फाख्ता के अंडे और मैं – बचपन की एक सच्ची घटना
जब हम छोटे थे, तो हमारे लिए दुनिया का सबसे प्यारा स्थान हमारा ननिहाल होता था। मेरा ननिहाल पंजाब के नाभा के पास रोहटी मौड़ां गाँव में था। वहाँ मेरे नाना जी सरदार हरमील सिंह रहते थे, जो बहुत सरल और शांत स्वभाव के व्यक्ति थे और बाद में गाँव के मुखिया भी बने। उनका घर और खासकर उनका बगीचा, जिसे हम “वाड़ी” कहते थे, हमारे लिए किसी जादुई दुनिया से कम नहीं था।
उस बगीचे में आम, अमरूद, अनार, अंगूर और नींबू के कई पेड़ थे। हर पेड़ पर पक्षियों की चहचहाहट गूंजती रहती थी और हर कोना जीवन से भरा हुआ लगता था। लेकिन उन सबमें सबसे खास था एक बड़ा आम का पेड़, जिसकी डालियाँ मुझे हमेशा अपनी ओर बुलाती थीं।
उसी पेड़ से जुड़ी एक ऐसी घटना है, जिसने मेरे बचपन की सोच को हमेशा के लिए बदल दिया।
उस आम के पेड़ पर एक फाख्ता ने अपना घोंसला बनाया हुआ था। उसमें उसने अपने अंडे दिए थे। मैं बहुत छोटा था, लगभग पाँच-छह साल का, लेकिन हर दिन उन अंडों को देखने बगीचे में चला जाता था। फाख्ता बहुत सावधानी से अपने अंडों की रक्षा कर रही थी और मैं घंटों उसे देखता रहता था।
एक दिन मैंने देखा कि एक कौआ बार-बार उस घोंसले की तरफ झपटता है। फाख्ता तुरंत उसे भगा देती थी। यह दृश्य देखकर मुझे बहुत डर और दुख हुआ। मुझे लगा कि कौआ उसके अंडों को नुकसान पहुँचाना चाहता है। मेरे मन में अचानक एक भावना जागी कि मुझे उन अंडों की रक्षा करनी चाहिए।
मैंने तुरंत नाना जी से कहा कि मैं बगीचे में बैठकर फाख्ता के अंडों की रक्षा करना चाहता हूँ। नाना जी मुस्कुराए, लेकिन उन्होंने मुझे समझाया भी कि यह आसान काम नहीं है। फिर भी उन्होंने मुझे अनुमति दे दी। उस दिन से मैंने खुद को उस छोटे से घोंसले का रक्षक मान लिया।
मैं रोज़ बगीचे में जाकर उसी पेड़ के नीचे बैठ जाता था। मेरा खाना भी वहीं पहुँच जाता था। मैं घंटों अंडों की निगरानी करता और किसी भी पक्षी को उनके पास नहीं आने देता था। धीरे-धीरे फाख्ता भी मेरी मौजूदगी को समझने लगी और अब वह मुझसे डरती नहीं थी। वह जान गई थी कि मैं उसकी मदद कर रहा हूँ।
हालाँकि यह काम इतना आसान नहीं था। कभी-कभी दूसरे पक्षी घोंसले के पास आ जाते थे। मैं तुरंत दौड़कर उन्हें भगाता था। यह मेरे लिए एक जिम्मेदारी बन गई थी, और मैं इसे पूरी गंभीरता से निभाता था, जैसे कोई बड़ा काम कर रहा हूँ।
कुछ दिनों बाद वह पल आया जिसका मुझे इंतज़ार था। घोंसले में से छोटे-छोटे बच्चे बाहर आने लगे। मैं बहुत खुश हो गया। मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी मेहनत सफल हो गई हो और मैंने सच में किसी जीवन की रक्षा की हो।
