चतुराई : एक बुद्धिमान लड़की की अद्भुत हिंदी लोक-कथा
बहुत समय पहले किसी राज्य में एक गरीब आदमी अपनी पत्नी, बेटे और छोटी बेटी के साथ रहता था। वह मेहनती तो था, लेकिन उसकी किस्मत हमेशा उसका साथ नहीं देती थी। कभी खेती खराब हो जाती, कभी बीमारी आ जाती और कभी घर की मरम्मत में सारा पैसा खर्च हो जाता। धीरे-धीरे उसकी हालत इतनी खराब हो गई कि घर चलाना भी मुश्किल हो गया।
कई बार पूरा परिवार आधा पेट खाकर सो जाता था। फिर भी वह आदमी ईमानदार था और अपने परिवार से बहुत प्रेम करता था। एक दिन जब घर की हालत और बिगड़ गई, तब उसने निश्चय किया कि वह राजा से सहायता मांगेगा। उसे उम्मीद थी कि दयालु राजा उसकी परेशानी समझेंगे।
अगले दिन वह गरीब आदमी राजदरबार में पहुंचा। उसने राजा को प्रणाम किया और विनम्रता से कहा कि उसे कुछ पैसों की आवश्यकता है। उसने राजा से पांच हजार रुपये उधार मांगे और वचन दिया कि वह पांच वर्षों के भीतर पूरा पैसा लौटा देगा। राजा स्वभाव से उदार था।
उसने उस आदमी की बातों में सच्चाई देखी और बिना ज्यादा सवाल किए उसे पांच हजार रुपये दे दिए। गरीब आदमी खुशी-खुशी घर लौटा और अपने परिवार की जरूरतें पूरी करने लगा। कुछ समय तक सब ठीक चलता रहा, लेकिन किस्मत ने फिर करवट बदल ली। पांच साल गुजर गए और वह आदमी कर्ज वापस नहीं कर पाया।
समय पूरा होने के बाद राजा को अपने पैसे याद आए। उन्होंने सैनिकों को भेजने के बजाय स्वयं उस गरीब आदमी के घर जाने का निर्णय लिया। राजा यह देखना चाहता था कि आखिर वह आदमी पैसा क्यों नहीं लौटा पाया। जब राजा पहली बार उसके घर पहुंचे, तब वह आदमी घर पर नहीं मिला। उसकी पत्नी ने कोई बहाना बना दिया।
दूसरी बार गए तो बेटा नहीं मिला, तीसरी बार गए तो फिर कोई न कोई बहाना बनाकर राजा को लौटा दिया गया। राजा धीरे-धीरे समझ गया कि परिवार उससे बचने की कोशिश कर रहा है। लेकिन राजा भी जिद्दी था। उसने तय कर लिया कि अब वह सच्चाई जानकर ही रहेगा।
एक दिन राजा फिर उस गरीब आदमी के घर पहुंचा। इस बार घर के बाहर केवल एक छोटी लड़की बैठी हुई थी। वह बड़ी शांत और समझदार दिखाई दे रही थी। राजा ने उससे पूछा कि उसके पिता कहां हैं।
लड़की ने बिना घबराए उत्तर दिया—“पिताजी स्वर्ग का पानी रोकने गए हैं।” राजा यह सुनकर हैरान रह गया। उसे लड़की की बात का कुछ भी अर्थ समझ नहीं आया। फिर उसने पूछा कि उसका भाई कहां गया है। लड़की मुस्कुराकर बोली—“भइया बिना झगड़ा किए झगड़ा करने गए हैं।” राजा और उलझ गया। उसने तीसरा प्रश्न किया कि उसकी माँ कहां है। लड़की ने फिर अजीब-सा उत्तर दिया—“माँ एक से दो करने गई है।”
अब राजा को थोड़ा गुस्सा आने लगा। उसे लगा कि यह लड़की जानबूझकर उल्टे-सीधे जवाब दे रही है। उसने नाराज होकर पूछा कि वह खुद यहां बैठी क्या कर रही है। लड़की हंस पड़ी और बोली—“मैं घर बैठी संसार देख रही हूं।” राजा अब पूरी तरह उलझ चुका था।
