फिर धरती पर सरगम गूँजे (बाल कहानी)
एक शांत और सुहानी सुबह थी। छोटी-सी बच्ची सरगम अपने दादा जी के साथ बगीचे में टहलने निकली थी। सूरज की हल्की सुनहरी किरणें पेड़ों की पत्तियों पर पड़कर उन्हें चमका रही थीं। घास पर जमी ओस की बूंदें ऐसे चमक रही थीं जैसे किसी ने हरे मखमल पर मोती बिखेर दिए हों। हवा में गुलाब और चमेली की मीठी खुशबू घुली हुई थी। हर तरफ पक्षियों की चहचहाहट गूँज रही थी, मानो पूरा बगीचा एक संगीत का मंच हो।
सरगम चारों ओर देखकर बहुत खुश हो गई। उसे पेड़ों की कतारें, नीला आसमान, उड़ती तितलियाँ और तालाब में तैरती बत्तखें बहुत सुंदर लग रही थीं। वह खुशी से बोली कि यह बगीचा किसी जादुई दुनिया से कम नहीं है, जहाँ हर चीज़ जीवित और मुस्कुराती हुई लगती है। दादा जी मुस्कुराए और बोले कि यह जादू प्रकृति का है, जहाँ हर पेड़, हर फूल और हर पक्षी अपनी अलग भाषा में जीवन का गीत गाता है।
सरगम के मन में कई सवाल उठने लगे। उसने दादा जी से पूछा कि क्या पेड़, पशु और पक्षी हमारे दोस्त हैं। दादा जी ने प्यार से समझाया कि ये सब हमारे सबसे पुराने और सच्चे दोस्त हैं। पेड़ हमें हवा, फल और छाया देते हैं, पक्षी हमें अपनी मधुर आवाज़ से सुबह जगाते हैं और पशु हमारे जीवन में सहयोगी बनते हैं। उन्होंने कहा कि प्रकृति के बिना जीवन अधूरा है।
सरगम थोड़ी उदास हो गई और उसने पूछा कि अगर ये हमारे दोस्त हैं तो लोग उन्हें नुकसान क्यों पहुँचाते हैं। दादा जी के चेहरे पर भी उदासी आ गई। उन्होंने कहा कि इंसान ने विकास की दौड़ में बहुत कुछ पाया है, लेकिन प्रकृति से दूरी बना ली है। उसने पेड़ काटे, नदियाँ गंदी कीं और पक्षियों के घर छीन लिए। उन्होंने समझाया कि इंसान को यह समझना चाहिए कि वह प्रकृति के बिना जीवित नहीं रह सकता, इसलिए उसे उसका सम्मान करना चाहिए।
सरगम ने जमीन से कुछ सूखे पत्ते उठाए और पूछा कि अगर पेड़ बोल सकते तो क्या कहते। दादा जी ने कहा कि पेड़ विनती करते कि हमें मत काटो, क्योंकि हम तुम्हें जीवन देते हैं। हम तुम्हें साँस लेने के लिए हवा, बैठने के लिए छाया और जीने के लिए फल देते हैं। अगर पेड़ न हों तो जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
इसके बाद सरगम ने आसमान में उड़ते पक्षियों की ओर देखा और पूछा कि अगर पक्षी बोल सकते तो क्या कहते। दादा जी ने बताया कि पक्षी कहते कि हमें आज़ादी से उड़ने दो, हमारे घोंसले मत उजाड़ो। हमारी चहचहाहट तुम्हारे जीवन में संगीत भरती है और हमारी उड़ान तुम्हें स्वतंत्रता का संदेश देती है।
तालाब के पास से एक गाय अपने बछड़े के साथ गुजर रही थी। सरगम ने पूछा कि पशु क्या कहते होंगे। दादा जी ने कहा कि पशु कहते हैं कि वे हमारे साथी हैं, हमें दूध और सहयोग देते हैं और बदले में केवल प्यार और सुरक्षा चाहते हैं। वे भी जीवन का हिस्सा हैं और सम्मान के हकदार हैं।
सरगम अब गहरी सोच में डूब गई थी। उसने कहा कि लगता है कि पहले धरती पर सब मिलकर एक सुंदर संगीत बनाते होंगे,जिसमें पेड़, पक्षी, पशु और इंसान सब शामिल होते थे। अब वह संगीत कहीं टूट गया है। दादा जी ने कहा कि यह तभी होता है जब इंसान स्वार्थी बन जाता है और प्रकृति को भूल जाता है। यदि इंसान फिर से प्रेम और संवेदना सीख ले, तो यह खोया हुआ संगीत फिर से लौट सकता है।
