अजगर

लोक-कथा:अजगर

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लोक-कथा:अजगर

बहुत समय पहले किसी विशाल और समृद्ध राज्य में एक राजा राज करता था। उसके महल में किसी चीज़ की कमी नहीं थी, लेकिन उसके परिवार के भीतर शांति नहीं थी। राजा की दो रानियाँ थीं। बड़ी रानी का नाम शोभा था, जो स्वभाव से अत्यंत दयालु, शांत और धार्मिक महिला थी।

वह प्रजा से प्रेम करती थी और हमेशा दूसरों की सहायता के लिए तैयार रहती थी। उसकी एक सुंदर और संस्कारी पुत्री थी, जिसका नाम देवी था। दूसरी ओर छोटी रानी रूपा थी, जो बेहद घमंडी, कठोर और चालाक स्त्री थी। उसकी बेटी तारा भी अपनी माँ की तरह जिद्दी और अभिमानी स्वभाव की थी। रानी रूपा हमेशा चाहती थी कि पूरे राज्य की सत्ता उसी के हाथ में रहे और राजा केवल उसकी बात माने।

समय बीतने के साथ रानी रूपा के मन में बड़ी रानी शोभा और उसकी बेटी देवी के प्रति नफरत बढ़ती चली गई। वह यह सहन नहीं कर पाती थी कि लोग शोभा और देवी की अच्छाइयों की प्रशंसा करें। धीरे-धीरे उसने राजा को अपने प्रभाव में ले लिया। राजा भी उसकी क्रूरता और गुस्से से डरता था।

एक दिन रानी रूपा ने राजा से साफ कह दिया कि बड़ी रानी और उसकी बेटी को महल से निकाल दिया जाए। राजा कमजोर मन का था। उसने बिना विरोध किए शोभा और देवी को राजमहल से बाहर एक छोटे से पुराने घर में रहने भेज दिया। यह निर्णय सुनकर पूरी प्रजा दुखी हुई, लेकिन कोई भी रानी रूपा के विरुद्ध बोलने का साहस नहीं कर पाया।

महल से निकलने के बाद भी रानी रूपा का मन शांत नहीं हुआ। उसने देवी को अपमानित करने के लिए नया आदेश दिया कि अब वह प्रतिदिन राजा की गायों को जंगल में चराने के लिए ले जाया करेगी। रानी शोभा समझ गई कि यह केवल एक बहाना है और रूपा आगे भी उन्हें परेशान करने का अवसर ढूंढेगी।

फिर भी उसने अपनी बेटी को समझाया कि धैर्य रखना चाहिए और भगवान पर विश्वास करना चाहिए। देवी अपनी माँ की आज्ञा मानकर रोज सुबह गायों को जंगल ले जाती और शाम को वापस लेकर आती। जंगल शांत और रहस्यमयी था। वहां ऊंचे-ऊंचे पेड़, पक्षियों की आवाजें और दूर तक फैली हरियाली थी, लेकिन देवी हमेशा अकेलापन महसूस करती थी।

एक शाम जब वह गायों को लेकर घर लौट रही थी, तभी अचानक उसे पीछे से एक धीमी और अजीब आवाज सुनाई दी—“देवी, देवी, क्या तुम मुझसे विवाह करोगी?” यह सुनकर वह डर गई। उसने पीछे मुड़कर देखा, लेकिन वहां कोई दिखाई नहीं दिया। उसका दिल तेजी से धड़कने लगा और वह जल्दी-जल्दी गायों को हांकती हुई घर लौट आई।

अगले दिन भी वही घटना हुई। फिर वही रहस्यमयी आवाज गूंजी और वही प्रश्न पूछा गया। अब देवी का डर और बढ़ गया। रात को उसने सारी बात अपनी माँ को बताई। रानी शोभा पूरी रात सोचती रही। उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह कैसी विचित्र घटना है, लेकिन उसने अंततः निर्णय लिया कि जो भी हो, उसे साहस के साथ स्वीकार करना चाहिए।