उसे समझ आ गया कि यह कोई साधारण लड़की नहीं है। वह बड़ी चतुराई से बात कर रही है। उसने अपना गुस्सा शांत किया और प्यार से लड़की के पास बैठ गया। फिर मुस्कुराकर बोला कि वह उसकी किसी भी बात का अर्थ नहीं समझ पाया है। अगर लड़की उन सब बातों का मतलब समझा दे, तो उसे बहुत खुशी होगी।
लड़की भी कम बुद्धिमान नहीं थी। उसने तुरंत पूछा कि अगर वह सारी बातों का अर्थ बता दे, तो राजा उसे क्या देंगे। राजा के मन में उत्सुकता इतनी बढ़ चुकी थी कि वह कुछ भी देने को तैयार हो गया। उसने कहा कि जो भी वह मांगेगी, वही मिलेगा। तब लड़की ने बहुत समझदारी से कहा कि यदि राजा उसके पिता का सारा कर्ज माफ कर दें, तभी वह सारी बातों का अर्थ बताएगी।
राजा उसकी चतुराई देखकर मुस्कुराया और बोला कि वह वचन देता है कि कर्ज माफ कर देगा। लेकिन लड़की ने उसी समय अर्थ बताने के बजाय अगले दिन आने को कहा। राजा को यह बात थोड़ी अजीब लगी, फिर भी वह मान गया।
अगले दिन राजा फिर उस गरीब आदमी के घर पहुंचा। इस बार पूरा परिवार घर पर मौजूद था। लड़की ने राजा को देखते ही पूछा कि क्या उन्हें अपना वचन याद है। राजा ने सबके सामने कहा कि यदि लड़की सारी बातों का अर्थ समझा देगी, तो वह उसके पिता का कर्ज पूरी तरह माफ कर देगा।
अब लड़की ने धीरे-धीरे अपने उत्तरों का अर्थ समझाना शुरू किया। उसने कहा कि जब उसने कहा था कि उसके पिता स्वर्ग का पानी रोकने गए हैं, तो उसका मतलब यह था कि बारिश हो रही थी और घर की छत टपक रही थी। उसके पिता छत ठीक करने गए थे। चूंकि बारिश का पानी आसमान से आता है और लोग आसमान को स्वर्ग मानते हैं, इसलिए उसने ऐसा कहा।
इसके बाद लड़की ने अपने दूसरे उत्तर का अर्थ बताया। उसने कहा कि उसका भाई रेंगनी के कांटे काटने गया था। रेंगनी के कांटे इतने तेज होते हैं कि उन्हें काटते समय शरीर में जरूर चुभ जाते हैं। यानी बिना किसी से झगड़ा किए भी शरीर पर घाव हो जाते हैं। इसलिए उसने कहा था कि वह बिना झगड़ा किए झगड़ा करने गया है।
राजा उसकी बुद्धिमानी से बहुत प्रभावित हुआ। उसने महसूस किया कि छोटी-सी लड़की कितनी गहरी सोच रखती है। वह उत्सुकता से उसकी अगली बातें सुनने लगा। फिर लड़की ने तीसरे उत्तर का अर्थ बताया। उसने कहा कि उसकी माँ अरहर की दाल पीसने गई थी। जब साबुत दाल पीसी जाती है, तो एक दाना दो हिस्सों में बंट जाता है।
इसलिए उसने कहा था कि माँ एक से दो करने गई है। अब राजा पूरी तरह प्रभावित हो चुका था। अंत में लड़की ने चौथे उत्तर का अर्थ समझाया। उसने कहा कि वह उस समय भात बना रही थी और एक चावल निकालकर देख रही थी कि पूरा भात पका है या नहीं। यानी केवल एक चावल देखकर वह पूरे भात का हाल जान रही थी। इसी कारण उसने कहा था कि वह घर बैठी संसार देख रही है।
राजा लड़की की बुद्धिमानी पर आश्चर्यचकित रह गया। उसने कहा कि वह सचमुच बहुत चतुर है। लेकिन उसके मन में एक सवाल अभी भी था। उसने पूछा कि यदि लड़की चाहती तो यह सब बातें कल भी बता सकती थी, फिर उसने अगले दिन क्यों बुलाया। लड़की मुस्कुराई और बोली कि कल वह भात बना रही थी।