सरगम की आँखों में चमक आ गई। उसने दादा जी से वादा किया कि वह हर दिन एक पौधा लगाएगी, पक्षियों के लिए दाना रखेगी और किसी भी जीव को नुकसान नहीं पहुँचाएगी। उसने कहा कि वह चाहती है कि धरती फिर से मुस्कुराए। दादा जी ने उसे प्यार से शाबाशी दी और कहा कि जब हर बच्चा ऐसा सोचेगा, तब प्रकृति और इंसान का रिश्ता फिर से सुंदर हो जाएगा।
उस समय हवा हल्की-हल्की चलने लगी, पत्तियाँ झूमने लगीं और पक्षियों की आवाज़ और भी मधुर हो गई। सरगम को लगा जैसे पूरा बगीचा उसकी बातों को सुनकर खुश हो गया हो। उसने मुस्कुराकर प्रकृति को धन्यवाद दिया और वादा किया कि वह हमेशा उसका ध्यान रखेगी।
दादा जी ने अंत में कहा कि असली ज्ञान किताबों से नहीं, बल्कि प्रकृति को समझने से मिलता है। जो उसकी भाषा समझ लेता है, वही सच्चा ज्ञानी होता है। सूरज अब ऊपर आ चुका था और सरगम तथा दादा जी धीरे-धीरे घर लौट रहे थे, पीछे रह गई थी प्रकृति की वह मधुर सरगम—पत्तों की सरसराहट, पक्षियों की चहचहाहट और हवा की मीठी गूँज, जो कह रही थी कि यदि हम प्रकृति से प्रेम करें, तो धरती पर फिर से जीवन का सुंदर संगीत गूँज उठेगा।
परियाँ और दीवाली (परी कथा)
आसमान के एक रंग-बिरंगे कोने में परियों का एक अद्भुत और जादुई देश था। वहाँ हर तरफ फूलों की खुशबू फैली रहती थी, बादल रुई के मुलायम फाहों जैसे तैरते रहते थे और तारे रात में चाँदी की बूँदों की तरह चमकते थे। उस सुंदर दुनिया में परियाँ अपने चमकदार पंख फैलाकर उड़तीं, खेलतीं, गुनगुनातीं और प्रकृति की रक्षा करती थीं। वह पूरा देश किसी सपनों की दुनिया जैसा लगता था, जहाँ हर चीज़ जीवित और मुस्कुराती हुई प्रतीत होती थी।
इसी जादुई देश में एक छोटी-सी सुनहरी परी रहती थी। उसकी आँखें ओस की बूंदों जैसी चमकदार थीं और उसके पंख इंद्रधनुष के सात रंगों से दमकते थे। सभी उसे प्यार से “सुनहरी” कहकर बुलाते थे। वह बहुत जिज्ञासु और खुशमिजाज थी और हमेशा नई-नई बातें जानने के लिए उत्सुक रहती थी। एक दिन उसने धरती की ओर देखा, जहाँ बहुत हलचल थी और हर जगह लोग दीये जला रहे थे, घर सजा रहे थे और उत्सव मना रहे थे।
सुनहरी परी ने उत्सुक होकर अपनी माँ गुलाबी परी से पूछा कि धरती पर इतना उत्सव क्यों हो रहा है। गुलाबी परी परियों में सबसे समझदार मानी जाती थी। उसने मुस्कुराते हुए बताया कि आज दीवाली है, जो भगवान राम के अयोध्या लौटने की खुशी में मनाई जाती है। यह सुनकर सुनहरी परी की जिज्ञासा और बढ़ गई और उसने भगवान राम और अयोध्या के बारे में जानने की इच्छा जताई।
गुलाबी परी ने धीरे-धीरे रामायण की कहानी सुनानी शुरू की। उसने बताया कि अयोध्या के राजकुमार राम सत्य, धर्म और करुणा के प्रतीक थे। उन्होंने अपने पिता के वचन को निभाने के लिए चौदह वर्षों का वनवास स्वीकार किया और अपनी पत्नी सीता तथा भाई लक्ष्मण के साथ वन में रहने लगे। वहीं राक्षसराज रावण ने माता सीता का हरण कर लिया और उन्हें लंका ले गया।
इसके बाद भगवान राम ने वानरों, भालुओं, पक्षियों और पूरे वन की सहायता से सीता माता को वापस लाने के लिए संघर्ष किया। हनुमान जी ने समुद्र लांघा, जामवंत ने शक्ति दी और प्रकृति के हर हिस्से ने किसी न किसी रूप में उनकी सहायता की। यहाँ तक कि छोटी गिलहरी ने भी सेतु निर्माण में योगदान दिया, जिसे देखकर भगवान राम ने उसे स्नेह से आशीर्वाद दिया।
अंततः भगवान राम ने रावण का वध किया और माता सीता को मुक्त कराया। जब वे चौदह वर्षों बाद अयोध्या लौटे, तो वहाँ के लोगों ने दीप जलाकर उनका भव्य स्वागत किया। पूरी अयोध्या दीपों की रोशनी से जगमगा उठी और ऐसा लगा जैसे धरती पर तारों का सागर उतर आया हो। उसी दिन से यह पर्व दीवाली के रूप में मनाया जाने लगा।
