अपनी गलतियों से उजड़ता एक आदमी- मुंशी प्रेमचंद
आज जब मैं अपनी टूटी हुई जिंदगी के पन्ने पलटता हूँ, तो हर पन्ने पर केवल पछतावा दिखाई देता है। कभी मैं सम्मानित, शिक्षित और सुखी व्यक्ति माना जाता था। धन, प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य मेरे कदमों में बिछे रहते थे। ऊँचा खानदान, अच्छी शिक्षा और आकर्षक व्यक्तित्व—ईश्वर ने मुझे किसी चीज़ की कमी नहीं दी थी।
मेरा जीवन आराम और वैभव से भरा हुआ था। शानदार सैरें, महंगे वस्त्र, सुख-सुविधाओं से भरा घर और समाज में ऊँचा स्थान—सब कुछ मेरे पास था। मगर इंसान जब अपनी खुशियों की कीमत समझना छोड़ देता है, तभी उसका पतन शुरू होता है। मुझे कभी यह एहसास ही नहीं हुआ कि मेरे पास जो सबसे बड़ी दौलत है, वह मेरा परिवार है।
मेरी पत्नी इंदुमती एक अत्यंत सरल, पतिव्रता और सहनशील स्त्री थी। उसने कभी मेरे किसी व्यवहार का विरोध नहीं किया। मेरी हर बात को उसने अपना धर्म समझकर स्वीकार किया। घर में दो प्यारे बच्चे थे, जिनकी मुस्कान से घर स्वर्ग जैसा लगता था। लेकिन मेरे भीतर धीरे-धीरे एक ऐसी भटकन जन्म लेने लगी, जिसने मेरी समझ छीन ली। मैं देर रात घर लौटने लगा। हर रात नए-नए बहाने बनाता और झूठ बोलकर पत्नी की आँखों में धूल झोंकने का प्रयास करता। मगर वह सब समझती थी।
उसकी खामोशी मुझे रोक सकती थी, अगर मैं समझने वाला इंसान होता। वह झगड़ा नहीं करती थी, केवल चुपचाप आँसू बहा लेती थी। आज सोचता हूँ, काश वह मुझसे लड़ती, मुझे रोकती, मेरा अहंकार तोड़ देती। शायद तब मैं इस अंधे रास्ते पर इतना आगे न बढ़ता।
एक दिन शाम को मैं शहर की आनंदवाटिका में घूमने गया। वहीं मैंने पहली बार एक माली की लड़की को देखा, जिसका नाम फूलमती था। वह साधारण रूप-रंग वाली लड़की थी, मगर उसकी अनदेखी ने मेरे भीतर एक अजीब आकर्षण जगा दिया। उसने मेरी ओर देखा भी नहीं और अपने काम में लगी रही। यही बात मेरे अहंकार को चुभ गयी। मैं रोज़ बाग में जाने लगा। कभी फूल तोड़ने का बहाना करता, कभी टहलने का।
धीरे-धीरे उसकी झिझक कम होने लगी, मगर मैं अब भी उससे खुलकर बात नहीं कर पाता था। मेरे भीतर वासना और स्वार्थ का खेल चल रहा था, जिसे मैं प्रेम का नाम भी नहीं दे सकता।
आखिर मैंने एक चाल चली। एक दिन अपने पालतू कुत्ते को साथ लेकर गया और इशारे से उसे फूलमती की ओर दौड़ा दिया। वह डरकर गिर पड़ी। तब मैं बनावटी चिंता दिखाते हुए उसे बचाने पहुँचा। उसी घटना ने हमारे बीच बातचीत का रास्ता खोल दिया। धीरे-धीरे मुलाकातें बढ़ीं और मैं पूरी तरह उसके मोह में फँसता चला गया।
अब मेरा मन घर से उचटने लगा था। पत्नी और बच्चों का साथ मुझे बोझ लगने लगा। लेकिन भीतर कहीं अपराधबोध भी था, इसलिए मैं पत्नी के सामने बनावटी प्रेम दिखाने लगा। उसकी छोटी-छोटी इच्छाएँ पूरी करता, मगर दिल कहीं और भटकता रहता।
समय बीतने के साथ मेरा व्यवहार बदलने लगा। अब मैं घर की जरूरतों की ओर ध्यान ही नहीं देता था। पत्नी के कपड़े पुराने हो जाएँ, घर में राशन कम पड़ जाए, बच्चों की जरूरतें अधूरी रह जाएँ—मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था। मेरी सारी कमाई फूलमती पर खर्च होने लगी। मैं उसके लिए गहने खरीदता, महंगे कपड़े लाता और रात-रात भर सुनारों की दुकानों पर बैठा रहता। धीरे-धीरे मैंने अपने घर को उपेक्षा और दुख के अंधेरे में धकेल दिया। इंदुमती सब सहती रही, मगर उसके मन में दर्द की आग लगातार जलती रही।
