एक्ट्रेस -मुंशी प्रेमचंद
कहानी की शुरुआत एक भव्य रंगमंच से होती है, जहाँ प्रसिद्ध अभिनेत्री तारा देवी ने “शकुंतला” का इतना जीवंत अभिनय किया कि पूरा सभागार भावनाओं में डूब गया। दर्शक शिष्टता भूलकर मंच की ओर टूट पड़े—कोई फूल बरसा रहा था, कोई उसके चरणों में गिर रहा था। मैनेजर ने गर्व से घोषणा की कि यह शो फिर से होगा। इसी भीड़ में एक युवक चुपचाप खड़ा था—लंबा, आकर्षक और गंभीर व्यक्तित्व वाला कुंवर निर्मलकांत चौधरी। भीड़ उसके चारों ओर शोर कर रही थी, लेकिन उसकी आँखों में केवल तारा थी।
शो के बाद जब भीड़ छंट गई, कुंवर ने तारा से मिलने की इच्छा जताई, लेकिन मैनेजर ने नियमों का हवाला देकर मना कर दिया। वह निराश होकर जाने ही वाला था कि मैनेजर ने उसका परिचय पत्र माँगा। जब कार्ड पर “कुंवर निर्मलकांत चौधरी” और उसकी ऊँची सामाजिक पहचान सामने आई, तो मैनेजर का रवैया तुरंत बदल गया। जो व्यक्ति अभी तक अनजान था, वह अचानक समाज का सबसे सम्मानित नाम बन गया। यह वही क्षण था जहाँ प्रेम की नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा की ताकत दिखाई देती है।
अगले दिन तारा अपने कमरे में उस रहस्यमय युवक के बारे में सोचती रहती है। उसकी आँखों के सामने उसी शांत, गंभीर और भावपूर्ण दृष्टि वाला चेहरा घूमता रहता है। वह पहली बार किसी ऐसे पुरुष से प्रभावित होती है जो भीड़ का हिस्सा नहीं था, बल्कि भीड़ से अलग खड़ा था। तारा, जो वर्षों से मंच पर भावनाएँ निभा रही थी, पहली बार अपने भीतर सच्ची भावना महसूस करती है।
कुछ समय बाद कुंवर फिर आता है और दोनों की मुलाकात होती है। धीरे-धीरे बातचीत बढ़ती है। कुंवर उसके अभिनय, उसके विचारों और उसकी कला की प्रशंसा करता है, लेकिन उसकी आँखों में केवल सम्मान नहीं, बल्कि गहरी आत्मीयता होती है। तारा भी उसके सादे, विनम्र और गहरे व्यक्तित्व से प्रभावित होती है। कुंवर उसके जीवन में हर दिन आने लगता है। वे साथ समय बिताते हैं, सैर करते हैं, संगीत सुनते हैं और धीरे-धीरे यह संबंध प्रेम में बदल जाता है।
लेकिन एक बात लगातार अनकही रहती है—विवाह। कुंवर प्रेम की बातें करता है, वादे करता है, लेकिन स्पष्ट रूप से शादी का निर्णय नहीं लेता। तारा के मन में यह बात चुभने लगती है। वह सोचती है कि क्या वह सिर्फ मनोरंजन या आकर्षण का हिस्सा है? वह मंच पर अभिनय करती थी, लेकिन अब उसका अपना जीवन भी एक अनिश्चित नाटक बनता जा रहा था।
समय बीतने के साथ दोनों के बीच संबंध गहरा होता जाता है, लेकिन समाज की नजरें भी उन पर पड़ने लगती हैं। अफवाहें फैलती हैं कि कुंवर एक अभिनेत्री के जाल में फँस रहा है। उसके परिवार और समाज के लोग उस पर दबाव डालते हैं कि वह अपने कुल और प्रतिष्ठा के अनुसार विवाह करे। दूसरी ओर तारा के भीतर भी संघर्ष शुरू हो जाता है—क्या वह वास्तव में उस योग्य है कि कुंवर जैसे व्यक्ति के जीवन में स्थायी स्थान पा सके?
