तेनाली रमन की कहानियां-कुएँ का विवाह
तेनाली राम ने अपने घर के पीछे एक नया कुआँ खुदवाया था, क्योंकि उस समय हर घर में पानी का स्रोत होना आवश्यक माना जाता था। उनके परिवार में एक पुरानी परंपरा थी कि जब भी कोई नया कुआँ बनाया जाता है, तो उसका विधिवत पूजन और “सम्मान” किया जाता है, मानो वह भी परिवार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो। इसी परंपरा के अनुसार एक छोटा-सा आयोजन रखा गया, जिसमें तेनाली राम ने पूरे रीति-रिवाज के साथ कुएँ की पूजा की। इस समारोह में राजा कृष्णदेव राय भी उपस्थित थे।
राजा ने जब यह अनोखी परंपरा देखी तो उन्हें पहले आश्चर्य हुआ और फिर हल्की-सी हँसी भी आ गई। उन्हें यह विचार थोड़ा अजीब और मनोरंजक लगा कि कुएँ का भी इस तरह से सम्मान किया जा रहा है। उन्होंने इसे हल्के में लेते हुए मजाक में एक शरारती योजना बना ली। अगले दिन उन्होंने पूरे दरबार में घोषणा कर दी कि वे अपने कुएँ का विवाह समारोह आयोजित कर रहे हैं और सभी दरबारियों को आदेश दिया कि वे अपने-अपने कुओं को इस विवाह में शामिल होने के लिए भेजें।
यह घोषणा सुनते ही पूरा दरबार असमंजस में पड़ गया। कोई समझ नहीं पा रहा था कि कुएँ भला एक स्थान से दूसरे स्थान कैसे जा सकते हैं। सभी दरबारी राजा के आदेश का विरोध भी नहीं कर सकते थे, लेकिन वे इस बात को लेकर परेशान थे कि इसका पालन कैसे किया जाए। स्थिति गंभीर और भ्रमित करने वाली हो गई थी, और सभी समाधान के लिए तेनाली राम की ओर देखने लगे।
तेनाली राम ने शांत मन से सभी को भरोसा दिलाया कि वे इस समस्या का हल निकालेंगे। उन्होंने सबको समझाया कि राजा की बात का उत्तर भी उसी के अनुसार और बुद्धिमानी से देना होगा। अगले दिन तेनाली के नेतृत्व में सभी दरबारी राजा कृष्णदेव राय के पास पहुँचे। दरबार में राजा मुस्कुराते हुए बैठे थे और शरारती अंदाज़ में पूछने लगे, “क्या तुम लोग अपने कुओं को मेरे कुएँ के विवाह में भेजने नहीं आए हो?”
तेनाली राम आगे आए और विनम्रता से बोले, “महाराज, हमारे कुएँ आपके कुएँ के विवाह में आने के लिए बहुत उत्सुक हैं, लेकिन हमारी परंपरा के अनुसार एक नियम है। जिस कुएँ का विवाह हो रहा है, उसे स्वयं आकर हमारे कुओं को आमंत्रित करना होता है। तभी हमारे कुएँ उस समारोह में शामिल हो सकते हैं।” यह सुनकर दरबार में सन्नाटा छा गया और राजा भी कुछ पल के लिए सोच में पड़ गए।
राजा ने तुरंत कहा, “यह कैसे संभव है? कोई कुआँ अपने स्थान से हटकर दूसरे कुओं को आमंत्रित करने कैसे जाएगा?” जैसे ही राजा ने यह कहा, उन्हें स्वयं एहसास हुआ कि उनकी योजना भी ठीक इसी प्रकार असंभव थी। दरबार में मौजूद सभी लोग समझ गए कि तेनाली राम ने बिना किसी अपमान के बहुत ही सुंदर तरीके से राजा की शरारत का उत्तर दे दिया है।
कुछ क्षणों बाद राजा कृष्णदेव राय मुस्कुरा उठे। उन्होंने अपनी गलती स्वीकार करते हुए वह शरारती आदेश वापस ले लिया। पूरे दरबार ने राहत की सांस ली। इस घटना के बाद सभी ने समझ लिया कि तेनाली राम केवल चतुर ही नहीं, बल्कि ऐसी बुद्धिमत्ता के मालिक हैं जो किसी भी जटिल स्थिति को सम्मान और समझदारी से सुलझा सकते हैं।
