमि की ओर चल पड़ा। मार्ग में अर्जुन ने उस श्मशान के पास रथ रोका जहाँ पाण्डवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र छिपाए थे। उन्होंने अपने दिव्य हथियार निकाल लिए।

उसी समय उनका अज्ञातवास पूर्ण हो चुका था और उर्वशी के श्राप के कारण मिली नपुंसकता भी समाप्त हो गई थी। युद्धभूमि के निकट पहुँचकर जब राजकुमार उत्तर ने कौरवों की विशाल सेना देखी, तो भय से काँप उठा और युद्ध छोड़कर भागने लगा।

तब अर्जुन ने उसे रोककर अपना वास्तविक परिचय दिया। उन्होंने कहा कि वे ही पाण्डुपुत्र अर्जुन हैं और कंक, बल्लभ, तन्तिपाल तथा ग्रान्थिक वास्तव में उनके भाई हैं। यह सुनकर राजकुमार उत्तर आश्चर्य और आनंद से भर गया। उसने अर्जुन के चरण पकड़ लिए और सारथी बनकर रथ संभाल लिया।

अर्जुन ने अपना देवदत्त शंख बजाया, जिसकी गूँज पूरे रणक्षेत्र में फैल गई। उस ध्वनि को सुनकर भीष्म और द्रोण समझ गए कि अर्जुन लौट आया है। दुर्योधन ने कहा कि पाण्डवों का अज्ञातवास पूरा नहीं हुआ, लेकिन भीष्म ने स्पष्ट कर दिया कि समय पूर्ण हो चुका है।

इसके बाद अर्जुन ने अकेले ही कौरव सेना पर धावा बोल दिया। उनके बाणों की वर्षा से कौरव सेना में भगदड़ मच गई। उन्होंने दुर्योधन को घेर लिया और उसके सैनिकों को तितर-बितर कर दिया। कर्ण अर्जुन के सामने आया, किन्तु अर्जुन के प्रचंड प्रहारों से उसका रथ, घोड़े और सारथी नष्ट हो गए और वह युद्धभूमि छोड़कर भाग निकला।

भीष्म और द्रोण ने भी अर्जुन को रोकने का प्रयास किया, लेकिन अर्जुन उनके हर बाण को आकाश में ही काट देते थे। अंततः कौरव सेना पराजित होकर पीछे हट गई और विराट राज्य की सारी गौएँ सुरक्षित वापस लौटा दी गईं। विजय प्राप्त करके अर्जुन और राजकुमार उत्तर विराट नगर लौट आए, और उसी के साथ पाण्डवों का अज्ञातवास सफलतापूर्वक समाप्त हो गया।

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महाभारत भारतीय संस्कृति का महान महाकाव्य है। इसमें कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध, धर्म-अधर्म, सत्य, कर्तव्य और मानव जीवन के मूल्यों का वर्णन किया गया है। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित यह ग्रंथ भारतीय इतिहास, दर्शन और नैतिक शिक्षा का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।

 लेखक / मूल रचनाकार: वेद व्यास
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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