परीलोक से वापसी

परीलोक से वापसी (कहानी)

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परीलोक से वापसी (कहानी)

डोरोथी एक साधारण दिखने वाली लड़की थी, जिसे देखकर कोई नहीं कह सकता था कि उसके जीवन में असाधारण और जादुई घटनाएँ जुड़ी हुई हैं। लेकिन उसके भीतर एक ऐसी विशेषता थी, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते थे। वह परी रानी ऊजमा की बहुत करीबी मित्र थी, जो ऊज नामक परी देश की शासक थी।

डोरोथी कई बार उस जादुई दुनिया की यात्रा कर चुकी थी और हर बार किसी न किसी संकट से ऊजमा ने अपने जादू से उसकी रक्षा की थी। ऊजमा ने उसे यह भी बताया था कि यदि कभी कोई गंभीर संकट आए, तो वह उसे याद करे, क्योंकि उसकी जादुई तसवीर के माध्यम से वह उसे देख सकती है और मदद कर सकती है।

एक रात डोरोथी अपने चाचा से मिलने जा रही थी। वह घोड़ागाड़ी में अपने साथी जैब के साथ यात्रा कर रही थी और दोनों आपस में बातें कर रहे थे। रास्ता शांत था, लेकिन अचानक धरती जोर से हिलने लगी और भयानक गड़गड़ाहट के साथ भूकंप आ गया। जमीन फट गई और घोड़ागाड़ी सीधे एक गहरी दरार में गिर गई। डोरोथी डर से चीख उठी, और कुछ ही क्षणों में वे सब अंधकार में गिरते चले गए। ऐसा लग रहा था मानो वे धरती के भीतर किसी अनजान दुनिया में जा रहे हों।

जब डोरोथी को होश आया तो उसने खुद को एक अजीब और चमकदार दुनिया में पाया। चारों ओर रंग-बिरंगी रोशनी फैली हुई थी और दूर-दूर तक शीशे के बने घर दिखाई दे रहे थे। हर चीज पारदर्शी थी और अंदर का दृश्य साफ दिख रहा था। कुछ लोग हवा में चलते दिखाई दे रहे थे, जो उसे और भी अधिक आश्चर्यचकित कर रहा था। तभी एक और चौंकाने वाली बात हुई, उसका घोड़ा मनुष्यों की तरह बोलने लगा, जिससे डोरोथी हैरानी और डर दोनों में डूब गई।

थोड़ी देर बाद वहाँ के लोग आ गए, जिनमें से एक के माथे पर तारे जैसा चमकीला निशान था और वही उनका राजा था। उसने डोरोथी और उसके साथियों पर आरोप लगाया कि उन्होंने उनके नगर मंगाबू पर पत्थर बरसाए हैं। डोरोथी ने समझाने की कोशिश की कि यह सब भूकंप के कारण हुआ है और वे लोग अनजाने में वहाँ गिर गए हैं। लेकिन राजा ने उन्हें धमकी दी कि उन्हें तांत्रिक के पास ले जाया जाएगा और यदि बात नहीं मानी गई तो उन्हें कठोर दंड दिया जाएगा।

इसी दौरान अचानक ऊज का जादूगर भी वहाँ आ पहुँचा, जिससे डोरोथी को थोड़ी राहत मिली। उन्हें एक भयानक महल में ले जाया गया, जहाँ फर्श पर जलती आग के बीच से एक डरावना तांत्रिक बाहर आया। उसका शरीर काँटों से भरा हुआ था और वह बेहद भयानक दिख रहा था। जब डोरोथी और जादूगर उस पर हँस पड़े, तो वह क्रोधित हो गया और उसने उनकी साँसें बंद करने की धमकी दी। डोरोथी को घुटन महसूस होने लगी, लेकिन तभी जादूगर ने तलवार से उस तांत्रिक को मार दिया।

सबको आश्चर्य हुआ कि उस तांत्रिक के शरीर से खून नहीं निकला, क्योंकि वह कोई मनुष्य नहीं था। वहाँ के लोग पेड़ों की तरह उगते और मरते थे, और मृत्यु के बाद फिर से उग आते थे। यह दुनिया सामान्य नियमों से बिल्कुल अलग थी, जो डोरोथी के लिए और भी अधिक रहस्यमय बनती जा रही थी।

