यादों के गलियारे और अधूरे ख़्वाब part-1
दिल्ली की गुनगुनी धूप और कड़कड़ाती ठंड के बीच बसा वह पुराना स्कूल, जहाँ हमारी ज़िंदगी के सबसे ख़ूबसूरत और मासूम साल बीते थे, आज भी मेरे ज़हन में पूरी तरह ताज़ा है। रोहित एक ऐसा लड़का था जिसे किताबों से ज़्यादा मैदान की धूल, क्रिकेट के बल्ले और दोस्तों के साथ कैंटीन में समोसे उड़ाने में मज़ा आता था।
बारहवीं कक्षा की शुरुआत हो चुकी थी और बोर्ड परीक्षाओं का भारी दबाव हर छात्र के चेहरे पर साफ़ देखा जा सकता था, लेकिन रोहित के लिए ज़िंदगी अब भी एक बेफ़िक्र नग्मे जैसी थी। उसके माता-पिता उसकी इस लापरवाही से हमेशा चिंतित रहते थे और टीचर्स को लगता था कि वह जीवन में कभी गंभीर नहीं हो पाएगा, पर रोहित की अपनी एक अलग ही दुनिया थी जहाँ वह अपनी शर्तों पर जीता था।
उसी साल जुलाई के महीने में, जब दिल्ली की बारिश ने मौसम को सुहाना बना दिया था, हमारी क्लास में एक नई लड़की ने दाखिला लिया जिसका नाम नैना था। नैना बिल्कुल शांत, सौम्य और अपनी पढ़ाई के प्रति बेहद समर्पित लड़की थी, जिसकी आँखों में एक अजीब सी गहराई और बड़े सपने साफ़ झलकते थे।
वह दिल्ली के एक मशहूर बिज़नेसमैन की बेटी थी लेकिन उसमें रत्ती भर भी घमंड नहीं था, और आते ही उसने अपनी बुद्धिमत्ता से सभी टीचर्स का दिल जीत लिया था। रोहित ने जब पहली बार नैना को क्लास रूम की खिड़की के पास बैठते हुए देखा, तो उसे लगा जैसे उसके दिल की धड़कनें पल भर के लिए थम सी गई हों और हवाओं में कोई अनसुनी धुन गूंजने लगी हो।
दोनों का स्वभाव एक-दूसरे से पूरी तरह विपरीत था; जहाँ रोहित क्लास में पीछे बैठकर मज़ाक करने में माहिर था, वहीं नैना हमेशा अगली बेंच पर बैठकर नोट्स बनाने में व्यस्त रहती थी। एक दिन इकोनॉमिक्स के टीचर ने क्लास टेस्ट के नंबर सुनाए, जिसमें रोहित को सबसे कम और नैना को पूरे नंबर मिले थे, जिसके बाद टीचर ने रोहित को कड़ी फटकार लगाई और उसे नैना के साथ बैठने का आदेश दे दिया ताकि उसकी संगत में रोहित कुछ सीख सके।
यह रोहित के लिए किसी बड़ी सज़ा और किसी गुप्त वरदान जैसा अनोखा मिश्रण था, क्योंकि वह नैना के पास बैठने से कतराता भी था और उसके दिल में एक अजीब सी ख़ुशी भी महसूस हो रही थी।
शुरुआती कुछ दिन दोनों के बीच बिल्कुल ख़ामोशी में बीते, जहाँ नैना सिर्फ़ अपनी किताबों में खोई रहती थी और रोहित खिड़की से बाहर देखते हुए समय बिताने की कोशिश करता था।
एक दोपहर जब रोहित एक मुश्किल थ्योरम को समझने में बुरी तरह जूझ रहा था और हताशा में अपना सिर पकड़ कर बैठ गया, तब नैना ने मुस्कुराते हुए अपनी कॉपी उसकी तरफ़ बढ़ा दी और बहुत ही सरल शब्दों में उसे पूरा कॉन्सेप्ट समझाना शुरू किया। नैना की आवाज़ की मिठास और उसका समझाने का तरीक़ा रोहित के दिल को छू गया, और उस दिन के बाद से उन दोनों के बीच बातचीत का एक सिलसिला शुरू हो गया जो धीरे-धीरे एक गहरी दोस्ती में बदलने लगा।