खतरनाक फूलदान
विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय को उनके एक सहयोगी ने तीन अत्यंत सुंदर और कीमती फूलदान भेंट किए थे। ये फूलदान इतने आकर्षक थे कि राजा उन्हें अपनी सबसे प्रिय वस्तुओं में गिनने लगे। उन्होंने उनकी सुरक्षा और सफाई के लिए एक विशेष सेवक नियुक्त किया, जिसे हर समय फूलदानों का ध्यान रखना होता था। महल में इन फूलदानों को सम्मान और गर्व का प्रतीक माना जाने लगा था।
एक दिन महल के अंदर एक छोटी-सी घटना घटी। एक चूहा गलती से एक फूलदान के ऊपर चढ़ गया और अचानक उसका संतुलन बिगड़ गया। हल्की सी हलचल से वह फूलदान कांप गया और नीचे गिरकर टूट गया। यह घटना सुनते ही महल में हड़कंप मच गया। राजा कृष्णदेव राय को जब इस बारे में पता चला, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्हें लगा कि यह लापरवाही सेवक की वजह से हुई है, इसलिए उन्होंने बिना पूरी बात समझे उसे मृत्युदंड देने का आदेश दे दिया।
सेवक की जान खतरे में थी और पूरा दरबार इस कठोर निर्णय से स्तब्ध था। जब यह बात तेनाली राम तक पहुँची, तो वे बहुत दुखी हुए। उन्होंने समझ लिया कि यह एक दुर्घटना थी, लेकिन राजा के क्रोध के कारण एक निर्दोष व्यक्ति की जान जाने वाली थी। तेनाली ने तुरंत जेल जाकर सेवक से मुलाकात की और उसे शांत रहकर एक योजना समझाई। उन्होंने कहा कि यदि सही समय पर सही कदम उठाया जाए, तो उसकी जान बचाई जा सकती है।
अगले दिन सेवक को फांसी के लिए ले जाया जा रहा था। जल्लाद ने उससे अंतिम इच्छा पूछी। सेवक ने विनम्रता से कहा कि वह एक बार शेष बचे दो फूलदानों को देखना चाहता है। उसकी यह इच्छा सुनकर दरबार में कुछ लोग हैरान हुए, लेकिन राजा ने अनुमति दे दी। दोनों फूलदान उसके सामने लाए गए। जैसे ही वे उसके पास रखे गए, सेवक अचानक आगे बढ़ा और दोनों फूलदानों को उठाकर जमीन पर पटक दिया, जिससे वे भी चूर-चूर हो गए।
यह देखकर राजा का क्रोध और भी बढ़ गया। उन्होंने गुस्से में पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया, जबकि वह पहले से ही सजा पाने वाला था। सेवक ने शांत और विनम्र स्वर में उत्तर दिया, “महाराज, ये फूलदान तो वैसे भी नष्ट होने वाले थे। यदि किसी दिन ये टूटते, तो इनके साथ मेरी जान भी चली जाती, क्योंकि मुझे इनकी रक्षा का दंड मिलता। इसलिए मैंने सोचा कि कम से कम मरने से पहले मैं वह कारण ही समाप्त कर दूँ, जिससे मेरी मृत्यु निश्चित थी।”
यह सुनकर पूरा दरबार स्तब्ध रह गया। राजा कृष्णदेव राय को अपनी जल्दबाजी और कठोर निर्णय का एहसास हुआ। उन्हें समझ आया कि बिना पूरी सच्चाई जाने किसी को दंड देना न्याय नहीं होता। तेनाली राम की चतुराई और सूझबूझ के कारण न केवल सेवक की जान बच गई, बल्कि राजा को भी न्याय और धैर्य का एक महत्वपूर्ण पाठ मिल गया। अंततः राजा ने सेवक को रिहा करने का आदेश दिया और भविष्य में अधिक सावधानी से निर्णय लेने का वचन दिया।
