दादी माँ की कहानियाँ-आदित्य

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दादी माँ की कहानियाँ-आदित्य

बहुत समय पहले की बात है। समुद्र के किनारे बसे एक छोटे-से नगर में आदित्य नाम का एक युवक रहता था। वह बहुत ही कुशल चित्रकार था। उसे प्रकृति से बहुत प्रेम था। वह घंटों तक समुद्र की लहरों, आसमान के रंगों, उड़ते पक्षियों और डूबते सूरज को देखकर उनके सुंदर चित्र बनाया करता था। उसकी बनाई हुई तस्वीरें इतनी जीवंत होती थीं कि लोग उन्हें देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते थे।

आदित्य का स्वभाव भी बहुत अच्छा था। वह विनम्र, दयालु और शांत स्वभाव का युवक था। उसे समुद्र के किनारे बैठकर चित्र बनाना सबसे अधिक पसंद था। हर सुबह वह अपने रंग और कागज़ लेकर तट पर पहुँच जाता और लहरों की सुंदरता को अपने चित्रों में उतारने लगता।

एक दिन वह हमेशा की तरह समुद्र किनारे बैठा चित्र बना रहा था। मौसम बहुत सुहावना था। हल्की ठंडी हवा चल रही थी और समुद्र की लहरें मधुर संगीत जैसी आवाज़ कर रही थीं। तभी अचानक समुद्र के भीतर हलचल हुई। आदित्य ने ध्यान से देखा तो उसे आश्चर्य हुआ। समुद्र की गहराइयों से बारह सुंदर जलपरियाँ बाहर आ रही थीं।

वे सभी बेहद सुंदर थीं। जैसे ही वे तट पर पहुँचीं, उन्होंने अपना रूप बदल लिया और सुंदर युवतियों में परिवर्तित हो गईं। शायद उन्हें यह पता नहीं था कि वहाँ कोई इंसान भी मौजूद है। वे हँसती-खेलती हुई समुद्र किनारे दौड़ने लगीं। कोई सीपियाँ इकट्ठा कर रही थी, कोई लहरों के साथ खेल रही थी। उनका सौंदर्य देखकर आदित्य मंत्रमुग्ध हो गया। वह चुपचाप एक चट्टान के पीछे छिपकर उन्हें देखने लगा।

कुछ देर बाद दूर से कुछ लोगों के आने की आवाज़ सुनाई दी। जलपरियाँ घबरा गईं। वे तुरंत वापस समुद्र की ओर भागीं ताकि कोई उन्हें देख न सके। एक-एक करके वे फिर से मछलियों का रूप लेकर समुद्र में कूद गईं। लेकिन भागते समय एक जलपरी का पैर पत्थर से टकरा गया और वह गिर पड़ी। उसके पैर में चोट लग गई थी, इसलिए वह तुरंत समुद्र में नहीं जा सकी। बाकी ग्यारह जलपरियाँ उसे छोड़कर जा चुकी थीं।

वह जलपरी अभी भी युवती के रूप में वहीं बैठी दर्द से कराह रही थी। आदित्य ने जब यह देखा, तो वह तुरंत उसकी मदद के लिए दौड़ा। उसने बहुत सावधानी से उसे उठाया। आदित्य के हाथों में लाल रंग लगा हुआ था, क्योंकि वह चित्र बना रहा था। जब उसने जलपरी को सहारा दिया, तो उसके हाथ का लाल रंग जलपरी के माथे पर लग गया।

जलपरी ने पहली बार किसी इंसान को इतना दयालु और मददगार देखा था। वह आदित्य की अच्छाई से बहुत प्रभावित हुई। उसने मुस्कुराकर कहा, “आप बहुत अच्छे इंसान हैं। मेरे पिता आपसे मिलकर बहुत प्रसन्न होंगे। क्या आप मेरे साथ समुद्र के भीतर चलेंगे?”

