दशरथ मांझी

दशरथ मांझी: संकल्प और प्रेम की अद्वितीय गाथा

8
Join WhatsApp
Join Now
Join Facebook
Join Now

दशरथ मांझी: संकल्प और प्रेम की अद्वितीय गाथा

बिहार के गया जिले के गहलौर गाँव की मिट्टी में एक ऐसा इंसान पैदा हुआ, जिसने अपने दृढ़ संकल्प और अटूट प्रेम के बल पर इतिहास की धारा को ही बदल कर रख दिया। उनका नाम था दशरथ मांझी, जिन्हें दुनिया आज “माउंटेन मैन” के नाम से जानती है। गहलौर गाँव एक ऐसा इलाका था जो चारों तरफ से एक विशाल और पथरीले पहाड़ से घिरा हुआ था। इस गाँव के लोग बुनियादी सुविधाओं जैसे अस्पताल, स्कूल और पक्की सड़कों से पूरी तरह से वंचित थे।

जीवन अत्यंत कठिन था और लोगों को पहाड़ पार करके ही दूसरी तरफ के कस्बे, वजीरगंज जाना पड़ता था। दशरथ मांझी का जन्म एक बेहद गरीब और पिछड़े परिवार में हुआ था, जहाँ दो वक्त की रोटी कमाना भी एक बड़ी चुनौती थी। बचपन से ही उन्होंने अभाव और संघर्ष को बहुत करीब से देखा था, लेकिन उनके भीतर एक अद्भुत जिजीविषा और स्वाभिमान था।

गाँव की कठिन परिस्थितियों और संसाधनों की कमी ने उनके बचपन को संघर्षमय बना दिया था, फिर भी उनके चेहरे पर हमेशा एक अजीब सी शांति और आँखों में कुछ कर गुजरने की चमक दिखाई देती थी। वह जानते थे कि उनका जीवन साधारण नहीं रहने वाला है, लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि नियति उनसे कितना बड़ा और ऐतिहासिक काम करवाने वाली है।

प्रेम की शुरुआत और वजीरगंज की दूरी

दशरथ मांझी जब थोड़े बड़े हुए, तो वे काम की तलाश में गाँव से भागकर धनबाद की कोयला खदानों में चले गए। वहाँ उन्होंने कई सालों तक कठिन परिश्रम किया और थोड़ा पैसा कमाया। कुछ समय बाद जब वे वापस अपने गाँव गहलौर लौटे, तो उनका विवाह फागुनी देवी नाम की एक अत्यंत सुंदर और सरल स्वभाव की युवती से हुआ। फागुनी देवी के आते ही दशरथ के जीवन में खुशियों का आगमन हुआ और वे अपनी पत्नी से अगाध प्रेम करने लगे।

दशरथ मांझी गाँव के जमींदार के खेतों में मजदूरी करने लगे और पहाड़ के दूसरी तरफ काम करते थे। गहलौर पहाड़ इतना विशाल था कि इसे पार करने में घंटों का समय लगता था और रास्ता बेहद संकरा और खतरनाक था। फागुनी देवी रोज दोपहर में अपने पति के लिए खाना लेकर उस ऊंचे और पथरीले पहाड़ को पार करके जाती थीं।

दोनों के बीच का प्रेम इतना गहरा था कि वे एक-दूसरे के बिना रहने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। दशरथ मांझी दिन भर कड़ी धूप में पसीना बहाते थे और फागुनी का इंतजार करते थे। वह हर दिन पहाड़ की चोटियों को देखते और सोचते कि काश यह पहाड़ हमारे बीच की दूरी न बढ़ाता। लेकिन उन्हें क्या पता था कि यही पहाड़ एक दिन उनके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी का कारण बनने वाला है।

वह काली दोपहर और पहाड़ का क्रूर प्रहार

एक दिन रोज की तरह फागुनी देवी अपने पति दशरथ के लिए दोपहर का भोजन लेकर पहाड़ के संकरे और पथरीले रास्ते से जा रही थीं। उस दिन तेज धूप थी और पैर फिसलने के कारण फागुनी देवी का संतुलन बिगड़ गया। वह पहाड़ से नीचे एक गहरी खाई में गिर गईं और उनका पैर पूरी तरह से जख्मी हो गया।

