सुलगती राख

सुलगती राख: खौफनाक राज़

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सुलगती राख part-2

श्रीनगर की वादियों में जब सर्दियों की पहली बर्फ़बारी हुई, तो समर को लगा कि उसका अतीत भी इस सफ़ेद चादर के नीचे हमेशा के लिए दफ़्न हो जाएगा। वह दिल्ली की भागदौड़ भरी ज़िंदगी और अपनी ज़हन में गूंजती अजीब आवाज़ों से तंग आकर अपनी पुश्तैनी हवेली ‘काली कोठी’ वापस लौटा था।

कश्मीर के एक दूरदराज़ गांव में स्थित यह हवेली पिछले बीस सालों से बंद पड़ी थी, और गांव वाले इसके पास भटकने से भी कतराते थे। समर के माता-पिता की एक कार हादसे में रहस्यमय मौत के बाद उसे इस जगह से दूर रखा गया था, लेकिन अब उसके पास लौटने के अलावा कोई रास्ता नहीं था।

हवेली के भारी लकड़ी के दरवाज़े को खोलते ही धूल और सड़न की एक ठंडी गंध ने समर का स्वागत किया, जिसने उसकी रीढ़ में एक अजीब सी सिहरन पैदा कर दी। उसने अपनी जैकेट को कसकर लपेटा और लिविंग रूम की तरफ कदम बढ़ाए, जहां दीवारों पर टंगे हुए पुरखों के धुंधले चित्र उसे ही घूरते हुए प्रतीत हो रहे थे।

शाम ढलते ही वादियों में चीखती हुई बर्फ़ीली हवाएं चलने लगीं, जिससे हवेली की पुरानी खिड़कियां थरथराने लगीं। समर ने आग जलाई, लेकिन उस गर्माहट में भी उसे एक अजीब सी ठंडक का अहसास हो रहा था, जैसे कोई अदृश्य वजूद उसके ठीक पीछे खड़ा हो।

रात के सन्नाटे में जब समर की आंख खुली, तो उसे हवेली के नीचे से किसी के रोने की मद्धम आवाज़ सुनाई दी। वह आवाज़ किसी बच्चे की थी, जो बेहद दर्द और लाचारी में किसी को पुकार रहा था, लेकिन शब्द साफ़ नहीं थे। उसने हाथ में मोमबत्ती ली और उस आवाज़ का पीछा करते हुए हवेली के सबसे पिछले हिस्से की तरफ बढ़ गया, जहां एक पुराना, जंग लगा लोहे का दरवाज़ा था। उस दरवाज़े पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था कि इसे कभी न खोला जाए, लेकिन समर के भीतर की बेचैनी और एक अजीब से आकर्षण ने उसे रुकने नहीं दिया।

जैसे ही उसने भारी कुंडी को खिसकाया, दरवाज़ा एक भयानक चरमराहट के साथ खुल गया, जिसके पीछे नीचे की ओर जाती हुई अंधेरी सीढ़ियां थीं। नीचे का तापमान ऊपर से कहीं ज़्यादा कम था, और वहां की हवा में किसी पुरानी दवा और सड़ती हुई चीज़ों की महक घुली हुई थी। समर ने अपनी मोमबत्ती की रोशनी में देखा कि वह एक विशाल तहखाना था, जो किसी वैज्ञानिक प्रयोगशाला या फिर किसी पुरानी जेल जैसा दिखाई देता था। वहां दीवारों पर अजीबोगरीब चेनें बंधी हुई थीं और फर्श पर सूखे हुए खून के काले पड़ चुके निशान चारों तरफ बिखरे हुए थे।

तहखाने के बीचों-बीच एक भारी लकड़ी की मेज़ थी, जिस पर धूल से सनी हुई कई पुरानी डायरियां और कुछ अजीबोगरीब कांच के जार रखे हुए थे। समर ने कांपते हाथों से सबसे ऊपर रखी डायरी को उठाया, जिसके पन्नों पर उसके पिता ‘डॉ. अमानत बेग’ के दस्तखत थे। डायरी के पहले ही पन्ने को पढ़ते ही समर के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई, क्योंकि उसमें किसी रूहानी ताकत या बीमारी का नहीं, बल्कि इंसानी क्रूरता का एक ऐसा काला चिट्ठा दर्ज था जिसने समर के पूरे वजूद को हिलाकर रख दिया।

