प्रतिबिंब कक्ष

प्रतिबिंब कक्ष

17
Join WhatsApp
Join Now
Join Facebook
Join Now

प्रतिबिंब कक्ष Part 1

दिल्ली की सर्द रातों में अपराध मनोविज्ञान विशेषज्ञ डॉ. नीरज सहगल का नाम किसी किंवदंती की तरह लिया जाता था। पुलिस ऐसे मामलों में उसे बुलाती थी जहाँ अपराधी कोई सबूत नहीं छोड़ता था, मगर अपने पीछे भय की ऐसी परतें छोड़ जाता था जो पीड़ितों के परिवारों को वर्षों तक सोने नहीं देती थीं।

नीरज का दावा था कि हर अपराधी अपने मन के भीतर एक अदृश्य हस्ताक्षर छोड़ता है, और वही हस्ताक्षर उसे पकड़ने की कुंजी बनते हैं। लेकिन वह नहीं जानता था कि जल्द ही उसे ऐसे खेल में धकेल दिया जाएगा जहाँ अपराधी का हस्ताक्षर उसकी अपनी आत्मा पर उभरने वाला था।

एक सुबह उसके क्लिनिक में एक सीलबंद लिफाफा पहुँचा। भीतर केवल एक तस्वीर थी। तस्वीर में एक कमरा दिखाई दे रहा था जिसमें चारों दीवारों पर आईने लगे थे। कमरे के बीचोंबीच एक कुर्सी थी और उस कुर्सी पर कोई व्यक्ति बैठा था जिसका चेहरा धुंधला कर दिया गया था। तस्वीर के पीछे लाल स्याही से लिखा था— “अगर तुम सच में मन पढ़ सकते हो, तो बताओ इस कमरे में कौन मरने वाला है।”

नीरज को यह किसी विक्षिप्त व्यक्ति का मज़ाक लगा। उसने तस्वीर दराज में रख दी। मगर उसी शाम समाचार चैनलों पर एक हत्या की खबर चली। मृतक वही व्यक्ति था जो तस्वीर में धुंधले चेहरे के साथ कुर्सी पर बैठा दिखाई दे रहा था। पुलिस हैरान थी क्योंकि हत्या के समय मृतक एक परित्यक्त गोदाम में मिला था, जबकि तस्वीर किसी बंद कमरे की थी।

अगले दिन दूसरा लिफाफा आया। इस बार तस्वीर में एक महिला थी। वही कमरा, वही आईने, वही कुर्सी। पीछे लिखा था— “समय शुरू हो चुका है।” नीरज ने तुरंत पुलिस को सूचना दी। महिला की पहचान होने में छह घंटे लगे। लेकिन जब तक पुलिस उसके घर पहुँची, वह मर चुकी थी। मौत आत्महत्या जैसी लग रही थी, पर उसके चेहरे पर ऐसा आतंक जमे था जैसे उसने मरने से पहले कोई असंभव चीज देखी हो।

जाँच की कमान इंस्पेक्टर कविता राणा के हाथ में थी। वह नीरज पर भरोसा करती थी, मगर अब उसके मन में भी संदेह पैदा होने लगा था। दोनों तस्वीरें सबसे पहले नीरज को मिली थीं। दोनों मृतकों का उससे कोई संबंध नहीं था, फिर भी कोई उसे पहले से चेतावनी क्यों दे रहा था? नीरज के पास इसका कोई उत्तर नहीं था।

तीसरी तस्वीर आने तक पूरा शहर भय और अफवाहों से भर चुका था। इस बार तस्वीर के पीछे केवल एक संख्या लिखी थी— “17”। पुलिस ने अनुमान लगाया कि यह अगला शिकार हो सकता है या कोई तारीख। मगर जब तस्वीर में दिख रहा व्यक्ति मरा मिला, उसके हाथ पर चाकू से खुदा हुआ वही अंक पाया गया। ऐसा लग रहा था जैसे हत्यारा केवल लोगों को नहीं मार रहा था, बल्कि किसी अदृश्य पहेली के टुकड़े जोड़ रहा था।

नीरज रातों को सो नहीं पा रहा था। एक रात उसने तस्वीरों को फिर से देखा। अचानक उसकी नजर आईनों पर पड़ी। हर तस्वीर में आईनों के प्रतिबिंब अलग थे। उसने उन्हें डिजिटल रूप से जोड़ने की कोशिश की। प्रतिबिंबों में कुछ शब्द छिपे हुए थे। शब्दों को क्रम से पढ़ने पर एक वाक्य बना— “तुम मुझे पहले भी जानते थे।”