अगर वह राजा को समझाने लगती, तो भात जल जाता और उसकी माँ उसे डांटती। इसके अलावा उस समय घर में कोई नहीं था। यदि वह कहती कि राजा ने कर्ज माफ कर दिया है, तो शायद परिवार वाले उसकी बात पर विश्वास नहीं करते। लेकिन आज राजा के सामने कहने से सबको सच्चाई पर भरोसा हो गया और परिवार को खुशी भी मिली।
लड़की की यह बात सुनकर राजा अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसने अपने गले से मोतियों की माला उतारकर लड़की को भेंट कर दी। साथ ही उसने गरीब आदमी का पूरा कर्ज माफ कर दिया। राजा ने कहा कि ऐसी बुद्धिमान और समझदार लड़की किसी भी राज्य के लिए गर्व की बात होती है। गरीब आदमी और उसका परिवार खुशी से भर गया। उन्होंने लड़की को गले लगा लिया और राजा का धन्यवाद किया। उस दिन के बाद राजा भी उस परिवार का विशेष ध्यान रखने लगा।
यह लोक-कथा हमें सिखाती है कि बुद्धिमानी केवल बड़ी उम्र या ऊंचे पद से नहीं आती। कई बार छोटे बच्चे भी अपनी समझदारी और चतुराई से बड़े-बड़ों को हैरान कर देते हैं। साथ ही यह कहानी यह भी बताती है कि कठिन परिस्थितियों में धैर्य और समझदारी से काम लेने वाला व्यक्ति हमेशा सम्मान और सफलता प्राप्त करता है।
पंछी बोला चार पहर : बुद्धि और रहस्य से भरी हिंदी लोक-कथा
बहुत पुराने समय की बात है। किसी राज्य में एक अत्यंत बुद्धिमान और जिज्ञासु राजा राज करता था। उसे नई-नई बातें जानने और रहस्यों को समझने का बहुत शौक था। उसका मानना था कि संसार में कोई भी बात बिना अर्थ के नहीं होती। महल के भीतर उसका एक विशाल आंगन था, जिसमें एक पुराना और घना बकौली का पेड़ लगा हुआ था।
दिनभर उस पेड़ पर पक्षियों का कलरव गूंजता रहता, लेकिन रात होते ही वहां एक रहस्यमयी पक्षी आकर बैठता था। वह पक्षी हर रात चारों पहरों में अलग-अलग बातें कहता था। उसकी आवाज इतनी स्पष्ट और अजीब होती थी कि महल के पहरेदार तक डर जाते थे। लेकिन राजा उस पक्षी की बातें सुनने के लिए हर रात जागता था।
जब रात का पहला पहर शुरू होता, तब वह पक्षी धीमी आवाज में कहता—“किस मुख दूध पिलाऊं, किस मुख दूध पिलाऊं?” दूसरे पहर में उसकी आवाज बदल जाती और वह बोलता—“ऐसो कहूं न दीख, ऐसो कहूं न दीख!” तीसरे पहर में वह करुण स्वर में कहता—“अब हम करबू का, अब हम करबू का?” और जैसे ही चौथा पहर आता, उसकी आवाज कठोर हो जाती और वह बोल उठता—“सब बम्मन मर जायें, सब बम्मन मर जायें!” राजा इन बातों को रोज सुनता और हर बार सोच में पड़ जाता। उसे लगता कि इन शब्दों के पीछे कोई गहरा अर्थ अवश्य छिपा है। लेकिन चाहे जितना विचार करे, उसे कोई उत्तर नहीं मिलता था।
