माइकल फैराडे – इलेक्ट्रिक मोटर
यह कहानी लंदन के एक बेहद गरीब और तंग इलाके से शुरू होती है, जहाँ एक ब्लैकस्मिथ यानी लोहार का परिवार रहता था। साल 1791 में जन्मे माइकल फैराडे का बचपन अभावों और दुखों की एक ऐसी लंबी दास्तान था, जिसने उन्हें कम उम्र में ही जीवन की कठोर वास्तविकताओं से रूबरू करा दिया था।
उनके पिता जेम्स अक्सर बीमार रहते थे, जिसकी वजह से परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि माइकल को सप्ताह में केवल एक पाव रोटी से गुजारा करना पड़ता था। स्कूल जाने की उम्र में उन्हें केवल बुनियादी पढ़ना और लिखना सिखाया गया, लेकिन स्थानीय स्कूल के मास्टर के सख्त और अपमानजनक रवैये के कारण उनकी माँ ने उन्हें स्कूल से निकाल लिया।
इस तरह, आधुनिक विज्ञान की नींव रखने वाले इस महान वैज्ञानिक की औपचारिक शिक्षा बचपन में ही पूरी तरह से समाप्त हो गई थी। लेकिन माइकल के भीतर एक ऐसी चीज थी जिसे गरीबी भी नहीं दबा सकी, और वह थी उनके भीतर की अदम्य जिज्ञासा और कुछ नया सीखने की कभी न खत्म होने वाली प्यास, जिसने उन्हें हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
जब माइकल फैराडे केवल 13 वर्ष के थे, तब उन्हें अपने परिवार की मदद करने के लिए काम पर निकलना पड़ा। उन्हें लंदन के एक बुकबाइंडर और स्टेशनर, जॉर्ज रिबाउ की दुकान पर एक अखबार बांटने वाले लड़के के रूप में काम मिला। माइकल दिन भर पूरे शहर की गलियों में घूम-घूम कर भारी-भरकम अखबार बांटते थे और शाम को थक-हार कर दुकान पर लौटते थे।
उनकी मेहनत और ईमानदारी को देखकर जॉर्ज रिबाउ बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने एक साल बाद माइकल को अपनी दुकान पर बिना कोई फीस लिए बुकबाइंडर की नौकरी पर रख लिया। यह माइकल के जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ क्योंकि अब उनके सामने किताबों का एक समंदर था।
जब भी दिन भर का काम खत्म होता और दुकान की बत्तियां बुझने का वक्त आता, माइकल मोमबत्ती की मद्धम रोशनी में उन किताबों को बाइंड करने के बजाए उन्हें पढ़ना शुरू कर देते थे। उन्होंने इतिहास, कला, साहित्य और दर्शन की सैकड़ों किताबें पढ़ीं, लेकिन दो किताबों ने उनके दिमाग पर सबसे गहरा असर डाला—पहली थी ‘इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ और दूसरी थी जेन मैर्सेट की ‘केमिस्ट्री पर बातचीत’।
जिज्ञासा का उदय और विज्ञान की ओर पहला कदम
किताबों की उस छोटी सी दुकान में काम करते हुए माइकल फैराडे का झुकाव धीरे-धीरे विज्ञान की ओर होने लगा। विशेष रूप से इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में बिजली यानी इलेक्ट्रिसिटी पर लिखे गए एक लंबे लेख ने उनके दिमाग में कौतूहल पैदा कर दिया।
उस जमाने में बिजली को एक जादुई और रहस्यमयी चीज माना जाता था, जिसके बारे में दुनिया बहुत कम जानती थी। फैराडे सिर्फ पढ़कर संतुष्ट होने वाले इंसान नहीं थे; वे जो कुछ भी पढ़ते थे, उसे खुद अपनी आंखों से देखना चाहते थे।
उन्होंने अपनी बेहद कम कमाई में से कुछ पैसे बचाकर कबाड़ से पुरानी चीजें खरीदना शुरू किया, जैसे टूटी हुई कांच की बोतलें, तांबे के तार और पुराने जस्ते के टुकड़े। इन मामूली चीजों की मदद से उन्होंने अपनी दुकान के एक छोटे से कोने में अपनी पहली घरेलू प्रयोगशाला बनाई।