यह संदेश उसकी रीढ़ में बर्फ की तरह उतर गया।

नीरज ने अपने पुराने रिकॉर्ड खंगालने शुरू किए। पिछले पंद्रह वर्षों में उसने सैकड़ों अपराधियों की प्रोफाइल बनाई थी। उनमें से कई जेल में थे, कुछ मर चुके थे। मगर एक नाम देखकर उसका दिल धड़क उठा— आरव मल्होत्रा।

आरव कभी उसका मरीज था। अत्यधिक बुद्धिमान, असामान्य रूप से शांत और खतरनाक स्तर तक निरीक्षण करने वाला युवक। वह दावा करता था कि लोग वैसे नहीं होते जैसे दिखते हैं। उसके अनुसार हर व्यक्ति के भीतर एक दूसरा व्यक्तित्व छिपा होता है जो अवसर मिलने पर असली चेहरे को निगल जाता है। उपचार के दौरान आरव अचानक गायब हो गया था। कुछ महीनों बाद उसे मृत घोषित कर दिया गया था।

नीरज ने फाइल कविता को दिखाई। मगर जब पुलिस ने रिकॉर्ड जाँचे, तो चौंकाने वाली बात सामने आई। अस्पताल में आरव नाम का कोई मरीज कभी दर्ज ही नहीं था। फाइल असली थी, हस्ताक्षर असली थे, मगर सिस्टम में उसका कोई अस्तित्व नहीं था।

उस रात नीरज को पहला फोन आया।

दूसरी तरफ धीमी साँसों की आवाज थी।

“क्या तुमने आखिरकार मुझे पहचान लिया?”

नीरज जम गया।

“कौन हो तुम?”

“मैं वही हूँ जिसे तुमने बनाया था।”

लाइन कट गई।

अब नीरज को लगने लगा कि कोई उसके जीवन के हर कोने पर नजर रख रहा है। उसके घर के बाहर खड़ी कारें उसे संदिग्ध लगने लगीं। सड़क पर चलते लोग उसे देखते हुए प्रतीत होते। मोबाइल में अजीब संदेश आने लगे जिनमें केवल दर्पणों की तस्वीरें होती थीं। धीरे-धीरे उसकी वास्तविकता पर पकड़ कमजोर पड़ने लगी।

एक रात उसने अपने बेडरूम के आईने पर उँगली से लिखा वाक्य देखा— “झूठ बोलना बंद करो।”

मगर घर में कोई घुसा नहीं था।

सीसीटीवी फुटेज देखने पर वह और भयभीत हो गया। रात तीन बजे वह खुद नींद में उठकर आईने तक गया था और वही वाक्य लिखकर वापस सो गया था।

नीरज को पहली बार अपने मानसिक संतुलन पर संदेह हुआ।

उसने अपने ऊपर मनोवैज्ञानिक परीक्षण किए। परिणाम सामान्य थे। लेकिन अगले सप्ताह एक और चौंकाने वाली घटना हुई। चौथे मृतक के घर से पुलिस को एक डायरी मिली। उसमें कई पन्नों पर केवल एक नाम लिखा था— “नीरज सहगल।”

अब मीडिया उग्र हो उठा। समाचार चैनल उसे संदिग्ध घोषित करने लगे। इंटरनेट पर लोग उसे सीरियल किलर कहने लगे। पुलिस आधिकारिक रूप से उस पर आरोप नहीं लगा सकती थी, मगर उसकी हर गतिविधि पर निगरानी रखी जा रही थी।

कविता भी अब उससे दूरी बनाने लगी।

फिर पाँचवीं तस्वीर आई।

इस बार तस्वीर में कुर्सी पर बैठा व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि स्वयं नीरज था।

तस्वीर के पीछे केवल चार शब्द लिखे थे—

“अब खेल पूरा होगा।”

प्रतिबिंब कक्ष Part 2

प्रतिबिंब कक्ष
प्रतिबिंब कक्ष

तस्वीर देखने के बाद नीरज के भीतर कुछ टूट गया। उसे महसूस हुआ कि वह किसी अपराधी का पीछा नहीं कर रहा, बल्कि किसी ऐसे व्यक्ति का शिकार बन चुका है जो उसकी सोच से कई कदम आगे चल रहा है। उसने अपने घर की तलाशी ली। बेसमेंट में रखे पुराने बक्सों के बीच उसे एक धातु का डिब्बा मिला जिसे उसने वर्षों से नहीं खोला था।

डिब्बे के भीतर एक वीडियो टेप थी।

उसने रिकॉर्डिंग चलाई।

स्क्रीन पर बीस वर्ष पुराना दृश्य उभरा। एक प्रयोगशाला। कुछ डॉक्टर। और उनमें एक युवा नीरज।