धीरे-धीरे यह रहस्य राजा के मन पर बोझ बन गया। उसकी नींद कम होने लगी और चिंता बढ़ने लगी। अंततः उसने अपने राजपुरोहित को बुलाया। पुरोहित विद्वान माना जाता था और राजा को विश्वास था कि वह इस पहेली का समाधान अवश्य करेगा। राजा ने उसे पूरी बात बताई और पक्षी के चारों वाक्य दोहराए। पुरोहित ने भी बहुत ध्यान से सुना, लेकिन उसे तुरंत कोई उत्तर नहीं सूझा। उसने राजा से कुछ समय मांगा और घर लौट आया। रास्तेभर उसके मन में वही चार वाक्य घूमते रहे। वह बार-बार सोचता, लेकिन कोई अर्थ समझ नहीं पाता। उसकी चिंता इतनी बढ़ गई कि उसका चेहरा मुरझा गया।
घर पहुंचकर उसकी पत्नी ने देखा कि आज उसके पति बहुत परेशान हैं। उसने कारण पूछा तो पुरोहित ने सारी बात बता दी। उसने कहा कि राजा ने उसे कठिन समस्या में डाल दिया है और यदि वह उत्तर न दे पाया तो उसकी प्रतिष्ठा खतरे में पड़ जाएगी। ब्राह्मणी बहुत समझदार स्त्री थी। उसने ध्यान से पक्षी की चारों बातें सुनीं। कुछ देर सोचने के बाद वह मुस्कुराई और बोली कि इसमें चिंता की कोई बात नहीं है। उसने कहा कि इन बातों का अर्थ वह स्वयं राजा को समझा सकती है। पुरोहित आश्चर्यचकित रह गया। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उसकी पत्नी इतनी आसानी से इस रहस्य को समझ गई है।
अगले दिन पुरोहित राजदरबार पहुंचा और राजा से कहा कि उसकी पत्नी इन पहेलियों का उत्तर दे सकती है। राजा को बड़ी खुशी हुई। उसने तुरंत पालकी भेजकर ब्राह्मणी को महल बुलवाया। राजमहल में उसका बड़ा सम्मान किया गया। राजा और रानी ने उसे आदरपूर्वक बैठाया और रात होने की प्रतीक्षा करने लगे। जैसे ही पहला पहर शुरू हुआ, वही रहस्यमयी पक्षी पेड़ पर आकर बैठ गया। उसने पहले की तरह कहा—“किस मुख दूध पिलाऊं, किस मुख दूध पिलाऊं?” राजा ने उत्सुकता से ब्राह्मणी की ओर देखा और पूछा कि इसका क्या अर्थ है।
ब्राह्मणी मुस्कुराई और बोली कि पक्षी अधूरी बात कहता है। फिर उसने पूरी पंक्ति सुनाई—“लंका में रावण भयो, बीस भुजा दश शीश, माता ओकी जा कहे, किस मुख दूध पिलाऊं?” उसने समझाया कि लंका में रावण का जन्म हुआ, जिसके दस सिर और बीस भुजाएं थीं। उसकी माता यह सोचकर परेशान थी कि इतने मुखों में किस मुख से दूध पिलाए। यह सुनकर राजा चकित रह गया। उसे लगा कि सचमुच पक्षी के शब्दों में गहरी बात छिपी थी। उसने प्रसन्न होकर कहा कि यह अर्थ बिल्कुल सही है।
कुछ समय बाद दूसरा पहर शुरू हुआ और पक्षी फिर बोला—“ऐसो कहूं न दीख, ऐसो कहूं न दीख!” राजा ने तुरंत ब्राह्मणी से इसका अर्थ पूछा। उसने शांत स्वर में कहा कि पक्षी का आशय यह है—“घर जम्ब नव दीप, बिना चिंता को आदमी, ऐसो कहूं न दीख।” उसने समझाया कि पूरी पृथ्वी, नौ खंड और चारों दिशाओं में खोजने पर भी ऐसा मनुष्य नहीं मिलेगा जिसे कोई चिंता न हो। हर व्यक्ति किसी-न-किसी चिंता में डूबा रहता है।
कोई धन की चिंता करता है, कोई परिवार की और कोई सम्मान की। यह सुनकर राजा ने गहरी सांस ली और कहा कि यह बात बिल्कुल सत्य है, क्योंकि स्वयं वह भी उसी पक्षी की पहेली को लेकर चिंतित था।
