लोक-कथा

लोक-कथा : दरख़्त रानी

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लोक-कथा : दरख़्त रानी

बहुत पुराने समय की बात है। किसी छोटे-से गाँव में एक बूढ़ा आदमी अपनी पत्नी के साथ रहता था। दोनों एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे, लेकिन उनके जीवन में एक गहरा दुख था। शादी को बीस वर्ष बीत चुके थे, फिर भी उनकी कोई संतान नहीं थी। हर मंदिर, हर मजार और हर देवी-देवता से उन्होंने संतान की प्रार्थना की थी।

समय के साथ उनके बाल सफेद हो गए, शरीर कमजोर हो गया, लेकिन मन में औलाद की चाह कभी खत्म नहीं हुई। आखिरकार भगवान की कृपा हुई और बूढ़े की पत्नी गर्भवती हो गई। यह खबर सुनकर दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। बूढ़ा अपनी पत्नी का बहुत ध्यान रखता और उसकी हर छोटी-बड़ी इच्छा पूरी करने की कोशिश करता था।

एक दिन बूढ़े की पत्नी को अचानक खट्टे-मीठे बेर खाने की इच्छा हुई। उस समय गर्मियों का मौसम था और बेर कहीं मिलना आसान नहीं था। फिर भी बूढ़ा अपनी पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए जंगल-जंगल भटकने लगा। कई दिनों तक घूमने के बाद एक दिन उसे घने जंगल के बीच एक तालाब दिखाई दिया।

तालाब के किनारे बेर की एक झाड़ी लगी हुई थी, जिस पर ढेर सारे पके हुए बेर चमक रहे थे। बूढ़ा खुशी से भर गया। उसने जल्दी-जल्दी बेर तोड़कर अपनी झोली में भरने शुरू कर दिए। लेकिन तभी तालाब के पानी में हलचल हुई और एक विशाल आदमखोर मगरमच्छ बाहर निकला।

मगरमच्छ इतना बड़ा और भयानक था कि उसे देखकर बूढ़े के प्राण सूख गए। उसने जोर से सांस खींची तो ऐसी तेज हवा चली कि बूढ़ा अपना संतुलन खो बैठा और तालाब में गिर पड़ा। जैसे ही वह बाहर निकलने की कोशिश करने लगा, मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया। बूढ़ा डर से कांपने लगा और मगरमच्छ से दया की भीख मांगने लगा।

उसने कहा कि वह बेर केवल अपनी गर्भवती पत्नी के लिए ले जा रहा है। उसकी पत्नी की हालत ऐसी है कि वह बिना बेर खाए नहीं रह सकती। मगरमच्छ ने उसकी बात ध्यान से सुनी। कुछ देर सोचने के बाद उसने बूढ़े को छोड़ दिया, लेकिन एक शर्त रख दी। उसने कहा कि यदि बूढ़े के घर बेटा पैदा हुआ तो वह उसका रहेगा, लेकिन यदि बेटी हुई तो वह मगरमच्छ की होगी।

डरा हुआ बूढ़ा अपनी जान बचाने के लिए तुरंत राजी हो गया। वह मन ही मन सोच रहा था कि शायद मगरमच्छ से फिर कभी मुलाकात नहीं होगी। कुछ महीनों बाद बूढ़े के घर एक अत्यंत सुंदर लड़की पैदा हुई। उसकी आंखें हीरे की तरह चमकती थीं और चेहरा गुलाब के फूल जैसा सुंदर था।

उसे देखकर बूढ़ा और उसकी पत्नी खुशी से भर गए, लेकिन उसी क्षण बूढ़े को मगरमच्छ से किया वादा याद आ गया। उसका दिल कांप उठा। उसने तय कर लिया कि अब वह कभी उस तालाब के पास नहीं जाएगा। लड़की धीरे-धीरे बड़ी होने लगी। उसकी सुंदरता और मासूमियत पूरे गांव में चर्चा का विषय बन गई।

समय बीतता गया और लड़की चौदह वर्ष की हो गई। तभी एक वर्ष भारी बारिश हुई और तालाब का पानी बढ़ गया। मगरमच्छ बहकर खेतों के पास तक पहुंच गया। एक दिन बूढ़ा खेत से लौट रहा था कि मगरमच्छ ने उसका रास्ता रोक लिया। उसने गुस्से में पूछा कि क्या वह उसे भूल गया है।