अगली सुबह रानी शोभा ने देवी से कहा कि यदि आज फिर वही आवाज सुनाई दे, तो उसे कहना कि यदि वह अगले दिन उनके घर आएगा, तभी विवाह संभव होगा। देवी यह सुनकर चौंक गई। उसने डरते हुए कहा कि वे उस व्यक्ति को जानते तक नहीं हैं। लेकिन रानी शोभा ने दुखी मन से कहा कि उनकी स्थिति पहले ही बहुत खराब है।

शायद भगवान इसी रूप में उनकी सहायता करना चाहते हों। उस शाम जब देवी जंगल से लौट रही थी, तब फिर वही कोमल लेकिन दुखभरी आवाज सुनाई दी—“देवी, क्या तुम मुझसे विवाह करोगी?” इस बार देवी ने हिम्मत जुटाई और उत्तर दिया—“यदि तुम कल सुबह मेरे घर आओगे, तो मैं तुमसे विवाह कर लूंगी।” इतना कहकर वह जल्दी से घर लौट आई।

अगले दिन सुबह-सुबह रानी शोभा ने घर का दरवाजा खोला। बाहर का दृश्य देखकर वह भय से कांप उठी। सीढ़ियों पर एक विशाल अजगर कुंडली मारकर बैठा था। उसका शरीर इतना बड़ा था कि उसे देखकर किसी का भी दिल दहल जाए। रानी शोभा डरकर चीख पड़ी। देवी और नौकर दौड़ते हुए आए।

तभी वह अजगर शांत और विनम्र आवाज में बोला कि उसे निमंत्रण दिया गया था, इसलिए वह आया है। उसने कहा कि देवी ने उससे विवाह का वचन दिया था। यह सुनकर सब स्तब्ध रह गए। रानी शोभा को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसकी बेटी का विवाह किसी अजगर से होगा।

उधर जब यह खबर रानी रूपा तक पहुंची तो वह भीतर ही भीतर बहुत प्रसन्न हुई। उसे लगा कि अब देवी का जीवन पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा। वह तुरंत अपने नौकरों के साथ वहां पहुंची और बोली कि यदि राजकुमारी ने वचन दिया है तो उसे निभाना ही होगा। उसी दिन देवी और अजगर का विवाह कर दिया गया। पूरे विवाह में न खुशी थी और न उत्साह। रानी शोभा का हृदय दुख से भरा हुआ था, लेकिन देवी ने अपनी माँ का हाथ पकड़कर उन्हें धैर्य रखने को कहा। विवाह के बाद अजगर अपनी पत्नी के साथ कमरे में चला गया और दरवाजा बंद हो गया।

उस रात रानी शोभा पूरी रात जागकर भगवान से प्रार्थना करती रही। सुबह होते ही वह घबराई हुई देवी के कमरे के पास पहुंची और दरवाजा खटखटाया। कुछ क्षण बाद दरवाजा खुला तो सामने का दृश्य देखकर वह आश्चर्य से भर गई। वहां कोई अजगर नहीं था। दरवाजे पर एक अत्यंत सुंदर और तेजस्वी युवक खड़ा था, जबकि देवी उसके पीछे मुस्कुरा रही थी।

युवक ने विनम्रता से बताया कि वह वास्तव में एक राजकुमार है, जिसे एक वन-देवता के श्राप के कारण अजगर बनना पड़ा था। बाद में वन-देवता को अपनी गलती का पछतावा हुआ और उन्होंने कहा कि यदि कोई राजकुमारी उससे विवाह करेगी, तभी वह पुनः मनुष्य बन सकेगा। देवी के साहस और विश्वास ने उसका श्राप समाप्त कर दिया था।

यह खबर पूरे राज्य में आग की तरह फैल गई। लोग उस अद्भुत युवक को देखने महल आने लगे। राजा भी यह देखकर अत्यंत प्रसन्न हुआ। लेकिन रानी रूपा के मन में जलन की आग भड़क उठी। वह यह सहन नहीं कर पा रही थी कि देवी, जिसे वह दुख देना चाहती थी, अब भाग्यशाली बन गई है।