तीसरा पहर आया और पक्षी ने दुखभरी आवाज में कहा—“अब हम करबू का, अब हम करबू का?” राजा फिर उत्सुक हो उठा। ब्राह्मणी ने कहा कि इसका अर्थ भी बड़ा मार्मिक है। उसने पूरी पंक्ति सुनाई—“पांच वर्ष की कन्या साठे दई ब्याह, बैठी करम बिसूरती, अब हम करबू का?” उसने समझाया कि यदि पांच वर्ष की छोटी बच्ची का विवाह साठ वर्ष के बूढ़े से कर दिया जाए, तो वह बेचारी अपना भाग्य रोते हुए यही कहेगी कि अब वह क्या करे। यह बात सुनकर राजा गंभीर हो गया। उसे एहसास हुआ कि यह केवल पहेली नहीं बल्कि समाज की कुरीतियों पर भी चोट है।
धीरे-धीरे रात का चौथा पहर शुरू हुआ। अब पक्षी ने कठोर स्वर में कहा—“सब बम्मन मर जायें, सब बम्मन मर जायें!” यह सुनकर राजा थोड़ा चौंका। उसने पूछा कि क्या यह उचित बात है। ब्राह्मणी मुस्कुराई और बोली कि पक्षी यहां भी अधूरी बात कहता है। फिर उसने पूरी पंक्ति सुनाई—“विश्वा संगत जो करें, सुरा मांस जो खायें, बिना सपरे भोजन करें, वै सब बम्मन मर जायें।”
उसने समझाया कि जो ब्राह्मण बुरी संगति करते हैं, शराब और मांस का सेवन करते हैं और बिना स्नान किए भोजन करते हैं, वे अपने धर्म और आचरण से गिर चुके हैं। ऐसे लोगों का नष्ट हो जाना ही उचित है। राजा ने सिर हिलाकर कहा कि यह बात भी बिल्कुल सही है।
चारों पहरों की पहेलियों का समाधान सुनकर राजा अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि एक साधारण ब्राह्मणी इतनी बुद्धिमान हो सकती है। उसने कहा कि उसकी बुद्धि सचमुच अद्भुत है। रानी भी उसकी समझदारी से प्रभावित हुई। राजा ने उसे सुंदर वस्त्र, गहने और उपहार देकर सम्मानित किया। साथ ही उसने पुरोहित की भी बहुत प्रशंसा की, क्योंकि ऐसी बुद्धिमान पत्नी होना भी सौभाग्य की बात थी।
उस दिन के बाद राजदरबार में पुरोहित का सम्मान पहले से और अधिक बढ़ गया। यह लोक-कथा हमें सिखाती है कि बुद्धि और ज्ञान केवल बड़े पद या ऊंचे दर्जे वालों के पास ही नहीं होते। कई बार साधारण दिखाई देने वाले लोग भी गहरी समझ और जीवन का सच्चा ज्ञान रखते हैं। साथ ही यह कहानी यह भी बताती है कि हर बात के पीछे कोई न कोई अर्थ छिपा होता है, जिसे समझने के लिए धैर्य, विवेक और गहरी सोच की आवश्यकता होती है।
आलसियों का आश्रम : हास्य और सीख से भरी हिंदी लोक-कथा

बहुत समय पहले एक समृद्ध और शांत राज्य था। उस राज्य का राजा अत्यंत दयालु, न्यायप्रिय और बुद्धिमान था। उसकी प्रजा सुखी थी और राज्य में किसी प्रकार की कमी नहीं थी। खेतों में अच्छी फसल होती थी, व्यापार फल-फूल रहा था और लोग मेहनत करके अपना जीवन सुखपूर्वक बिताते थे।
लेकिन धीरे-धीरे राज्य में एक अजीब समस्या पैदा होने लगी। कुछ लोगों को काम करने से इतनी चिढ़ होने लगी कि उन्होंने मेहनत करना पूरी तरह छोड़ दिया। पहले वे थोड़ा-बहुत काम टालते थे, फिर धीरे-धीरे आलस उनकी आदत बन गया। स्थिति यह हो गई कि वे अपने लिए भोजन बनाना भी पसंद नहीं करते थे। दिनभर बस लेटे रहते, सोते रहते या दूसरों के भरोसे खाना खाने की सोचते रहते।
