रूह का सौदा

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रूह का सौदा part-1

साहिल और सुमन का रिश्ता शुरुआत से ही एक खूबसूरत ख़्वाब जैसा था, लेकिन किसी को नहीं पता था कि यह ख़्वाब कब एक कभी न ख़त्म होने वाले दुःस्वप्न में बदल जाएगा। सुमन स्वभाव से बेहद संवेदनशील और कलात्मक थी, जबकि साहिल का व्यक्तित्व एक चुंबकीय आकर्षण से भरा था जो धीरे-धीरे एक दम घोंटू अधिकार में बदलने लगा था।

उनकी पहली मुलाक़ात एक कॉफ़ी शॉप में हुई थी जहाँ साहिल की तीखी आँखों ने सुमन को अपनी ओर ऐसा खींचा कि वह सब कुछ भूल बैठी। शुरुआत के कुछ महीने तो हवा में तैरते हुए बीत गए, जहाँ दोनों एक-दूसरे के बिना एक पल भी नहीं रह सकते थे। लेकिन धीरे-धीरे, वह बेइंतहा प्यार एक ऐसी सनक में तब्दील होने लगा जिसने सुमन की आज़ादी की हर दीवार को ढहाना शुरू कर दिया।

साहिल का प्यार अब पज़ेसिवनेस का रूप ले चुका था और सुमन के हर कदम पर उसकी नज़र रहने लगी थी। “तुम कल उस दोस्त से इतनी देर क्या बात कर रही थी सुमन? मुझे तुम्हारी ये आदतें बिल्कुल पसंद नहीं हैं,” साहिल ने एक शाम उसका हाथ ज़ोर से भींचते हुए कहा था।

सुमन ने उसकी आँखों में देखा, जहाँ प्यार से ज़्यादा एक अजीब सा डर और पागलपन तैर रहा था, जिसने उसे अंदर तक कँपा दिया। वह खुद को समझाती कि साहिल ऐसा सिर्फ इसलिए करता है क्योंकि वह उससे हद से ज़्यादा प्यार करता है और उसे खोने से डरता है। इसी भावनात्मक निर्भरता का फ़ायदा उठाकर साहिल ने धीरे-धीरे सुमन को उसके दोस्तों और यहाँ तक कि उसके परिवार से भी पूरी तरह काट दिया।

गैसलाइटिंग साहिल का सबसे बड़ा हथियार बन चुका था, जिससे वह सुमन के आत्मसम्मान को रोज़ थोड़ा-थोड़ा तोड़ता था। जब भी सुमन किसी बात पर आपत्ति जताती, साहिल पूरी कहानी को इस तरह घुमा देता कि आख़िर में सुमन खुद को ही गुनहगार मानने लगती और रोते हुए उससे माफ़ी माँगती।

“तुम पागल हो रही हो सुमन, मैंने ऐसा कभी नहीं कहा; तुम हर बात का बतंगड़ बनाने लगी हो, तुम्हारी दिमागी हालत ठीक नहीं है,” साहिल अक्सर ठंडे स्वर में कहता। सुमन अपनी ही याददाश्त और समझ पर शक करने लगी थी, उसे लगने लगा था कि शायद वाकई गलती उसी की है। इस मानसिक प्रताड़ना ने उसे अंदर से इतना कमज़ोर कर दिया था कि वह अपने अस्तित्व के लिए भी साहिल के फैसलों पर निर्भर हो गई थी।

उनके बीच का शारीरिक आकर्षण और इंटिमेसी भी अब एक किस्म का जाल बन चुकी थी, जिसका इस्तेमाल साहिल हर झगड़े के बाद करता था। जब भी उनके बीच कोई बड़ा मनोवैज्ञानिक टकराव होता, साहिल अचानक बेहद रोमांटिक और आक्रामक रूप से करीब आ जाता, जिससे सुमन सब कुछ भूलने पर मजबूर हो जाती।

वह रातें जितनी तीव्र और जुनूनी होती थीं, सुबह का सन्नाटा उतना ही कड़वा और अजनबी एहसास लेकर आता था। सुमन को महसूस होने लगा था कि साहिल का वह स्पर्श अब प्यार नहीं, बल्कि उसके शरीर और आत्मा पर अपना अधिकार ज़ाहिर करने का एक ज़रिया मात्र था। फिर भी, उस ज़हरीले कशिश से दूर भाग पाना सुमन के लिए लगभग नामुमकिन हो चुका था क्योंकि वह उस दर्द की आदी हो चुकी थी।

