मकर संक्रांति

लोक कथाएं- मकर संक्रांति

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लोक-कथाएँ हमारे समाज की वह पारंपरिक कहानियाँ हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से सुनाई जाती रही हैं। इनमें जीवन के अनुभव, लोक-ज्ञान, नैतिक मूल्य, हास्य और कल्पनाशीलता का सुंदर मिश्रण होता है। ये कहानियाँ किसी एक लेखक की नहीं होतीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक रचना होती हैं। लोक-कथाएँ सरल भाषा में गहरी सीख देती हैं और बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी के लिए प्रेरणादायक होती हैं।

इन्हीं लोक-कथाओं के माध्यम से हमें ईमानदारी, समझदारी, धैर्य, साहस और नैतिकता जैसे जीवन-मूल्य सीखने को मिलते हैं। हर कहानी के पीछे कोई न कोई संदेश छिपा होता है जो हमें जीवन को बेहतर तरीके से समझने में मदद करता है।
हम आपके सामने 20 लोकप्रिय हिंदी लोक-कथाओं का एक सुंदर संग्रह प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आपको मनोरंजन के साथ-साथ जीवन के महत्वपूर्ण पाठ भी सिखाएँगी।

लोक कथाएं- मकर संक्रांति

मकर संक्रांति भारत के सबसे प्राचीन और पवित्र त्योहारों में से एक माना जाता है। यह केवल एक पर्व नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति, धर्म और प्रकृति के बीच गहरे संबंध का प्रतीक है। हर वर्ष पौष मास में जब सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तब इस पर्व को मनाया जाता है।

इस दिन से सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं और माना जाता है कि धरती पर शुभ कार्यों की शुरुआत का समय आ जाता है। भारत के अलग-अलग राज्यों में इसे अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। कहीं इसे खिचड़ी कहा जाता है, कहीं पोंगल, कहीं लोहड़ी तो कहीं उत्तरायण। लेकिन हर स्थान पर इसका उद्देश्य एक ही होता है—सूर्य देव के प्रति आभार प्रकट करना और जीवन में सुख-समृद्धि की कामना करना।

प्राचीन समय में पृथ्वीलोक पर बबरुवाहन नामक एक राजा का राज्य हुआ करता था। उसका राज्य बहुत समृद्ध था और वहां किसी प्रकार की कमी नहीं थी। उसी राज्य में हरिदास नाम का एक ब्राह्मण अपनी पत्नी गुणवती के साथ रहता था। गुणवती अत्यंत धर्मपरायण और पतिव्रता स्त्री थी। उसका पूरा जीवन पूजा-पाठ, दान-पुण्य और अतिथि सेवा में बीतता था। वह हर देवी-देवता की भक्ति करती, व्रत रखती और जरूरतमंदों की सहायता करती थी। समय बीतता गया और धीरे-धीरे गुणवती वृद्ध हो गई। अंततः जब उसकी मृत्यु हुई, तब यमराज के दूत उसे धर्मलोक ले गए।

यमलोक पहुंचकर गुणवती ने देखा कि धर्मराज सुंदर सिंहासन पर विराजमान हैं और उनके पास चित्रगुप्त बैठकर सभी मनुष्यों के कर्मों का लेखा-जोखा प्रस्तुत कर रहे हैं। गुणवती भयभीत होकर सिर झुकाकर खड़ी हो गई। चित्रगुप्त ने उसके पूरे जीवन का विवरण धर्मराज के सामने रखा। धर्मराज उसके पुण्य कर्मों से प्रसन्न तो हुए, लेकिन उनके चेहरे पर हल्की उदासी भी दिखाई दी। गुणवती ने विनम्रता से पूछा कि उसने जीवनभर केवल अच्छे कर्म किए, फिर भी उनके चेहरे पर दुःख क्यों है। तब धर्मराज ने बताया कि उसने सभी देवी-देवताओं की पूजा की, लेकिन कभी भी धर्मराज के नाम से कोई व्रत, दान या पूजा नहीं की।