उनके हाथ से भोजन का बर्तन छूट गया और वह दर्द से कराहने लगीं। जब दशरथ मांझी को इस बात का पता चला, तो वे पागलों की तरह दौड़ते हुए पहाड़ के नीचे पहुँचे। उन्होंने देखा कि उनकी प्रिय पत्नी खून से लथपथ पड़ी हुई थी और तड़प रही थी। पहाड़ के कारण वजीरगंज के अस्पताल की दूरी लगभग 55 किलोमीटर थी, जबकि यदि पहाड़ न होता तो यह दूरी मात्र 15 किलोमीटर रह जाती।

दशरथ मांझी अपनी पत्नी को गोद में उठाकर अस्पताल की तरफ भागे, लेकिन रास्ते की लंबाई और पहाड़ की रुकावट के कारण समय पर इलाज नहीं मिल सका। अस्पताल पहुँचने से पहले ही फागुनी देवी ने दम तोड़ दिया और दशरथ मांझी के हाथों में उनकी आखिरी सांसें थम गईं। इस घटना ने दशरथ को भीतर से पूरी तरह झकझोर कर रख दिया। वे अपनी पत्नी के शव को देखकर चीख-चीख कर रोने लगे। उनका पूरा संसार उजड़ चुका था और उनके दिल में एक ऐसा घाव हो गया था जो कभी नहीं भर सकता था।

संकल्प का जन्म और पहाड़ से अकेले जंग

पत्नी की मौत के गम में डूबे दशरथ मांझी ने रोने और किस्मत को दोष देने के बजाय एक बेहद कठोर और अकल्पनीय निर्णय लिया। उन्होंने पहाड़ की तरफ देखा और अत्यंत क्रोध तथा दृढ़ता के साथ कहा, “तूने मेरी पत्नी को मुझसे छीना है, मैं तुझे तोड़कर रख दूँगा। तेरा गुरूर मिट्टी में मिला दूँगा।” उन्होंने अपनी बकरी बेची और उससे एक हथौड़ा और एक छेनी खरीदी।

सन् 1960 में दशरथ मांझी ने अकेले ही उस विशालकाय और कठोर गहलौर पहाड़ को काटना शुरू कर दिया। जब उन्होंने पहली बार पहाड़ पर हथौड़ा चलाया, तो गाँव के लोगों ने उन्हें देखा और उनका मजाक उड़ाने लगे। लोगों ने कहा कि पत्नी की मौत के गम में दशरथ का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है और वह पागल हो गया है।

कोई भला एक मामूली छेनी और हथौड़े से इतने बड़े पहाड़ को कैसे काट सकता है? लेकिन दशरथ पर इन बातों का कोई असर नहीं हुआ। वे सुबह से लेकर शाम तक बिना रुके, बिना थके पहाड़ की छाती पर वार करते रहे। कड़कड़ाती ठंड हो, झुलसा देने वाली गर्मी हो या फिर मूसलाधार बारिश, दशरथ मांझी का हाथ कभी नहीं रुका। वे पूरी तरह से एक धुन में रम चुके थे, जहाँ केवल पहाड़ था, उनका हथौड़ा था और उनकी पत्नी की यादें थीं।

समाज का उपहास और विपरीत परिस्थितियाँ

शुरुआती सालों में दशरथ मांझी को समाज और अपने ही गाँव के लोगों के भारी विरोध और उपहास का सामना करना पड़ा। लोग उन्हें देखते ही हँसते थे और पागल कहकर बुलाते थे। यहाँ तक कि उनके पिता ने भी उन्हें डांटा और कहा कि वह अपना समय और जीवन बर्बाद कर रहे हैं। लेकिन दशरथ मांझी का संकल्प हिमालय से भी ऊँचा था।