जब वे छोटे बच्चे बड़े होकर उड़ने लगे, तो वह दृश्य मेरे लिए बहुत अद्भुत था। उनके छोटे-छोटे पंखों से उड़कर आसमान में जाना देखकर मुझे गहरी खुशी और गर्व महसूस हुआ। उस पल मुझे समझ आया कि किसी की रक्षा करना कितना बड़ा और सुखद अनुभव होता है।
उस दिन के बाद मेरी सोच बदल गई। मुझे एहसास हुआ कि बचपन की यह छोटी-सी घटना केवल खेल नहीं थी, बल्कि एक सीख थी—कि हर जीव का जीवन महत्वपूर्ण है। चाहे वह इंसान हो या पक्षी, उसकी रक्षा करना और उसका सम्मान करना हमारा कर्तव्य है।
आज भी जब मैं उस बगीचे और उस फाख्ता को याद करता हूँ, तो दिल में एक शांत खुशी भर जाती है। वह अनुभव मुझे हमेशा याद दिलाता है कि सच्ची खुशी किसी बड़े काम में नहीं, बल्कि किसी छोटे जीवन की रक्षा करने में छिपी होती है।
देवता की सीख (कहानी)
एक छोटे से गाँव में एक सुंदर और शांत मंदिर था। उस मंदिर के पास एक महात्मा जी रहते थे, जो रोज़ देवता की पूजा और आरती करते थे। गाँव के लोग उन पर बहुत श्रद्धा रखते थे और बच्चे भी अक्सर उनके पास बैठकर बातें सुनते थे।
उसी गाँव में एक होनहार और समझदार बच्चा रहता था, जिसका नाम माधव था। वह पढ़ाई में बहुत तेज़ था, लेकिन साथ ही बहुत जिज्ञासु भी था। वह अक्सर महात्मा जी के पास जाकर उनसे तरह-तरह के सवाल पूछा करता था। महात्मा जी उसे बहुत स्नेह करते थे।
एक दिन माधव ने उत्सुक होकर महात्मा जी से पूछा, “बाबा, क्या देवता सच में होते हैं?”
महात्मा जी मुस्कुराए और बोले, “हाँ बेटा, देवता होते हैं।”
माधव ने फिर पूछा, “और वे क्या करते हैं?”
महात्मा जी ने कहा, “वे सब कुछ कर सकते हैं और अपने भक्तों को सब कुछ दे सकते हैं।”
यह सुनकर माधव के मन में देवता के प्रति एक गहरी श्रद्धा और उत्सुकता पैदा हो गई। वह मंदिर जाने लगा और मन ही मन देवता से अपनी इच्छाएँ माँगने लगा। उसे लगने लगा कि शायद देवता उसकी हर इच्छा पूरी कर देंगे। धीरे-धीरे वह पढ़ाई की ओर थोड़ा लापरवाह होने लगा और खेलकूद में अधिक समय बिताने लगा।
कुछ समय बाद एक रात माधव को एक बहुत ही स्पष्ट और अद्भुत सपना आया। उसने देखा कि स्वयं देवता उसके सामने खड़े हैं। उनका चेहरा शांत और तेजस्वी था। देवता ने उससे कहा, “यह सच है कि मैं सब कुछ दे सकता हूँ, लेकिन मैं केवल उन्हीं को देता हूँ जो मेहनत करते हैं।”
देवता ने आगे समझाया, “यदि मैं बिना मेहनत करने वालों को सब कुछ देने लगूँ, तो वे आलसी हो जाएँगे। मेहनत ही सफलता की असली कुंजी है। खेलना अच्छा है, लेकिन पढ़ाई पर भी ध्यान देना ज़रूरी है। अगर तुमने मेहनत नहीं की, तो दूसरे बच्चे तुमसे आगे निकल जाएँगे।”
यह सुनकर माधव को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसे समझ आ गया कि केवल प्रार्थना करने से नहीं, बल्कि मेहनत करने से ही सफलता मिलती है। जब वह नींद से जागा, तो उसने तुरंत महात्मा जी को अपना सपना बताया।