इसके बाद डोरोथी और उसके साथियों को एक गहरी गुफा में बंद कर दिया गया। उन्हें कहा गया कि उन्हें ऐसी जगह फेंका जाएगा जहाँ से वे कभी वापस नहीं आ सकेंगे। लेकिन जादूगर ने अपनी लालटेन जलाई और एक छिपा हुआ रास्ता खोज निकाला। वे घंटों चलते रहे और अंततः एक घाटी में पहुँच गए, जहाँ सब कुछ अदृश्य था। वहाँ एक अजीब घटना हुई, डोरोथी की बिल्ली ने एक फल खाया और गायब हो गई।

उन्हें पता चला कि उस घाटी में रहने वाले लोग भी उन्हीं फलों के कारण अदृश्य हो चुके हैं। उन्होंने डोरोथी को सलाह दी कि वे पानी पर चलने के लिए एक विशेष पौधे का रस अपने पैरों पर लगाएँ। ऐसा करने के बाद वे भालुओं से बचकर नदी पार करने में सफल हो गए। आगे उनका सामना लकड़ी के मानवों से हुआ, जो सब कुछ लकड़ी के बने हुए थे और इशारों से बात करते थे। उन्होंने डोरोथी और उसके साथियों को बंदी बना लिया।

जैब ने समझदारी दिखाई और लकड़ी मानवों के उड़ने वाले पंख चुरा लिए। फिर वे उन पंखों की मदद से उड़कर भाग निकले। लेकिन उनका सफर आसान नहीं था, क्योंकि आगे एक गुफा में भयानक अजगर उनका इंतजार कर रहे थे। सभी निराश हो गए और लगने लगा कि अब बचना मुश्किल है। तभी डोरोथी को परी रानी ऊजमा की याद आई और उसने उसे याद किया।

उसी क्षण ऊजमा की जादुई तसवीर में दृश्य उभरा और उसने अपनी शक्ति से सभी को उस खतरनाक गुफा से निकालकर ऊज के परीलोक में पहुँचा दिया। वहाँ डोरोथी और ऊजमा की मुलाकात हुई, और दोनों बहुत खुश हुए। कुछ दिन वहाँ रहने के बाद डोरोथी ने अपने चाचा की याद दिलाई और घर लौटने की इच्छा जताई।

अंत में ऊजमा ने अपनी जादुई शक्ति से डोरोथी और जैब को सुरक्षित उनके घर पहुँचा दिया। डोरोथी वापस अपनी दुनिया में लौट आई, लेकिन उसका दिल अपनी प्यारी सखी ऊजमा के साथ परीलोक में ही रह गया था।

मित्तो बकरी (यहूदी कहानी)

एरेन एक साधारण लेकिन मेहनती व्यक्ति था, जो रोयेंदार खालों का व्यापार करता था। इस वर्ष उसका व्यापार ठीक से नहीं चला था और घर की आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई थी। हनुक्का का त्योहार नजदीक था, और घर में खुशियों के लिए पैसों की सख्त जरूरत थी। ऐसे में उसने एक कठिन निर्णय लिया—घर की पुरानी और बूढ़ी बकरी मित्तो को बेचने का। मित्तो अब दूध भी कम देती थी, इसलिए कसाई उसे आठ सिक्कों में खरीदने को तैयार था। इन पैसों से वह त्योहार के लिए मोमबत्तियाँ, तेल, आलू और बच्चों के लिए उपहार खरीद सकता था।

एरेन ने अपने बड़े बेटे रुबिन को बकरी को शहर ले जाकर बेचने का काम सौंपा। रुबिन इस फैसले से दुखी था, क्योंकि मित्तो उसके परिवार का हिस्सा बन चुकी थी। घर की महिलाएँ और बच्चे भी भावुक हो गए, लेकिन परिवार की मजबूरी के आगे सब चुप थे। रुबिन ने गर्म कपड़े पहने, कुछ खाना साथ रखा और मित्तो के गले में रस्सी बाँधकर यात्रा पर निकल पड़ा। मित्तो शांत स्वभाव की बकरी थी, वह रुबिन पर पूरा भरोसा करती थी और बिना किसी विरोध के उसके साथ चल पड़ी।