आदित्य पहले तो थोड़ा घबराया, लेकिन उसके मन में उस जलपरी के लिए प्रेम जाग चुका था। उसने बिना देर किए उसके साथ जाने की हामी भर दी। जलपरी उसे समुद्र की गहराइयों में ले गई। वहाँ का संसार अद्भुत था। चारों ओर चमकते मोती, रंग-बिरंगी मछलियाँ और सुंदर महल दिखाई दे रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो कोई जादुई दुनिया हो।

जलपरी आदित्य को अपने पिता के पास ले गई। उसके पिता समुद्र के राजा थे। वे विशाल सिंहासन पर बैठे थे और उनके चारों ओर समुद्री जीव पहरा दे रहे थे। जलपरी ने अपने पिता को बताया कि कैसे आदित्य ने उसकी मदद की थी। समुद्रराज बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने स्नेहपूर्वक कहा, “बेटा, तुमने मेरी बेटी की सहायता की है। बताओ, तुम्हें इनाम में क्या चाहिए?” आदित्य ने विनम्रता से उत्तर दिया, “महाराज, मुझे कोई धन-दौलत नहीं चाहिए। यदि आप अनुमति दें, तो मैं आपकी बेटी का हाथ माँगना चाहता हूँ।”

समुद्रराज कुछ क्षण सोचते रहे। फिर वे मुस्कुराए और बोले, “यदि तुम सचमुच उससे प्रेम करते हो, तो तुम्हें एक परीक्षा देनी होगी। मेरी बारह बेटियाँ हैं और सभी बिल्कुल एक जैसी दिखती हैं। यदि तुम अपनी प्रिय जलपरी को पहचान लोगे, तभी तुम्हारा विवाह उससे होगा।”

कुछ ही देर में बारहों जलपरियाँ आदित्य के सामने आकर खड़ी हो गईं। सचमुच सभी एक जैसी सुंदर थीं। किसी को पहचानना लगभग असंभव था। आदित्य कुछ पल के लिए सोच में पड़ गया। लेकिन तभी उसकी नज़र एक जलपरी के माथे पर पड़ी। वहाँ लाल रंग का हल्का निशान था।

उसे तुरंत याद आया कि यह वही रंग है, जो उसके हाथों से उस जलपरी के माथे पर लग गया था।
आदित्य खुशी से मुस्कुराया और उसी जलपरी की ओर इशारा करते हुए बोला, “यही वह है, जिससे मैं प्रेम करता हूँ।”
समुद्रराज बहुत खुश हुए। उन्होंने कहा, “तुमने अपनी परीक्षा पास कर ली।” फिर बड़े धूमधाम से आदित्य और जलपरी का विवाह कर दिया गया।

लेकिन विवाह के बाद एक समस्या सामने आई। आदित्य हमेशा समुद्र के भीतर नहीं रह सकता था और जलपरी हमेशा धरती पर नहीं रह सकती थी। तब आदित्य ने अपनी पत्नी से एक वादा किया। उसने कहा, “मैं हर सुबह समुद्र से बाहर जाकर अपनी दुनिया में चित्र बनाऊँगा और शाम होते ही तुम्हारे पास लौट आया करूँगा।”

जलपरी ने मुस्कुराकर उसका वादा स्वीकार कर लिया। आदित्य ने जीवनभर अपना वचन निभाया। वह हर सुबह समुद्र की लहरों से निकलकर बाहर आता और शाम को फिर समुद्र में लौट जाता।

लोग कहते हैं कि इसी कारण सूर्य को “आदित्य” कहा जाता है। जैसे सूर्य सुबह समुद्र से निकलता हुआ प्रतीत होता है और शाम को फिर समुद्र की लहरों में छिप जाता है, वैसे ही चित्रकार आदित्य भी हर दिन अपनी प्रिय जलपरी के पास लौट जाया करता था।
इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि सच्चा प्रेम विश्वास, वचन और समर्पण पर टिका होता है। जो व्यक्ति अपना वादा निभाता है, उसका प्रेम हमेशा अमर हो जाता है।

नासमझी

एक छोटे-से गाँव में एक मेहनती किसान रहता था। उसके पास थोड़ी-सी जमीन और कुछ गायें थीं। उन्हीं गायों के दूध और खेती की कमाई से उसका घर चलता था। किसान बहुत समझदार और ईमानदार व्यक्ति था। उसका एक बेटा भी था, जो अभी छोटा था और दुनियादारी की बातों को अच्छी तरह नहीं समझता था। किसान अपने बेटे को हमेशा समझाने की कोशिश करता था, लेकिन अनुभव की कमी के कारण वह कई बातों में जल्दी भरोसा कर लेता था।

