विश्वामित्र

विश्वामित्र और महायज्ञ का संकल्प

7
Join WhatsApp
Join Now
Join Facebook
Join Now

विश्वामित्र और महायज्ञ का संकल्प

प्राचीन काल की बात है, जब तपोवन के घने जंगलों में ऋषियों की कुटिया हुआ करती थीं। चारों ओर शांति का वातावरण था और केवल वेदमंत्रों की गूंज सुनाई देती थी। महर्षि विश्वामित्र ने एक बहुत ही बड़े और दिव्य महायज्ञ का अनुष्ठान करने का संकल्प लिया था।

इस यज्ञ का मुख्य उद्देश्य लोक कल्याण, पृथ्वी पर धर्म की स्थापना और देवताओं को उनका उचित भाग प्रदान करना था। विश्वामित्र जी जानते थे कि यह कार्य अत्यंत कठिन है, क्योंकि इस क्षेत्र के आस-पास का जो बीहड़ वन था, वह भयानक और क्रूर निशाचरों का गढ़ माना जाता था।

फिर भी, उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए इस महान यज्ञ की दीक्षा ली और सभी आवश्यक दिव्य सामग्रियां एकत्रित करना आरंभ कर दिया। यज्ञ की वेदी को शास्त्रों के अनुसार अत्यंत पवित्र और शुद्ध मिट्टी से तैयार किया गया था, जिसके चारों ओर रंग-बिरंगे फूलों और आम के पत्तों से सुंदर तोरण द्वार बनाए गए थे।

संपूर्ण आर्यावर्त के महान और तपस्वी ब्राह्मणों को इस अनुष्ठान में भाग लेने के लिए विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। तपोवन की भूमि इस पावन अवसर पर पूरी तरह से सज-धजकर तैयार हो चुकी थी और हर तरफ एक अलौकिक पवित्रता का अहसास हो रहा था।

जैसे ही यज्ञ का शुभ मुहूर्त निकट आया, ऋषियों ने वेदमंत्रों का सस्वर पाठ करना प्रारंभ कर दिया। उनकी दिव्य वाणी से निकलने वाली तरंगें पूरे आकाश मंडल को गुंजायमान कर रही थीं। चारों दिशाओं से शुद्ध घी, कपूर, चंदन की लकड़ियां और दुर्लभ जड़ी-बूटियों की महक वातावरण में घुलने लगी थी।

विश्वामित्र जी स्वयं मुख्य वेदी पर आसीन थे और उनके मुख पर एक अपूर्व तेज चमक रहा था। यज्ञ की अग्नि धीरे-धीरे प्रज्वलित हो रही थी और उसकी लपटें देवताओं तक ऋषियों की प्रार्थनाएं पहुँचाने के लिए आतुर दिख रही थीं।

सभी उपस्थित मुनि अत्यंत एकाग्र चित्त से आहुतियां दे रहे थे और ईश्वर से संसार की सुख-समृद्धि की कामना कर रहे थे। तपोवन का कण-कण इस समय भक्ति और साधना के रंग में डूबा हुआ महसूस हो रहा था, मानो साक्षात स्वर्ग ही धरती पर उतर आया हो।

ऋषियों का विश्वास था कि इस यज्ञ की पूर्णाहुति से संसार में व्याप्त सभी नकारात्मक शक्तियों का समूल नाश हो जाएगा और चारों ओर शांति का साम्राज्य स्थापित होगा।

परंतु, इस पावन अनुष्ठान की भनक उस घने जंगल के अंधकारमय कोनों में छिपे बैठे असुरों को लग चुकी थी। वे जानते थे कि यदि यह यज्ञ पूरी तरह से संपन्न हो गया, तो उनकी आसुरी शक्तियों का प्रभाव हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा और वे निर्बल हो जाएंगे।

इसलिए, राक्षसों के राजा ने अपने सबसे क्रूर और मायावी अनुचरों को इस पवित्र कार्य को नष्ट करने का आदेश दे दिया था। वे राक्षस बहुत समय से इस ताक में बैठे थे कि कब सही अवसर मिले और वे तपोवन पर धावा बोल सकें।