इन आलसी लोगों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी। कुछ लोग तो इतने सुस्त हो गए थे कि पानी पीने के लिए भी खुद उठना पसंद नहीं करते थे। वे अपने परिवार और पड़ोसियों पर निर्भर रहने लगे। शुरुआत में लोगों ने दया दिखाकर उनकी सहायता की, लेकिन धीरे-धीरे सब परेशान हो गए।
मेहनती लोगों को यह अच्छा नहीं लगता था कि वे दिन-रात मेहनत करें और कुछ लोग बिना काम किए आराम से जीवन बिताएं। अब आलसियों को भोजन मिलना भी कठिन होने लगा। कई घरों में झगड़े होने लगे क्योंकि परिवार के लोग इन निकम्मों से परेशान हो चुके थे। तब उन आलसियों ने सोचा कि उन्हें कोई ऐसा उपाय करना चाहिए जिससे बिना मेहनत किए उनका गुजारा चलता रहे।
एक दिन राज्य के सभी आलसी लोग एक साथ इकट्ठा हुए और राजा के दरबार में पहुंचे। वे बड़ी दीनता का दिखावा करते हुए बोले कि राज्य में उनके लिए रहने और खाने की उचित व्यवस्था नहीं है। उन्होंने राजा से मांग की कि उनके लिए एक अलग आश्रम बनवाया जाए, जहां वे आराम से रह सकें और खाने-पीने की सुविधा भी मिले।
वे बोले कि वे बहुत दुखी हैं और कोई उनकी सहायता नहीं करता। दरबार में उपस्थित मंत्री और सैनिक उनकी बातें सुनकर मन ही मन हंस रहे थे, क्योंकि वे जानते थे कि ये लोग केवल कामचोर हैं। लेकिन राजा तुरंत कुछ नहीं बोला। वह शांत बैठा उनकी बातें सुनता रहा।
राजा बहुत बुद्धिमान था। वह समझ चुका था कि समस्या केवल गरीबी की नहीं बल्कि आलस की है। फिर भी उसने तुरंत उन्हें डांटा नहीं। कुछ देर सोचने के बाद उसने अपने मंत्री को आदेश दिया कि आलसियों के लिए एक बड़ा आश्रम बनवाया जाए। मंत्री को राजा का आदेश थोड़ा अजीब लगा, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
कुछ ही समय में राज्य के बाहर एक बड़ा आश्रम तैयार हो गया। वहां सोने के लिए बिस्तर थे, खाने की व्यवस्था थी और आराम की सारी सुविधाएं मौजूद थीं। यह सुनते ही राज्य के सभी आलसी लोग खुशी-खुशी वहां जाकर रहने लगे। अब उनका दिन केवल खाने और सोने में गुजरने लगा। कोई काम नहीं, कोई जिम्मेदारी नहीं। वे खुद को बहुत भाग्यशाली समझने लगे।
कई दिनों तक यह चलता रहा। राजा चुपचाप सब देखता रहा। फिर एक दिन उसने अपने मंत्री और कुछ सैनिकों को साथ लिया और उस आश्रम की ओर चल पड़ा। वहां पहुंचकर उसने देखा कि अधिकांश आलसी गहरी नींद में सो रहे हैं। कुछ लोग खाते-खाते ही लेटे हुए थे और कुछ ऐसे थे जिन्हें उठकर बैठने तक की इच्छा नहीं थी। राजा ने मंत्री की ओर देखा और हल्की मुस्कान के साथ एक सैनिक को आदेश दिया कि आश्रम के एक हिस्से में आग लगा दी जाए। सैनिक राजा का आदेश सुनकर चौंका, लेकिन उसने वैसा ही किया। थोड़ी ही देर में आश्रम में धुआं फैलने लगा और आग की लपटें दिखाई देने लगीं।