तब उसने एक नई योजना बनाई। उसने अपनी बेटी तारा को बुलाकर कहा कि अब वह गायों को जंगल चराने ले जाया करेगी और यदि कोई उससे विवाह का प्रस्ताव करे, तो तुरंत स्वीकार कर लेना। तारा इस बात से डर गई। वह जंगल नहीं जाना चाहती थी, लेकिन माँ के डर से उसने उसकी बात मान ली।

कई दिनों तक तारा गायों को जंगल ले जाती रही, लेकिन उसे कोई आवाज सुनाई नहीं दी। अब रानी रूपा बेचैन हो गई। उसने सोचा कि शायद उन्हें खुद ही कोई अजगर ढूंढना पड़ेगा। उसने अपने नौकरों को आदेश दिया कि वे जंगल से एक बड़ा अजगर पकड़कर लाएं। कई दिनों की खोज के बाद नौकर एक विशाल अजगर पकड़ लाए। रानी रूपा खुशी से पागल हो गई। उसने तुरंत तारा का विवाह उस अजगर से कर दिया। उसे विश्वास था कि अगले दिन वही चमत्कार होगा और अजगर एक सुंदर राजकुमार बन जाएगा।

विवाह की रात तारा और अजगर को एक कमरे में बंद कर दिया गया। पूरी रात रानी रूपा उत्साह में सो नहीं सकी। सुबह होते ही वह दौड़कर कमरे के पास पहुंची और दरवाजा खटखटाया, लेकिन अंदर से कोई उत्तर नहीं मिला। घबराकर उसने दरवाजा धक्का देकर खोल दिया। अंदर केवल मोटा अजगर पड़ा था और तारा कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। रानी चीख पड़ी। महल में हड़कंप मच गया। तभी रसोइये ने कहा कि शायद तारा अजगर के पेट में है। वह तुरंत बड़ा चाकू लाया और अजगर का पेट चीर दिया। कुछ ही क्षणों बाद तारा जीवित बाहर निकाल ली गई। वह डर के मारे रोती हुई अपनी माँ से लिपट गई।

अजगर की मृत्यु हो गई और उसी के साथ रानी रूपा के लालच और ईर्ष्या का सपना भी टूट गया। उसे समझ आ गया कि भाग्य केवल नकल करने से नहीं बदलता। देवी को सुख इसलिए मिला क्योंकि उसके मन में साहस, सच्चाई और विश्वास था, जबकि रूपा और तारा केवल लालच और ईर्ष्या से भरी हुई थीं। इस प्रकार यह लोक-कथा सिखाती है कि सच्चे मन और अच्छे कर्मों का फल हमेशा अच्छा मिलता है, जबकि लालच और द्वेष अंततः मनुष्य को दुख और अपमान ही देते हैं।

तीन पुतले : बुद्धिमानी और चरित्र की अनमोल हिंदी लोक-कथा

बहुत समय पहले भारत भूमि पर एक महान सम्राट राज्य करता था, जिसका नाम चन्द्रगुप्त था। उसका साम्राज्य दूर-दूर तक फैला हुआ था और उसकी वीरता तथा न्यायप्रियता की चर्चा हर दिशा में होती थी। लेकिन केवल युद्ध और राजनीति ही उसकी रुचि नहीं थे। महाराज को कला, संगीत और विशेष रूप से अनोखे खिलौनों का बहुत शौक था।

राजमहल में दुनिया भर से दुर्लभ वस्तुएँ मंगवाई जाती थीं। हर दिन महाराज को कोई नई वस्तु देखने की उत्सुकता रहती थी। यदि किसी दिन कोई नई चीज़ न दिखाई दे, तो उनका मन उदास हो जाता था। उनके दरबार में विद्वानों, कलाकारों और व्यापारियों का लगातार आना-जाना लगा रहता था।