शुरुआत में मौसम ठीक था, लेकिन कुछ ही समय बाद आसमान बदलने लगा। तेज हवा चलने लगी, बादल गहरे नीले हो गए और देखते ही देखते भयानक बर्फबारी शुरू हो गई। पहले ओले गिरे, फिर भारी बर्फ गिरने लगी जिससे पूरा रास्ता सफेद हो गया। रुबिन के लिए दिशा पहचानना मुश्किल हो गया और वह पूरी तरह भटक गया। बर्फ इतनी तेज थी कि कुछ ही देर में सब कुछ ढक गया और चारों ओर सिर्फ सफेद अंधकार रह गया।

ठंड इतनी बढ़ गई थी कि रुबिन के हाथ-पैर सुन्न होने लगे। वह समझ गया कि अगर उन्हें जल्दी कोई आश्रय नहीं मिला तो दोनों की जान खतरे में पड़ सकती है। मित्तो भी अब थकने लगी थी और आगे बढ़ना उसके लिए मुश्किल हो गया था। उसने रुककर मिमियाना शुरू किया, जैसे वह इस कठिन परिस्थिति पर सवाल उठा रही हो। रुबिन भी डर गया था, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी और भगवान से प्रार्थना करने लगा कि उन्हें किसी तरह बचा लिया जाए।

तभी अचानक दूर एक छोटा सा टीला दिखाई दिया। पास जाकर देखा तो वह बर्फ से ढका सूखी घास का बड़ा ढेर था। रुबिन के लिए यह उम्मीद की किरण थी। उसने तुरंत बर्फ हटाई और घास के भीतर एक छोटा सा सुरक्षित स्थान बना लिया। वह और मित्तो दोनों उस अस्थायी गुफा में छिप गए, जहाँ बाहर की तेज ठंड से कुछ राहत मिल रही थी। मित्तो को वहाँ घास मिल गई और वह शांत होकर खाने लगी, जिससे उसका डर भी कम हो गया।

रुबिन ने भी थोड़ा भोजन किया और थककर लेट गया। घास की गुफा में गर्मी बनी हुई थी क्योंकि मित्तो का शरीर भी गर्मी दे रहा था। धीरे-धीरे बाहर का तूफान और तेज हो गया, लेकिन अंदर दोनों सुरक्षित थे। रुबिन ने महसूस किया कि अब यह बकरी सिर्फ एक जानवर नहीं रही, बल्कि उसकी साथी और रक्षक बन चुकी है। वह उसके पास लेटकर उसे परिवार जैसा महसूस करने लगा।
रात भर बर्फ गिरती रही और वे दोनों उसी घास के ढेर में रुके रहे।

समय के साथ उनका भरोसा एक-दूसरे पर और मजबूत होता गया। मित्तो लगातार घास खाती रही और रुबिन उसके दूध से अपनी भूख मिटाता रहा। दोनों के बीच एक अनोखा भावनात्मक रिश्ता बन चुका था, जहाँ शब्दों से ज्यादा भावनाएँ काम कर रही थीं। रुबिन ने उससे बातें करनी शुरू कर दीं, जैसे वह सच में उसे समझ रही हो।

तीन दिनों तक वे उसी घास के टीले में फंसे रहे। इन दिनों में रुबिन ने मित्तो की देखभाल की और मित्तो ने उसे जीवन का सबसे बड़ा सहारा दिया। ठंड, भूख और डर के बीच दोनों एक-दूसरे के सहारे जिंदा रहे। धीरे-धीरे रुबिन के मन में मित्तो के प्रति गहरा लगाव बढ़ गया और उसने समझ लिया कि उसे बेच देना गलत निर्णय होता।

तीसरी रात तूफान थोड़ा शांत हुआ और चाँद की रोशनी बर्फ पर पड़ने लगी। यह दृश्य बहुत सुंदर और शांत था। रुबिन ने बाहर निकलने का फैसला किया और बर्फ के टीले से बाहर आ गया। अब मौसम साफ होने लगा था और दूर से एक रास्ता दिखाई देने लगा था। कुछ समय बाद एक किसान की गाड़ी वहाँ से गुजरी और उन्होंने रास्ता पहचान लिया।

रुबिन और मित्तो सुरक्षित रूप से गाँव लौट आए। घर के लोग उन्हें देखकर बेहद खुश हुए, क्योंकि वे दोनों कई दिनों से लापता थे। रुबिन ने पूरे अनुभव की कहानी सुनाई कि कैसे मित्तो ने उसकी जान बचाई और कैसे उन्होंने तीन दिन उस घास के टीले में बिताए। यह कहानी सुनकर परिवार भावुक हो गया और सबने समझ लिया कि मित्तो केवल एक बकरी नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा है।