इसी बीच एक दिन कुंवर स्पष्ट करता है कि वह तारा से विवाह करना चाहता है। यह सुनकर तारा की दुनिया बदल जाती है। लेकिन खुशी के साथ-साथ उसके भीतर भय और असमंजस भी बढ़ जाता है। वह अपने अतीत, अपनी उम्र, अपने पेशे और समाज की सोच को लेकर स्वयं को दोषी महसूस करने लगती है। उसे लगता है कि वह कुंवर को वह जीवन नहीं दे पाएगी जो वह योग्य है।
विवाह से एक दिन पहले तारा अकेले बैठकर अपने जीवन के बारे में सोचती है। उसे लगता है कि अगर वह कुंवर से विवाह करती है तो शायद वह उसे सुख नहीं दे पाएगी। वह यह भी सोचती है कि प्रेम का सबसे बड़ा रूप त्याग है। वह निर्णय लेती है कि वह कुंवर के जीवन को बोझ नहीं बनाएगी।
रात के अंधेरे में वह घर छोड़ने का निर्णय लेती है। वह एक पत्र लिखती है जिसमें वह कुंवर से क्षमा मांगती है और कहती है कि वह उसके प्रेम को स्वीकार नहीं कर सकती, क्योंकि वह स्वयं को उसके योग्य नहीं मानती। वह उसके दिए हुए आभूषण छोड़ देती है, केवल वह मोतियों का हार अपने साथ लेती है—जो उनके प्रेम की अंतिम निशानी था।
तारा चुपचाप शहर छोड़ देती है और गंगा की ओर चल पड़ती है। वहाँ वह एक नाविक से नदी पार कराने को कहती है। गंगा की शांत धारा में नाव धीरे-धीरे आगे बढ़ती है और तारा अपने पुराने जीवन, प्रेम और पहचान को पीछे छोड़ती जाती है। वह किसी नए जीवन की ओर नहीं, बल्कि आत्मत्याग और मौन की ओर बढ़ रही होती है।
कहानी वहीं समाप्त होती है जहाँ तारा अंधेरी रात में गंगा के पार चली जाती है—अपने प्रेम को खोकर, लेकिन अपने आत्मसम्मान और निर्णय के साथ।
कजाकी — बचपन की अमिट स्मृति(मुंशी प्रेमचंद)
मेरे बचपन की यादों में कजाकी नाम का एक व्यक्ति आज भी उतनी ही स्पष्टता से जीवित है, जैसे वह कल ही की बात हो। चालीस वर्ष बीत चुके हैं, पर उसकी छवि मेरे मन में आज भी घूमती रहती है। मैं उन दिनों अपने पिता के साथ आज़मगढ़ की एक तहसील में रहता था। वहीं कजाकी नाम का एक पासी जाति का डाकिया नौकरी करता था। वह हँसमुख, साहसी और बेहद जीवंत स्वभाव का व्यक्ति था। उसका रोज का काम था डाक का थैला लेकर आना-जाना।
हर शाम वह डाक लेकर आता, रात भर वहीं रहता और सुबह फिर डाक लेकर चला जाता। उसी शाम वह दोबारा लौट भी आता। मैं दिनभर उसकी प्रतीक्षा में बेचैन रहता। जैसे ही चार बजे का समय होता, मैं सड़क पर जाकर खड़ा हो जाता। थोड़ी देर बाद दूर से उसकी झुनझुनी की आवाज सुनाई देती और वह कंधे पर डाक का थैला लिए तेज़ी से आता दिखाई देता। उसका शरीर मजबूत और आकर्षक था, मानो किसी मूर्तिकार ने बड़ी सावधानी से गढ़ा हो।
मुझे देखते ही वह और तेज दौड़ने लगता और उसकी झुनझुनी की आवाज भी बढ़ जाती। मैं खुशी से भरकर उसकी ओर भागता और वह मुझे अपने कंधों पर बैठा लेता। वह पल मेरे लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं था। कजाकी मुझे लेकर कभी मैदान में खेलता, कभी बिरहा गाता और कभी चोर-डाकुओं की कहानियाँ सुनाता। उसकी कहानियों में डाकू भी ऐसे वीर होते, जो अमीरों को लूटकर गरीबों की मदद करते थे। मैं उन्हें नायक समझने लगता था।
एक दिन कजाकी अपने काम पर देर से आया। सूर्य डूब चुका था और मैं बेचैनी से उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। अचानक उसकी झुनझुनी की आवाज सुनाई दी। मैं दौड़कर उसकी ओर गया, लेकिन गुस्से में उसे मारने लगा, फिर रूठ गया। तभी उसने मुस्कुराकर कहा कि वह मेरे लिए एक खास चीज लाया है। मेरी जिद पर उसने अपने पास से एक हिरन का बच्चा दिखाया। वह दृश्य देखकर मेरी सारी नाराजगी खुशी में बदल गई।