एक दिन किसान को कुछ जरूरी काम से दूसरे शहर जाना पड़ा। जाने से पहले उसने अपने बेटे को बुलाया और कहा, “देखो बेटा, मैं कुछ दिनों के लिए बाहर जा रहा हूँ। मेरे पीछे खेतों और गायों का अच्छी तरह ध्यान रखना। समय पर फसल को पानी देना और किसी चीज़ का नुकसान मत होने देना। और हाँ, एक व्यापारी हमारी तीन गायों को खरीदने आने वाला है। उसे गायें दिखा देना, लेकिन बिना पूरे पैसे लिए गायें मत देना।”

बेटे ने आत्मविश्वास से कहा, “ठीक है पिताजी, आप चिंता मत कीजिए। मैं सब संभाल लूँगा।”
किसान अपने काम से शहर चला गया। अगले ही दिन सुबह एक व्यापारी किसान के घर पहुँचा। वह बहुत चालाक आदमी था। उसके चेहरे पर मीठी मुस्कान थी और वह बड़ी विनम्रता से बातें कर रहा था। किसान का बेटा उसे गायों के पास ले गया और तीनों गायें दिखाईं।

व्यापारी ने गायों को ध्यान से देखा। वे सभी स्वस्थ और अच्छी नस्ल की थीं। वह बोला, “वाह! तुम्हारी गायें तो बहुत अच्छी हैं। मुझे ये तीनों पसंद आ गईं। बताओ, इनकी कीमत कितनी है?”
बेटे ने तुरंत उत्तर दिया, “तीनों गायों की कीमत तीन हज़ार रुपए है।”
व्यापारी ने सिर हिलाते हुए कहा, “कीमत बिल्कुल ठीक है। मैं ये तीनों गायें खरीदना चाहता हूँ।”
यह कहकर उसने गायों की रस्सियाँ खोलनी शुरू कर दीं। तभी किसान का बेटा बोला, “लेकिन पहले आपको पैसे देने होंगे। उसके बाद ही आप गायें ले जा सकते हैं।”

व्यापारी मुस्कुराकर बोला, “तुम बिल्कुल सही कह रहे हो। लेकिन बात यह है कि मैं जल्दी में यहाँ चला आया और पैसे अपने घर ही भूल गया। ऐसा करो, मैं अभी गायें ले जाता हूँ और कल सुबह आते ही तुम्हें पूरे तीन हज़ार रुपए दे जाऊँगा।”
बेटा थोड़ा सोच में पड़ गया। उसे अपने पिता की बात याद आई कि बिना पैसे लिए गायें नहीं देनी हैं। उसने व्यापारी से कहा, “लेकिन मैं आपकी बात पर भरोसा कैसे करूँ?”

व्यापारी बहुत चालाक था। उसने तुरंत एक नई तरकीब सोची। वह बोला, “तुम्हारी बात भी सही है। अगर मैं अपनी कोई कीमती चीज़ तुम्हारे पास छोड़ जाऊँ, तब तो तुम्हें भरोसा हो जाएगा न?”
बेटे ने कहा, “हाँ, तब ठीक रहेगा। लेकिन आप क्या छोड़ेंगे?”

व्यापारी ने तुरंत तीनों गायों में से एक गाय की रस्सी वापस बेटे के हाथ में पकड़ा दी और बोला, “यह देखो, यह गाय भी एक हज़ार रुपए की है न? मैं अपनी यह एक हज़ार रुपए की गाय तुम्हारे पास छोड़ देता हूँ। अब तो तुम्हें भरोसा हो गया होगा?”
बेटे ने सोचा, “तीन हज़ार रुपए की गायों के बदले में एक हज़ार रुपए की गाय तो मेरे पास रह ही रही है। इसमें नुकसान कैसा?” वह व्यापारी की बातों में आ गया और बोला, “ठीक है, आप बाकी दो गायें ले जाइए।”