सुनहरी परी यह कहानी सुनकर बहुत प्रभावित हुई। उसने अपनी माँ से पूछा कि क्या परियों का भी इस कहानी से कोई संबंध है। गुलाबी परी मुस्कुराई और समझाया कि परियाँ प्रकृति की आत्मा होती हैं। वे फूलों की खुशबू, नदियों की धारा और हवाओं के संगीत में बसती हैं। जब माता सीता वन में थीं, तब पूरी प्रकृति ने उनकी सहायता की थी और परियाँ भी उसी प्रकृति का हिस्सा थीं।
गुलाबी परी ने बताया कि माता सीता स्वयं धरती की पुत्री और प्रकृति का ही एक रूप हैं, इसलिए परियों का उनसे माँ-बेटी जैसा संबंध है। जब वे दुखी थीं, तो परियों की आत्माएँ भी दुखी हो गई थीं, और जब वे राम के साथ अयोध्या लौटीं, तो पूरा प्रकृति-जगत और परियों का संसार आनंद से भर गया।
यह सुनकर सुनहरी परी बहुत प्रसन्न हो गई और उसने पूछा कि क्या परियाँ भी दीवाली मनाती हैं। गुलाबी परी हँसकर बोली कि जब धरती पर लोग दीप जलाते हैं, तो परियाँ आकाश में तारों को और अधिक चमकदार बना देती हैं। जब लोग खुशियाँ मनाते हैं, तो परियाँ फूलों की पंखुड़ियों से सुगंध और रंग बरसाती हैं। पूरा आकाश और धरती मिलकर इस उत्सव में शामिल होते हैं।
उस रात जब दीवाली का पर्व धरती पर मनाया जा रहा था, तो आकाश में परियाँ भी अपने तरीके से उत्सव मना रही थीं। सुनहरी परी और उसकी सहेलियाँ बादलों पर बैठकर दीपों की कतारों को देख रही थीं। तारे और अधिक चमक रहे थे, हवा में सुगंध फैल रही थी और बादल हल्की-हल्की फूलों की वर्षा कर रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे धरती और आकाश मिलकर एक ही सुंदर गीत गा रहे हों।
गुलाबी परी ने अंत में सुनहरी परी को समझाया कि दीवाली केवल दीप जलाने का पर्व नहीं है, बल्कि यह अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक है। यह सिखाता है कि जहाँ सत्य और धर्म होते हैं, वहाँ पूरी प्रकृति साथ देती है। परियाँ, पक्षी, नदियाँ और इंसान—सब मिलकर इस खुशी को साझा करते हैं।
सुनहरी परी ने यह सब सुनकर संकल्प लिया कि वह हमेशा अच्छाई और सत्य के मार्ग पर चलेगी और धरती के बच्चों के लिए खुशी और प्रकाश फैलाएगी। उस रात दीवाली केवल अयोध्या की नहीं, बल्कि पूरे आकाश, परियों के देश और पूरी प्रकृति का उत्सव बन गई।
सफ़ेद परी और काली परी (परी कथा)
बहुत समय पहले की बात है, एक शांत और सुंदर गाँव था—नारायणगढ़। वहाँ की पाठशाला पूरे इलाके में प्रसिद्ध थी क्योंकि वहाँ के बच्चे बहुत मेहनती, होनहार और खुशमिजाज थे। कक्षा में हमेशा हँसी-मज़ाक और सीखने की खुशी बनी रहती थी। बच्चे पढ़ाई को बोझ नहीं, बल्कि एक खेल की तरह लेते थे और हर दिन कुछ नया सीखते थे।
लेकिन समय के साथ धीरे-धीरे बदलाव आने लगा। बच्चों के चेहरे की मुस्कान कम होने लगी। वे गृहकार्य टालने लगे, पढ़ाई से बचने लगे और चुपचाप रहने लगे। कई बच्चों को डरावने सपने आने लगे—कभी अंधेरे जंगल, कभी गिरते हुए रास्ते, तो कभी गुस्से भरे चेहरे। पूरा माहौल धीरे-धीरे भारी और उदास होने लगा।
कक्षा पाँच की एक समझदार लड़की सरगम भी इन बदलावों से परेशान थी। एक रात उसने अपनी माँ से कहा कि उसे गृहकार्य करने से डर लगने लगा है और उसे लगता है जैसे किताब खोलते ही कोई उसे घूर रहा हो। वह यह भी बताती है कि उसे रात में अजीब-सी काली छाया दिखाई देती है जो उसके सपनों में आ जाती है। यह सुनकर माँ गंभीर हो गईं।