यह सुनकर गुणवती अत्यंत दुखी हुई और उसने धर्मराज से क्षमा मांगी। उसने कहा कि उसे इस व्रत के विषय में कभी जानकारी नहीं मिली। तब उसने प्रार्थना की कि प्रभु उसे ऐसा मार्ग बताएं जिससे पृथ्वी के लोग धर्मराज की कृपा प्राप्त कर सकें। धर्मराज ने कहा कि जिस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं, उसी दिन से उनके नाम का व्रत प्रारंभ करना चाहिए। उन्होंने बताया कि पूरे एक वर्ष तक श्रद्धा और नियम के साथ उनकी कथा सुननी चाहिए और धर्म के दस नियमों का पालन करना चाहिए। इन नियमों में धैर्य रखना, मन को वश में रखना, सत्य बोलना, क्रोध न करना, दान-पुण्य करना और इंद्रियों पर नियंत्रण रखना शामिल था।

धर्मराज ने आगे बताया कि अगले वर्ष मकर संक्रांति पर इस व्रत का विधिपूर्वक उद्यापन करना चाहिए। साथ ही उनकी और चित्रगुप्त की प्रतिमा बनवाकर पूजा करनी चाहिए, काले तिल के लड्डुओं का भोग लगाना चाहिए और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, कंबल तथा अन्य वस्तुएं दान करनी चाहिए। गुणवती ने यह सब ध्यानपूर्वक सुना और धर्मराज से प्रार्थना की कि उसे पुनः पृथ्वीलोक पर भेज दिया जाए ताकि वह स्वयं यह व्रत कर सके और लोगों को भी इसके महत्व के बारे में बता सके। धर्मराज उसकी भक्ति से प्रसन्न हुए और उसे पृथ्वी पर लौटने की अनुमति दे दी।

धरती पर लौटकर गुणवती ने अपने पति हरिदास को पूरी कथा सुनाई। मकर संक्रांति आने पर दोनों पति-पत्नी ने पूरे नियम और श्रद्धा के साथ धर्मराज का व्रत आरंभ किया। उन्होंने दान-पुण्य किए, कथा सुनी और धर्म के नियमों का पालन किया। धीरे-धीरे उनके जीवन में सुख और शांति आने लगी। अंततः धर्मराज की कृपा से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। यह कथा लोगों को सिखाती है कि केवल पूजा-पाठ ही नहीं बल्कि सत्य, दया और धर्म का पालन भी जीवन में अत्यंत आवश्यक है।

मकर संक्रांति से जुड़ी एक और प्रसिद्ध कथा सूर्य देव और शनि देव की है। सूर्य देव की दो पत्नियां थीं—संज्ञा और छाया। छाया के पुत्र शनि देव जन्म से ही श्याम वर्ण के थे। उनका रंग देखकर सूर्य देव ने उन्हें अपना पुत्र मानने से इंकार कर दिया और उनका अपमान किया। इस कारण शनि देव और माता छाया को अलग रहना पड़ा। सूर्य देव के व्यवहार से दुखी होकर माता छाया ने उन्हें कुष्ठ रोग का श्राप दे दिया। क्रोध में सूर्य देव ने शनि देव का घर जला दिया। बाद में जब यमराज ने सूर्य देव को अपनी गलती का एहसास कराया, तब वे स्वयं शनि देव से मिलने पहुंचे।

जब सूर्य देव वहां पहुंचे, तब शनि देव के पास कुछ भी नहीं बचा था। फिर भी उन्होंने प्रेमपूर्वक अपने पिता का स्वागत काले तिल से किया। पुत्र के इस व्यवहार से सूर्य देव अत्यंत भावुक हो गए। उन्होंने शनि देव को “मकर” राशि का स्वामित्व
और आशीर्वाद दिया कि मकर संक्रांति के दिन जो भी उन्हें काले तिल अर्पित करेगा, उसके जीवन में सुख और समृद्धि आएगी। तभी से इस पर्व पर काले तिल का विशेष महत्व माना जाता है। यह कथा हमें क्षमा, प्रेम और पारिवारिक संबंधों की महत्ता सिखाती है।