व्यापारी मुस्कुराया, दो गायों को लेकर वहाँ से चला गया और फिर कभी वापस नहीं आया।
अगले दिन किसान शहर से लौटा। उसने देखा कि तीन गायों की जगह केवल एक गाय बची हुई है। उसने तुरंत बेटे से पूछा, “बाकी दो गायें कहाँ गईं?” बेटे ने गर्व से सारी बात बताई। उसने सोचा कि पिता उसकी समझदारी की तारीफ करेंगे। लेकिन पूरी बात सुनते ही किसान ने अपना सिर पकड़ लिया।

वह बोला, “बेटा, तुम बहुत बड़े धोखे का शिकार हो गए। वह गाय व्यापारी की नहीं, हमारी ही थी। उसने हमारी तीन गायों में से एक गाय तुम्हारे पास छोड़ दी और बाकी दो लेकर भाग गया। उसने तुम्हें कोई कीमती चीज़ नहीं दी, बल्कि हमारी ही चीज़ का सहारा लेकर हमें नुकसान पहुँचा दिया।”

अब बेटे को अपनी गलती समझ में आई। उसे बहुत पछतावा हुआ। उसने दुखी होकर कहा, “मुझसे बहुत बड़ी नासमझी हो गई पिताजी। मैंने बिना ठीक से सोचे उस व्यापारी की बातों पर विश्वास कर लिया।”
किसान ने प्यार से समझाया, “बेटा, जीवन में हर मीठी बात करने वाला व्यक्ति सच्चा नहीं होता। कभी भी किसी अनजान व्यक्ति पर जल्दी भरोसा नहीं करना चाहिए। समझदारी से काम लेना बहुत जरूरी है।”

उस दिन के बाद बेटे ने यह सीख हमेशा याद रखी। वह हर काम सोच-समझकर करने लगा और किसी की चिकनी-चुपड़ी बातों में आसानी से नहीं आता था। इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि बिना सोचे-समझे किसी पर विश्वास करना नुकसानदायक हो सकता है। बुद्धिमानी इसी में है कि हर बात को ध्यान से समझकर निर्णय लिया जाए।

बिल्ली की छींक

एक पुराने शहर में एक बहुत बड़ा आटे का गोदाम था। उस गोदाम में गेहूँ और आटे की ढेर सारी बोरियाँ रखी रहती थीं। चारों तरफ अनाज की खुशबू फैली रहती थी। उसी गोदाम में बहुत सारे चूहे भी रहते थे। उन्हें वहाँ खाने-पीने की कभी कमी नहीं होती थी। वे दिनभर बोरियों के बीच इधर-उधर दौड़ते रहते और रात होते ही मज़े से दावत उड़ाते।

लेकिन उन चूहों की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे बहुत होशियार थे। वे हमेशा सावधानी से बाहर निकलते और हर खतरे पर नज़र रखते थे। इसलिए अब तक कोई बिल्ली उन्हें आसानी से पकड़ नहीं पाई थी।

एक दिन एक काली बिल्ली घूमते-घूमते उस गोदाम तक पहुँच गई। जैसे ही उसने अंदर झाँका, उसकी आँखें चमक उठीं। उसने देखा कि वहाँ चूहों की भरमार है। बिल्ली मन-ही-मन बहुत खुश हुई। उसने सोचा, “वाह! यह जगह तो मेरे लिए किसी खजाने से कम नहीं। यहाँ मुझे रोज़ भरपेट खाना मिलेगा।”

बिल्ली धीरे से गोदाम के अंदर घुस गई और एक कोने में छिपकर बैठ गई। उसने सोचा कि जैसे ही कोई चूहा बाहर निकलेगा, वह झट से उसे पकड़ लेगी। वह सुबह से शाम तक इंतज़ार करती रही। लेकिन एक भी चूहा उसके सामने नहीं आया।
असल में चूहे बहुत चालाक थे। वे पहले चारों ओर ध्यान से देखते, फिर ही अपनी बिलों से बाहर निकलते। उन्हें जरा-सी आहट भी मिल जाती, तो वे तुरंत छिप जाते। बिल्ली कई घंटों तक भूखी बैठी रही। धीरे-धीरे रात हो गई। अब भूख के मारे उसका बुरा हाल होने लगा।