एक दिन सुमन को साहिल के फोन में कुछ ऐसे मैसेजेस मिले जिन्होंने उसके पैरों तले से ज़मीन ही खिसका दी। साहिल किसी और लड़की से उसी अंदाज़ में बात कर रहा था, जिस अंदाज़ में उसने कभी सुमन से बात करना शुरू किया था। जब सुमन ने काँपते हाथों से वह फोन उसके सामने रखा, तो साहिल के चेहरे पर शिकन तक नहीं आई, बल्कि उसकी आँखें गुस्से से लाल हो गईं।

“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरा फोन छूने की? तुम मुझ पर जासूसी कर रही हो? तुम्हारे इसी शक वाले रवैये ने मुझे दूर जाने पर मजबूर किया है,” साहिल ने चिल्लाते हुए मेज़ पर हाथ दे मारा। यह धोखा और विश्वासघात सुमन के लिए एक ऐसा झटका था जिसने उसकी बची-कुची समझ को भी बिखेर कर रख दिया।

विश्वास के इस बुरी तरह टूटने के बाद भी सुमन उस रिश्ते को छोड़ नहीं पा रही थी, क्योंकि उसका मानसिक संतुलन पूरी तरह साहिल से जुड़ चुका था। वह रात भर जागकर रोती और सोचती कि आखिर उससे कहाँ कमी रह गई कि साहिल को किसी और का सहारा लेना पड़ा।

साहिल कभी पूरी रात घर नहीं आता, और जब आता तो सुमन से इस तरह बर्ताव करता जैसे कुछ हुआ ही न हो, जो सुमन को और पागल बना देता था। दोनों के बीच की बातचीत अब सिर्फ तानों, चीख-पुकार और एक-दूसरे को नीचा दिखाने तक ही सीमित रह गई थी। वह घर, जो कभी उनके सपनों का आशियाना था, अब एक ऐसे मनोवैज्ञानिक युद्ध का मैदान बन चुका था जहाँ रोज़ दोनों की आत्माएँ लहूलुहान होती थीं।

रूह का सौदा part-2

रूह का सौदा

वक्त गुज़रने के साथ साहिल का जुनून और जुनूनी ईर्ष्या एक ख़तरनाक स्तर पर पहुँच गई थी, भले ही वह खुद वफ़ादार नहीं था। एक शाम जब सुमन अपने एक पुराने कलीग से रास्ते में मिलकर सिर्फ ‘हैलो’ कह रही थी, साहिल ने उन्हें देख लिया और घर आते ही तमाशा खड़ा कर दिया।

उसने सुमन की अलमारी के सारे कपड़े ज़मीन पर फेंक दिए और उसका चेहरा दबोचते हुए बोला, “तुम मेरी हो सुमन, सिर्फ मेरी; अगर मुझे छोड़कर किसी और की तरफ देखा भी, तो मैं तुम्हें और खुद को खत्म कर दूँगा।” सुमन की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन उस खौफ़ के बीच भी उसे एक अजीब सा सुकून मिल रहा था कि साहिल अब भी उससे इतनी शिद्दत से जुड़ा है। यह उस ज़हरीले रिश्ते का सबसे डरावना सच था कि पीड़ित को अपने उत्पीड़क के गुस्से में भी प्यार दिखने लगता था।

इस घटना के बाद सुमन के भीतर एक गहरा बदलाव आने लगा, जिसे साहिल भाँप नहीं पाया। उसने रोना-धोना बंद कर दिया था और उसकी आँखें अब एक ठहरे हुए समंदर की तरह शांत पर रहस्यमयी हो चुकी थीं। वह साहिल की हर बात पर हाँ मिलाने लगी थी, उसकी हर गैसलाइटिंग को चुपचाप स्वीकार करती, जिससे साहिल को लगा कि उसने सुमन को पूरी तरह अपने काबू में कर लिया है।

लेकिन असल में, सुमन के भीतर का आत्मसम्मान, जो इतने समय से मरा हुआ था, अब एक भयानक प्रतिशोध और आज़ादी की आग में बदलने लगा था। वह समझ चुकी थी कि इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने के लिए उसे साहिल के ही खेल को उसी के खिलाफ खेलना होगा।