भगीरथ और मां गंगा की कथा भी मकर संक्रांति से गहराई से जुड़ी हुई है। राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया था, लेकिन इंद्र देव ने ईर्ष्या के कारण यज्ञ का घोड़ा चुरा लिया और कपिल मुनि के आश्रम के पास बांध दिया। राजा सगर के साठ हजार पुत्र घोड़ा खोजते हुए वहां पहुंचे और उन्होंने कपिल मुनि पर चोरी का आरोप लगा दिया। क्रोधित होकर कपिल मुनि ने अपने श्राप से उन सभी को भस्म कर दिया। बाद में राजा भगीरथ ने कठोर तपस्या करके मां गंगा को पृथ्वी पर लाने का संकल्प लिया ताकि उनके पूर्वजों को मोक्ष मिल सके।

भगीरथ की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा पृथ्वी पर आने के लिए तैयार हुईं, लेकिन उनका वेग इतना प्रचंड था कि पृथ्वी नष्ट हो सकती थी। तब भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण किया और धीरे-धीरे पृथ्वी पर प्रवाहित किया। भगीरथ मां गंगा को लेकर कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे, जहां गंगा जल के स्पर्श से राजा सगर के पुत्रों को मोक्ष प्राप्त हुआ। जिस दिन यह चमत्कार हुआ, वह दिन मकर संक्रांति का था। इसी कारण इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व माना जाता है।

मकर संक्रांति से जुड़ी अन्य कथाओं में भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा भी प्रसिद्ध है, जिसमें उन्होंने असुर राजा बलि को पाताल लोक भेजा था। वहीं एक कथा के अनुसार सूर्य देव के रथ में लगे खरमास के प्रभाव समाप्त होकर इस दिन से उनके सातों घोड़े तेज गति से चलने लगते हैं, जिससे दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं। माता यशोदा द्वारा श्रीकृष्ण को पाने के लिए रखा गया मकर संक्रांति व्रत भी इस पर्व की महिमा को दर्शाता है। इन सभी कथाओं का उद्देश्य केवल धार्मिक आस्था बढ़ाना नहीं, बल्कि लोगों को धर्म, दया, सत्य, क्षमा और संस्कृति से जोड़ना भी है।

खिचड़ी की कहानी

बहुत समय पहले एक छोटे से गांव में एक बूढ़ी माई रहा करती थी। उसका जीवन बेहद साधारण था, लेकिन उसका मन भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में हमेशा लीन रहता था। गांव के लोग उसे गरीब जरूर कहते थे, पर उसकी आस्था इतनी समृद्ध थी कि वह हर परिस्थिति में प्रसन्न रहती थी। माघ का महीना शुरू होते ही वह कठोर व्रत रखती, रोज प्रातःकाल उठकर गंगा स्नान के लिए जाती और दिनभर भगवान का भजन करती थी। उसके पास खाने के लिए बहुत कम होता था, लेकिन उसने कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया। उसका विश्वास था कि जो व्यक्ति सच्चे मन से भगवान का नाम लेता है, उसकी सहायता स्वयं भगवान करते हैं।

हर दिन जब वह स्नान करके लौटती और पूजा समाप्त कर अपना व्रत खोलने बैठती, तब उसके आंगन में एक कटोरे में गरम-गरम खिचड़ी रखी मिलती। वह समझ जाती कि यह स्वयं श्रीकृष्ण की कृपा है। बूढ़ी माई प्रेम से उस खिचड़ी को भगवान का प्रसाद मानकर खाती और भगवान का धन्यवाद करती। यह क्रम कई दिनों तक चलता रहा। गांव में किसी को इस रहस्य का पता नहीं था, लेकिन उसकी पड़ोस में रहने वाली एक औरत को यह बात धीरे-धीरे खटकने लगी। वह स्वभाव से ईर्ष्यालु थी और उसे यह सहन नहीं होता था कि एक गरीब बूढ़ी औरत रोज स्वादिष्ट खिचड़ी खाए जबकि उसके पास कोई साधन भी नहीं है।