एक दिन बाग में फूलमती पूरी सज-धज के साथ मेरे सामने खड़ी थी। तभी अचानक महाराजा अपने साथियों के साथ वहाँ आ पहुँचे। फूलमती घबराकर झाड़ियों में छिप गयी, मगर महाराजा की नजर उस पर पड़ गयी। उन्होंने मुझसे पूछा कि वह कौन है। मैं डर गया और झूठ बोल बैठा कि वह माली की लड़की है। तभी असली माली भी वहाँ आ गया।
पूछताछ शुरू हुई और बात धीरे-धीरे खुलने लगी। माली ने रोते हुए कहा कि उसकी लड़की अमीर लोगों के साथ घूमती है और उसने उसके परिवार की इज्जत मिट्टी में मिला दी है। महाराजा सब समझ चुके थे। उस समय मेरा सिर शर्म से झुक गया। मुझे लगा कि मेरी बर्बादी अब बहुत दूर नहीं है।
कुछ दिनों बाद एक बूढ़ी औरत मेरे घर आई। उसके जाने के बाद मैंने पत्नी से पूछताछ की। मेरे मन में संदेह भर गया था कि कहीं वह किसी गलत रास्ते पर तो नहीं चल रही। मैंने गुस्से में इंदुमती पर आरोप लगाए। मगर उस दिन पहली बार मेरी पत्नी का दर्द बाहर आया। वह रो पड़ी और बोली कि उसने उस बूढ़ी औरत को केवल अपने दुख बताए थे—मेरी बेवफाई, मेरी बेरुखी और घर की आर्थिक परेशानियाँ।
उसने बताया कि घर चलाने के लिए उसे अपने गहने तक बेचने पड़े। यह सुनकर मेरे भीतर शर्म और भय दोनों पैदा हुए। मुझे समझ आने लगा कि मेरी करतूतों ने घर की नींव हिला दी है।
अगले ही दिन दरबार से बुलावा आ गया। महाराजा ने मुझे कठोर शब्दों में डाँटा। उन्होंने कहा कि मुझे जो सम्मान और धन मिला था, उसका उद्देश्य अपने परिवार और वंश की रक्षा करना था, न कि ऐयाशी और चरित्रहीनता में डूब जाना। उन्होंने मेरी सारी सुविधाएँ और अधिकार छीन लिए और मेरे स्थान पर मेरी पत्नी का नाम दर्ज कर दिया। अब घर और संपत्ति की जिम्मेदारी इंदुमती को सौंप दी गयी।
मैं भीतर से पूरी तरह टूट चुका था। जिस घर का मैं मालिक था, उसी घर में अब मेरे लिए कोई स्थान नहीं बचा था।
मैं बिना कुछ कहे शहर छोड़कर बंबई चला गया। वहाँ एक मिल में मामूली नौकरी करने लगा। जीवन किसी तरह चलने लगा, मगर आत्मा हर दिन पछतावे की आग में जलती रही। कुछ समय बाद चोरी-छिपे अपने पुराने घर गया। देखा, घर पहले से कहीं अधिक व्यवस्थित और खुशहाल था। बच्चे खेल रहे थे, दरवाजे पर रोशनी जगमगा रही थी और हर ओर साफ-सफाई थी। मुझे पता चला कि इंदुमती ने अपनी समझदारी से सब सँभाल लिया है। दूसरी ओर फूलमती किसी दूसरे अमीर आदमी के साथ चली गयी थी। उस रात मैं दूर खड़ा अपने ही घर को देखता रहा।
मेरी आँखों में आँसू थे, क्योंकि मैंने समझ लिया था कि इंसान की सबसे बड़ी बर्बादी तब होती है, जब वह सच्चे प्रेम और अपने परिवार की कद्र करना छोड़ देता है।
अधूरी चाहत में छिपा प्रेम का असली सुख – मुंशी प्रेमचंद