इस प्रकार, एक ओर जहाँ पवित्र वेदमंत्रों की गूंज से आकाश पवित्र हो रहा था, वहीं दूसरी ओर घने जंगलों के भीतर एक भयानक और विनाशकारी षड्यंत्र का जाल बुना जा रहा था, जो जल्द ही इस शांत वातावरण को अशांत करने वाला था।

सुबाहु और मारीच का भयानक आक्रमण

यज्ञ का कार्य अपने मध्य चरण में पहुँच चुका था और ऋषियों का उत्साह एवं भक्ति भाव पराकाष्ठा पर था। तभी अचानक, बिना किसी पूर्व संकेत के, स्वच्छ और साफ आकाश में काले-कलूटे, डरावने बादलों का एक विशाल समूह उमड़ने लगा।

दिन के उजाले में ही चारों ओर गहरा अंधकार छा गया और तेज, ठंडी हवाएं चलने लगीं, जिससे यज्ञ की पवित्र अग्नि डगमगाने लगी। ऋषियों ने जब ऊपर देखा, तो उन्हें आकाश में दो अत्यंत विशाल और भयानक राक्षस दिखाई दिए, जिनका नाम सुबाहु और मारीच था।

ये दोनों लंकापति रावण के अत्यंत प्रिय और मायावी सेनापति थे, जिन्हें ऋषियों के यज्ञों को नष्ट करने में विशेष आनंद आता था। उनके साथ सैकड़ों अन्य छोटे-मोटे राक्षस भी थे, जो हवा में उड़ते हुए अट्टहास कर रहे थे। उनकी लाल-लाल आँखें क्रोध से उबल रही थीं और उनके बड़े-बड़े दांत बाहर निकले हुए थे, जो किसी को भी भयभीत करने के लिए पर्याप्त थे।

राक्षसों ने तपोवन के ऊपर पहुँचते ही अपनी मायावी शक्तियों का प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। वे ज़ोर-ज़ोर से गर्जना कर रहे थे, जिससे धरती कांपने लगी और आश्रम के पेड़-पौधे टूट-टूट कर गिरने लगे।

सुबाहु ने अपनी भयानक आवाज़ में चिल्लाकर कहा कि तुम ढोंगी ऋषियों, तुम्हारा यह यज्ञ कभी पूरा नहीं हो सकता, क्योंकि इस भूमि पर केवल हमारा अधिकार है। इतना कहते ही, उसने यज्ञ वेदी की ओर पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़े फेंकने शुरू कर दिए।

ऋषियों में अचानक मची इस खलबली से चारों ओर हाहाकार मच गया। यज्ञ की वेदी को बचाने के लिए कुछ वृद्ध मुनि आगे आए, परंतु राक्षसों के प्रहार के सामने वे असहाय साबित हो रहे थे। मारीच ने अपनी माया से आकाश से रक्त, मांस और मलमूत्र की वर्षा शुरू कर दी, ताकि यज्ञ की पवित्रता पूरी तरह से नष्ट हो जाए।

इस वीभत्स दृश्य को देखकर तपोवन के सभी ऋषि-मुनि अत्यंत भयभीत हो गए। पवित्र यज्ञ कुंड में जैसे ही अपवित्र वस्तुएं गिरने लगीं, वैसे ही अग्नि देव की लपटें धीमी पड़ने लगीं और काले धुएं का एक विशाल गुबार उठने लगा।

ऋषियों के द्वारा वर्षों की कड़ी मेहनत से एकत्रित की गई पवित्र सामग्रियां, जैसे शुद्ध घी, औषधियां और कुशा, सब इधर-उधर बिखर गईं और दूषित हो गईं। सुबाहु और मारीच का यह क्रूर कृत्य देखकर महर्षि विश्वामित्र का हृदय अत्यंत दुखी और क्रोधित हो उठा।

वे जानते थे कि यदि इस समय इन राक्षसों को रोका नहीं गया, तो सनातन धर्म की इस महान परंपरा को भारी क्षति पहुँचेगी और धरती पर अधर्म का अंधकार पूरी तरह से फैल जाएगा।