सुलगती राख part-2

उस डायरी में दर्ज तारीखें बीस साल पुरानी थीं, जब कश्मीर एक बेहद अशांत दौर से गुज़र रहा था और पूरी वादी में डर का माहौल था। समर के पिता, जो दुनिया की नज़रों में एक बेहद सम्मानित डॉक्टर और समाजसेवक थे, असल में इस तहखाने में एक बेहद खौफनाक और प्रतिबंधित तजुर्बा कर रहे थे। वे इंसानी दिमाग की यादों को पूरी तरह से मिटाने और उन्हें नए सिरे से रीप्रोग्राम करने की एक गुप्त तकनीक पर काम कर रहे थे, जिसका नाम ‘प्रोजेक्ट सफ़ेद चादर’ रखा गया था। इस काम के लिए उन्होंने उन अनाथ और लावारिस बच्चों का इस्तेमाल किया था, जिन्हें कोई ढूंढने वाला नहीं था।

डायरी के पन्ने पलटते हुए समर की आंखों से आंसू बहने लगे, क्योंकि उसमें दर्ज हर एक तजुर्बा किसी मासूम की चीखों और दर्दनाक मौत की कहानी बयां कर रहा था। उसके पिता ने लिखा था कि कैसे वे बच्चों के दिमाग में बिजली के झटके देकर उनकी यादें मिटाते थे, जिससे कई बच्चे मानसिक संतुलन खो बैठते थे या हमेशा के लिए सो जाते थे।

समर को अपनी धुंधली यादों में एक छोटा बच्चा याद आने लगा, जो कभी इस हवेली के बगीचे में उसके साथ खेलता था, लेकिन अचानक गायब हो गया था। उस बच्चे का नाम कबीर था, और डायरी के मुताबिक, वह इस खौफनाक तजुर्बे का सबसे आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था।

जैसे-जैसे समर डायरी में गहराई से उतरता गया, उसे अहसास हुआ कि उसके माता-पिता की मौत कोई हादसा नहीं थी, बल्कि उनकी इसी क्रूरता का अंजाम थी। गांव के ही कुछ लोगों को जब इस बात की भनक लगी थी, तो उन्होंने हवेली को घेरने की कोशिश की थी, जिसके बाद अमानत बेग ने अपने सारे सबूतों को मिटाने का फैसला किया।

लेकिन सबसे चौंकाने वाला खुलासा अभी बाकी था, जिसने समर के दिमाग में एक ऐसा तूफान खड़ा कर दिया जिससे उसकी अपनी पहचान पर ही सवाल उठने लगे। डायरी के आखिरी पन्नों में लिखा था कि कबीर कोई बाहर का अनाथ बच्चा नहीं था, बल्कि वह खुद अमानत बेग का बड़ा बेटा और समर का सगा भाई था।

अमानत बेग ने लिखा था कि कबीर के भीतर कुछ ऐसी मानसिक शक्तियां थीं जो आम इंसानों में नहीं होतीं, और इसी वजह से उन्होंने अपने ही बेटे को इस नरक में झोंक दिया था। समर को वह रात याद आने लगी जब उसने अपने पिता को एक बच्चे पर चिल्लाते हुए देखा था, और उसकी मां रोते हुए मिन्नतें कर रही थीं।

उस रात के बाद से कबीर कभी नहीं दिखा, और समर को बताया गया कि उसका कोई भाई कभी था ही नहीं, वह सिर्फ उसका एक वहम था। समर का पूरा शरीर कांप रहा था, क्योंकि उसे समझ आ गया था कि उसके बचपन की कई यादें असल में उसकी अपनी नहीं, बल्कि कबीर की थीं, जिन्हें उसके दिमाग में जबरन डाला गया था।

तभी तहखाने के एक कोने में रखे एक बड़े लोहे के बक्से से टकराकर समर की मोमबत्ती नीचे गिर गई, और चारों तरफ फिर से गहरा अंधेरा छा गया। उस अंधेरे में समर को किसी के चलने की आहट सुनाई दी, जो बहुत धीमी थी लेकिन उसकी तरफ ही बढ़ रही थी।

उसने जल्दी से अपने फोन की फ्लैशलाइट जलाई, और जो कुछ उसने देखा, उसने उसके हलक से चीख भी निकलने नहीं दी। बक्से के पीछे एक गुप्त दरवाज़ा था जो ज़मीन के और नीचे जाता था, और वहां से एक बूढ़ा, जंजीरों में जकड़ा हुआ शख्स रेंगते हुए बाहर आ रहा था, जिसकी आंखें पूरी तरह से सफ़ेद हो चुकी थीं।