जब गाँव में भयंकर सूखा पड़ा और पीने के पानी की किल्लत हो गई, तो गाँव के अधिकांश लोग गहलौर छोड़कर चले गए। दशरथ मांझी के पास खाने को कुछ नहीं था, लेकिन उन्होंने पहाड़ काटना बंद नहीं किया। वे कई दिनों तक जंगली पत्तियां और घास खाकर जीवित रहे और कभी-कभार गंदे गड्ढों का पानी पीकर अपनी प्यास बुझाते थे।

एक समय ऐसा भी आया जब सरकार की तरफ से उन्हें रोकने का प्रयास किया गया और वन विभाग के अधिकारियों ने उन्हें जेल भेजने की धमकी दी। लेकिन दशरथ के अटूट साहस के सामने अधिकारी भी पीछे हट गए। धीरे-धीरे कुछ लोगों को उनकी निस्वार्थ भावना का अहसास होने लगा और वे चोरी-छिपे उन्हें खाना देने लगे। दशरथ मांझी का यह संघर्ष केवल एक पहाड़ के खिलाफ नहीं था, बल्कि वे समाज की संकीर्ण सोच, गरीबी और भूख के खिलाफ भी अकेले लड़ रहे थे।

दिल्ली की यात्रा और व्यवस्था की बेरुखी

दशरथ मांझी का संघर्ष केवल गहलौर की पहाड़ियों तक ही सीमित नहीं रहा। जब पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा कट चुका था, तब उन्होंने सोचा कि सरकार से इस रास्ते को पक्का बनाने और गाँव के विकास के लिए मदद मांगनी चाहिए। उनके पास पैसे नहीं थे, इसलिए वे रेलवे ट्रैक के किनारे-किनारे पैदल ही दिल्ली के लिए निकल पड़े।

सैकड़ों किलोमीटर की यह पैदल यात्रा अत्यंत कष्टदायक थी, लेकिन उनके पैरों में छाले भी उनके हौसले को डिगा नहीं सके। जब वे दिल्ली पहुँचे और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने लगे, तो उन्हें केवल कागजी आश्वासन और अधिकारियों की बेरुखी का सामना करना पड़ा। नौकरशाही के इस रवैये ने उन्हें निराश तो किया, लेकिन उनका हौसला नहीं तोड़ सके।

वे वापस अपने गाँव गहलौर लौट आए और फिर से अपने हथौड़े को थाम लिया। वे समझ गए थे कि व्यवस्था के भरोसे बैठने से कुछ नहीं होने वाला, उन्हें अपना काम खुद ही पूरा करना होगा। उन्होंने दिल्ली की उस यात्रा से सीख ली कि आत्मनिर्भरता ही सबसे बड़ी ताकत है। वे दुगुने उत्साह के साथ पहाड़ को काटने में जुट गए और हर दिन पहाड़ की ऊंचाई उनके हौसले के सामने छोटी होती चली गई।

22 वर्षों का तप और पहाड़ की पराजय

साल बीतते गए, दशक बदलते गए, लेकिन दशरथ मांझी का संकल्प नहीं बदला। उन्होंने पूरे 22 वर्षों तक यानी 1960 से 1982 तक लगातार उस विशाल पहाड़ की छाती को चीरने का काम किया। इन 22 वर्षों में उनके बाल सफेद हो गए, शरीर पर झुर्रियां पड़ गईं, और हाथ-पैर पूरी तरह से सख्त हो गए, लेकिन उनकी आँखों की चमक वैसी ही बनी रही।

आखिरकार, वह ऐतिहासिक दिन भी आया जब उस घमंडी पहाड़ ने हार मान ली और दशरथ मांझी के संकल्प की जीत हुई। उन्होंने अकेले दम पर 360 फीट लंबा, 30 फीट चौड़ा और 25 फीट गहरा रास्ता पहाड़ के बीचों-बीच से बना दिया। इस रास्ते के बनते ही गहलौर और वजीरगंज के बीच की दूरी 55 किलोमीटर से घटकर मात्र 15 किलोमीटर रह गई।