पड़ोसन रोज चुपके से बूढ़ी माई पर नजर रखती। वह देखती कि दिनभर बूढ़ी के घर में न तो कोई राशन आता है और न ही कोई मेहमान, फिर भी शाम होते ही उसके पास खिचड़ी का कटोरा कैसे पहुंच जाता है। उसके मन में शक और जलन बढ़ती चली गई। उसने कई बार जानने की कोशिश की, लेकिन बूढ़ी माई केवल मुस्कुराकर कहती कि यह सब भगवान की कृपा है। यह सुनकर पड़ोसन और भी जलने लगी। उसे लगने लगा कि जरूर कोई रहस्य है जिसे बूढ़ी उससे छिपा रही है। धीरे-धीरे उसकी ईर्ष्या इतनी बढ़ गई कि उसने बूढ़ी को सबक सिखाने का निश्चय कर लिया।

एक दिन माघ संक्रांति का पावन पर्व आया। उस दिन बूढ़ी माई पहले से भी अधिक श्रद्धा के साथ गंगा स्नान के लिए गई। उधर जैसे ही वह घर से निकली, उसी समय भगवान श्रीकृष्ण उसके आंगन में खिचड़ी का कटोरा रखकर चले गए।

पड़ोसन पहले से ही ताक में बैठी थी। जैसे ही उसने आंगन में रखा हुआ खिचड़ी का कटोरा देखा और यह सुनिश्चित किया कि बूढ़ी घर पर नहीं है, उसने तुरंत वह कटोरा उठाया और घर के पीछे वाली सड़क पर जाकर पूरी खिचड़ी फेंक दी। इतना ही नहीं, उसने कटोरा भी वहीं पटक दिया ताकि बूढ़ी को कुछ भी न मिले। उसे लगा कि अब बूढ़ी भूखी रहेगी और उसका यह रहस्य भी समाप्त हो जाएगा।

कुछ देर बाद बूढ़ी माई स्नान करके वापस लौटी। उसने रोज की तरह भगवान का नाम लिया और प्रसाद लेने आंगन में पहुंची, लेकिन वहां कुछ नहीं था। उसने पूरे घर में खोजा, हर कोने में देखा, लेकिन खिचड़ी का कटोरा कहीं नहीं मिला। उसकी आंखों में आंसू आ गए। वह दुखी होकर बार-बार एक ही बात दोहराने लगी—“कहां गई मेरी खिचड़ी और कहां गया मेरा कटोरा?” उसकी आवाज में इतना दर्द था कि सुनने वाला भी भावुक हो जाए। उस दिन बूढ़ी माई भूखी ही सो गई, लेकिन उसके मन में भगवान के प्रति कोई शिकायत नहीं थी। वह केवल यही सोचती रही कि शायद उसकी परीक्षा ली जा रही है।

दूसरी ओर जहां पड़ोसन ने खिचड़ी फेंकी थी, वहां कुछ दिनों बाद एक छोटा सा पौधा उग आया। धीरे-धीरे वह पौधा बड़ा हुआ और उसमें दो सुंदर फूल खिले। उन फूलों में अद्भुत चमक थी और उन्हें देखकर हर कोई आकर्षित हो जाता था। उसी राज्य का राजा एक दिन शिकार खेलने के लिए उसी रास्ते से गुजरा। उसकी नजर उन अनोखे फूलों पर पड़ी तो वह उन्हें देखकर मंत्रमुग्ध हो गया। उसने दोनों फूल तोड़ लिए और महल में ले जाकर अपनी रानी को दे दिए। रानी ने जैसे ही उन फूलों को सूंघा, उसके जीवन में चमत्कार हो गया। कुछ समय बाद रानी गर्भवती हो गई।

राजा और रानी वर्षों से संतान प्राप्ति के लिए परेशान थे। राज्य में उत्तराधिकारी न होने के कारण सभी चिंतित रहते थे। लेकिन अब महल में खुशियों की लहर दौड़ गई। समय आने पर रानी ने दो सुंदर पुत्रों को जन्म दिया। पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया। राजा ने बड़े स्तर पर दान-पुण्य करवाया और मंदिरों में पूजा करवाई। दोनों राजकुमार जैसे-जैसे बड़े होते गए, उनकी सुंदरता और तेज देखकर लोग आश्चर्यचकित रह जाते। लेकिन एक विचित्र बात थी—वे दोनों किसी से भी बात नहीं करते थे। चाहे राजा हो, रानी हो या कोई मंत्री, वे केवल मुस्कुराते लेकिन कभी एक शब्द नहीं बोलते।

