दादी माँ की कहानियाँ

दादी माँ की कहानियाँ – काम करने की इच्छा

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दादी माँ की कहानियाँ बचपन की सबसे सुंदर यादों में से एक होती हैं। इन कहानियों में प्यार, संस्कार, सीख और मनोरंजन का अनोखा मेल होता है। दादी माँ अपनी मीठी आवाज़ में ऐसी रोचक कहानियाँ सुनाती थीं, जिन्हें सुनकर बच्चे खुशी से भर जाते थे और साथ ही जीवन की अच्छी बातें भी सीखते थे।

इन कहानियों में कभी जानवरों की चतुराई होती है, कभी राजाओं की बहादुरी और कभी साधारण लोगों की समझदारी। आज भी दादी माँ की कहानियाँ बच्चों और बड़ों दोनों को उतनी ही पसंद आती हैं। हम आपके सामने लोकप्रिय दादी माँ की कहानियाँ प्रस्तुत कर रहे हैं, जिन्हें आप ज़रूर पढ़ें।

दादी माँ की कहानियाँ – काम करने की इच्छा

एक बड़े और समृद्ध नगर में मुकुल नाम का एक युवक रहता था। उसके पिता शहर के प्रसिद्ध व्यापारी थे और उनके पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी। आलीशान मकान, नौकर-चाकर, गाड़ियाँ और सुख-सुविधा की हर चीज उनके घर में मौजूद थी। मुकुल भी पढ़ा-लिखा, समझदार और विनम्र स्वभाव का युवक था।

व्यापार में वह अपने पिता का हाथ बँटाता था और अपनी मेहनत तथा बुद्धिमानी से लोगों का सम्मान प्राप्त कर चुका था। लेकिन इतनी समृद्धि होने के बावजूद उसके माता-पिता की एक चिंता थी—मुकुल का विवाह। वे चाहते थे कि उनके बेटे को ऐसी जीवनसंगिनी मिले जो केवल सुंदर ही न हो, बल्कि अच्छे संस्कारों वाली, समझदार और घर के काम-काज में निपुण भी हो।

मुकुल के माता-पिता कई परिवारों से मिल चुके थे। कई लड़कियों की तस्वीरें भी देखी गईं, लेकिन मुकुल जल्दबाज़ी में कोई निर्णय नहीं लेना चाहता था। उसका मानना था कि केवल बाहरी सुंदरता से घर नहीं चलता। वह ऐसी पत्नी चाहता था जो मेहनती हो, जिम्मेदार हो और जीवन की कठिनाइयों में उसका साथ दे सके।

मुकुल के कई मित्र थे और उनमें से कुछ की बहनें विवाह योग्य थीं। इसलिए मुकुल अक्सर अपने मित्रों के घर जाया करता था। वह वहाँ सामान्य बातचीत करता, परिवार के लोगों से मिलता और चुपचाप यह समझने की कोशिश करता कि घर की लड़कियों का स्वभाव कैसा है। वह कभी किसी को अपने आने का असली उद्देश्य नहीं बताता था, क्योंकि उसे लगता था कि यदि लोग जान जाएँगे तो वे दिखावा करने लगेंगे और उसे सच्चाई का पता नहीं चल पाएगा।

एक दिन मुकुल अपने मित्र अरुण के घर गया। अरुण का परिवार साधारण लेकिन सम्मानित परिवार था। जब मुकुल घर के अंदर पहुँचा तो उसकी नज़र कमरे के एक कोने पर पड़ी, जहाँ सूत के कई बड़े-बड़े गट्ठर रखे हुए थे। पास में एक चरखा भी रखा था। ऐसा लग रहा था जैसे वहाँ बहुत मेहनत से सूत काता गया हो। मुकुल को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने सोचा कि इतना सारा सूत तैयार करना कोई आसान काम नहीं है। उसने मन ही मन अनुमान लगाया कि यदि कोई व्यक्ति इतने सूत से कपड़ा बुने, तो उसमें कई सप्ताह लग सकते हैं।

मुकुल ने उत्सुकता से अपने मित्र की माँ से पूछा, “माँ जी, यह इतना सारा सूत किसने काता है?”
अरुण की माँ मुस्कुराईं और बोलीं, “बेटा, यह सब मेरी बेटी ने काता है। वह घर के सारे काम भी करती है और सूत बुनने में भी बहुत तेज है।”