महात्मा जी मुस्कुराए और बोले, “देवता हमेशा मेहनत करने वालों के साथ रहते हैं। वे केवल उन्हीं की मदद करते हैं जो अपने प्रयासों में ईमानदार होते हैं।”
उस दिन के बाद माधव ने अपनी आदत बदल दी। वह मन लगाकर पढ़ाई करने लगा और खेलकूद को भी संतुलित रूप से समय देने लगा। धीरे-धीरे उसकी मेहनत रंग लाई और परीक्षा के परिणाम में वह अपनी कक्षा में प्रथम स्थान पर आया।
माधव बहुत खुश हुआ, लेकिन उसे अब यह समझ आ चुका था कि उसकी सफलता के पीछे सबसे बड़ा हाथ उसकी मेहनत का था, न कि केवल इच्छाओं का।
एकता की ताकत (कहानी)

राजू रामपुर नाम के एक छोटे से गाँव में रहता था। रामपुर बहुत सुंदर गाँव था, जहाँ चारों ओर हरे-भरे पेड़ थे, सुनहरे खेत लहराते थे और गाँव के बीचों-बीच एक चौपाल थी जहाँ लोग बैठकर बातें करते थे। गाँव का वातावरण बहुत शांत और खुशहाल था।
एक दिन राजू का जन्मदिन था। घर में खुशी का माहौल था। उसके पिताजी उसके लिए मिठाई लेकर आए। राजू बहुत खुश हुआ और उसने मिठाई गाँव के बच्चों में बाँट दी। बाँटते-बाँटते एक छोटा सा मिठाई का टुकड़ा ज़मीन पर गिर गया।
थोड़ी ही देर में वहाँ बहुत सारी चींटियाँ आ गईं। वे सब उस छोटे से टुकड़े को मिलकर उठाने लगीं। कुछ चींटियाँ आगे खींच रही थीं, कुछ पीछे से धक्का दे रही थीं और कुछ रास्ता बना रही थीं। धीरे-धीरे वे उस टुकड़े को अपने बिल की ओर ले जाने लगीं।
राजू यह देखकर हैरान रह गया। वह तुरंत अपने पिताजी के पास दौड़कर गया और बोला, “पिताजी, देखिए! इतनी सारी चींटियाँ मिलकर उस छोटे से टुकड़े को ले जा रही हैं।”
यह सुनकर उसके पिताजी मुस्कुराए और बोले, “बेटा, यही तो एकता की ताकत है।”
राजू ने उत्सुक होकर पूछा, “एकता क्या होती है, पिताजी?”
पिताजी ने उसे प्यार से समझाया, “एकता का मतलब है मिलकर काम करना। जब सब लोग साथ मिलकर काम करते हैं, तो बड़े से बड़ा काम भी आसान हो जाता है।”
उन्होंने आगे समझाते हुए कहा, “जैसे कई छोटे-छोटे तिनके मिलकर रस्सी बन जाते हैं, और वह रस्सी इतनी मजबूत हो जाती है कि बड़े जानवरों को भी नियंत्रित किया जा सकता है। उसी तरह जब लोग मिलकर काम करते हैं, तो कोई भी मुश्किल काम आसान हो जाता है।”
राजू ध्यान से अपने पिताजी की बातें सुन रहा था। उसे अब समझ आ गया था कि अकेले रहने से काम मुश्किल होता है, लेकिन साथ मिलकर काम करने से हर चीज़ आसान हो जाती है।
उस दिन के बाद राजू ने भी अपने दोस्तों के साथ मिलकर काम करना शुरू किया। चाहे पढ़ाई हो, खेल हो या कोई काम—वह हमेशा सबके साथ मिलकर काम करता था।
धीरे-धीरे गाँव में भी बच्चों और बड़ों ने मिलकर काम करना शुरू कर दिया। खेतों में, चौपाल में और हर जगह सहयोग की भावना बढ़ गई। गाँव और भी खुशहाल और मजबूत बन गया।
राजा का आदेश (कहानी)