जो रास्ता कभी मौत का कारण बनता था, वह अब जीवनदायिनी सड़क बन चुका था। गाँव के लोग जो कभी उन्हें पागल कहते थे, अब उनके पैरों में गिरकर माफी मांगने लगे और उन्हें भगवान का दर्जा देने लगे। दशरथ मांझी ने साबित कर दिया था कि यदि मनुष्य के भीतर सच्चा प्रेम और दृढ़ संकल्प हो, तो वह प्रकृति की सबसे बड़ी चुनौती को भी परास्त कर सकता है।

राष्ट्रीय पहचान और अंतिम समय

पहाड़ काटने का कारनामा पूरा होने के बाद दशरथ मांझी की ख्याति पूरे देश में फैल गई। मीडिया और सरकार का ध्यान उनकी तरफ गया। बिहार सरकार ने उन्हें सम्मानित किया और उनके नाम पर कई योजनाओं की घोषणा की। उन्हें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल में राज्य स्तर पर बड़ा सम्मान मिला, यहाँ तक कि मुख्यमंत्री ने अपनी कुर्सी पर बिठाकर उन्हें सम्मानित किया था।

इसके बावजूद, दशरथ मांझी हमेशा एक साधारण और जमीन से जुड़े इंसान बने रहे। उन्हें जो भी आर्थिक मदद मिली, उन्होंने उसे गाँव के विकास और अस्पताल बनवाने के काम में लगा दिया। उनका सपना था कि उनके गाँव में एक बड़ा अस्पताल बने ताकि भविष्य में किसी और की पत्नी या माँ इलाज के अभाव में दम न तोड़े।

जीवन के अंतिम दिनों में वे कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हो गए। उन्हें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), दिल्ली में भर्ती कराया गया, जहाँ 17 अगस्त 2007 को इस महान आत्मा ने दुनिया को अलविदा कह दिया। बिहार सरकार ने उनका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया, जो इस बात का प्रतीक था कि एक अदना सा मजदूर भी अपने कर्मों से राष्ट्र का गौरव बन सकता है।

माउंटेन मैन की अमर विरासत

दशरथ मांझी आज हमारे बीच शारीरिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनकी विरासत और उनकी कहानी आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में जिंदा है। उनके जीवन पर बॉलीवुड में “मांझी – द माउंटेन मैन” नाम की एक बेहद प्रभावशाली फिल्म भी बनी, जिसमें उनके किरदार को जीवंत किया गया और दुनिया ने उनके संघर्ष को करीब से देखा।

गहलौर गाँव में आज वह रास्ता मौजूद है, जो हर आने-जाने वाले को दशरथ मांझी के त्याग और प्रेम की याद दिलाता है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि मुश्किलें चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, यदि हमारे इरादे फौलादी हैं तो हम किसी भी परिस्थिति को बदल सकते हैं।

उनका एक प्रसिद्ध संवाद “जब तक तोड़ेंगे नहीं, तब तक छोड़ेंगे नहीं” आज युवाओं के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा मंत्र बन चुका है। दशरथ मांझी केवल एक व्यक्ति नहीं थे, बल्कि वे मानवीय इच्छाशक्ति, निस्वार्थ प्रेम और अटूट धैर्य के साक्षात प्रतीक थे। उनकी यह अमर गाथा सदियों तक आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती रहेगी कि कोई भी काम असंभव नहीं है, बशर्ते आपके पास उसे पूरा करने का अटूट संकल्प हो।

अगर आपको यह कहानी पसंद आई, तो अन्य ज्ञानवर्धक कहानियाँ भी ज़रूर पढ़ें।

दशरथ माँझी 
प्रस्तुति: Saying Central Team

दिलचस्प कहानियों का सफर यहीं खत्म नहीं होता, ये भी ज़रूर पढ़ें:
Share:
WhatsApp
Facebook

Leave a Comment

Feature corner

चाणक्य नीति
Chanakya Neeti Explained

नीति और सफलता के अमूल्य सूत्र।

Book Summaries Explained

लोकप्रिय किताबों के मुख्य विचार।
Read More »

Child Psychology Explained

बच्चों की सोच और मनोविज्ञान।
Read More »

Moral Values Explained

छोटी कहानियाँ और नैतिक शिक्षा।

Inspirational Lives

महान व्यक्तियों के प्रेरणादायक जीवन।

CATEGORIES