जब दोनों राजकुमार जवान हुए तो उन्हें शिकार खेलने का बहुत शौक हुआ। वे अक्सर जंगल की ओर निकल जाते। रास्ते में वही बूढ़ी माई मिलती, जो अब भी उदास होकर वही शब्द दोहराती रहती—“कहां गई मेरी खिचड़ी और कहां गया मेरा कटोरा?” यह सुनते ही दोनों राजकुमार रुक जाते और पहली बार बोलते—“हम हैं तेरी खिचड़ी और हम हैं तेरा कटोरा।” बूढ़ी माई यह सुनकर चौंक जाती, लेकिन उसे कुछ समझ नहीं आता। हर बार ऐसा ही होता। पूरे राज्य में यह बात फैल गई कि जो राजकुमार किसी से नहीं बोलते, वे उस बूढ़ी औरत से बात करते हैं।

एक दिन यह बात राजा के कानों तक पहुंची। उसे बहुत आश्चर्य हुआ। उसने तुरंत बूढ़ी माई को राजमहल बुलवाया और पूछा कि आखिर उसके सामने दोनों पुत्र कैसे बोलने लगते हैं। बूढ़ी माई ने विनम्रता से पूरी कहानी सुनाई। उसने बताया कि कैसे वह माघ का व्रत करती थी, कैसे भगवान श्रीकृष्ण उसे खिचड़ी का प्रसाद देते थे और कैसे एक दिन उसकी खिचड़ी और कटोरा गायब हो गए थे। तभी दोनों राजकुमार आगे आए और बोले कि पड़ोसन द्वारा फेंकी गई वही खिचड़ी फूल बन गई थी और उन्हीं फूलों से उनका जन्म हुआ है। उन्होंने कहा कि भगवान ने उन्हें बूढ़ी माई के प्रेम और भक्ति का प्रतिफल बनाकर भेजा है।

यह अद्भुत सत्य सुनकर राजा और रानी भावुक हो उठे। उन्होंने बूढ़ी माई को महल में सम्मानपूर्वक रहने के लिए स्थान दिया। अब बूढ़ी माई के जीवन के दुख समाप्त हो गए थे। उसे परिवार का प्यार और सम्मान दोनों मिलने लगे। राजा ने पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर खिचड़ी बनवाकर भगवान श्रीकृष्ण को भोग लगाया और फिर वह प्रसाद लोगों में बांटा गया। तभी से मकर संक्रांति और माघ के पावन अवसर पर खिचड़ी खाने और दान करने की परंपरा शुरू हुई। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति, धैर्य और भगवान पर विश्वास रखने वाले व्यक्ति की सहायता स्वयं ईश्वर करते हैं, जबकि ईर्ष्या और द्वेष अंततः मनुष्य को केवल पछतावा ही देते हैं।

फुर्र-फुर्र : एक भोले जुलाहे की मजेदार लोक-कथा

बहुत समय पहले किसी छोटे से गांव में एक सीधा-सादा जुलाहा रहता था। वह मेहनत करके अपना जीवन चलाता था और कपड़ा बुनने का काम करता था। उसका स्वभाव इतना भोला था कि गांव के लोग कई बार उसकी बातों पर हंसते भी थे, लेकिन वह किसी की बात का बुरा नहीं मानता था।

उसकी पत्नी थोड़ी तेज स्वभाव की थी और घर के कामकाज में बहुत अनुशासन रखती थी। एक दिन पत्नी ने उसे रुई लाने के लिए बाजार भेजा ताकि वह सूत कातकर कपड़ा बुन सके। जुलाहा खुशी-खुशी रुई लेकर वापस लौट रहा था। रास्ते में उसे एक नदी दिखाई दी, जिसके किनारे ठंडी हवा चल रही थी। उसने सोचा कि थोड़ी देर आराम कर लिया जाए, फिर घर चला जाएगा।