वह अवाक रह गया।

वीडियो में मानसिक व्यवहार नियंत्रण पर एक गुप्त प्रयोग चल रहा था। उद्देश्य था ऐसे व्यक्तियों का निर्माण करना जिनकी स्मृतियों को बदला जा सके। कैमरे में नीरज और उसकी टीम एक किशोर लड़के पर परीक्षण कर रहे थे।

उस लड़के का नाम आरव था।

वीडियो समाप्त होने से पहले एक भयावह दृश्य आया। आरव कैमरे की ओर देखकर मुस्कुराया और बोला—

“अगर मेरी यादें मिटाओगे, तो मैं तुम्हारी यादों में छिप जाऊँगा।”

नीरज की साँसें रुक गईं।

उसे धीरे-धीरे सब याद आने लगा।

वर्षों पहले एक निजी संस्था ने मानव मस्तिष्क पर अवैध प्रयोग किए थे। नीरज उनमें शामिल था। आरव सबसे प्रतिभाशाली विषय था। मगर प्रयोग नियंत्रण से बाहर हो गया। आरव ने शोधकर्ताओं की कमजोरियों को समझ लिया और उनके खिलाफ मानसिक युद्ध शुरू कर दिया। अंततः संस्था ने परियोजना बंद कर दी और सारे रिकॉर्ड मिटा दिए।

मगर एक बात किसी को नहीं पता थी।

आरव मरा नहीं था।

उसने अपनी पहचान मिटा दी थी।

नीरज ने यह जानकारी कविता को देने की कोशिश की, लेकिन उससे पहले ही पुलिस उसके घर पहुँच गई। एक गुप्त गोदाम में पाँचों हत्याओं से जुड़े सबूत मिले थे और उन सबूतों पर नीरज के डीएनए थे।

स्थिति असंभव थी।

या तो कोई उसे फँसा रहा था।

या वह स्वयं अपराधी था।

गिरफ्तारी के बाद उसे उच्च सुरक्षा मानसिक निरीक्षण केंद्र में रखा गया। वहीं उसकी मुलाकात एक वृद्ध मनोचिकित्सक से हुई जिसने एक ऐसा सत्य बताया जिसने पूरी कहानी की नींव हिला दी।

वृद्ध ने कहा कि आरव का सबसे बड़ा प्रयोग किसी मशीन पर नहीं था।

वह इंसानों पर था।

विशेष रूप से नीरज पर।

बीस वर्ष पहले आरव ने नीरज के मन में झूठी स्मृतियों के बीज बो दिए थे। इतने गहरे कि नीरज वास्तविक घटनाओं और कृत्रिम स्मृतियों में अंतर नहीं कर सकता था। संभव था कि पिछले कई वर्षों की उसकी कुछ यादें कभी हुई ही न हों।

नीरज ने इसे पागलपन समझा।

लेकिन फिर उसे एक फाइल दिखाई गई।

उसमें उसके बचपन, शिक्षा और करियर से जुड़े दस्तावेज थे।

उनमें असंख्य विरोधाभास थे।

कुछ स्कूल जिनमें वह पढ़ने का दावा करता था, कभी अस्तित्व में ही नहीं थे।

कुछ तस्वीरों में उसके साथ खड़े लोग काल्पनिक पहचान वाले निकले।

ऐसा लग रहा था जैसे उसकी पूरी जीवनकथा धीरे-धीरे गढ़ी गई थी।

नीरज का मन बिखरने लगा।

फिर एक रात निरीक्षण केंद्र में बिजली चली गई।

अँधेरे में एक व्यक्ति उसके कमरे में आया।

वह आरव था।

उम्र बढ़ चुकी थी, मगर आँखें वैसी ही थीं।

शांत।

ठंडी।

असहनीय रूप से स्थिर।

आरव ने कहा कि हत्याएँ उसने नहीं कीं।

नीरज ने क्रोध से उसका गला पकड़ने की कोशिश की, मगर आरव हँस पड़ा।

“तुम अब भी नहीं समझे।”

उसने एक टैबलेट स्क्रीन नीरज के सामने रखी।

उसमें सुरक्षा कैमरों की रिकॉर्डिंग थीं।

हर हत्या में दिखाई देने वाला व्यक्ति नीरज था।

कोई मुखौटा नहीं।

कोई संपादन नहीं।

वह स्वयं।

नीरज की दुनिया ढह गई।

लेकिन आरव ने अगला वाक्य बोलकर उसे और गहरे अँधेरे में धकेल दिया।

“तुमने उन्हें मारा, लेकिन इसलिए नहीं कि मैं चाहता था। इसलिए क्योंकि तुम हमेशा से ऐसा करना चाहते थे।”