बहुत समय पहले चंदनपुर नाम का एक समृद्ध राज्य था, जहाँ राजा तेज प्रताप सिंह का शासन था। वे बहुत ही दयालु, न्यायप्रिय और परोपकारी राजा थे। उनके राज्य की प्रजा बहुत खुश रहती थी। हर घर में सुख-शांति थी और लोग मिलजुलकर रहते थे। किसी को किसी चीज़ की कमी नहीं थी।
एक दिन राजा तेज प्रताप सिंह जंगल में भ्रमण के लिए गए। जंगल का वातावरण बहुत सुंदर था। वहाँ शेर, चीते, भालू, हिरन और खरगोश जैसे अनेक जानवर घूम रहे थे। यह दृश्य देखकर राजा को विचार आया कि क्यों न इन सुंदर जानवरों को चंदनपुर में लाया जाए ताकि लोग उन्हें देखकर आनंदित हों।
राजा ने जानवरों से कहा कि वे चंदनपुर आ जाएँ। उन्होंने आश्वासन दिया कि वहाँ उनका पूरा ध्यान रखा जाएगा और उन्हें कोई परेशानी नहीं होगी। राजा की बात सुनकर शेर, चीते और भालू तो तैयार हो गए, लेकिन हिरन और खरगोश डर के कारण वहाँ जाने से मना कर दिए।
कुछ ही समय में शेर, चीते और भालू चंदनपुर आ गए। शुरुआत में लोग उन्हें देखकर बहुत खुश हुए। बच्चे उन्हें देखकर उत्साहित भी थे, लेकिन साथ ही थोड़ा डर भी महसूस कर रहे थे। धीरे-धीरे स्थिति बदलने लगी। रात के समय, जब पूरा गाँव सो जाता, तब शेर, चीते और भालू गाँव के पशुओं पर हमला करने लगे। वे किसी की गाय, किसी की भैंस और किसी की बकरी को नुकसान पहुँचाने लगे। धीरे-धीरे गाँव में भय का माहौल फैलने लगा।
जब लोगों को इस बात का पता चला, तो वे परेशान होकर राजा के पास पहुँचे और शिकायत करने लगे। उन्होंने बताया कि ये जानवर गाँव के लिए खतरा बन गए हैं और उनका रहना अब असुरक्षित हो गया है। राजा तेज प्रताप सिंह ने पूरी बात ध्यान से सुनी। उन्होंने समझ लिया कि जो जीव दूसरों को नुकसान पहुँचाते हैं और मिलजुलकर नहीं रहते, उन्हें साथ रखना उचित नहीं होता। उन्होंने तुरंत निर्णय लिया कि ऐसे जानवरों को जंगल में वापस भेज दिया जाए।
राजा ने सैनिकों को आदेश दिया कि वे शेर, चीते और भालू को जंगल की ओर वापस भेज दें। सैनिकों ने उन्हें मजबूर करके जंगल की ओर वापस पहुँचा दिया। धीरे-धीरे वे फिर से अपने प्राकृतिक स्थान में रहने लगे। उनके जाने के बाद चंदनपुर में फिर से शांति और सुरक्षा लौट आई। लोग पहले की तरह सुखी जीवन जीने लगे। सभी ने यह सीख ली कि हर जीव का स्थान अलग होता है और जो दूसरों को नुकसान पहुँचाए, उसे नियंत्रित करना आवश्यक है।
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बालकथाएँ बच्चों के लिए रोचक, सरल और प्रेरणादायक कहानियाँ होती हैं। ये उनकी कल्पनाशक्ति, नैतिक मूल्यों, भाषा कौशल और रचनात्मक सोच को विकसित करती हैं। मनोरंजन के साथ-साथ जीवन की महत्वपूर्ण सीख भी प्रदान करती हैं।
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प्रस्तुति: Saying Central Team