माँ ने सरगम को प्यार से समझाया कि यह डर कोई साधारण चीज नहीं है। उन्होंने बताया कि यह “काली परी” का असर हो सकता है। काली परी तब आती है जब बच्चों के मन में आलस, डर, झूठ और जलन घर कर जाते हैं। वह उनके मन में अंधेरा भर देती है और सपनों को डरावना बना देती है।
सरगम ने हैरानी से पूछा कि क्या सच में ऐसी कोई परी होती है। माँ ने आगे बताया कि हर अंधेरे के पीछे एक रोशनी भी होती है, और उसी रोशनी का नाम “सफ़ेद परी” है। सफ़ेद परी तब आती है जब हम मेहनत, सच्चाई और आत्मविश्वास को अपनाते हैं। वह हमारे मन को मजबूत बनाती है और सपनों को सुंदर और रंगीन कर देती है।
माँ ने सरगम को समझाया कि अगर वह अपने डर और आलस को छोड़कर मेहनत करेगी और पढ़ाई को समझने की कोशिश करेगी, तो सफ़ेद परी उसके जीवन में जरूर आएगी। सरगम ने यह बात दिल से स्वीकार की और उसी दिन से उसने ठान लिया कि वह पढ़ाई को बोझ नहीं, बल्कि एक मजेदार सीखने की प्रक्रिया की तरह लेगी।
अगले दिन से सरगम ने अपनी आदतें बदलनी शुरू कर दीं। वह समय पर पढ़ाई करने लगी, ध्यान से सुनने लगी और जो भी समझ न आता, वह बिना झिझक पूछने लगी। उसने अपने दोस्तों की भी मदद करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा और डर कम होने लगा।
एक रात जब सरगम सो रही थी, उसे फिर वही काली छाया दिखाई दी। वह उसे पढ़ाई छोड़ने और आलस करने के लिए उकसाने लगी। लेकिन इस बार सरगम थोड़ी मजबूत हो चुकी थी, फिर भी वह डर गई। तभी अचानक उसके कमरे में तेज़ रोशनी फैल गई और एक सुंदर सफ़ेद परी प्रकट हुई। उसके चमकते पंख थे और उसके हाथ में सुनहरी छड़ी थी।
सफ़ेद परी ने मुस्कुराकर कहा कि सरगम ने मेहनत और सच्चाई का रास्ता चुना है, इसलिए वह उसकी मदद करने आई है। उसने अपनी छड़ी से एक उजली रोशनी फैलाई, जिससे काली परी धीरे-धीरे कमजोर पड़कर गायब हो गई। सरगम का डर खत्म हो गया और उसका मन शांत हो गया।
इसके बाद सफ़ेद परी ने सरगम को एक जादुई बगीचे में ले जाया। वहाँ हर तरफ रंग-बिरंगे फूल थे, उड़ते पक्षी थे और खुश बच्चे थे। कुछ बच्चे किताबें पढ़ रहे थे, कुछ खेल-खेल में गणित सीख रहे थे और कुछ विज्ञान के प्रयोग कर रहे थे। पूरा वातावरण खुशी और सीखने की ऊर्जा से भरा हुआ था।
सरगम ने आश्चर्य से पूछा कि क्या ये सभी बच्चे भी सफ़ेद परी के साथ हैं। परी ने समझाया कि ये वे बच्चे हैं जो मेहनत, जिज्ञासा और सच्चाई को अपनाते हैं। उनके मन में डर नहीं होता, बल्कि सवाल होते हैं, और सवालों से ही ज्ञान पैदा होता है। यह सुनकर सरगम बहुत प्रेरित हुई।
सुबह जब सरगम की नींद खुली, तो उसका मन पहले से बहुत हल्का और खुश था। अब वह डर को छोड़कर आत्मविश्वास के साथ पढ़ाई करने लगी। धीरे-धीरे उसका प्रदर्शन बेहतर होने लगा और उसका डर पूरी तरह खत्म हो गया।
सरगम ने अपने दोस्तों को भी यह कहानी सुनाई कि कैसे काली परी डर और आलस से आती है और सफ़ेद परी मेहनत और सच्चाई से। धीरे-धीरे पूरे स्कूल का माहौल बदलने लगा। बच्चे फिर से खुश होकर पढ़ाई करने लगे और कक्षा में हँसी और सीखने की आवाजें लौट आईं।
अब पाठशाला पहले जैसी नहीं, बल्कि और भी बेहतर और सकारात्मक हो गई थी। हर बच्चा समझ गया था कि पढ़ाई बोझ नहीं, बल्कि सफलता की सीढ़ी है।
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प्रस्तुति: Saying Central Team