बूढ़े ने डरते हुए स्वीकार किया कि उसके घर लड़की हुई थी। मगरमच्छ बोला कि अब वह लड़की उसकी अमानत है और उसे तुरंत उसके हवाले कर देना चाहिए। बूढ़ा अपनी बेटी को देने के विचार से कांप उठा, लेकिन मगरमच्छ ने धमकी दी कि यदि उसने वादा पूरा नहीं किया तो वह पूरे परिवार को मार डालेगा।

बूढ़ा मजबूर हो गया। उसने एक चाल चली। उसने मगरमच्छ से कहा कि उसकी बेटी को कमल के फूल बहुत पसंद हैं। यदि मगरमच्छ अपनी पीठ पर कमल का फूल रखकर पानी में छिप जाए, तो लड़की उसे लेने के लिए खुद पानी में आ जाएगी। मगरमच्छ इस योजना से खुश हो गया। घर आकर बूढ़े ने सारी बात अपनी पत्नी को बताई। यह सुनते ही माँ रोने लगी। उसे अपनी बेटी को मौत के मुंह में भेजने का दुख सहन नहीं हो रहा था। लेकिन डर और मजबूरी के कारण दोनों कुछ नहीं कर पाए।

अगले दिन बूढ़े ने अपनी बेटी से कहा कि वह उसे ननिहाल छोड़ने ले जा रहा है। लड़की यह सुनकर खुशी से झूम उठी। उसने नए कपड़े पहने और पिता के साथ जंगल की ओर चल पड़ी। रास्ते में वे तालाब के किनारे पहुंचे। बूढ़े ने बेटी को वहां बैठाकर कहा कि वह अभी लौटकर आता है।

लड़की भोलेपन में वहीं बैठी रही। तभी उसकी नजर पानी में तैरते एक सुंदर कमल के फूल पर पड़ी। वह उसे लेने के लिए धीरे-धीरे पानी में उतरने लगी। जैसे-जैसे वह आगे बढ़ती, फूल और दूर खिसक जाता। लड़की डरकर अपने पिता को पुकारती रही, लेकिन उसका पिता वापस नहीं आया। अचानक पानी से लाल आंखों वाला विशाल मगरमच्छ निकला और लड़की को पकड़कर तालाब के पार एक गुफा में ले गया।

गुफा में मगरमच्छ ने लड़की को बंद कर दिया। उसकी सुंदरता देखकर वह उसे तुरंत खाना नहीं चाहता था। वह राहगीरों और जानवरों को पकड़कर खाता और उनका सामान लड़की के लिए लाता। लड़की डर के मारे चुपचाप वहीं रहती। धीरे-धीरे तालाब का मगरमच्छ पूरे इलाके में आदमखोर के नाम से मशहूर हो गया।

लोग वहां आना छोड़ने लगे। अब मगरमच्छ को भोजन मिलना कठिन हो गया। उसने तालाब की सारी मछलियां और जंगल के जानवर तक खा लिए। आखिरकार वह इतना भूखा हो गया कि उसने लड़की को खाने का विचार बनाया। लेकिन उससे पहले वह अपने दांत तेज कराने लुहार के पास चला गया।

मगरमच्छ के जाते ही लड़की ने भागने की योजना बनाई। उसने गुफा में पड़े सोने-चांदी के गहनों को एक टोकरी में भरा और अपने शरीर पर कीचड़ लगाकर खुद को बूढ़ी औरत जैसा बना लिया। जैसे ही वह गुफा से बाहर निकली, मगरमच्छ लौट आया। उसने गरजकर पूछा कि वह कौन है।

लड़की ने कांपते हुए जवाब दिया कि वह एक अंधी बूढ़ी औरत है, जिसके शरीर में केवल हड्डियां बची हैं। उसने मगरमच्छ से कहा कि गुफा में एक सुंदर और जवान लड़की है, जिसे खाकर उसे अधिक आनंद आएगा। मगरमच्छ उसे पहचान नहीं पाया और तेजी से गुफा में चला गया। लड़की मौका पाकर भाग निकली और घने जंगल में खो गई।

भागते-भागते वह एक घने जंगल में पहुंची, जहां उसे शेर की भयानक दहाड़ सुनाई दी। डर के मारे उसका शरीर कांपने लगा। तभी उसे एक विशाल बरगद का पेड़ दिखाई दिया। वह पेड़ से लिपटकर रोते हुए बोली कि यदि संभव हो तो वह उसे अपने भीतर छिपा ले। आश्चर्य की बात यह हुई कि पेड़ सचमुच फट गया और लड़की उसके भीतर समा गई। फिर पेड़ बंद हो गया। अब वह उसी पेड़ के भीतर रहने लगी।