तब बिल्ली ने सोचा, “सीधे तरीके से तो ये चूहे पकड़ में आने वाले नहीं। अब मुझे कोई चाल चलनी पड़ेगी।”
बहुत सोचने के बाद उसे एक तरकीब सूझी। वह गोदाम की खाली जगह में जाकर जमीन पर लेट गई। उसने अपने शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ दिया और आँखें बंद कर लीं। वह ऐसा नाटक करने लगी जैसे मर चुकी हो।
कुछ देर बाद एक छोटा-सा चूहा अपनी बिल से बाहर निकला। उसने दूर से बिल्ली को पड़ा देखा। वह खुशी से उछल पड़ा और चिल्लाकर बोला, “अरे देखो! यहाँ एक मरी हुई बिल्ली पड़ी है!”

यह सुनते ही कुछ और चूहे भी बाहर आ गए। छोटा चूहा बहादुरी दिखाते हुए बिल्ली की ओर दौड़ने लगा। लेकिन तभी वहाँ एक बूढ़ा और अनुभवी चूहा आया। उसने छोटे चूहे को रोकते हुए कहा, “रुको! इतनी जल्दी भरोसा मत करो।”
छोटा चूहा बोला, “लेकिन दादाजी, यह बिल्ली तो बिल्कुल नहीं हिल रही। यह सचमुच मर चुकी है।”
बूढ़ा चूहा समझदारी से बोला, “बेटा, बिल्ली इतनी आसानी से नहीं मरती। यह तो मोटी-ताज़ा और स्वस्थ दिखाई दे रही है। मुझे इस पर भरोसा नहीं है।”

फिर बूढ़े चूहे ने बिल्ली को परखने की एक योजना बनाई। वह धीरे-धीरे पास रखी आटे की बोरियों पर चढ़ गया। ऊपर पहुँचकर उसने सबसे ऊपरी बोरी को अपने तेज दाँतों से काटना शुरू कर दिया।
जैसे ही बोरी फटी, उसमें भरा हुआ सफेद आटा सीधे नीचे बिल्ली के ऊपर गिरने लगा। कुछ ही पलों में बिल्ली पूरी तरह आटे से ढक गई। अब वह काली नहीं, बल्कि सफेद दिखाई देने लगी। लेकिन बिल्ली फिर भी अपनी चालाकी बनाए रखने के लिए चुपचाप पड़ी रही।

थोड़ी देर बाद आटा उसकी नाक में घुसने लगा। उसने खुद को रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन आखिरकार उसकी नाक में गुदगुदी होने लगी। अचानक उसे जोरदार छींक आ गई।
“छींक!”

जैसे ही बिल्ली छींककर उठी, सारे चूहे समझ गए कि वह मरी नहीं थी, बल्कि उन्हें धोखा देने का नाटक कर रही थी।
सभी चूहे जोर-जोर से चिल्लाने लगे, “भागो! भागो! बिल्ली जिंदा है!”

यह सुनते ही सारे चूहे बिजली की तेजी से अपनी-अपनी बिलों में घुस गए। बिल्ली देखती ही रह गई। उसकी सारी चालाकी बेकार हो गई थी। ऊपर से वह आटे में लथपथ होकर बिल्कुल अजीब दिखाई दे रही थी।
बूढ़ा चूहा मुस्कुराते हुए बोला, “याद रखो, केवल आँखों से देखी हुई बात पर भरोसा नहीं करना चाहिए। समझदारी से काम लेना हमेशा जरूरी होता है।”

बिल्ली बहुत शर्मिंदा हुई। उसे समझ आ गया कि चालाकी हमेशा काम नहीं आती, खासकर जब सामने समझदार लोग हों।
इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि बुद्धिमानी और सावधानी हमें बड़े से बड़े धोखे से बचा सकती है। किसी भी बात पर बिना सोचे-समझे विश्वास नहीं करना चाहिए।

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दादी माँ की कहानियाँ प्यार, संस्कार, अनुभव और जीवन की अनमोल सीख से भरपूर होती हैं। ये रोचक कथाएँ बच्चों और बड़ों को मनोरंजन के साथ नैतिक मूल्य, पारिवारिक प्रेम और अच्छे आचरण की प्रेरणा देती हैं।

दादी माँ की कहानियाँ
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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