दादी माँ की कहानियाँ-चार भाई
बहुत समय पहले एक नगर में चार भाई रहते थे। चारों भाई बहुत बुद्धिमान और समझदार थे। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे हर छोटी-से-छोटी बात को ध्यान से देखते और समझते थे। वे किसी भी चीज़ को बिना सोचे-समझे नहीं मानते थे। रास्ते में चलते समय भी वे पेड़ों, जानवरों, लोगों और आसपास की हर चीज़ पर ध्यान देते थे। उनकी तेज़ बुद्धि के कारण लोग अक्सर उनसे सलाह लिया करते थे।
एक दिन चारों भाई किसी दूसरे शहर की ओर जा रहे थे। मौसम साफ था और वे धीरे-धीरे बातें करते हुए रास्ते पर चल रहे थे। चलते-चलते उन्होंने देखा कि एक आदमी बहुत परेशान होकर इधर-उधर घूम रहा है। उसके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी। वह कभी सड़क की ओर देखता, कभी जंगल की ओर और बार-बार किसी को खोजने की कोशिश करता।
चारों भाइयों ने उसके पास जाकर विनम्रता से पूछा, “भाई, तुम इतने परेशान क्यों हो? क्या कोई समस्या है?”
वह आदमी एक सौदागर था। उसने दुखी होकर कहा, “मेरा ऊँट खो गया है। मैं उस पर सामान लादकर शहर जा रहा था। रास्ते में मैं बहुत थक गया, इसलिए थोड़ी देर के लिए पेड़ के नीचे सो गया। जब मेरी आँख खुली, तो ऊँट गायब था। मैं तभी से उसे ढूँढ़ रहा हूँ। क्या आप लोगों ने रास्ते में कोई ऊँट देखा है?”
पहला भाई कुछ देर सोचकर बोला, “क्या तुम्हारा ऊँट एक आँख से काना था?”
सौदागर आश्चर्य से बोला, “हाँ, बिल्कुल! उसकी एक आँख खराब थी।”
तभी दूसरा भाई बोला, “क्या वह एक पैर से थोड़ा लँगड़ाकर चलता था?”
सौदागर की आँखें और फैल गईं। उसने कहा, “हाँ, यह भी सही है!”
अब तीसरे भाई ने पूछा, “क्या उसके ऊपर एक तरफ गेहूँ लदा हुआ था?”
सौदागर उत्साहित होकर बोला, “हाँ, हाँ! बिल्कुल सही!”
चौथा भाई बोला, “और दूसरी तरफ शहद का थैला था, है न?”
अब तो सौदागर खुशी से उछल पड़ा। वह बोला, “अरे! आप लोगों ने मेरा ऊँट जरूर देखा है। जल्दी बताइए, वह कहाँ है?”
लेकिन चारों भाई शांत स्वर में बोले, “हमने तुम्हारे ऊँट को कभी नहीं देखा।”
यह सुनते ही सौदागर का चेहरा बदल गया। उसे विश्वास नहीं हुआ। वह गुस्से में बोला, “यदि तुमने ऊँट नहीं देखा, तो उसके बारे में इतनी सारी बातें तुम्हें कैसे पता हैं? जरूर तुम लोगों ने ही मेरा ऊँट चुराया है और अब झूठ बोल रहे हो!”
चारों भाइयों ने उसे बहुत समझाने की कोशिश की, लेकिन वह मानने को तैयार नहीं हुआ। आखिरकार वह उन्हें पकड़कर नगर के जज के पास ले गया।
जज बहुत बुद्धिमान व्यक्ति था। उसने चारों भाइयों और सौदागर की पूरी बात ध्यान से सुनी। फिर उसने भाइयों से पूछा, “यदि तुम लोगों ने सचमुच ऊँट नहीं देखा, तो उसके बारे में इतनी सही जानकारी कैसे दी?”