कुछ समय बाद एक राजकुमार शिकार करते हुए उसी जंगल में आया। वह दातून के लिए पेड़ की शाखा काटने लगा, तभी भीतर से मधुर आवाज आई कि धीरे काटो, कहीं उसकी आंख या हाथ न कट जाए। राजकुमार यह सुनकर हैरान रह गया। वह बिना दातून लिए महल लौट आया।

पूरी रात वह उसी जादुई पेड़ के बारे में सोचता रहा। आखिर उसने निश्चय किया कि वह उसी पेड़ से विवाह करेगा। सबने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ा रहा। अंततः राजा ने उसकी इच्छा मान ली और पूरे विधि-विधान से उस पेड़ के साथ उसका विवाह करा दिया गया।

राजकुमार उस पेड़ को अपने महल के बाग में ले आया। रात होते ही लड़की पेड़ से निकलती और महल के सारे काम कर देती। सुबह होने से पहले वह फिर पेड़ के भीतर चली जाती।

एक रात राजकुमार ने उसे देख लिया। अगले दिन जब लड़की महल में गई हुई थी, तब उसने पेड़ को आग लगाकर जला दिया। लड़की दौड़ती हुई आई और दुखी होकर पूछने लगी कि उसने ऐसा क्यों किया। राजकुमार ने प्रेम से कहा कि अब उसे अंधेरे पेड़ में रहने की आवश्यकता नहीं है। वह उसे अपनी रानी बनाना चाहता है और उसके बिना नहीं जी सकता।

लड़की ने जीवन में पहली बार सच्चा प्रेम और अपनापन महसूस किया। जिस परिवार ने उसे धोखा देकर मौत के हवाले कर दिया था, वहां उसे केवल दुख मिला था। लेकिन राजकुमार के प्रेम में उसे नया जीवन मिला। उसने उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इसके बाद दोनों महल में सुख और प्रेम से रहने लगे। पूरे राज्य में उनकी प्रेमकथा प्रसिद्ध हो गई और लोग उस लड़की को “दरख़्त रानी” के नाम से याद करने लगे।

यह लोक-कथा हमें सिखाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयां आएं, साहस और बुद्धिमानी से उनका सामना किया जा सकता है। साथ ही यह कहानी यह भी बताती है कि सच्चा प्रेम हर दुख और भय को मिटा देता है।

लोहा खा गया घुन

बहुत समय पहले की बात है। एक नगर में दो व्यापारी रहते थे, जिन्हें लोग प्यार से मामा और फूफा कहकर बुलाते थे। दोनों की आपस में अच्छी मित्रता थी और वे व्यापार में साझेदार भी थे। वे हमेशा इस बात पर विचार करते रहते कि ऐसा कौन-सा व्यापार किया जाए जिससे भविष्य में अधिक लाभ प्राप्त हो।

एक दिन दोनों बैठे-बैठे व्यापार की नई योजना बनाने लगे। मामा ने कहा कि यदि ऐसी वस्तु खरीदी जाए जो जल्दी खराब न हो और जिसकी कीमत समय के साथ बढ़ती जाए, तो भविष्य में बड़ा लाभ मिल सकता है। फूफा को यह बात बहुत पसंद आई और उसने सहमति जताई। काफी सोच-विचार के बाद दोनों ने लोहा खरीदने का निश्चय किया, क्योंकि उस समय लोहे की मांग भी बढ़ रही थी और उसके दाम बढ़ने की संभावना थी।

दोनों ने अपनी जमा पूंजी मिलाकर काफी मात्रा में लोहा खरीद लिया। अब समस्या यह थी कि उस लोहे को सुरक्षित कहाँ रखा जाए। तब मामा ने कहा कि उसके पास एक पुरानी मजबूत कोठरी है जहाँ लोहा सुरक्षित रह सकता है। फूफा ने भरोसा करते हुए पूरा लोहा मामा की देखरेख में रखवा दिया। शुरू-शुरू में सब कुछ ठीक रहा।

लोहा उसी तरह कोठरी में रखा रहा और दोनों निश्चिंत होकर अपने-अपने काम में लग गए। लेकिन धीरे-धीरे मामा के मन में लालच जन्म लेने लगा। उसे लगा कि यदि वह यह लोहा अकेले बेच दे तो सारा धन उसी का हो जाएगा। यही सोचकर उसने धीरे-धीरे बिना फूफा को बताए पूरा लोहा बेच डाला और सारा पैसा स्वयं रख लिया।

कई महीनों बाद बाजार में लोहे के दाम अचानक बहुत बढ़ गए। यह सुनकर फूफा बहुत खुश हुआ और तुरंत मामा के पास पहुंचा। उसने उत्साह से कहा कि अब समय आ गया है कि लोहा बेचकर अच्छा लाभ कमाया जाए। उसने मामा से कहा कि जल्दी से लोहा निकालो ताकि दोनों उसे बेच सकें।