स्कूल में सालाना इंटर-हाउस डिबेट कॉम्पिटिशन की घोषणा हुई, और पूरे स्कूल को उम्मीद थी कि हमेशा की तरह नैना ही इस प्रतियोगिता में जीत हासिल करेगी, लेकिन इस बार नैना ने रोहित को भी अपने साथ भाग लेने के लिए मना लिया। रोहित इस बात से बेहद घबराया हुआ था क्योंकि उसने कभी मंच पर जाकर बोलने की हिम्मत नहीं की थी, पर नैना ने उस पर पूरा भरोसा जताया और हर शाम स्कूल के बाद लाइब्रेरी में बैठकर उसे तैयारी करवाने लगी।
उन मुलाक़ातों ने रोहित को न केवल एक बेहतर वक्ता बनाया, बल्कि उसने महसूस किया कि वह नैना के प्रति आकर्षित हो रहा है, जो उसकी ज़िंदगी को एक सही दिशा और गहरा मक़सद दे रही थी।
प्रतियोगिता के दिन जब रोहित मंच पर खड़ा हुआ तो उसके पैर काँप रहे थे और पूरा हॉल छात्रों से भरा हुआ था, लेकिन जैसे ही उसकी नज़र सामने बैठी नैना पर पड़ी जिसने मुस्कुराकर उसे थम्स-अप किया, रोहित का सारा डर अचानक ग़ायब हो गया। उसने इतना शानदार और प्रभावशाली भाषण दिया कि पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा और उन दोनों की जोड़ी ने स्कूल को पहला स्थान दिलाया। उस रात रोहित सो नहीं सका; उसे समझ आ गया था कि नैना सिर्फ़ उसकी एक अच्छी दोस्त नहीं है, बल्कि वह उसका पहला सच्चा प्यार बन चुकी है जिसे वह खोने की कल्पना भी नहीं कर सकता था।
जैसे-जैसे बोर्ड परीक्षाएं नज़दीक आ रही थीं, पढ़ाई का तनाव अपने चरम पर पहुँच चुका था और दोनों का साथ में बैठना और बातें करना काफ़ी कम हो गया था क्योंकि नैना पूरी तरह सेंट स्टीफेंस कॉलेज में एडमिशन लेने के अपने सपने को पूरा करने में जुट गई थी।
रोहित ने भी नैना के स्तर तक पहुँचने के लिए अपनी रातों की नींद हराम कर दी और पहली बार अपनी ज़िंदगी में बेहद गंभीरता से पढ़ाई करना शुरू किया ताकि वह उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चल सके। विदारी समारोह (फेयरवेल) के दिन, जब सब रो रहे थे और एक-दूसरे की शर्ट पर ऑटोग्राफ लिख रहे थे, रोहित ने नैना की डायरी में चुपके से अपने दिल की बात लिख दी और उम्मीद की कि वह इसे पढ़कर उसके जज्बातों को समझेगी।
जब बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम आए, तो नैना ने पूरे शहर में टॉप किया था और उसका सेंट स्टीफेंस कॉलेज में एडमिशन पक्का हो गया था, जबकि रोहित ने भी अपनी मेहनत के दम पर बहुत अच्छे अंक हासिल किए थे और उसे दिल्ली यूनिवर्सिटी के ही एक दूसरे कॉलेज में दाखिला मिल गया था।
परिणाम वाले दिन जब रोहित ने नैना को बधाई देने के लिए फोन किया, तो उसकी आवाज़ में एक अजीब सा सूनापन था क्योंकि उसके माता-पिता उसे आगे की पढ़ाई के लिए लंदन भेजने की तैयारी कर रहे थे। यह सुनकर रोहित का दिल जैसे टुकड़ों में टूट गया, और उसने महसूस किया कि उसका पहला प्यार शायद शुरू होने से पहले ही हमेशा के लिए ख़त्म होने की कगार पर पहुँच चुका है।