पहला भाई आगे बढ़ा और बोला, “महोदय, रास्ते पर हमें ऊँट के पैरों के निशान दिखाई दिए। हमने यह भी देखा कि रास्ते के केवल एक तरफ की घास खाई हुई थी। दूसरी तरफ की घास बिल्कुल वैसी ही थी। इससे हमें समझ में आया कि ऊँट एक आँख से नहीं देख सकता होगा, इसलिए उसे केवल एक ओर की घास दिखाई देती होगी।”
जज ने सिर हिलाकर कहा, “बहुत अच्छा। आगे बताओ।”
दूसरा भाई बोला, “महोदय, हमने पैरों के निशानों को ध्यान से देखा। उनमें से एक पैर के निशान बाकी पैरों से अधिक गहरे थे। इससे हमें समझ में आया कि ऊँट एक पैर से लँगड़ाता होगा और चलते समय उस पैर पर अधिक भार डालता होगा।”
अब तीसरा भाई बोला, “श्रीमान, रास्ते पर हमें गेहूँ के कुछ दाने गिरे हुए मिले। वे केवल एक तरफ गिरे थे। इससे हमने अंदाज़ा लगाया कि ऊँट की एक तरफ गेहूँ की बोरी लदी होगी और उसमें कहीं छोटा-सा छेद हो गया होगा।”
फिर चौथा भाई बोला, “और रास्ते की दूसरी ओर हमें शहद की कुछ बूँदें दिखाई दीं। इससे हमने समझा कि दूसरी तरफ शहद का थैला रखा होगा।”
जज चारों भाइयों की बातें सुनकर बहुत प्रभावित हुआ। उसे समझ में आ गया कि ये चारों बहुत तेज बुद्धि वाले और सच्चे लोग हैं। उन्होंने केवल अपने ध्यान और समझदारी से सारी बातें जान ली थीं। जज ने सौदागर से कहा, “तुमने बिना सच्चाई जाने इन निर्दोष लोगों पर आरोप लगाया। ये लोग चोर नहीं, बल्कि बहुत बुद्धिमान हैं।”
सौदागर को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने चारों भाइयों से माफी माँगी।
जज इतना प्रभावित हुआ कि उसने चारों भाइयों को अपने साथ काम करने का निमंत्रण दिया। उसने कहा, “तुम लोगों जैसी बुद्धि और समझदारी बहुत कम लोगों में होती है। यदि तुम मेरे साथ काम करोगे, तो कई अपराधियों को पकड़ने में मदद मिलेगी।”
चारों भाइयों ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। उसके बाद वे जज के साथ मिलकर कई मुश्किल मामलों को सुलझाने लगे। अपनी तेज बुद्धि और गहरी समझ के कारण उन्होंने अनेक चोरों और अपराधियों को पकड़वाया। धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि पूरे राज्य में फैल गई।
लोग कहते थे कि यदि किसी समस्या का हल कोई नहीं निकाल पाए, तो चार भाइयों के पास जरूर जाना चाहिए।
इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि बुद्धिमानी केवल पढ़ाई से नहीं आती, बल्कि ध्यान से देखने, सोचने और समझने से भी आती है। जो व्यक्ति हर छोटी बात पर ध्यान देता है, वह कठिन से कठिन समस्या का समाधान भी निकाल सकता है।
अपना देश
एक छोटा-सा पचास पैसे का सिक्का था। आकार में भले ही वह छोटा था, लेकिन उसने अपने जीवन में बहुत कुछ देखा था। वह एक हाथ से दूसरे हाथ में जाता रहता था। कभी किसी दुकानदार की तिजोरी में रहता, तो कभी किसी बच्चे की मुट्ठी में। कभी वह किसी माँ के पर्स में होता, तो कभी किसी बूढ़े आदमी की जेब में। इस तरह घूमते-घूमते उसने पूरे देश की सैर कर ली थी।
उसे अपने काम पर बहुत गर्व था।
लोग उससे चीज़ें खरीदते, बच्चों को टॉफियाँ दिलाते और छोटे-छोटे काम पूरे करते। कई बार छोटे बच्चे उसे पाकर बहुत खुश हो जाते। वे उसे अपनी गुल्लक में डालते और बड़े प्यार से सँभालकर रखते। सिक्के को लगता था कि उसका जीवन बहुत अच्छा है, क्योंकि लोग उसकी कद्र करते थे।