वहाँ उन्होंने खुद से एक ‘इलेक्ट्रोस्टैटिक जेनरेटर’ का निर्माण किया और छोटे-छोटे रासायनिक प्रयोग करने लगे। उनके मालिक जॉर्ज रिबाउ उनके इस वैज्ञानिक जुनून को देखकर हैरान थे और उन्होंने माइकल को कभी टोकने के बजाय हमेशा प्रोत्साहित किया।
फैराडे की यह वैज्ञानिक यात्रा तब एक नए स्तर पर पहुंच गई जब उन्होंने लंदन की ‘सिटी फिलॉसॉफिकल सोसाइटी’ के बारे में सुना। यह एक ऐसा समूह था जहाँ युवा और उत्साही लोग हर हफ्ते इकट्ठा होते थे और विज्ञान, खगोलशास्त्र और भौतिकी पर चर्चा करते थे।
माइकल ने अपने भाई रॉबर्ट की मदद से, जिसने उन्हें प्रवेश शुल्क के लिए कुछ पैसे उधार दिए थे, इन व्याख्यानों में जाना शुरू किया। वहाँ वे पूरी रात बैठकर वैज्ञानिकों के भाषण सुनते थे और एक-एक शब्द को अपनी सुंदर लिखावट में नोट करते थे। फैराडे के पास स्केच बनाने का एक अद्भुत हुनर था, इसलिए वे प्रयोगों के उपकरणों के विस्तृत चित्र भी अपनी कॉपियों में बना लेते थे।
इन सभाओं ने उनके विचारों को एक नई दिशा दी और उन्हें यह अहसास कराया कि उनका जन्म बुकबाइंडिंग के लिए नहीं, बल्कि विज्ञान की दुनिया में कुछ महान क्रांतिकारी काम करने के लिए हुआ है। अब उनका पूरा ध्यान इस बात पर था कि वे कैसे किसी तरह विज्ञान की मुख्यधारा से जुड़ सकें।
साल 1812 में माइकल फैराडे के जीवन में एक और चमत्कारी घटना घटी, जिसने उनके भाग्य को हमेशा के लिए बदल दिया। उनकी दुकान पर आने वाले एक ग्राहक, विलियम डांस ने माइकल की विज्ञान के प्रति दीवानगी को देखा था।
उन्होंने माइकल को उस समय के दुनिया के सबसे मशहूर और महान रसायनशास्त्री सर हम्फ्री डेवी के आखिरी चार व्याख्यानों के टिकट उपहार में दिए, जो ‘रॉयल इंस्टीट्यूशन ऑफ ग्रेट ब्रिटेन’ में होने वाले थे। फैराडे के लिए यह किसी सपने के सच होने जैसा था क्योंकि सर हम्फ्री डेवी उस दौर के विज्ञान जगत के रॉकस्टार थे। फैराडे रॉयल इंस्टीट्यूशन की गैलरी में सबसे आगे बैठकर डेवी के हर एक शब्द को मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे।
उन्होंने डेवी के व्याख्यानों और प्रयोगों के बेहद विस्तृत, साफ और सुंदर नोट्स तैयार किए, जो लगभग 300 पन्नों की एक मोटी किताब बन गई। फैराडे ने इस किताब को खुद अपने हाथों से चमड़े की शानदार बाइंडिंग दी, और उनके मन में एक अजीब सी उम्मीद जागने लगी कि शायद यही उनके भविष्य का रास्ता है।
रॉयल इंस्टीट्यूशन का सफर और अपमान की कड़वाहट
बुकबाइंडर के रूप में माइकल फैराडे की सात साल की अप्रेंटिसशिप अब खत्म होने वाली थी और वे एक पूर्ण कारीगर बनने जा रहे थे। लेकिन उनका दिल अब इस काम में बिल्कुल नहीं लगता था; वे हर हाल में सर हम्फ्री डेवी के साथ काम करना चाहते थे।
उन्होंने पूरी हिम्मत जुटाकर अपने बनाए हुए उन 300 पन्नों के खूबसूरत नोट्स को सर हम्फ्री डेवी को एक पत्र के साथ भेज दिया, जिसमें उन्होंने विज्ञान की सेवा करने की अपनी इच्छा व्यक्त की थी। डेवी उन नोट्स की सटीकता और सुंदरता को देखकर दंग रह गए, लेकिन उन्होंने फैराडे को बुलाकर बहुत ही प्यार से समझाया कि विज्ञान एक बहुत ही अनिश्चित क्षेत्र है जिसमें पैसा नहीं है, इसलिए उन्हें बुकबाइंडिंग का अपना सुरक्षित पेशा नहीं छोड़ना चाहिए।