लेकिन मामा ने बड़ी चालाकी से झूठ बोलते हुए कहा कि अब वह लोहा बचा ही नहीं है। जब फूफा ने कारण पूछा तो मामा बोला कि कोठरी में घुन लग गए थे और उन्होंने सारा लोहा खा लिया। यह सुनकर फूफा को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह समझ गया कि मामा उससे झूठ बोल रहा है, क्योंकि भला घुन कभी लोहे को खा सकते हैं। लेकिन उसने उसी समय कोई विवाद नहीं किया और चुपचाप वहाँ से चला आया। उसके मन में अब मामा को सबक सिखाने की योजना बनने लगी थी।

कुछ दिनों बाद फूफा फिर मामा के घर पहुँचा। इस बार वह बड़े प्रेम से बात करने लगा। उसने कहा कि वह एक बड़ी शानदार बारात में जा रहा है जहाँ बहुत अच्छा भोजन और मनोरंजन होगा। उसने मामा से आग्रह किया कि वह अपने बारह वर्ष के बेटे को उसके साथ भेज दे ताकि बच्चा भी आनंद ले सके।

मामा को फूफा पर पूरा भरोसा था, इसलिए उसने खुशी-खुशी अपने बेटे को उसके साथ भेज दिया और कहा कि बच्चे का अच्छे से ध्यान रखना। फूफा बच्चे को अपने घर ले गया और सुरक्षित स्थान पर रख दिया। फिर वह सामान्य रूप से अपने काम में लग गया। एक दिन बीता, फिर दूसरा दिन भी निकल गया, लेकिन लड़का वापस नहीं आया। अब मामा को चिंता सताने लगी। वह भागता हुआ फूफा के पास पहुँचा और अपने बेटे के बारे में पूछने लगा।

फूफा ने बड़ी गंभीरता से उत्तर दिया कि रास्ते में एक बड़ी चील आई और वह लड़के को अपने पंजों में दबाकर उड़ गई। यह सुनते ही मामा गुस्से से तिलमिला उठा। उसने कहा कि यह बिल्कुल झूठ है, क्योंकि कोई चील इतने बड़े लड़के को कैसे उठा सकती है। उसने फूफा को धमकी दी कि यदि उसका बेटा वापस नहीं मिला तो वह राजा भीम के दरबार में न्याय की गुहार लगाएगा। फूफा ने शांत स्वर में कहा कि उसे कोई आपत्ति नहीं है और चलो राजा के पास चलते हैं।

दोनों राजा भीम के दरबार में पहुँचे और पूरी घटना सुनाई गई। राजा भीम ने जब यह सुना कि चील बारह वर्ष के लड़के को उठा ले गई, तो उन्हें भी विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने फूफा को डांटते हुए कहा कि वह स्पष्ट झूठ बोल रहा है।
तब फूफा ने हाथ जोड़कर बड़ी विनम्रता से कहा, “महाराज, यदि घुन लोहे को खा सकते हैं, तो चील लड़के को भी उठा सकती है।” फिर उसने दो पंक्तियाँ कही—

“कथा कहूँ कथावली, सुनो राजा भीम।
लोहा को घुनन खाय, तो लड़का ले गया चील।”
यह सुनते ही राजा भीम सारी बात समझ गए।

उन्हें तुरंत एहसास हो गया कि मामा ने लालच में आकर अपने साथी के साथ धोखा किया है। राजा ने कठोर स्वर में मामा को आदेश दिया कि वह तुरंत फूफा का सारा धन लौटाए और अपने अपराध के लिए क्षमा मांगे। साथ ही फूफा को भी आदेश दिया गया कि वह लड़के को सुरक्षित उसके पिता के पास वापस पहुँचा दे।

मामा शर्म से सिर झुकाकर खड़ा रहा। उसे अपनी गलती का एहसास हो चुका था। उसने फूफा का सारा पैसा लौटा दिया और भविष्य में कभी लालच न करने का वचन दिया।

इस प्रकार राजा भीम की बुद्धिमानी से न्याय हुआ और दोनों के बीच का विवाद समाप्त हो गया। इस लोक-कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि लालच मनुष्य को अंधा बना देता है और जो दूसरों को धोखा देता है, अंत में स्वयं भी अपमानित होता है। बुद्धिमानी और धैर्य से अन्याय का उत्तर दिया जाए तो सत्य अवश्य जीतता है।

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लोक कथाएं
प्रस्तुति: Saying Central Team

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