एक दिन वह सिक्का एक जर्मन पर्यटक के हाथ में पहुँचा। वह व्यक्ति भारत घूमने आया था। घूमते-घूमते उसने कई जगहों से सामान खरीदा और उसी दौरान वह पचास पैसे का सिक्का उसके पास आ गया। जब पर्यटक अपने देश जर्मनी वापस लौटा, तो वह सिक्का भी उसके साथ चला गया।
जर्मनी पहुँचकर सिक्के ने खुद को एक नए संसार में पाया। उस व्यक्ति के पर्स में अलग-अलग देशों के कई सुंदर सिक्के थे। कुछ जर्मनी के थे, कुछ फ्रांस के और कुछ दूसरे देशों के। शुरू-शुरू में पचास पैसे का सिक्का थोड़ा उदास हो गया। उसे अपना देश और अपने लोग याद आने लगे। लेकिन धीरे-धीरे उसने बाकी सिक्कों से दोस्ती कर ली।
अब उसे लगने लगा कि दुनिया बहुत बड़ी है और उसे नए देश देखने का मौका मिल रहा है। वह खुशी-खुशी अपने नए सफर का आनंद लेने लगा। एक दिन उस जर्मन व्यक्ति का छोटा बेटा अपने पिता के पर्स से कुछ सिक्के निकालकर आइसक्रीम खरीदने गया। उन्हीं सिक्कों में वह भारतीय पचास पैसे का सिक्का भी था। लड़के ने आइसक्रीम वाले को सिक्का दिया, लेकिन जैसे ही दुकानदार ने उसे देखा, उसका चेहरा बदल गया।
वह बोला, “यह सिक्का नकली है। यह यहाँ नहीं चलेगा।”
इतना कहकर उसने सिक्का वापस कर दिया।
यह सुनकर सिक्के को बहुत दुख हुआ। अपने देश में तो कभी किसी ने उसे नकली नहीं कहा था। वहाँ लोग उसे पहचानते थे, उसकी इज्जत करते थे और खुशी से इस्तेमाल करते थे। लेकिन यहाँ, दूसरे देश में, कोई उसे पहचानता तक नहीं था।
उस दिन के बाद सिक्के का जीवन बदल गया। अब जो भी व्यक्ति उसे देखता, उसे लेने से मना कर देता। कोई कहता, “यह बेकार है।” कोई कहता, “यह हमारे काम का नहीं।” हर कोई जल्दी-जल्दी उससे छुटकारा पाने की कोशिश करता।
सिक्का बहुत उदास रहने लगा। उसे अपने देश की गलियाँ, दुकानदार, बच्चे और लोगों का प्यार याद आने लगा। उसे समझ में आने लगा कि अपने लोगों के बीच रहने की खुशी कुछ और ही होती है।
इसी तरह एक दिन वह सिक्का घूमते-घूमते एक भारतीय छात्र के हाथ में पहुँचा। वह लड़का पढ़ाई के लिए जर्मनी आया हुआ था। जैसे ही उसकी नजर उस सिक्के पर पड़ी, उसकी आँखें चमक उठीं।
वह खुशी से बोला, “अरे! यह तो मेरे देश का सिक्का है!”
उसने सिक्के को हाथ में लेकर ध्यान से देखा। उसे ऐसा लगा जैसे अचानक उसे अपने देश की कोई प्यारी याद मिल गई हो। उसने बड़े प्यार से उस सिक्के को चूमा और अपने दोस्तों को दिखाते हुए बोला, “देखो, यह भारत का सिक्का है।”
सिक्के की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। इतने दिनों बाद किसी ने उसे पहचानकर प्यार दिया था। उसे लगा जैसे वह फिर से अपने घर पहुँच गया हो।
उस लड़के ने सिक्के को बहुत संभालकर रखा। उसने उसे साफ पानी से धोया, चमकाया और एक छोटी-सी सुंदर डिब्बी में रख दिया। फिर वह डिब्बी अपनी जेब में रखने लगा, ताकि गलती से भी वह सिक्का किसी और को न दे बैठे।
कुछ महीनों बाद जब लड़के की पढ़ाई पूरी हुई, तो वह वापस भारत लौट आया। वह सिक्का भी उसके साथ अपने देश लौट आया।
भारत पहुँचकर सिक्का बहुत खुश हुआ। उसे लगा जैसे उसकी खोई हुई दुनिया वापस मिल गई हो। अब वह सुरक्षित था, अपने लोगों के बीच था।