फैराडे निराश तो हुए, लेकिन उन्होंने अपनी उम्मीद नहीं छोड़ी। कुछ ही समय बाद, रॉयल इंस्टीट्यूशन की प्रयोगशाला में एक दुर्घटना हुई जिसमें एक विस्फोट के कारण डेवी की आंखें अस्थाई रूप से चोटिल हो गईं। डेवी को तुरंत एक ऐसे सहायक की जरूरत थी जो उनकी बातों को लिख सके, और उन्हें तुरंत उस होनहार लड़के माइकल फैराडे की याद आई।
मार्च 1813 में माइकल फैराडे को आधिकारिक तौर पर रॉयल इंस्टीट्यूशन में एक लैब असिस्टेंट के रूप में नियुक्त किया गया। हालांकि उनका वेतन बहुत कम था और उनका मुख्य काम प्रयोगशाला की सफाई करना, बोतलों को धोना और रसायनों को तैयार करना था, लेकिन फैराडे के लिए यह दुनिया की सबसे बेहतरीन जगह थी।
वे दिन-रात सर हम्फ्री डेवी के साथ काम करते थे और उनकी हर तकनीक को बहुत करीब से सीखते थे। जल्द ही, डेवी ने फैराडे को यूरोप के एक लंबे दौरे पर अपने साथ ले जाने का फैसला किया। यह दौरा फैराडे के लिए विज्ञान की एक महान यूनिवर्सिटी साबित हुआ क्योंकि उन्हें एम्पीयर, वोल्टा और गे-लुसाक जैसे यूरोप के सबसे बड़े वैज्ञानिकों से मिलने का मौका मिला।
लेकिन इस यात्रा का एक स्याह पहलू भी था; सर हम्फ्री डेवी की पत्नी, जेन एप्रीस, एक घमंडी और कुलीन वर्ग की महिला थीं। वे फैराडे को एक अदना नौकर समझती थीं और उनके साथ बेहद अपमानजनक व्यवहार करती थीं। वे फैराडे को अपने साथ बग्गी में बैठने नहीं देती थीं और नौकरों के साथ खाना खाने पर मजबूर करती थीं, जिससे फैराडे मानसिक रूप से बहुत आहत होते थे।
इस अपमान और मानसिक प्रताड़ना के बावजूद, माइकल फैराडे ने कभी हार नहीं मानी और अपना पूरा ध्यान केवल और केवल विज्ञान पर केंद्रित रखा।
यूरोप से लौटने के बाद, रॉयल इंस्टीट्यूशन में उनकी जिम्मेदारियां बढ़ गईं और वे अब सिर्फ एक सफाई करने वाले सहायक नहीं थे, बल्कि एक कुशल रसायनशास्त्री बन चुके थे। उन्होंने स्टील के नए मिश्र धातुओं पर शोध किया और कांच के निर्माण की नई तकनीकों का आविष्कार किया, जिससे रॉयल इंस्टीट्यूशन को भारी वित्तीय लाभ हुआ।
लेकिन फैराडे का असली शौक और झुकाव अभी भी भौतिकी और बिजली की उस अनसुलझी दुनिया की तरफ था, जो उस समय के वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली बनी हुई थी। वे जानते थे कि प्रकृति के नियम बहुत ही सरल और आपस में जुड़े हुए हैं, और इसी विश्वास के साथ वे हर दिन प्रयोगशाला में देर रात तक अकेले काम करते रहते थे।
उनके मन में यह विचार बार-बार आता था कि अगर बिजली से चुंबकत्व पैदा हो सकता है, तो क्या इसका उल्टा संभव नहीं है, और यही विचार आगे चलकर इतिहास रचने वाला था।
ओर्स्टेड की खोज और फैराडे का नया विचार

साल 1820 में विज्ञान की दुनिया में एक बहुत बड़ा धमाका हुआ जब डेनमार्क के वैज्ञानिक हंस क्रिश्चियन ओर्स्टेड ने एक अभूतपूर्व खोज की। ओर्स्टेड ने अपने एक प्रयोग के दौरान देखा कि जब किसी तांबे के तार से बिजली की धारा प्रवाहित की जाती है, तो उसके पास रखी हुई चुंबकीय सुई (कंपास) अपनी जगह से विक्षेपित हो जाती है, यानी हिलने लगती है।