यादों के गलियारे और अधूरे ख़्वाब part-2

कॉलेज की ज़िंदगी स्कूल से बिलकुल अलग थी; दिल्ली यूनिवर्सिटी का नॉर्थ कैंपस अपनी आज़ादी, राजनीति, कैफ़े और विशाल पुस्तकालयों के लिए जाना जाता था, जहाँ हर कोई अपनी पहचान बनाने की जद्दोजहद में लगा हुआ था। नैना के लंदन जाने का प्लान आख़िरकार उसके दादाजी की तबीयत ख़राब होने के कारण टल गया था और उसने सेंट स्टीफेंस में ही दाखिला ले लिया था, जिससे रोहित के बुझे हुए दिल को एक नई उम्मीद और संजीवनी मिल गई थी। हालाँकि वे दोनों अब एक ही कैंपस में थे, लेकिन अलग-अलग कॉलेजों और अलग-अलग कोर्सेज की वजह से उनके बीच पहले जैसी रोज़ाना की मुलाक़ातें और लंबी बातें अब मुमकिन नहीं रह गई थीं।
रोहित ने कॉलेज में आकर खुद को पूरी तरह बदलने का फ़ैसला किया; उसने थिएटर सोसाइटी जॉइन कर ली और अपनी अभिनय कला के दम पर जल्द ही पूरे कैंपस में मशहूर हो गया, जबकि नैना इकोनॉमिक्स सोसाइटी की प्रेसिडेंट बन चुकी थी।
एक शाम जब दोनों की मुलाक़ात कैंपस के मशहूर ‘सुदाम की चाय’ पर हुई, तो रोहित ने देखा कि नैना के साथ उसकी क्लास का है बेहद अमीर और होशियार लड़का अर्णव खड़ा था, जो नैना के काफ़ी नज़दीक लग रहा था। अर्णव और नैना को इस तरह साथ देखकर रोहित के अंदर जलन और हीनभावना की एक तीखी लहर दौड़ गई, और उसने महसूस किया कि वह नैना की हाई-प्रोफाइल कॉलेज लाइफ में कहीं फिट नहीं बैठता।
उस दिन के बाद से रोहित ने नैना से दूरी बनानी शुरू कर दी और खुद को पूरी तरह से थिएटर और पढ़ाई के दलदल में झोंक दिया ताकि वह इस मानसिक दर्द से उबर सके। कॉलेज के दूसरे साल में एक बड़ा इंटर-कॉलेज यूथ फेस्टिवल आयोजित हुआ, जहाँ रोहित के नाटक का मुक़ाबला सेंट स्टीफेंस के नाटक से था, जिसका निर्देशन खुद अर्णव कर रहा था और नैना मुख्य दर्शक दीर्घा में बैठी थी।
रोहित ने मंच पर अपनी पूरी आत्मा उड़ेल दी और एक ऐसे आशिक का किरदार निभाया जो अपनी किस्मत और समाज से लड़ रहा है; उसकी परफॉर्मेंस इतनी जीवंत थी कि नैना की आँखों से आँसू छलक पड़े और रोहित के कॉलेज ने बेस्ट प्ले का अवॉर्ड जीत लिया।
जीत के जश्न के बीच, जब सब रोहित को बधाइयाँ दे रहे थे, नैना भीड़ को चीरती हुई उसके पास आई और उसने रोहित का हाथ पकड़कर उसे एक शांत कोने में ले जाकर पूछा कि उसने उससे बात करना क्यों बंद कर दिया।
रोहित की आँखों में आँसू आ गए और उसने गुस्से और हताशा में कह दिया कि वह अर्णव जैसे अमीर और कामयाब लोगों के बीच अपनी जगह नहीं बना सकता और वह उसकी ज़िंदगी में केवल एक रुकावट है। नैना ने बिना कुछ सोचे रोहित के गाल पर एक हल्का सा थप्पड़ मारा और रोते हुए कहा कि उसने स्कूल के दिनों में उसकी डायरी में लिखे हर एक शब्द को पढ़ा था और वह तब से सिर्फ़ और केवल रोहित से ही प्यार करती है।