यज्ञ सामग्री की निर्लज्ज चोरी

राक्षसों का अत्याचार यहीं पर समाप्त नहीं हुआ; वे केवल विघ्न डालकर ही संतुष्ट नहीं होने वाले थे, बल्कि वे ऋषियों को पूरी तरह से विवश और भूखा-प्यासा मारना चाहते थे।

सुबाहु के इशारे पर, उसके भूखे और लालची राक्षस अनुचरों ने आश्रम के अन्न भंडारों पर धावा बोल दिया। आश्रम में ऋषियों ने जो फल, कंदमूल, तिल, जौ और चावल यज्ञ तथा अपने भरण-पोषण के लिए संचित करके रखे थे, राक्षस उन्हें जबरन छीनने लगे। वे बड़े-बड़े बर्तनों को लातों से मारकर तोड़ने लगे और पवित्र अन्न को अपने गंदे पैरों से कुचलने लगे।

कुछ राक्षस तो यज्ञ के लिए रखी गई शुद्ध सामग्रियों की बोरियां अपने कंधों पर उठाकर आकाश मार्ग से भागने लगे, ताकि ऋषियों के पास दोबारा यज्ञ शुरू करने के लिए कुछ भी शेष न बचे।

इस लूटपाट के दौरान, तपोवन की पवित्र गाएं, जो ऋषियों को यज्ञ के लिए दूध और घी प्रदान करती थीं, वे भी भय के मारे इधर-उधर भागने लगीं। राक्षसों ने उन निर्दोष पशुओं को भी प्रताड़ित किया और कई गायों को अपने साथ जबरन खींचकर ले गए।

ऋषियों की कुटियों को तहस-नहस कर दिया गया, जहाँ उनके अमूल्य ग्रंथ और पांडुलिपियां रखी हुई थीं। सुबाहु और मारीच इस तबाही को देखकर ज़ोर-ज़ोर से हंस रहे थे और ऋषियों की लाचारी का मज़ाक उड़ा रहे थे।

ऋषियों के पास कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं था, वे केवल अपनी तपस्या और मंत्रों के बल पर ही जीते थे, इसलिए वे इन शारीरिक रूप से बलवान और हिंसक राक्षसों का सामना करने में स्वयं को पूरी तरह असमर्थ पा रहे थे।

महर्षि विश्वामित्र यह सब अपनी आँखों से देख रहे थे। उनके पास इतनी आत्मिक शक्ति और तपोबल था कि वे चाहें तो एक ही क्षण में इन सभी राक्षसों को भस्म कर सकते थे।

परंतु, यज्ञ की दीक्षा लिए होने के कारण, वे स्वयं किसी पर क्रोध नहीं कर सकते थे और न ही किसी को श्राप दे सकते थे, क्योंकि ऐसा करने से उनके अपने यज्ञ का नियम टूट जाता और उनकी तपस्या का क्षय हो जाता। यह शास्त्रों का कड़ा नियम था कि यज्ञ के दौरान व्रती को पूरी तरह से शांत और क्षमाशील रहना पड़ता है।

अपनी इसी विवशता के कारण विश्वामित्र जी अंदर ही अंदर अत्यंत व्यथित हो रहे थे और वे कोई ऐसा उपाय सोचने लगे, जिससे बिना नियम तोड़े इन दुष्ट निशाचरों का समूल नाश किया जा सके और यज्ञ को निर्विघ्न संपन्न कराया जा सके।

महर्षि विश्वामित्र का अयोध्या प्रस्थान

तपोवन की इस दयनीय स्थिति को देखने के बाद, महर्षि विश्वामित्र ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय लिया। उन्होंने समझ लिया था कि इस समस्या का समाधान केवल क्षत्रिय वीरों के बाहुबल से ही संभव है, जो धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाने में सक्षम हों। इसलिए, उन्होंने अपने यज्ञ को कुछ समय के लिए स्थगित किया और तुरंत अयोध्या नगरी की ओर प्रस्थान करने का मन बनाया।