मुकुल ने आश्चर्य से पूछा, “इतने सारे सूत का कपड़ा बुनने में तो एक महीने से भी अधिक समय लग जाएगा, है ना?”
मित्र की माँ को कहीं न कहीं यह अंदाज़ा हो गया था कि मुकुल यह सवाल यूँ ही नहीं पूछ रहा। उन्होंने सोचा कि यदि मुकुल पर उनकी बेटी का अच्छा प्रभाव पड़े तो शायद रिश्ता बनने की संभावना हो सकती है। इसलिए उन्होंने गर्व से कहा, “अरे नहीं बेटा, मेरी बेटी चाहे तो इसे दस-पंद्रह दिनों में ही बुन सकती है।”

मुकुल ने उनकी बात सुनी, लेकिन उसे पूरा विश्वास नहीं हुआ। उसने उस समय कुछ नहीं कहा। वह मुस्कुराकर सामान्य बातें करता रहा। थोड़ी देर बाद जब वह वापस जाने लगा, तब उसने चुपके से एक छोटी-सी बात की। कमरे में रखे सूत के गट्ठरों के नीचे उसने अलमारी की चाबी छिपा दी। उसने यह काम इतने सावधानी से किया कि किसी की नज़र उस पर नहीं पड़ी।

करीब एक महीने बाद मुकुल फिर अपने मित्र के घर पहुँचा। इस बार घर का माहौल थोड़ा परेशान दिखाई दे रहा था। अरुण की माँ चिंतित थीं। मुकुल ने कारण पूछा तो उन्होंने दुखी होकर कहा, “बेटा, पिछले एक महीने से हमारी अलमारी की चाबी गायब है। हमने पूरे घर में ढूँढ लिया, लेकिन उसका कहीं पता नहीं चला।”

मुकुल शांत स्वर में बोला, “क्या आपने हर जगह अच्छी तरह देखा?” उन्होंने कहा, “हाँ बेटा, कोई जगह बाकी नहीं छोड़ी।” तब मुकुल धीरे से उस कोने की ओर बढ़ा जहाँ सूत के गट्ठर रखे थे। उसने एक गट्ठर उठाया और उसके नीचे से वही चाबी निकालकर अरुण की माँ के हाथ में रख दी। चाबी ठीक उसी जगह पड़ी थी जहाँ मुकुल ने एक महीने पहले उसे छिपाया था।

यह देखकर अरुण की माँ हैरान रह गईं। मुकुल मुस्कुराया और बहुत विनम्रता से बोला, “माँ जी, आपने कहा था कि आपकी बेटी इस सूत को दस-पंद्रह दिनों में बुन सकती है। हो सकता है कि वह बहुत तेज काम करती हो, लेकिन उसके लिए काम शुरू करना भी तो ज़रूरी है। पिछले एक महीने में इस गट्ठर को किसी ने छुआ तक नहीं, तभी तो चाबी अभी तक यहीं पड़ी है।”

मुकुल की बात सुनकर अरुण की माँ चुप हो गईं। वे समझ गई थीं कि मुकुल ने बिना कुछ कहे सच्चाई जान ली है। उन्होंने महसूस किया कि केवल किसी काम का ज्ञान होना पर्याप्त नहीं होता। यदि व्यक्ति के अंदर काम करने की इच्छा, मेहनत करने का उत्साह और जिम्मेदारी का भाव न हो, तो उसकी योग्यता भी बेकार हो जाती है।

उस दिन मुकुल जब वहाँ से लौटा तो उसके मन में एक बात पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी थी। जीवन में सफलता केवल हुनर से नहीं मिलती, बल्कि उस हुनर को मेहनत और लगन से उपयोग करने की इच्छा से मिलती है। काम आना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है काम को पूरे मन से करने की चाह रखना। यही इच्छा इंसान को आगे बढ़ाती है और उसे दूसरों से अलग बनाती है।