एक रात पड़ोस में अचानक बहुत शोर मचा। खिड़की से झाँककर देखा, तो एक पानवाला अपनी पत्नी को बेरहमी से पीट रहा था। वह स्त्री रोती हुई चुपचाप मार सह रही थी, लेकिन उस आदमी के भीतर ज़रा भी दया नहीं थी। आखिर जब सहनशक्ति जवाब दे गयी, तो वह उठ खड़ी हुई और गुस्से में बोली कि अब वह इस घर में एक पल भी नहीं रहेगी।
उसने कहा कि भीख माँगकर गुज़ारा कर लेगी, लेकिन ऐसे निर्दयी आदमी के साथ नहीं रहेगी। यह कहकर वह अपनी पुरानी साड़ी उठाकर घर से निकल पड़ी। कुछ दूर जाकर वह लौटी और संदूक से कुछ पैसे निकालने लगी, मगर उसके पति ने झपटकर उसका हाथ पकड़ लिया और पैसे छीन लिए। वह दृश्य देखकर मेरा मन भीतर तक काँप उठा। उसी क्षण मुझे पहली बार स्त्री की असली बेबसी और समाज में उसकी स्थिति का एहसास हुआ।
मैं देर तक खिड़की पर खड़ी रही, यह सोचते हुए कि शायद वह स्त्री लौट आएगी या उसका पति उसे मनाने जाएगा। मगर दोनों में से कुछ भी नहीं हुआ। उस घटना ने मेरे मन में अजीब बेचैनी भर दी। मैं सोचने लगी कि यह दुकान दोनों की मेहनत से चलती थी। पुरुष तो इधर-उधर घूमता रहता था, जबकि उसकी पत्नी दिन-रात मेहनत करती थी।
फिर भी अधिकार केवल पुरुष का था। वह जब चाहे स्त्री को घर से निकाल सकता था। इसी सोच ने मेरे मन को इतना विचलित कर दिया कि रात भर नींद आँखों से कोसों दूर रही। बाहर चाँदनी फैली हुई थी और आसमान में बादल चाँद के पास आकर बिखर जाते थे। मुझे वे बादल ऐसी स्त्रियाँ लग रही थीं, जिन्हें प्रेम और अधिकार के नाम पर कुचल दिया गया हो।
मैंने खिड़की बंद कर दी और अपने पति की ओर देखा। वह गहरी नींद में सो रहे थे। उनका चेहरा शांत और तेजस्वी था। कभी यही चेहरा मेरे लिए संसार का सबसे सुंदर दृश्य हुआ करता था। उनकी बाँहों में सिमटकर मुझे ऐसा लगता था, मानो जीवन का हर सुख मिल गया हो। मगर अब न जाने कितने दिन बीत चुके थे, जब मैंने उस प्रेम को उसी तीव्रता से महसूस किया हो।
पाँच वर्ष पहले विवाह के समय उनकी एक झलक पाने के लिए मेरा मन कितना बेचैन रहता था। उनकी आँखों की हल्की मुस्कान मेरे हृदय में अनगिनत सपने जगा देती थी। उस समय उनका एक स्पर्श भी मुझे रोमांचित कर देता था। लेकिन आज वही व्यक्ति हर समय मेरे सामने रहते हुए भी मुझसे दूर लगता था।
पहले जब वह बाहर जाते थे, तो मैं दरवाजे तक उन्हें छोड़ने जाती थी। अगर जाते-जाते वह पीछे मुड़कर मुस्करा देते, तो मेरा पूरा दिन खुशी में बीत जाता था। शाम होते ही मैं छत पर चढ़कर उनके लौटने का इंतजार करती रहती थी। दूर से उनकी झलक मिलते ही मन में जैसे उत्सव शुरू हो जाता था।
मगर अब उनका आना-जाना मुझे महसूस तक नहीं होता। पहले उनकी छोटी-छोटी बातें भी मुझे आकर्षित करती थीं—किसी बच्चे को गोद में उठाना, कुत्ते को प्यार करना या पौधों को पानी देना। तब उनका हर व्यवहार मेरे लिए प्रेम का एक नया रूप था। लेकिन अब वही सब सामान्य और नीरस लगने लगा था। मैं समझ नहीं पा रही थी कि बदलाव उनमें आया है या मेरे मन में।
एक दिन मुझे याद आया कि विवाह के शुरुआती दिनों में उन्होंने मुझे फूलों का एक छोटा-सा गुलदस्ता दिया था। वह साधारण फूल मेरे लिए किसी अनमोल खजाने से कम नहीं थे। मैं बार-बार उन्हें देखती, छूती और अपने पास सँभालकर रखती। जब वे सूख गए, तब भी मैंने उन्हें फेंका नहीं, बल्कि अपने संदूक में सुरक्षित रख दिया। आज उनके दिए हुए महंगे गहने और रत्नजटित हार मेरे पास हैं, मगर उनमें वह आनंद नहीं मिलता।