इस खोज ने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों को हिलाकर रख दिया क्योंकि इससे पहले तक बिजली और चुंबकत्व को दो बिल्कुल अलग-अलग ताकतें माना जाता था। ओर्स्टेड के इस प्रयोग ने यह साबित कर दिया था कि बिजली की धारा अपने चारों तरफ एक अदृश्य चुंबकीय क्षेत्र पैदा करती है। जब यह खबर लंदन पहुंची, तो सर हम्फ्री डेवी और उनके दोस्त विलियम वोलास्टन ने तुरंत इस पर काम करना शुरू कर दिया।
वे यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि इस चुंबकीय प्रभाव का उपयोग करके किसी वस्तु को लगातार कैसे घुमाया जा सकता है, लेकिन वे अपने तमाम प्रयासों के बावजूद पूरी तरह से असफल रहे और उन्होंने हार मान ली।
माइकल फैराडे ने डेवी और वोलास्टन की इस विफलता को बहुत करीब से देखा था और उनके तेज दिमाग ने इस समस्या को एक बिल्कुल अलग नजरिए से देखना शुरू किया। फैराडे का मानना था कि ओर्स्टेड की खोज केवल एक शुरुआत है और बिजली की इस चुंबकीय शक्ति में कुछ ऐसा छिपा है जिसे बाकी वैज्ञानिक देख नहीं पा रहे हैं।
उन्होंने सोचा कि यदि बिजली का तार चुंबक को प्रभावित कर सकता है, तो चुंबक भी बिजली के तार को प्रभावित करना चाहिए। फैराडे के पास उच्च स्तर की गणितीय शिक्षा नहीं थी, लेकिन उनकी सबसे बड़ी ताकत थी उनकी अद्भुत कल्पना शक्ति, जिसके जरिए वे अदृश्य ताकतों और रेखाओं को अपने दिमाग में साफ देख सकते थे। उन्होंने बिजली की धारा से निकलने वाली ताकतों को ‘लाइन ऑफ फोर्स’ यानी बल की रेखाओं के रूप में सोचना शुरू किया।
उन्होंने कल्पना की कि ये रेखाएं तार के चारों ओर एक गोलाकार चक्र की तरह घूमती हैं, और यदि इस चक्र को सही तरीके से नियंत्रित किया जाए, तो इससे लगातार गति पैदा की जा सकती है।
अपने इस क्रांतिकारी विचार को सच साबित करने के लिए फैराडे ने सितंबर 1821 में रॉयल इंस्टीट्यूशन की अपनी प्रयोगशाला में एक बेहद सरल लेकिन ऐतिहासिक प्रयोग की तैयारी शुरू की। उन्होंने एक गहरा कांच का बर्तन लिया और उसके तल में एक साधारण सीधा चुंबक खड़ा कर दिया, जिसे उन्होंने मोम की मदद से बर्तन के नीचे पूरी तरह से फिक्स कर दिया था।
इसके बाद उन्होंने उस बर्तन में आधा ऊपर तक पारा यानी मरकरी भर दिया, जो कि बिजली का एक बहुत अच्छा सुचालक होता है। फिर उन्होंने छत से एक तांबे का पतला तार लटकाया, जो पारे की सतह को सिर्फ छू रहा था और वह पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से हिल-डुल सकता था।
इस पूरे सेटअप को उन्होंने एक शक्तिशाली बैटरी से जोड़ दिया ताकि तार और पारे के माध्यम से बिजली की धारा प्रवाहित की जा सके। यह एक ऐसा क्षण था जब विज्ञान का पूरा इतिहास एक नई करवट लेने जा रहा था और फैराडे की धड़कनें बहुत तेज थीं।
इतिहास का पहला इलेक्ट्रिक मोटर और विवाद की आग
जैसे ही माइकल फैराडे ने उस सर्किट को पूरा किया और बैटरी से बिजली की धारा उस लटकते हुए तांबे के तार में बहने लगी, प्रयोगशाला में एक अद्भुत और अकल्पनीय चमत्कार हुआ। वह लटकता हुआ तांबे का तार उस स्थिर चुंबक के चारों ओर गोल-गोल चक्कर काटने लगा, और उसकी गति बहुत ही सुचारू और निरंतर थी।