जैसे ही लोगों को आग का पता चला, वहां भगदड़ मच गई। जो लोग अभी तक आलस में पड़े थे, वे भी अपनी जान बचाने के लिए तेजी से भागने लगे। कोई दरवाजे की ओर दौड़ रहा था, कोई खिड़की से कूद रहा था। कुछ लोग तो इतने डर गए कि बिना चप्पल पहने ही भाग निकले। मंत्री और सैनिक यह दृश्य देखकर हैरान थे। जिन्हें चलने में भी आलस आता था, वे अब अपनी जान बचाने के लिए बिजली की गति से दौड़ रहे थे। राजा शांत खड़ा सब देखता रहा। लेकिन तभी उसकी नजर आश्रम के एक कोने पर गई, जहां अभी भी दो आदमी लेटे हुए थे।
आग धीरे-धीरे उस हिस्से तक पहुंच रही थी। गर्मी बढ़ने लगी थी, फिर भी वे दोनों उठने का नाम नहीं ले रहे थे। उनमें से एक ने हल्की-सी करवट ली और सुस्त आवाज में दूसरे से कहा कि उसकी पीठ पर गर्मी महसूस हो रही है, जरा देखो तो मामला क्या है। दूसरा आदमी बिना आंखें खोले ही बोला कि अगर गर्मी लग रही है तो दूसरी करवट लेकर सो जाओ। यह सुनकर वहां खड़े सभी लोग दंग रह गए। आश्रम में आग लगी हुई थी और ये दोनों अभी भी उठने को तैयार नहीं थे।
राजा यह दृश्य देखकर हंस पड़ा। उसने मंत्री की ओर देखकर कहा कि वास्तव में ये दोनों ही सच्चे आलसी हैं। बाकी सभी लोग केवल कामचोर थे, क्योंकि जान बचाने के समय वे तुरंत भाग खड़े हुए। लेकिन ये दोनों इतने आलसी हैं कि आग लगने पर भी अपनी जगह से उठना नहीं चाहते। राजा ने आदेश दिया कि इन दोनों को भरपेट भोजन और आराम की पूरी सुविधा दी जाए, क्योंकि उन्होंने आलस की पराकाष्ठा साबित कर दी है। वहीं बाकी सभी लोगों को काम पर लगाया जाए और उन्हें समझाया जाए कि बिना मेहनत किए जीवन नहीं चल सकता।
राजा के आदेश के बाद सैनिकों ने बाकी सभी आलसियों को काम पर लगा दिया। किसी को खेतों में भेजा गया, किसी को निर्माण कार्य में और किसी को सफाई के काम में। शुरुआत में वे लोग बहुत नाराज हुए, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें मेहनत की आदत पड़ने लगी। अब उन्हें समझ आने लगा कि मेहनत करने वाले व्यक्ति का जीवन ही सबसे अच्छा होता है। दूसरी ओर वे दो “सच्चे आलसी” पूरे राज्य में हास्य का विषय बन गए। लोग उनकी कहानी सुनाकर बच्चों को आलस से दूर रहने की सीख देने लगे।
यह लोक-कथा हमें सिखाती है कि अत्यधिक आलस मनुष्य को निकम्मा बना देता है। जो व्यक्ति मेहनत से भागता है, वह धीरे-धीरे दूसरों पर निर्भर हो जाता है और सम्मान खो देता है। साथ ही यह कहानी यह भी बताती है कि बुद्धिमान व्यक्ति समस्या को केवल दंड देकर नहीं, बल्कि समझदारी से हल करता है। राजा ने बिना गुस्सा किए बड़ी चतुराई से असली और नकली आलसियों की पहचान कर ली। इसलिए जीवन में मेहनत, जिम्मेदारी और कर्मठता को अपनाना ही सफलता और सम्मान का सही मार्ग है।
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लोक कथाएँ हमारी सांस्कृतिक धरोहर का अमूल्य हिस्सा हैं। इनमें जीवन के अनुभव, नैतिक शिक्षा, लोक परंपराएँ और मनोरंजन का सुंदर समन्वय मिलता है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाने वाली ये कहानियाँ समाज की संस्कृति और मूल्यों को जीवंत बनाए रखती हैं।
लोक कथाएं
प्रस्तुति: Saying Central Team