यह स्वीकारोक्ति उन दोनों के जीवन का सबसे भावुक और जादुई मोड़ साबित हुई; दिल्ली की उस ठंडी शाम को हडसन लेन के एक छोटे से कैफ़े में बैठकर दोनों ने अपने सारे गिले-शिकवे दूर किए और हमेशा एक-दूसरे का साथ निभाने का वादा किया।
लेकिन ज़िंदगी इतनी आसान नहीं होती, क्योंकि कॉलेज के आख़िरी साल के आते-आते प्लेसमेंट और करियर का दबाव उन पर भारी पड़ने लगा था और नैना को अपनी आगे की पढ़ाई के लिए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से स्कॉलरशिप का ऑफर मिल गया था। इस बार रोहित ने अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं को किनारे रखकर नैना को अपने सपनों को पूरा करने के लिए प्रोत्साहित किया, क्योंकि वह जानता था कि सच्चा प्यार किसी को बाँधने का नाम नहीं बल्कि उड़ने के लिए पंख देने का नाम है।
नैना के लंदन जाने के बाद का समय रोहित के लिए बेहद कठिन और अकेलापन से भरा था, लेकिन उसने इस अलगाव को अपनी कमज़ोरी बनाने के बजाय अपनी सबसे बड़ी ताक़त में बदल लिया। उसने दिन-रात कड़ी मेहनत की, सिविल सर्विसेज परीक्षा (UPSC) की तैयारी शुरू की और खुद को पूरी तरह से पढ़ाई के प्रति समर्पित कर दिया ताकि वह नैना के माता-पिता के सामने एक योग्य जीवनसाथी के रूप में खड़ा हो सके। उनके बीच हज़ारों मील की दूरी थी और टाइम ज़ोन का बड़ा अंतर था, लेकिन हर रात एक छोटी सी वीडियो कॉल उनके बीच के इस फासले को मिटा देती थी और उन्हें अपने-अपने लक्ष्यों के प्रति डटे रहने का हौसला देती थी।
तीन साल की अथक मेहनत, असफलताओं और मानसिक तनाव से गुजरने के बाद, जब यूपीएससी का अंतिम परिणाम घोषित हुआ, तो रोहित ने पूरे देश में शानदार रैंक हासिल की थी और उसका चयन आईएएस (IAS) अधिकारी के रूप में हो गया था।
यह ख़बर सुनते ही रोहित की आँखों से ख़ुशी के आँसू बह निकले और उसने सबसे पहला फोन लंदन में बैठी नैना को किया, जो यह सुनकर खुशी से झूम उठी और उसने उसी वक़्त भारत वापस लौटने का टिकट बुक करवा लिया। रोहित के माता-पिता की आँखों में गर्व के आँसू थे और पूरा मोहल्ला ढोल-नगाड़ों के साथ इस ऐतिहासिक कामयाबी का जश्न मना रहा था, लेकिन रोहित का दिल सिर्फ़ नैना के दीदार के लिए बेकरार था।
दिल्ली एयरपोर्ट के अराइवल गेट पर जब तीन साल बाद नैना और रोहित एक-दूसरे के सामने आए, तो समय जैसे पल भर के लिए ठहर गया और उनकी आँखों ने वो सब कह दिया जो शब्दों में बयां करना नामुमकिन था। नैना दौड़कर रोहित के गले लग गई और रोहित ने उसे कसकर अपनी बाहों में भर लिया, जहाँ स्कूल के उस बेंच से शुरू हुआ एक मासूम सफ़र आज अपनी मुकम्मल मंज़िल पर पहुँच चुका था। उन दोनों ने साबित कर दिया था कि अगर प्यार सच्चा हो और उसमें एक-दूसरे को आगे बढ़ाने की चाह हो, तो दुनिया की कोई भी दूरी या कठिनाई आपके सपनों और आपकी मोहब्बत को हासिल करने से नहीं रोक सकती।