मैंने संदूक खोलकर वह सूखा हुआ गुलदस्ता निकाला। उसे हाथ में लेते ही मेरी नस-नस में जैसे पुरानी स्मृतियाँ दौड़ गयीं। उन मुरझाई पंखुड़ियों में मुझे वह प्रेम महसूस हुआ, जो आज की चमकदार चीजों में कहीं खो चुका था।
फिर मुझे उनका एक पुराना पत्र याद आया, जो उन्होंने कॉलेज के दिनों में लिखा था। मैंने उसे निकालकर पढ़ा। उसमें बड़े साहित्यिक प्रेम-वाक्य नहीं थे। बस साधारण-सी शिकायतें थीं कि मैंने कई दिनों से पत्र क्यों नहीं लिखा और अगर मैं पत्र नहीं भेजूँगी, तो वह छुट्टियों में घर नहीं आएँगे। मगर उन्हीं भोले शब्दों में सच्चा अपनापन और बेचैनी छिपी हुई थी।
आज भी वह पत्र पढ़ते समय मेरा हृदय वैसे ही धड़कने लगा, जैसे वर्षों पहले धड़का था। अब भी वह मुझे पत्र लिखते थे, मगर उनमें केवल सजावटी शब्द और औपचारिक प्रेम होता था। उनमें वह बेचैनी, वह तड़प और वह अधिकार नहीं था, जो पहले हुआ करता था।
मुझे धीरे-धीरे समझ आने लगा कि प्रेम का सबसे मधुर रूप शायद अभिलाषा में ही छिपा होता है। जब प्रेम पूरी तरह मिल जाता है, तब उसकी उत्कंठा धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। पहले मैं अपने पति को पाने के लिए तरसती थी, इसलिए हर छोटी बात भी अनमोल लगती थी।
अब वह हर समय मेरे पास थे, मगर उसी सहज उपलब्धता ने प्रेम की तीव्रता को कम कर दिया था। मुझे याद आया कि तीज के व्रत पर मैंने देवी से केवल यही वर माँगा था कि हम दोनों कभी अलग न हों। देवी ने मेरी इच्छा पूरी कर दी, मगर शायद उसी के साथ प्रेम की वह बेचैन अभिलाषा भी समाप्त हो गयी, जिसमें असली आनंद छिपा था।
रात की नीरवता में अचानक कहीं से गीत की आवाज़ सुनाई दी—
“अनोखे-से नेही के त्याग,
निराले पीड़ा के संसार,
कहाँ होते हो अंतर्धान,
लुटा करके सोने-सा प्यार।”
इन पंक्तियों ने मेरे हृदय को भीतर तक झकझोर दिया। मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। ऐसा लगा, जैसे कोई मेरे जीवन के खोए हुए प्रेम को पुकार रहा हो। उसी समय मेरे पति की नींद खुल गई। उन्होंने मुझे रोते देखा और कारण पूछा। मैं अपने आँसुओं को रोक न सकी।
मैंने उनसे कहा कि प्रेम केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि उस तड़प का नाम है, जिसमें इंसान रो भी सके। पहले वह मेरी बात समझ नहीं पाए, मगर तभी फिर वही गीत गूँजा। इस बार मैंने उनके चेहरे पर भी कंपन देखा। उनकी आँखों में आँसू आ गए। उसी क्षण मैं उनके सीने से लिपट गई। वर्षों बाद मुझे फिर वही धड़कन सुनाई दी, वही सच्चा प्रेम महसूस हुआ, जिसकी अभिलाषा में मेरा मन इतने दिनों से भटक रहा था।
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मुंशी प्रेमचंद की प्रेरणादायक और यथार्थवादी कहानी समाज, मानवता, नैतिकता और जीवन के गहरे सत्य को सरल भाषा में प्रस्तुत करती है। उनकी रचनाएँ पाठकों को सोचने, सीखने और बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देती हैं।
लेखक / मूल रचनाकार: मुंशी प्रेमचंद
प्रस्तुति: Saying Central Team