मूल्यवान वस्तु

बहुत समय पहले एक विशाल और समृद्ध राज्य था, जहाँ राजा मयंक और रानी गार्गी रहते थे। उनका महल दूर-दूर तक अपनी भव्यता और सुंदरता के लिए प्रसिद्ध था। महल के ऊँचे-ऊँचे स्तंभ, चमचमाते आँगन और रंग-बिरंगे बगीचे देखने वालों का मन मोह लेते थे। लेकिन उस महल की सबसे बड़ी सुंदरता राजा और रानी का प्रेम था। दोनों एक-दूसरे से अत्यंत प्रेम करते थे। राजा मयंक अपनी रानी गार्गी का बहुत सम्मान करते थे और रानी भी पूरे मन से अपने पति और राज्य की सेवा करती थीं। प्रजा भी उन्हें आदर्श दंपति मानती थी।

रानी गार्गी केवल सुंदर ही नहीं थीं, बल्कि बहुत बुद्धिमान और दयालु भी थीं। वे गरीबों की सहायता करतीं, बीमारों का हाल पूछतीं और राज्य के लोगों की परेशानियों को समझती थीं। इसी कारण प्रजा उन्हें बहुत प्रेम करती थी। राजा मयंक भी पहले उनकी हर बात पर गर्व करते थे। लेकिन कहते हैं कि कभी-कभी एक छोटी-सी बात भी मन में ऐसा ज़हर घोल देती है, जो रिश्तों को बदल देता है।

एक दिन राजा मयंक के दरबार में एक प्रसिद्ध ज्योतिषी आए। राजा ने उनका बड़े सम्मान के साथ स्वागत किया। दरबार में बैठे सभी मंत्री और दरबारी उत्सुकता से उनकी बातें सुन रहे थे। ज्योतिषी ने राजा और रानी की कुंडलियाँ देखीं। कुछ देर तक गहरी सोच में डूबे रहने के बाद उन्होंने कहा, “महाराज, रानी गार्गी के ग्रह अत्यंत शुभ हैं। उनके भाग्य में बहुत बड़ा सम्मान और शक्ति लिखी है। संभव है कि आने वाले समय में राज्य की बागडोर भी उनके हाथों में आ जाए।”

दरबार में सन्नाटा छा गया। कुछ लोगों ने इसे सामान्य भविष्यवाणी समझा, लेकिन राजा मयंक के मन में यह बात तीर की तरह चुभ गई। उन्हें लगा कि कहीं भविष्य में लोग रानी को उनसे अधिक महत्व न देने लगें। उसी क्षण उनके मन में ईर्ष्या ने जन्म ले लिया। धीरे-धीरे यह ईर्ष्या बढ़ती गई। पहले जो राजा हर बात में रानी की प्रशंसा करते थे, अब वही उनसे दूरी बनाने लगे। रानी समझ नहीं पा रही थीं कि अचानक ऐसा क्या हो गया है।

दिन बीतते गए और राजा का व्यवहार कठोर होता गया। वे रानी से कम बात करते, उनकी ओर ध्यान नहीं देते और कई बार बिना कारण क्रोधित हो उठते। रानी गार्गी यह सब चुपचाप सहती रहीं, क्योंकि वे अपने पति से बहुत प्रेम करती थीं। वे चाहती थीं कि किसी तरह राजा के मन का भ्रम दूर हो जाए। लेकिन राजा का क्रोध दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही गया।

एक दिन राजा का धैर्य टूट गया। क्रोध में भरकर उन्होंने रानी को अपने कक्ष में बुलाया। उनका चेहरा गुस्से से लाल था। उन्होंने कठोर स्वर में कहा, “रानी गार्गी, हम चाहते हैं कि आप तुरंत यह राजमहल छोड़ दें और अपने माता-पिता के घर चली जाएँ।”
यह सुनते ही रानी के पैरों तले जमीन खिसक गई। उनकी आँखों में आँसू भर आए।

उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस व्यक्ति से वे सबसे अधिक प्रेम करती हैं, वही उन्हें इस तरह महल से जाने का आदेश देगा। वे कुछ क्षण तक चुप रहीं। राजा ने जब उन्हें रोते देखा तो थोड़ा नरम स्वर में बोले, “आपको इस महल और इसकी सुख-सुविधाओं को छोड़ने में कठिनाई होगी। इसलिए हम आपको अनुमति देते हैं कि आप अपनी सबसे प्रिय और सबसे मूल्यवान वस्तु अपने साथ ले जा सकती हैं। इसके अलावा हम आपको कुछ नहीं देंगे।”