सुलगती राख part-3

सुलगती राख

वह शख्स कोई और नहीं, बल्कि कबीर था—समर का वह भाई जिसे बीस साल पहले मरा हुआ मान लिया गया था, लेकिन वह इस अंधेरे में ज़िंदा दफ़्न था। उसके शरीर पर अनगिनत ऑपरेशनों के निशान थे, और उसके सिर पर कुछ अजीबोगरीब धातु के तार अब भी धंसे हुए थे जो उसकी त्वचा का हिस्सा बन चुके थे। कबीर ने समर की तरफ देखा, और बिना अपने होंठ हिलाए, उसकी आवाज़ सीधे समर के दिमाग में गूंज उठी, जिसने समर को घुटनों के बल बैठने पर मजबूर कर दिया। वह आवाज़ वही थी जो समर को बचपन से अपने सपनों में सुनाई देती थी, जो अब एक हकीकत बनकर उसके सामने खड़ी थी।

कबीर ने अपनी दिमागी शक्ति के ज़रिए समर को वह पूरा सच दिखाया जो बीस साल पहले इस हवेली की दीवारों के पीछे छुपाया गया था। समर ने देखा कि कैसे उसके माता-पिता ने कबीर के दिमाग का इस्तेमाल करके समर की एक जानलेवा बीमारी को ठीक किया था, जो बचपन में उसे होने वाली थी।

असल में, समर की जान बचाने के लिए कबीर के दिमाग के एक हिस्से को निकालकर समर के दिमाग में ट्रांसप्लांट किया गया था, जिससे समर तो बच गया लेकिन कबीर हमेशा के लिए इस हालत में पहुंच गया। समर के माता-पिता की मौत किसी हादसे में नहीं हुई थी, बल्कि कबीर ने अपनी बची-कुची मानसिक शक्तियों से उनकी कार का संतुलन बिगाड़कर उन्हें खाई में गिरा दिया था।

इतने सालों से कबीर इस तहखाने में बंद रहकर सिर्फ एक ही चीज़ का इंतज़ार कर रहा था—कि कब समर वापस आए और वह अपना अधूरा इंतकाम पूरा कर सके। समर को अब समझ आया कि उसे कश्मीर वापस खींचने वाली कोई आंतरिक इच्छा नहीं थी, बल्कि कबीर की दिमागी तरंगें थीं जो उसे लगातार सम्मोहित कर रही थीं। कबीर ने समर के करीब आकर उसका हाथ थाम लिया, और उस स्पर्श के साथ ही समर को महसूस हुआ कि उसके अपने दिमाग की नसें फटने लगी हैं। कबीर अपनी खोई हुई यादों और अपने दिमाग के उस हिस्से को वापस खींच रहा था जो समर के भीतर धड़क रहा था, जिससे समर का अपना वजूद मिटने लगा।

समर ने बचने की कोशिश की, लेकिन उसका शरीर पूरी तरह से लकवाग्रस्त हो चुका था, क्योंकि कबीर की दिमागी ताकत के सामने उसकी कोई हैसियत नहीं थी। तहखाने की दीवारें हिलने लगीं और ऊपर से मिट्टी और बर्फ़ के टुकड़े नीचे गिरने लगे, जैसे पूरी हवेली इस आखिरी गुनाह के गवाह को दफ़्न करने के लिए तैयार हो रही हो।

समर की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा, और उसे महसूस हुआ कि उसकी अपनी सारी यादें—उसका बचपन, उसकी पढ़ाई, उसका प्यार—सब कुछ एक-एक करके गायब हो रही हैं। वह अब एक खाली पन्ने की तरह होता जा रहा था, जबकि कबीर के चेहरे पर एक डरावनी और संतुष्ट मुस्कान उभर आई थी।

जब अगली सुबह गांव वालों ने ‘काली कोठी’ को पूरी तरह से ढह चुके मलबे के ढेर में तब्दील देखा, तो किसी को भी अचरज नहीं हुआ, क्योंकि वे जानते थे कि उस जगह का अंत ऐसा ही होना था। पुलिस की छानबीन में मलबे के नीचे से दो कंकाल मिले, जो एक-दूसरे का हाथ थामे हुए इस तरह पड़े थे जैसे वे सदियों पुराने बिछड़े हुए भाई हों।

लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि उन दोनों कंकालों के सिर आपस में कुछ इस कदर जुड़े हुए थे कि यह बताना नामुमकिन था कि कौन सा हिस्सा किसका था। कश्मीर की उस बर्फ़ीली वादी ने हमेशा के लिए बेग परिवार के उस सबसे काले और खौफनाक राज़ को अपने सीने में दफ़्न कर लिया, जिसकी गूंज अब सिर्फ वहां की हवाओं में सुनी जा सकती थी।

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