एक दिन प्रातःकाल की सभा सजी हुई थी। विशाल दरबार में सभी सभासद अपने-अपने स्थान पर बैठे थे। महामंत्री चाणक्य दरबार की कार्यवाही संभाल रहे थे। तभी महाराज ने मुस्कुराते हुए पूछा कि आज दरबार में क्या नया है। एक सैनिक आगे बढ़ा और उसने सूचना दी कि एक सौदागर दूर देश से आया है। उसके पास कुछ ऐसे अद्भुत खिलौने हैं, जिन्हें आज तक किसी ने नहीं देखा।

सैनिक ने यह भी बताया कि सौदागर का दावा है कि उसके खिलौनों का रहस्य केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही समझ सकता है। यह सुनकर महाराज की उत्सुकता और बढ़ गई। उन्होंने तुरंत आदेश दिया कि उस सौदागर को दरबार में प्रस्तुत किया जाए।
कुछ ही क्षणों बाद वह सौदागर दरबार में उपस्थित हुआ। उसने विनम्रता से महाराज को प्रणाम किया और अपनी बड़ी-सी पिटारी खोलकर उसमें से तीन सुंदर पुतले निकाले।

वे तीनों पुतले आकार, रंग और रूप में बिल्कुल एक जैसे दिखाई दे रहे थे। उन्हें देखकर कोई भी यह नहीं कह सकता था कि उनमें कोई अंतर है। सौदागर ने बड़े गर्व से कहा कि ये साधारण खिलौने नहीं हैं। इन तीनों का मूल्य अलग-अलग है। पहला पुतला एक लाख स्वर्ण मोहरों का है, दूसरा एक हजार मोहरों का और तीसरा केवल एक मोहर का। यह सुनकर पूरे दरबार में फुसफुसाहट शुरू हो गई।

सभी हैरान थे कि देखने में एक जैसे लगने वाले पुतलों की कीमत में इतना बड़ा अंतर कैसे हो सकता है।
महाराज चन्द्रगुप्त स्वयं भी इस रहस्य को समझ नहीं पाए। उन्होंने तीनों पुतलों को बहुत ध्यान से देखा। कभी उन्हें घुमाकर देखते, कभी उनकी बनावट पर ध्यान देते, लेकिन कोई अंतर समझ में नहीं आता।

अंततः उन्होंने पुतलों को दरबारियों की ओर बढ़ाते हुए कहा कि कोई इस रहस्य को सुलझाए। एक-एक करके सभी सभासदों ने पुतलों की जांच की। किसी ने उन्हें थपथपाया, किसी ने कानों को देखा, तो किसी ने उनकी चमक और वजन को परखा। लेकिन घंटों की कोशिश के बाद भी कोई उत्तर नहीं दे पाया। दरबार में सन्नाटा छा गया। सभी की निगाहें अब महामंत्री चाणक्य पर टिक गईं।
चाणक्य अत्यंत बुद्धिमान और धैर्यवान व्यक्ति थे।

वे किसी भी समस्या को जल्दबाजी में हल नहीं करते थे। उन्होंने पुतलों को अपने हाथों में लिया और बहुत ध्यान से उनका निरीक्षण करने लगे। कुछ देर सोचने के बाद उन्होंने दरबान को आदेश दिया कि तीन सूखे तिनके लाए जाएँ। दरबारियों को आश्चर्य हुआ कि आखिर तिनकों से क्या रहस्य खुलने वाला है।

थोड़ी ही देर में तिनके लाकर चाणक्य को दे दिए गए। अब पूरे दरबार में उत्सुकता चरम पर थी। हर कोई जानना चाहता था कि इन साधारण दिखने वाले पुतलों का रहस्य क्या है।
चाणक्य ने पहला तिनका उठाया और बड़े ध्यान से पहले पुतले के कान में डाल दिया। सभी ने देखा कि तिनका धीरे-धीरे भीतर चला गया और सीधे पेट तक पहुंच गया।

कुछ क्षणों बाद पुतले के होंठ हल्के से हिले और फिर शांत हो गए। यह देखकर दरबारियों की उत्सुकता और बढ़ गई। अब चाणक्य ने दूसरा तिनका उठाया और दूसरे पुतले के कान में डाला। इस बार तिनका एक कान से अंदर गया और दूसरे कान से बाहर निकल आया। पुतला बिल्कुल शांत रहा।