सबसे बड़ा मूर्ख

एक समय विजयनगर राज्य में एक अरब घोड़ा व्यापारी आया, जिसके पास एक अत्यंत शक्तिशाली, लंबी पूंछ वाला और आकर्षक घोड़ा था। उसकी बनावट और ताकत देखकर राजा कृष्णदेव राय बहुत प्रभावित हो गए। बिना देर किए उन्होंने वह घोड़ा खरीद लिया। व्यापारी बहुत चालाक था और उसने राजा के उत्साह को भांप लिया। उसने तुरंत एक और सौदा पेश किया और कहा कि उसके देश में ऐसे दो और बेहतरीन घोड़े हैं, जिन्हें वह मंगवा सकता है, लेकिन उसके लिए अग्रिम भुगतान करना होगा।
राजा उसकी बातों में आ गए और उन्होंने विश्वास करके व्यापारी को 5000 सोने के सिक्के दे दिए। व्यापारी ने वादा किया कि वह जल्द ही दो और घोड़े लेकर आएगा, लेकिन इसके बाद वह गायब हो गया। दिन, महीने और फिर पूरा एक साल बीत गया, लेकिन व्यापारी का कोई पता नहीं चला। दरबार में धीरे-धीरे सभी को समझ आने लगा कि राजा शायद ठगे गए हैं, लेकिन कोई भी इस विषय पर खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं करता था।
एक शाम तेनाली राम दरबार में बैठे हुए थे। उन्होंने एक सूची बनाई थी जिसमें उन लोगों के नाम थे जो बिना सोचे-समझे दूसरों पर भरोसा करके नुकसान उठाते हैं। संयोग से उस सूची में सबसे ऊपर राजा कृष्णदेव राय का नाम लिखा था। जब राजा ने यह देखा, तो वे बहुत क्रोधित हो गए और तुरंत तेनाली से इसका कारण पूछने लगे। पूरा दरबार सन्नाटे में आ गया और सभी तेनाली की प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगे।
तेनाली राम शांत और विनम्र स्वर में बोले, “महाराज, यदि कोई व्यक्ति किसी अजनबी को केवल उसके वादों पर भरोसा करके बिना किसी प्रमाण के 5000 सोने के सिक्के दे दे, और फिर सालों तक उसके लौटने का इंतजार करे, तो आप उसे क्या कहेंगे?” यह सुनकर राजा कुछ पल के लिए चुप हो गए। उन्हें अपनी गलती का एहसास होने लगा, लेकिन फिर भी वे अपनी बात स्पष्ट करना चाहते थे।
राजा ने पूछा, “यदि वह व्यापारी वापस आ जाए और अपना वादा पूरा कर दे, तब क्या होगा?” तेनाली राम मुस्कुराए और बहुत ही सरलता से उत्तर दिया, “तब महाराज, मैं सूची में आपका नाम हटा दूंगा और सबसे ऊपर उस व्यापारी का नाम लिख दूंगा जिसने वादा निभाया।” यह सुनते ही पूरा दरबार हँसी से गूंज उठा और राजा भी अपनी हँसी रोक नहीं पाए।
इस प्रकार तेनाली राम ने बिना किसी अपमान के, केवल बुद्धिमत्ता और हास्य के माध्यम से यह समझा दिया कि अंधा विश्वास और बिना सोच-समझ के निर्णय कभी-कभी हमें मुश्किल में डाल सकते हैं। राजा कृष्णदेव राय ने भी इस घटना से सीख ली और आगे से किसी भी व्यापारिक निर्णय में अधिक सावधानी बरतने का निश्चय किया।
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तेनाली रमन की मजेदार और प्रेरणादायक कहानी उनकी अद्भुत बुद्धिमत्ता, चतुराई और हाजिरजवाबी का परिचय देती है। जानिए कैसे उन्होंने अपनी सूझबूझ से कठिन समस्याओं का समाधान किया और सभी को अपनी प्रतिभा से प्रभावित किया।
लेखक / मूल रचनाकार: तेनाली रमन
प्रस्तुति: Saying Central Team