जुलाहा नदी किनारे बैठ हीा था कि अचानक मौसम बदल गया। देखते ही देखते तेज आंधी चलने लगी। हवा इतनी तेज थी कि उसके हाथों में पकड़ी सारी रुई उड़कर आसमान में बिखर गई। बेचारा जुलाहा घबरा गया। उसने दौड़-दौड़कर रुई पकड़ने की कोशिश की, लेकिन हल्की रुई हवा में फुर्र-फुर्र करके उड़ती चली गई। कुछ ही पलों में उसकी सारी मेहनत खत्म हो गई। अब उसे सबसे ज्यादा डर अपनी पत्नी का लग रहा था। वह सोचने लगा कि अगर खाली हाथ घर पहुंचा तो पत्नी बहुत नाराज़ होगी। डर और घबराहट में उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। उसे कुछ समझ नहीं आया तो वह बस बार-बार यही बोलने लगा—“फुर्र-फुर्र… फुर्र-फुर्र…”

रास्ते में आगे एक चिड़ीमार जाल बिछाकर पक्षियों को पकड़ रहा था। बड़ी देर से वह धैर्य के साथ बैठा था और कई चिड़ियां उसके जाल के पास मंडरा रही थीं। तभी जुलाहा वहां से गुजरते हुए जोर-जोर से “फुर्र-फुर्र” बोलने लगा। उसकी आवाज सुनते ही सारी चिड़ियां डरकर उड़ गईं। चिड़ीमार का सारा काम बिगड़ गया।

वह गुस्से से लाल हो गया और दौड़कर जुलाहे के पास आया। उसने चिल्लाकर कहा कि तुम्हारी वजह से मेरी सारी मेहनत बर्बाद हो गई। क्या तुम्हें कुछ और बोलना नहीं आता? अगर कुछ कहना ही है तो “पकड़ो! पकड़ो!” कहो। भोला जुलाहा तुरंत डर गया और उसने सोचा कि शायद यही सही बात होगी। अब वह रास्तेभर “पकड़ो! पकड़ो!” बोलते हुए आगे बढ़ने लगा।

कुछ दूर आगे बढ़ने पर उसे कुछ चोर दिखाई दिए। वे पेड़ के नीचे बैठकर चोरी के रुपए गिन रहे थे। जैसे ही उन्होंने किसी को “पकड़ो! पकड़ो!” चिल्लाते सुना, वे बुरी तरह घबरा गए। उन्हें लगा कि शायद सैनिक आ गए हैं और अब वे पकड़े जाएंगे। घबराहट में उन्होंने जल्दी-जल्दी पैसे छिपाने शुरू कर दिए।

लेकिन जब उन्होंने ध्यान से देखा तो सामने केवल एक अकेला जुलाहा चला आ रहा था। चोरों को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने जुलाहे को पकड़ लिया और डांटते हुए बोले कि क्या हमें मरवाने का इरादा है? ऐसी बात नहीं कहते। तुम्हें कहना चाहिए—“इसको रखो, ढेरों लाओ।” जुलाहा फिर डर गया और उसने तुरंत उनकी बात मान ली। अब वह पूरे रास्ते यही दोहराने लगा—“इसको रखो, ढेरों लाओ… इसको रखो, ढेरों लाओ…”

थोड़ी देर बाद वह एक श्मशान घाट के पास से गुजरा। वहां गांव के लोग बहुत दुखी होकर शवों का अंतिम संस्कार कर रहे थे। उस गांव में हैजे की बीमारी फैल गई थी और कई लोगों की मृत्यु हो चुकी थी। पूरा वातावरण दुख और शोक से भरा हुआ था। ऐसे समय में जब लोगों ने जुलाहे को “इसको रखो, ढेरों लाओ” कहते सुना तो उनका खून खौल उठा।