आरव ने खुलासा किया कि पाँचों मृतक उसी पुराने प्रयोग से जुड़े लोग थे। वे सभी अपराधी थे जिन्होंने बच्चों पर अमानवीय परीक्षण किए थे। वर्षों तक नीरज के भीतर अपराधबोध दबा रहा। उसका मन दो हिस्सों में बँट गया। एक हिस्सा सम्मानित विशेषज्ञ बना रहा। दूसरा हिस्सा उन लोगों को खोजता रहा जिन्होंने उस भयावह परियोजना में भाग लिया था।

आरव ने केवल एक काम किया था।

उसने नीरज को सच याद दिलाया।

हत्याओं का बीज पहले से उसके भीतर था।

आरव चला गया।

लेकिन अगली सुबह जब सुरक्षा अधिकारी कमरे में पहुँचे, वहाँ कोई आरव नहीं था। किसी कैमरे ने उसे रिकॉर्ड नहीं किया था।

ऐसा लगा मानो वह कभी आया ही नहीं।

अब नीरज को समझ नहीं आ रहा था कि पिछली रात वास्तविक थी या भ्रम।

मुकदमा शुरू हुआ।

पूरे देश की निगाहें उस पर थीं।

अदालत में एक के बाद एक सबूत उसके खिलाफ आते गए। मगर अंतिम दिन सबसे बड़ा झटका मिला।

कविता राणा ने गवाही दी।

उसने बताया कि उसने आरव की तलाश में महीनों काम किया।

पर ऐसा कोई व्यक्ति मिला ही नहीं।

सभी रिकॉर्ड, सभी सुराग, सभी नाम अंततः एक ही जगह जाकर खत्म हो जाते थे—

नीरज के अपने नोट्स में।

अदालत में सन्नाटा छा गया।

अगर आरव वास्तविक नहीं था, तो फिर वह कौन था?

फैसले से पहले नीरज को अंतिम बार बोलने का अवसर दिया गया।

वह कुछ क्षण चुप रहा।

फिर मुस्कुराया।

पहली बार।

एक अजीब, थकी हुई मुस्कान।

उसने कहा, “आप सब गलत प्रश्न पूछ रहे हैं। प्रश्न यह नहीं कि आरव असली था या नहीं। प्रश्न यह है कि यदि एक काल्पनिक व्यक्ति मुझे हत्या करने पर मजबूर कर सकता है, तो फिर असली अपराधी कौन है? मैं… या वह कल्पना जिसे मैंने वास्तविकता से अधिक शक्तिशाली बना दिया?”

कोर्टरूम में बैठे लोग उसकी ओर देखते रह गए।

कुछ सप्ताह बाद उसे आजीवन मनोवैज्ञानिक निगरानी वाले कारावास की सजा मिली।

मामला बंद कर दिया गया।

मगर कहानी वहाँ समाप्त नहीं हुई।

तीन वर्ष बाद निरीक्षण केंद्र की एक परित्यक्त कोठरी में मरम्मत का काम चल रहा था। मजदूरों को दीवार के भीतर एक छोटा धातु का डिब्बा मिला।

उसमें केवल एक तस्वीर थी।

वही आईनों वाला कमरा।

वही कुर्सी।

मगर इस बार कुर्सी पर बैठा व्यक्ति नीरज नहीं था।

वह इंस्पेक्टर कविता राणा थी।

तस्वीर के पीछे लाल स्याही से एक वाक्य लिखा था—

“प्रतिबिंब कभी मरते नहीं, वे केवल नया चेहरा चुनते हैं।”

जाँच दोबारा खोली गई।

लेकिन उसी रात वह तस्वीर रहस्यमय तरीके से सबूत कक्ष से गायब हो गई।

और सुरक्षा कैमरे में केवल एक चीज दर्ज हुई—

खाली कमरे के बीच लगे आईने में किसी अनजान व्यक्ति की मुस्कान।

मगर कमरे में कोई मौजूद नहीं था।

शीशमहल की दरारें

अगर आपको ऐसी ही दिलचस्प और प्रेरणादायक कहानियाँ पढ़ना पसंद है, तो हमारे WhatsApp चैनल से जुड़िए — वहाँ रोज़ नई stories सबसे पहले मिलती हैं
प्रस्तुति: Saying Central Team


दिलचस्प कहानियों का सफर यहीं खत्म नहीं होता, ये भी ज़रूर पढ़ें:
Share:
WhatsApp
Facebook

Leave a Comment

Feature corner

चाणक्य नीति
Chanakya Neeti Explained

नीति और सफलता के अमूल्य सूत्र।

Book Summaries Explained

लोकप्रिय किताबों के मुख्य विचार।
Read More »

Child Psychology Explained

बच्चों की सोच और मनोविज्ञान।
Read More »

Moral Values Explained

छोटी कहानियाँ और नैतिक शिक्षा।

Inspirational Lives

महान व्यक्तियों के प्रेरणादायक जीवन।

CATEGORIES