अब सभी की निगाहें तीसरे पुतले पर थीं। चाणक्य ने तीसरा तिनका उसके कान में डाला। जैसे ही तिनका अंदर गया, वह सीधे पुतले के मुँह से बाहर निकल आया और पुतले का मुँह खुल गया। ऐसा लग रहा था मानो वह लगातार कुछ बोलना चाहता हो।
अब महाराज चन्द्रगुप्त स्वयं को रोक नहीं पाए। उन्होंने तुरंत पूछा कि इन सबका क्या अर्थ है और इन पुतलों की कीमत अलग-अलग क्यों है। चाणक्य मुस्कुराए और धीरे-धीरे समझाना शुरू किया।

उन्होंने कहा कि पहला पुतला उन चरित्रवान और बुद्धिमान लोगों का प्रतीक है, जो किसी भी बात को सुनकर तुरंत दूसरों से नहीं कहते। वे बातों को अपने भीतर रखते हैं, उनकी सत्यता को परखते हैं और फिर सोच-समझकर बोलते हैं। ऐसे लोग समाज में सम्मान पाते हैं क्योंकि वे विश्वास के योग्य होते हैं। यही कारण है कि पहले पुतले का मूल्य सबसे अधिक, अर्थात एक लाख मोहरें रखा गया है।

इसके बाद चाणक्य ने दूसरे पुतले की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि यह पुतला उन लोगों का प्रतीक है, जो हर बात को सुनते तो हैं, लेकिन व्यर्थ की बातों पर ध्यान नहीं देते। वे न तो अफवाह फैलाते हैं और न ही किसी विवाद में पड़ते हैं। ऐसी बातें उनके एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकल जाती हैं।

ये लोग शांत स्वभाव के होते हैं और किसी को हानि नहीं पहुँचाते। इसलिए इस पुतले का मूल्य पहले से कम लेकिन फिर भी सम्मानजनक, अर्थात एक हजार मोहरें रखा गया है।
अंत में चाणक्य ने तीसरे पुतले को उठाया और बोले कि यह उन लोगों का प्रतीक है, जो कान के कच्चे और पेट के हल्के होते हैं। वे कोई भी बात सुनते ही तुरंत दूसरों को बताने लगते हैं।

उन्हें न सत्य की चिंता होती है और न परिणामों की। ऐसे लोग अफवाह फैलाते हैं, झगड़े करवाते हैं और समाज में अशांति पैदा करते हैं। उनकी बातों पर कभी विश्वास नहीं किया जा सकता। इसलिए इस पुतले का मूल्य सबसे कम, केवल एक मोहर रखा गया है। चाणक्य की यह व्याख्या सुनकर पूरा दरबार उनकी बुद्धिमानी की प्रशंसा करने लगा।
महाराज चन्द्रगुप्त अत्यंत प्रसन्न हुए।

उन्होंने सौदागर को उसका उचित मूल्य देने का आदेश दिया और साथ ही चाणक्य की प्रशंसा करते हुए कहा कि सच्चा ज्ञान केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि जीवन की गहरी समझ से आता है। दरबार के सभी लोग इस सीख को अपने मन में उतार चुके थे। उस दिन केवल तीन पुतलों का रहस्य ही नहीं खुला था, बल्कि यह भी स्पष्ट हो गया था कि मनुष्य का वास्तविक मूल्य उसके चरित्र और व्यवहार से तय होता है।

यह लोक-कथा हमें सिखाती है कि हर सुनी-सुनाई बात को तुरंत दूसरों तक पहुंचाना बुद्धिमानी नहीं होती। समझदार व्यक्ति वही होता है जो धैर्य रखे, सत्य को परखे और सोच-समझकर बोले। वहीं जो लोग अफवाह फैलाते हैं, वे समाज में कभी सम्मान नहीं पा सकते। इसलिए मनुष्य को अपने शब्दों और व्यवहार पर नियंत्रण रखना चाहिए, क्योंकि यही उसकी असली पहचान बनते हैं।

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लोक कथाएं
प्रस्तुति: Saying Central Team

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