कजाकी ने बताया कि वह जंगल में हिरनों के पीछे भागकर इस बच्चे को पकड़ लाया है, इसलिए देर हो गई। मैं उसे लेकर अत्यंत प्रसन्न था। घर जाकर जब डाकखाने पहुँचा, तो मेरे पिता क्रोधित हो गए क्योंकि डाक समय पर नहीं पहुँच पाई थी। उन्होंने कजाकी को नौकरी से निकाल दिया, उसका सामान छीन लिया और उसे डाकखाने से भगा दिया। मैं यह सब देखकर बहुत दुखी हो गया।
कजाकी चुपचाप सब सहता रहा, उसकी आँखों में आँसू थे। वह मुझे छोड़कर जाने लगा तो मेरा मन भर आया। घर पहुँचकर मैंने माँ को पूरी बात बताई। माँ को भी कजाकी पर दया आई, लेकिन तब तक वह जा चुका था। मैं रातभर रोता रहा और कजाकी के लौटने की आशा करता रहा।
अगले दिन मैंने अपने हिरन के बच्चे का नाम ‘मुन्नू’ रखा और उससे खेल में व्यस्त हो गया, लेकिन मन कहीं न कहीं कजाकी के लिए चिंतित था। शाम होते ही मैं फिर सड़क पर उसकी प्रतीक्षा करने लगा, पर वह नहीं आया। कई दिन बीत गए।
एक दिन एक स्त्री हमारे घर आई, उसके कपड़े फटे थे और चेहरा थका हुआ था। वह कजाकी की पत्नी थी। उसने बताया कि कजाकी उसी दिन से बीमार पड़ गया है, जब उसे डाकखाने से निकाला गया था। वह हर समय मेरा नाम लेता रहता है और मेरे पास आने की इच्छा करता है।
यह सुनकर घर में सबको पछतावा हुआ। मेरे पिता ने तुरंत उसकी बहाली के आदेश दिए। कुछ दिनों बाद कजाकी फिर लौट आया। वह अब बहुत कमजोर हो चुका था, मानो बीमारी ने उसे तोड़ दिया हो। लेकिन जैसे ही उसने मुझे देखा, उसकी आँखों में फिर वही पुरानी चमक लौट आई।
मैं दौड़कर उसके पास गया और वह मुझे फिर से कंधे पर बैठाने की कोशिश करने लगा। पर अब मैं बड़ा हो गया था और पहले जैसा अनुभव नहीं रहा। फिर भी उस पल में वही बचपन की खुशी लौट आई।
कुछ समय बाद एक दुखद घटना हुई। मेरा हिरन का बच्चा ‘मुन्नू’ कुत्ते के हमले में मारा गया। मैं बहुत दुखी हुआ। उस दिन मुझे समझ आया कि हर खुशी हमेशा नहीं रहती।
कहानी का अंत एक अजीब मोड़ पर हुआ। कजाकी लौट आया था, लेकिन मुन्नू चला गया था। मानो मेरी जिंदगी में एक खुशी आई तो दूसरी चली गई। आज भी जब मैं अपने बचपन को याद करता हूँ, तो कजाकी की झुनझुनी की आवाज मेरे कानों में गूंजती है और वह मासूम खुशी मेरी आँखों के सामने जीवित हो उठती है।
कप्तान साहब

जगत सिंह एक ऐसे युवक थे जिनका मन पढ़ाई-लिखाई से अधिक आवारगी और मौज-मस्ती में लगता था। स्कूल जाना उन्हें उतना ही अप्रिय लगता था जितना किसी को कड़वी दवा या जहरीला स्वाद। उनका स्वभाव घुमक्कड़ था—कभी वे अमरूद के बागों में पहुँच जाते और माली की डाँट को भी हँसकर झेल लेते, तो कभी नदी किनारे मल्लाहों के साथ नावों की सैर पर निकल जाते। उन्हें दूसरों को चिढ़ाना, मज़ाक उड़ाना और बेवजह शरारतें करना बहुत पसंद था।
वे जानबूझकर सवारों के पीछे शरारत करते, बुज़ुर्गों की नकल उतारते और अपनी हरकतों से सबको परेशान करते रहते थे।
पैसे की जरूरतें पूरी करने के लिए वह अक्सर घर से चोरी भी कर लेते थे। कभी रुपये उठा लेते, कभी घर की चीजें बेच देते। यहाँ तक कि घर की बोतलें और बर्तन भी एक-एक कर गायब हो चुके थे। उनके पिता, भक्त सिंह, डाकखाने में मुंशी थे और सख्त स्वभाव के व्यक्ति थे। वे बेटे की आदतों से बेहद परेशान रहते और कई बार उसे मारते-पीटते भी थे, लेकिन जगत सिंह पर किसी सजा का कोई असर नहीं होता था।