उन्हें लगा कि यह आदमी उनके दुख का मजाक उड़ा रहा है। कुछ लोग गुस्से में उसके पास पहुंचे और उसे डांटने लगे। उन्होंने कहा कि तुम्हें शर्म नहीं आती? यहां लोग मर रहे हैं और तुम ऐसी बातें कर रहे हो। ऐसे समय में तो कहना चाहिए—“यह तो बड़े दुख की बात है।”

बेचारा जुलाहा एक बार फिर डर गया। उसने हाथ जोड़कर माफी मांगी और तुरंत वही वाक्य रट लिया। अब वह धीरे-धीरे चलते हुए बार-बार कहने लगा—“यह तो बड़े दुख की बात है… यह तो बड़े दुख की बात है…” कुछ दूर जाने के बाद उसे एक बड़ी सुंदर बारात दिखाई दी।

ढोल-नगाड़े बज रहे थे, लोग नाच रहे थे और चारों तरफ खुशी का माहौल था। लेकिन जैसे ही बारातियों ने जुलाहे को यह कहते सुना कि “यह तो बड़े दुख की बात है”, वे भड़क उठे। उन्हें लगा कि यह उनकी खुशी में अपशकुन बोल रहा है। कुछ लोग उसे मारने दौड़े। जुलाहा डर के मारे कांपने लगा और बड़ी मुश्किल से उसने समझाया कि वह तो वही बोल रहा है जो लोगों ने उसे सिखाया है।

बारातियों को उसकी मूर्खता पर हंसी आ गई। उन्होंने उसे समझाया कि शादी-ब्याह के मौके पर ऐसी बातें नहीं बोलते। तुम्हें कहना चाहिए—“भाग्य में हो तो ऐसा सुख मिले।” जुलाहा ने फिर सिर हिलाया और नई बात याद कर ली। अब वह खुशी-खुशी यही बोलते हुए आगे बढ़ने लगा—“भाग्य में हो तो ऐसा सुख मिले… भाग्य में हो तो ऐसा सुख मिले…” दिनभर की भागदौड़ और मुसीबतों से वह बहुत थक चुका था। धीरे-धीरे शाम ढल गई और अंधेरा होने लगा। उसे अपनी पत्नी की बात याद आई कि जहां रात हो जाए, वहीं रुक जाना। इसलिए उसने एक जगह आराम करने का फैसला किया और वहीं लेटकर सो गया।

सुबह-सुबह अचानक उसके चेहरे पर ठंडा पानी पड़ा। वह घबराकर उठ बैठा। कुछ पल तक उसे समझ ही नहीं आया कि वह कहां है। जब उसने आंखें खोलीं तो हैरान रह गया। वह कोई दूसरी जगह नहीं बल्कि अपने ही घर के आंगन में सोया हुआ था। दरअसल थकान में चलते-चलते वह अपने घर तक पहुंच गया था और आंगन में ही सो गया था।

उसकी पत्नी सुबह घर का काम करते हुए उसे उठाने के लिए पानी डाल रही थी। अपनी पत्नी और घर को देखकर जुलाहा बहुत खुश हो गया। उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई और उसके मुंह से तुरंत वही बात निकली जो उसने आखिरी बार सीखी थी—“भाग्य में हो तो ऐसा सुख मिले।”

यह सुनकर उसकी पत्नी भी हंस पड़ी। गांववालों को जब यह पूरी घटना पता चली तो वे भी खूब हंसे। इस तरह भोले जुलाहे की यह मजेदार कहानी पूरे गांव में प्रसिद्ध हो गई। यह लोक-कथा हमें सिखाती है कि बिना समझे किसी की बात दोहराना कई बार बड़ी मुसीबत में डाल सकता है। साथ ही यह कहानी भोलेपन, हास्य और ग्रामीण जीवन की सरलता को भी बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत करती है।

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लोक कथाएँ हमारी सांस्कृतिक धरोहर का अमूल्य हिस्सा हैं। इनमें जीवन के अनुभव, नैतिक शिक्षा, लोक परंपराएँ और मनोरंजन का सुंदर समन्वय मिलता है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाने वाली ये कहानियाँ समाज की संस्कृति और मूल्यों को जीवंत बनाए रखती हैं।

लोक कथाएं
प्रस्तुति: Saying Central Team

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