फैराडे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं कर पा रहे थे; उन्होंने इतिहास में पहली बार बिजली की ऊर्जा को सीधे यांत्रिक ऊर्जा यानी मैकेनिकल मोशन में बदल दिया था। यह दुनिया का सबसे पहला ‘इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रोटेशन’ का प्रयोग था, जिसे आज हम इलेक्ट्रिक मोटर के नाम से जानते हैं।
फैराडे खुशी से झूम उठे और उन्होंने चिल्लाकर अपने साले जॉर्ज को बुलाया जो पास ही काम कर रहा था, ताकि वह भी इस चमत्कार को देख सके। दोनों ने मिलकर उस नाचते हुए तार को घंटो देखा; यह एक ऐसी खोज थी जिसने आने वाले मानवीय इतिहास और पूरी आधुनिक सभ्यता की दिशा और दशा को हमेशा-हमेशा के लिए बदल कर रख दिया था।
फैराडे ने तुरंत अपनी इस महान खोज पर एक विस्तृत शोध पत्र लिखा और उसे ‘त्रैमासिक विज्ञान पत्रिका’ में प्रकाशित करवा दिया। यह खबर जंगल की आग की तरह पूरी दुनिया में फैल गई और माइकल फैराडे रातों-रात विज्ञान की दुनिया के एक चमकते हुए सितारे बन गए।
लेकिन इस अपार सफलता के साथ ही उनके जीवन में एक भयानक और दर्दनाक तूफान भी आया। उनके गुरु सर हम्फ्री डेवी और विलियम वोलास्टन ने फैराडे पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने वोलास्टन के विचारों को चुराया है और उन्हें बिना कोई क्रेडिट दिए अपनी खोज के रूप में पेश कर दिया है।
यह आरोप फैराडे के ईमानदार चरित्र पर एक बहुत बड़ा और गहरा दाग था, जिसने उन्हें भीतर से पूरी तरह तोड़ कर रख दिया। फैराडे ने डेवी को समझाने की बहुत कोशिश की कि उनका प्रयोग वोलास्टन के विचार से बिल्कुल अलग है, लेकिन डेवी की ईर्ष्या और अहंकार ने उनकी एक न सुनी। इस विवाद के कारण गुरु और शिष्य के बीच के रिश्ते हमेशा के लिए खत्म हो गए, और फैराडे को कई सालों तक बिजली पर अपना शोध पूरी तरह से रोकना पड़ा।
इस भयंकर विवाद और मानसिक तनाव के बावजूद, समय ने माइकल फैराडे की महानता को साबित किया। साल 1824 में, डेवी के कड़े विरोध के बावजूद, फैराडे को रॉयल सोसाइटी का फेलो चुना गया, जो उस समय के किसी भी वैज्ञानिक के लिए सबसे बड़ा सम्मान माना जाता था। फैराडे ने कभी भी अपने मोटर का पेटेंट नहीं कराया; उनका मानना था कि विज्ञान की खोजें पूरी मानवता की भलाई के लिए होनी चाहिए, न कि किसी एक व्यक्ति के मुनाफे और व्यावसायिक लाभ के लिए।
उनके इसी निस्वार्थ आविष्कार का नतीजा है कि आज हमारे घरों के पंखों से लेकर वाशिंग मशीन, मिक्सर, पानी के पंप, इलेक्ट्रिक कारें और दुनिया भर की विशाल फैक्ट्रियों में चलने वाली बड़ी-बड़ी मशीनें उसी बुनियादी सिद्धांत पर काम करती हैं जो फैराडे ने उस छोटे से कांच के बर्तन और पारे की मदद से खोजा था।
माइकल फैराडे की यह कहानी हमें सिखाती है कि यदि आपके भीतर सच्ची लगन, अटूट धैर्य और निस्वार्थ जिज्ञासा हो, तो गरीबी की बेड़ियां और समाज का कोई भी बड़ा से बड़ा विरोध आपके कदमों को मंजिल तक पहुंचने से कभी नहीं रोक सकता।
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प्रस्तुति: Saying Central Team