आज भी वह सिक्का उसी लड़के के पास एक छोटी-सी डिब्बी में सँभालकर रखा हुआ है। लड़का जब भी उसे देखता है, उसे अपने छात्र जीवन और अपने देश की याद आ जाती है। और वह छोटा-सा सिक्का अब यह अच्छी तरह समझ चुका था कि दुनिया में चाहे कितनी भी जगहें घूम लो, लेकिन अपने देश और अपने लोगों का प्यार कहीं और नहीं मिलता।
इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि अपने देश, अपनी मिट्टी और अपने लोगों का महत्व सबसे बड़ा होता है। बाहर की दुनिया चाहे कितनी भी सुंदर क्यों न लगे, सच्चा अपनापन अपने घर और अपने देश में ही मिलता है।
बारह यात्री
बहुत समय पहले की बात है। कहते हैं यह कहानी हजारों साल पुरानी है, शायद उससे भी ज्यादा। एक कड़ाके की ठंड वाली रात थी। चारों ओर घना कोहरा फैला हुआ था। सड़कों पर सन्नाटा पसरा था और दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दे रहा था। तभी अचानक आठ घोड़ों से जुड़ी एक बड़ी-सी बंद गाड़ी एक अनजान शहर के बाहर आकर रुकी।
गाड़ी बहुत सुंदर थी, लेकिन देखने में थोड़ी रहस्यमयी भी लग रही थी। उसके पहियों की आवाज़ सुनसान रात में साफ सुनाई दे रही थी। गाड़ी के ऊपर बर्फ की हल्की परत जमी हुई थी और घोड़े थककर धीरे-धीरे साँस ले रहे थे।
गाड़ीवान ने अपनी मोटी ऊनी चादर को ठीक किया और गाड़ी के दरवाज़े के पास जाकर बोला, “आप सबकी मंजिल आ गई है। अब बाहर उतर जाइए।”
उसने धीरे से गाड़ी का दरवाज़ा खोला। अंदर अंधेरा था, लेकिन वहाँ बैठे यात्री बहुत अजीब दिखाई दे रहे थे। उनके कपड़े, सामान और चेहरों के भाव सब एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थे।
गाड़ीवान ने अपनी बड़ी-सी किताब निकाली और यात्रियों की गिनती करने लगा।
“एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः, सात, आठ, नौ, दस, ग्यारह, बारह।”
वह हैरान था कि इतने अलग-अलग लोग एक ही गाड़ी में कैसे सफर कर रहे थे।
सबसे पहले एक लंबा-सा लड़का बाहर उतरा। उसने मोटे ऊनी कपड़े पहन रखे थे। सिर पर टोपी थी और हाथ में रंग-बिरंगी पतंगें थीं। ठंडी हवा में भी उसके चेहरे पर मुस्कान थी।
गाड़ीवान ने पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”
लड़का बोला, “जनवरी।”
“और ये पतंगें?”
“मकर संक्रांति के लिए,” उसने खुशी से कहा।
गाड़ीवान ने उसका नाम अपनी किताब में लिखा और उसे जाने दिया।
उसके बाद एक छोटी-सी लड़की बाहर आई। वह बहुत प्यारी लग रही थी। उसने बसंती रंग के कपड़े पहन रखे थे और हाथों में फूलों का सुंदर गुलदस्ता था।
“नाम?” गाड़ीवान ने पूछा।
“फरवरी,” लड़की मुस्कुराकर बोली।
फिर उसने अपने फूल गाड़ीवान को देते हुए कहा, “ये सबको बाँट देना।”
इतना कहकर वह हँसते हुए आगे बढ़ गई।
अब तीसरा यात्री बाहर आया। उसके कपड़ों पर लाल, पीला, हरा और गुलाबी रंग लगा हुआ था। उसकी मुट्ठियों में गुलाल भरा था।
“तुम कौन हो?” गाड़ीवान ने पूछा।
“मार्च!” वह जोर से बोला और हवा में गुलाल उड़ाते हुए आगे निकल गया।
उसके जाते ही वातावरण रंगों से भर गया।
चौथा यात्री बड़ा खुशमिजाज आदमी था। उसने पगड़ी पहन रखी थी और पंजाबी गीत गुनगुना रहा था। उसकी लंबी दाढ़ी थी और चेहरे पर चमकती हुई मुस्कान।
“नाम बताओ,” गाड़ीवान बोला।
“अप्रैल सिंह!” वह हँसते हुए बोला और फिर गाने लगा, “बैसाखी है ओए बैसाखी!”