घर का माहौल हमेशा तनावपूर्ण रहता था। माँ और बहनें भी उससे नाराज़ रहती थीं। धीरे-धीरे उसकी बदनामी और चोरी की आदतों ने पूरे घर को संकट में डाल दिया। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि एक दिन उसके पिता के नाम पर गबन का मामला दर्ज हो गया। यह सब जगत सिंह की एक गलती से शुरू हुआ था—एक लिफाफा, जिसमें रुपये थे, उसकी नजर में आ गया और उसने उसे खोल लिया।
पहले उसने छोटे लालच में दस रुपये निकाले, लेकिन फिर उसके मन में बड़ा सपना जागा कि क्यों न इन पैसों से कोई काम शुरू किया जाए। लालच और सपनों के बीच फँसकर वह पूरे दो सौ रुपये लेकर घर छोड़कर बंबई चला गया। उसके जाने के बाद उसके पिता पर मुकदमा चला और उन्हें जेल की सजा हो गई।
बंबई से वह सेना में भर्ती हो गया। सेना में उसका आत्मविश्वास और साहस देखकर उसे तुरंत स्वीकार कर लिया गया। शुरू में उसे फौजी जीवन नया और रोमांचक लगा, लेकिन धीरे-धीरे उसे अपने घर, माँ और पुराने जीवन की याद सताने लगी। समुद्र की लहरें उसे अपने अतीत की ओर खींचने लगीं। अंततः उसने अपनी माँ को पत्र लिखा, जिसमें उसने अपने अपराधों के लिए क्षमा माँगी और जीवन सुधारने का वादा किया।
लेकिन उसे घर से कोई जवाब नहीं मिला। तभी उसे समाचार मिला कि उसके पिता को पाँच साल की सजा हो चुकी है और माँ गंभीर रूप से बीमार है। यह सुनकर उसका मन टूट गया। उसने छुट्टी माँगी, लेकिन उसे अनुमति नहीं मिली। मजबूरी में वह सेना में ही रह गया।
समय बीतता गया। चार वर्षों में जगत सिंह एक साहसी और अनुभवी सैनिक बन गया। वह युद्धों में बहादुरी दिखाने लगा और धीरे-धीरे उसका नाम एक वीर सैनिक के रूप में प्रसिद्ध हो गया। अब अफसर भी उसका सम्मान करते थे। लेकिन उसकी सफलता के पीछे भी एक खालीपन था—माँ की याद और पिता की जेल की पीड़ा उसे हर रात बेचैन करती थी।
उधर जेल में उसके पिता दिन-प्रतिदिन कमजोर होते जा रहे थे। वर्षों की सजा ने उन्हें तोड़ दिया था। उन्हें न घर की खबर थी, न बेटे की। वे पछतावे में डूबे रहते कि उन्होंने अपने बेटे को कभी सही प्रेम नहीं दिया, केवल कठोरता दिखाई।
जब उनकी सजा पूरी हुई, तब कोई उन्हें लेने नहीं आया। वे अकेले जेल से बाहर निकलकर सोच में पड़ गए कि अब जाएँ तो कहाँ जाएँ। तभी अचानक एक फौजी अफसर घोड़े पर सवार होकर जेल की ओर आया। उसके पीछे एक गाड़ी भी थी। उसने जेल से बाहर खड़े बूढ़े भक्त सिंह को देखा और सीधे उनके पास आकर रुक गया।
वह फौजी अफसर कोई और नहीं बल्कि जगत सिंह था—अब वह एक सम्मानित कप्तान बन चुका था। उसने अपने पिता के सामने घोड़े से उतरकर झुककर प्रणाम किया। पिता की आँखों में आँसू भर आए। वर्षों का दुःख, पश्चाताप और बिछड़न उस एक पल में टूट पड़ा।
जगत सिंह ने अपने पिता को सहारा दिया और कहा कि अब सब कुछ बदल चुका है। अब वह अपने अतीत की गलतियों को सुधारना चाहता है। पिता ने कांपते हाथों से बेटे को गले लगा लिया। दोनों के बीच वर्षों का दर्द आँसुओं में बह गया।
उस दिन के बाद पिता-पुत्र का जीवन फिर से जुड़ गया। जो परिवार टूट चुका था, वह फिर से एक हो गया—लेकिन उन बीते वर्षों की छाया हमेशा उनके साथ रही, एक सीख की तरह कि गलतियाँ चाहे जितनी बड़ी हों, पश्चाताप और सुधार से जीवन फिर से शुरू किया जा सकता है।
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मुंशी प्रेमचंद की प्रेरणादायक और यथार्थवादी कहानी समाज, मानवता, नैतिकता और जीवन के गहरे सत्य को सरल भाषा में प्रस्तुत करती है। उनकी रचनाएँ पाठकों को सोचने, सीखने और बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देती हैं।
लेखक / मूल रचनाकार: मुंशी प्रेमचंद
प्रस्तुति: Saying Central Team