अयोध्या के राजा दशरथ एक अत्यंत प्रतापी, न्यायप्रिय और धर्मपरायण शासक थे, जिनके राज्य में प्रजा पूरी तरह से सुरक्षित थी। विश्वामित्र जी तेज कदमों से चलते हुए अयोध्या के राजदरबार में पहुँचे, जहाँ उनका भव्य और आदरपूर्ण स्वागत किया गया।

राजा दशरथ ने स्वयं उठकर महर्षि के चरण धोए और उन्हें ऊंचे आसन पर बैठाया, क्योंकि एक महान ऋषि का उनके दरबार में आना अत्यंत सौभाग्य की बात मानी जाती थी।

राजा दशरथ ने अत्यंत विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर विश्वामित्र जी से आने का कारण पूछा और कहा कि हे महर्षि, आपके दर्शन से मेरा जीवन धन्य हो गया, आज्ञा कीजिए, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ? विश्वामित्र जी ने गंभीर वाणी में उत्तर दिया कि हे राजन्, मैं एक महान यज्ञ का अनुष्ठान कर रहा हूँ, परंतु सुबाहु और मारीच नामक दो भयानक राक्षस अपनी सेना के साथ आकर मेरे यज्ञ में बार-बार विघ्न डालते हैं।

वे यज्ञ सामग्री की चोरी करते हैं और तपोवन को अपवित्र कर देते हैं। मैं नियमबद्ध होने के कारण उन्हें श्राप नहीं दे सकता। इसलिए, मैं आपसे आपके ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को मांगने आया हूँ। श्रीराम अपनी वीरता और धनुर्विद्या से उन राक्षसों का वध करके मेरे यज्ञ की रक्षा करेंगे, अतः आप उन्हें मेरे साथ वन भेजने की कृपा करें।

यह सुनते ही राजा दशरथ का मुख पीला पड़ गया और उनका हृदय कांपने लगा। श्रीराम अभी मात्र किशोर अवस्था में थे और उन्होंने कभी किसी भयानक राक्षस से युद्ध नहीं किया था। दशरथ जी अपने प्राणों से प्रिय पुत्र को उस खतरनाक और हिंसक वातावरण में भेजने के विचार से ही अत्यंत व्याकुल हो उठे।

उन्होंने विश्वामित्र जी से प्रार्थना की कि हे मुनिवर, राम अभी बहुत छोटा है, वह राक्षसों की मायावी चालों को नहीं समझ पाएगा। उसके स्थान पर मैं स्वयं अपनी विशाल चतुरंगिणी सेना लेकर आपके साथ चलता हूँ और अपने अंतिम सांस तक आपके यज्ञ की रक्षा करूँगा, परंतु कृपा करके मेरे राम को मुझसे दूर न कीजिए।

राजा दशरथ का यह वात्सल्य और मोह देखकर विश्वामित्र जी थोड़े क्षणों के लिए मौन हो गए, परंतु वे अपने निश्चय पर अडिग थे, क्योंकि वे जानते थे कि श्रीराम कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि साक्षात नारायण के अंश हैं, जिनका जन्म ही दुष्टों के संहार के लिए हुआ है।

श्रीराम और लक्ष्मण द्वारा यज्ञ की दिव्य रक्षा

विश्वामित्र
विश्वामित्र

अंततः, महर्षि वशिष्ठ के समझाने पर राजा दशरथ ने भारी मन से अपने पुत्र श्रीराम और उनके साथ सदा रहने वाले भाई लक्ष्मण को विश्वामित्र जी के साथ जाने की अनुमति दे दी। दोनों राजकुमार अपने धनुष-बाण संभालकर अत्यंत उत्साह और वीरता के साथ महर्षि के पीछे-पीछे तपोवन की ओर चल पड़े।

जब वे आश्रम पहुँचे, तो ऋषियों ने उनका बड़े आदर-सत्कार के साथ स्वागत किया। श्रीराम और लक्ष्मण को देखकर तपोवन के सभी निवासियों के मन में एक नई आशा और सुरक्षा की भावना जागृत हो गई।

विश्वामित्र जी ने पुनः यज्ञ की वेदी को शुद्ध करवाया और नए सिरे से सामग्रियां एकत्रित करके अनुष्ठान का आरंभ किया। इस बार, यज्ञशाला के चारों ओर दोनों भाई अत्यंत सतर्कता के साथ पहरा देने लगे, उनके हाथों में प्रत्यंचा चढ़े हुए धनुष थे और उनकी दृष्टि चारों दिशाओं में घूम रही थी।