सुमन ने धीरे-धीरे साहिल की जासूसी करना और उसके करीब आने के नाटक को और गहरा कर दिया, जिससे साहिल का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर पहुँच गया। वह अक्सर साहिल के ड्रिंक्स में हल्की नशीली दवाइयाँ मिलाने लगी ताकि वह गहरी नींद में सो सके और वह उसके सारे काले राज़ इकट्ठा कर सके। साहिल को लगने लगा था कि सुमन अब उसके बिना एक साँस भी नहीं ले सकती, इसलिए उसने अपनी सतर्कता पूरी तरह से छोड़ दी थी।

एक रात, जब साहिल गहरे नशे और नींद में था, सुमन ने उसका फोन, लैपटॉप और सारे बिज़नेस डाक्यूमेंट्स खँगाले जिनमें उसके कई गैर-कानूनी लेन-देन और धोखाधड़ी के सबूत छिपे थे। सुमन के चेहरे पर एक सर्द मुस्कान तैर गई क्योंकि उसे समझ आ गया था कि साहिल की कमज़ोरी कहाँ है।

अगली सुबह जब साहिल उठा, तो उसने देखा कि घर पूरी तरह खाली था और दीवार पर एक बड़ा सा शीशा टूटा हुआ था। मेज़ पर एक लिफ़ाफ़ा रखा था जिसमें उन सभी सबूतों की कॉपीज़ थीं जो सुमन ने रात में इकट्ठी की थीं, और साथ में एक छोटा सा नोट था। नोट पर लिखा था, “तुमने मुझसे कहा था न साहिल कि मैं पागल हूँ और मेरी दिमागी हालत ठीक नहीं है?

आज तुम्हारी ये ‘पागल’ तुम्हारी पूरी दुनिया तबाह करके जा रही है।” साहिल के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई, उसने तुरंत सुमन को फोन लगाने की कोशिश की लेकिन उसका नंबर हमेशा के लिए बंद आ रहा था। उसका अहंकार, उसकी पज़ेसिवनेस और उसका घमंड एक ही पल में ताश के पत्तों की तरह बिखर गए थे।

साहिल पागलों की तरह उसे ढूँढने के लिए हर उस जगह गया जहाँ सुमन जा सकती थी, लेकिन वह कहीं नहीं मिली; उसने उसे हर तरफ से ब्लॉक कर दिया था। पहली बार साहिल को उस अकेलेपन और लाचारी का अहसास हुआ जिससे उसने सुमन को सालों तक गुज़ारा था।

उसका अपना ही घर अब उसे काटने को दौड़ता था, जहाँ हर कोने में सुमन की हँसी और उसके रोने की आवाज़ें गूँजती थीं। वह खुद अपनी ही साज़िशों और गैसलाइटिंग के जाल में फँस चुका था, और उसका मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा था। सुमन के जाने के बाद साहिल एक ऐसे अंधेरे गड्ढे में गिर गया था जहाँ से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था, क्योंकि उसकी सत्ता और नियंत्रण की भूख ने उसे खुद ही खोखला कर दिया था।

कुछ महीनों बाद, सुमन शहर से बहुत दूर एक नए समंदर के किनारे बैठी डूबते हुए सूरज को देख रही थी, जहाँ की हवा में एक आज़ाद एहसास था। उसके चेहरे पर अब वह डर और लाचारी नहीं थी, बल्कि एक नया आत्मविश्वास और अपनी ज़िंदगी को फिर से संवारने की चमक थी।

उसने उस ज़हरीले रिश्ते से बाहर निकलने के लिए एक भारी कीमत चुकाई थी, अपनी आत्मा का एक हिस्सा वहीं छोड़ आई थी, लेकिन वह आज़ाद थी। साहिल और सुमन की यह कहानी कोई आम प्रेम कहानी नहीं थी, बल्कि यह दो ऐसी रूहों की दास्तान थी जिन्होंने प्यार के नाम पर एक-दूसरे को तबाह कर दिया, जहाँ जीत किसी की नहीं हुई, बस एक ने जीना सीख लिया और दूसरा अपनी ही बनाई जेल में ताउम्र के लिए कैद हो गया।

अटूट रिश्तों की एक नई दास्तां,

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