इतना कहकर राजा वहाँ से चले गए। रानी सारी रात सोचती रहीं। वे दुखी थीं, लेकिन उनके मन में अपने पति के लिए प्रेम अभी भी वैसा ही था। उन्होंने निश्चय किया कि वे राजा को बिना कुछ कहे एक ऐसा उत्तर देंगी, जिससे उन्हें अपनी गलती का एहसास हो जाए।

उस रात राजा हमेशा की तरह अपने कक्ष में जाकर सो गए। देर रात जब पूरा महल शांत हो गया, तब रानी ने अपने विश्वसनीय सैनिकों को बुलाया। उन्होंने बहुत सावधानी से राजा के पलंग को उठवाया, ताकि उनकी नींद न टूटे। फिर सैनिकों की सहायता से राजा को उसी पलंग सहित रानी के माता-पिता के घर पहुँचा दिया गया।

सुबह जब राजा की आँख खुली तो वे चौंक पड़े। यह उनका राजमहल नहीं था। कमरे की सजावट अलग थी, दीवारें अलग थीं और वातावरण भी अपरिचित लग रहा था। वे घबरा गए और तुरंत उठकर इधर-उधर देखने लगे। तभी रानी गार्गी मुस्कुराते हुए वहाँ आईं।

राजा उन्हें देखकर क्रोधित हो उठे और बोले, “यह हम कहाँ हैं? हम यहाँ कैसे आए? और आप यहाँ क्या कर रही हैं?”
रानी ने शांत स्वर में कहा, “महाराज, यह मेरे माता-पिता का घर है। आपके आदेश के अनुसार मैं महल छोड़कर यहाँ आ गई हूँ।”
राजा आश्चर्य से उन्हें देखने लगे। रानी ने आगे कहा, “महाराज, आपने कहा था कि मैं अपनी सबसे प्रिय और मूल्यवान वस्तु अपने साथ ला सकती हूँ। मैंने वही किया। मेरे लिए संसार की सबसे मूल्यवान वस्तु आप हैं। इसलिए मैं आपको अपने साथ यहाँ ले आई।”

यह सुनते ही राजा स्तब्ध रह गए। उनके पास कोई शब्द नहीं थे। उन्हें याद आया कि किस प्रकार उन्होंने ईर्ष्या और क्रोध में आकर अपनी ही प्रिय रानी को अपमानित किया था। लेकिन रानी ने बदले में क्रोध नहीं, बल्कि प्रेम दिखाया। उनकी आँखें नम हो गईं।
राजा मयंक को अपनी गलती का गहरा एहसास हुआ।

उन्होंने रानी के सामने सिर झुकाकर कहा, “गार्गी, मुझे क्षमा कर दो। मैंने ईर्ष्या में आकर बहुत बड़ी भूल की। तुम्हारा प्रेम और त्याग मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं है।” रानी मुस्कुराईं और बोलीं, “महाराज, पति-पत्नी का रिश्ता विश्वास और प्रेम से चलता है। जहाँ प्रेम सच्चा हो, वहाँ ईर्ष्या के लिए कोई स्थान नहीं होता।”

उस दिन के बाद राजा मयंक पूरी तरह बदल गए। उन्होंने रानी का पहले से भी अधिक सम्मान करना शुरू कर दिया। दोनों वापस अपने महल लौट आए और फिर जीवनभर प्रेम, विश्वास और सम्मान के साथ रहने लगे। उनकी कहानी पूरे राज्य में एक सीख बन गई कि सच्चा प्रेम वही होता है, जो कठिन समय में भी साथ न छोड़े और जिसे दुनिया की हर दौलत से अधिक मूल्यवान माना जाए।

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दादी माँ की कहानियाँ प्यार, संस्कार, अनुभव और जीवन की अनमोल सीख से भरपूर होती हैं। ये रोचक कथाएँ बच्चों और बड़ों को मनोरंजन के साथ नैतिक मूल्य, पारिवारिक प्रेम और अच्छे आचरण की प्रेरणा देती हैं।

दादी माँ की कहानियाँ
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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