वह “ओए-ओए” और “बल्ले-बल्ले” करता हुआ आगे बढ़ गया।
अब पाँचवाँ और छठा यात्री साथ-साथ बाहर आए। दोनों गर्मी से परेशान दिखाई दे रहे थे। उनके हाथों में पंखे, ठंडे पानी की बोतलें और आइसक्रीम थीं।
“हम हैं मई कुमार गरम और जून देवी गरम,” उन्होंने पसीना पोंछते हुए कहा।
दोनों पंखा झलते हुए धीरे-धीरे आगे चले गए।
अब सातवाँ यात्री बाहर आया। वह छोटा-सा बालक था। उसके सिर पर मोरपंख का मुकुट था और हाथ में बाँसुरी।
गाड़ीवान मुस्कुराकर बोला, “और तुम्हारा नाम?”
बालक बोला, “जुलाई! मुझे जल्दी जाना है, जन्मदिन की तैयारी करनी है।”
इतना कहकर वह दौड़ता हुआ चला गया।
फिर एक सुंदर लड़की बाहर आई। उसने सफेद कुर्ता, हरी सलवार और केसरिया दुपट्टा पहन रखा था। उसके हाथ में राखी थी।
“तुम कौन हो?” गाड़ीवान ने पूछा।
“अगस्त,” लड़की गर्व से बोली। “मुझे अपने भैया को राखी बाँधनी है।”
वह जल्दी-जल्दी आगे बढ़ गई।
अब नौवीं यात्री बाहर निकली। उसने सुंदर साड़ी पहन रखी थी और हाथ में लड्डुओं का थाल था।
वह बोली, “मेरा नाम सितंबर बाई है। ये लड्डू गणपति बप्पा के लिए हैं।”
गाड़ीवान ने मुस्कुराकर उसका नाम लिख लिया।
इसके बाद दसवाँ यात्री बाहर आया। वह किसी राजकुमार जैसा लग रहा था। सिर पर मुकुट, माथे पर तिलक और हाथ में धनुष था।
“आप कौन हैं?” गाड़ीवान ने आदर से पूछा।
राजकुमार बोला, “हम हैं कुमार अक्टूबर। बुराइयों को खत्म करना हमारा काम है।”
गाड़ीवान ने झुककर उसे प्रणाम किया।
अब ग्यारहवाँ यात्री बाहर आया। वह लगातार छींक रहा था।
“आ… आ… छींक!”
उसका थैला नीचे गिर गया और उसमें से पटाखे चारों ओर फैल गए।
गाड़ीवान खुश होकर बोला, “अरे वाह! इतने सारे पटाखे!”
यात्री बोला, “सावधान! ये दीपावली के लिए हैं।”
“तुम्हारा नाम?”
“नवंबर,” उसने उत्तर दिया।
अब केवल एक यात्री बचा था। गाड़ीवान ने आवाज लगाई, “अंदर जो भी है, जल्दी बाहर आओ!”
तभी लाल कपड़े पहने एक मोटा-सा व्यक्ति बाहर आया। उसके पास ढेर सारे उपहार थे और हाथ में एक सुंदर क्रिसमस ट्री था।
“नाम?” गाड़ीवान ने पूछा।
वह मुस्कुराकर बोला, “सेंट दिसंबर।”
गाड़ीवान ने जल्दी से उसका नाम भी लिख लिया।
अब सभी यात्री जा चुके थे। गाड़ीवान ने गाड़ी का दरवाज़ा बंद किया और अपने घर की ओर चल पड़ा। रास्ते भर वह उन्हीं अजीब यात्रियों के बारे में सोचता रहा।
जब उसने गाँववालों को यह कहानी सुनाई, तो सब लोग हैरान रह गए। फिर धीरे-धीरे सभी समझ गए कि वे बारह यात्री और कोई नहीं, बल्कि साल के बारह महीने थे।
जनवरी से दिसंबर तक हर महीना अपने साथ त्योहार, मौसम और खुशियाँ लेकर आता है। तभी तो उन सभी यात्रियों के कपड़े, सामान और बातें अलग-अलग थीं।
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हर महीना अपने साथ नई खुशियाँ, नए रंग और नई उम्मीदें लेकर आता है। समय बदलता रहता है, लेकिन हर मौसम और हर त्योहार जीवन को सुंदर बनाता है।
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दादी माँ की कहानियाँ प्यार, संस्कार, अनुभव और जीवन की अनमोल सीख से भरपूर होती हैं। ये रोचक कथाएँ बच्चों और बड़ों को मनोरंजन के साथ नैतिक मूल्य, पारिवारिक प्रेम और अच्छे आचरण की प्रेरणा देती हैं।
दादी माँ की कहानियाँ
प्रस्तुति: Saying Central Team