यज्ञ के अंतिम दिन, जैसे ही मुख्य आहुति का समय आया, आकाश में फिर से वही भयानक गर्जना सुनाई दी और सुबाहु तथा मारीच अपनी पूरी आसुरी सेना के साथ यज्ञ को नष्ट करने के लिए प्रकट हो गए।

वे पहले की तरह ही आकाश से मल-मूत्र और पत्थरों की वर्षा करने ही वाले थे कि श्रीराम ने अत्यंत फूर्ती से अपने धनुष से एक दिव्य बाण छोड़ा, जिसने हवा में ही उन सभी अपवित्र वस्तुओं को नष्ट कर दिया। लक्ष्मण ने भी अपने तीखे बाणों की बौछार करके छोटे-मोटे राक्षसों को खदेड़ना शुरू कर दिया।

तपोवन की भूमि इस बार राक्षसों के अट्टहास से नहीं, बल्कि दोनों राजकुमारों के धनुष की टंकार से गूंज उठी। सुबाहु ने क्रोध में आकर श्रीराम पर एक विशाल गदा फेंकी, परंतु श्रीराम ने अपने एक ही बाण से उस गदा के सैकड़ों टुकड़े कर दिए, जिससे सुबाहु का घमंड चूर-चूर हो गया।

इसके बाद, श्रीराम ने मारीच को निशाना बनाकर

‘मानवास्त्र’ का संधान किया। यह बाण इतना शक्तिशाली था कि इसके लगते ही मारीच बिना प्राण गंवाए, हवा की गति से उड़ता हुआ समुद्र के पार सौ योजन दूर जाकर गिरा, जिससे उसका सारा अहंकार समाप्त हो गया और वह फिर कभी तपोवन की ओर मुड़कर देखने का साहस नहीं कर सका।

इसके तुरंत बाद, श्रीराम ने ‘आग्नेयास्त्र’ का प्रयोग करके क्रूर सुबाहु के छाती को चीर दिया, जिससे वह तड़पता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। शेष बचे हुए राक्षस अपनी जान बचाकर जंगलों की ओर भाग खड़े हुए।

इस प्रकार, श्रीराम और लक्ष्मण के पराक्रम से तपोवन पूरी तरह से भयमुक्त हो गया और महर्षि विश्वामित्र का वह महान यज्ञ अत्यंत पवित्रता और आनंद के साथ सकुशल संपन्न हुआ। सभी देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की और ऋषियों ने दोनों भाइयों को दीर्घायु और कल्याण का अमर आशीर्वाद दिया।

अगर आपको यह कहानी पसंद आई, तो अन्य ज्ञानवर्धक और नैतिक कहानियाँ भी ज़रूर पढ़ें।

पौराणिक कहानियों का विशाल संग्रह पढ़ें, जिनमें देवताओं, ऋषि-मुनियों, अवतारों, महाभारत, रामायण और भारतीय संस्कृति से जुड़ी प्रेरणादायक, रोचक एवं ज्ञानवर्धक कथाएं शामिल हैं। हर कहानी जीवन मूल्यों, धर्म और नैतिक शिक्षा का संदेश देती है।

 लेखक / मूल रचनाकार : पौराणिक कथाएँ
 प्रस्तुति: Saying Central Team

दिलचस्प कहानियों का सफर यहीं खत्म नहीं होता, ये भी ज़रूर पढ़ें:
Share:
WhatsApp
Facebook

Leave a Comment

Feature corner

चाणक्य नीति
Chanakya Neeti Explained

नीति और सफलता के अमूल्य सूत्र।

Book Summaries Explained

लोकप्रिय किताबों के मुख्य विचार।
Read More »

Child Psychology Explained

बच्चों की सोच और मनोविज्ञान।
Read More »

Moral Values Explained

छोटी कहानियाँ और नैतिक शिक्षा।

Inspirational Lives

महान व्यक्तियों के प्रेरणादायक जीवन।

CATEGORIES