इसके बाद परिवार ने मित्तो को बेचने का विचार हमेशा के लिए छोड़ दिया। समय के साथ एरेन का व्यापार भी सुधर गया और घर में खुशहाली लौट आई। हनुक्का का त्योहार इस बार और भी खास बन गया। बच्चे मोमबत्तियाँ जलाकर खुश थे और मित्तो अलाव के पास बैठी शांति से सबको देख रही थी। रुबिन अक्सर मित्तो से बातें करता और पूछता कि क्या उसे वे कठिन दिन याद हैं। मित्तो बस प्यार से अपना सिर हिला देती और धीरे से “माँ” जैसा स्वर निकालती। वह एक शब्द ही उनके बीच के पूरे प्रेम और भरोसे को व्यक्त कर देता था।

कड़वी मिठाई (यहूदी कहानी)

इस्राइल के एक छोटे से शहर में एक धनी व्यक्ति कादिश रहता था। उसके जीवन का सबसे बड़ा सुख उसका इकलौता बेटा अतजल था। अतजल देखने में बहुत सुंदर था, लेकिन उसका स्वभाव बेहद आलसी था। उसे मेहनत और जिम्मेदारी से ज्यादा कहानियाँ सुनना पसंद था। वह हमेशा किसी न किसी से स्वर्ग की कहानियाँ सुनने के लिए उत्सुक रहता और उन्हीं कल्पनाओं में खोया रहता था। उसके मन में स्वर्ग की एक ऐसी छवि बन चुकी थी जहाँ सिर्फ आराम, मिठाइयाँ और बिना किसी काम के जीवन होता है।

अतजल ने कई बार सुना था कि स्वर्ग में कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती, वहाँ हर इच्छा तुरंत पूरी हो जाती है और बच्चों को पढ़ाई भी नहीं करनी पड़ती। वह अपने घर के जीवन से इसकी तुलना करता और परेशान हो जाता। उसे माँ की डाँट, पिता की सख्ती और रोजमर्रा की जिम्मेदारियाँ बिल्कुल पसंद नहीं थीं। धीरे-धीरे उसके मन में यह विचार मजबूत होने लगा कि उसे किसी तरह स्वर्ग पहुँच जाना चाहिए, क्योंकि उसके अनुसार वही सबसे आरामदायक जगह थी।

यह विचार धीरे-धीरे एक खतरनाक जिद में बदल गया। अतजल ने खाना-पीना छोड़ दिया और बिस्तर पर लेटकर यह कहना शुरू कर दिया कि वह मर चुका है। जो भी उसे उठाने आता, वह वही बात दोहराता कि अब वह इस दुनिया में नहीं है। माँ बहुत दुखी हुई और उसे समझाने की कोशिश करती रही, लेकिन अतजल अपनी बात पर अड़ा रहा। उसका शरीर कमजोर होता जा रहा था और घर का माहौल पूरी तरह दुख और चिंता में बदल गया था।

कई हकीम और डॉक्टर बुलाए गए, लेकिन कोई भी अतजल की इस अजीब जिद को नहीं बदल सका। वह हर समय यही कहता रहता था कि वह मर चुका है और उसे स्वर्ग जाना है। कादिश और उसकी पत्नी दोनों अपने बेटे की इस स्थिति से बेहद परेशान थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे अपने इकलौते बेटे को कैसे बचाएँ, जो धीरे-धीरे खुद को मौत की ओर धकेल रहा था।

आखिरकार कादिश प्रसिद्ध डॉक्टर योत्स के पास गया। डॉक्टर ने स्थिति को समझकर कहा कि वह इलाज कर सकता है, लेकिन उसकी एक शर्त होगी। मजबूरी में कादिश ने शर्त मान ली। डॉक्टर ने एक योजना बनाई जिसमें कमरे को बहुत सुंदर तरीके से सजाया गया, दीवारों पर ‘स्वर्गलोक’ लिखा गया और नौकरों को देवदूतों की तरह तैयार किया गया। पूरा वातावरण ऐसा बनाया गया जैसे वह सचमुच कोई दिव्य स्थान हो।

इसके बाद डॉक्टर ने योजना के अनुसार कहा कि अतजल वास्तव में मर चुका है और उसे दफनाया जाना चाहिए। यह सुनकर अतजल खुश हो गया, क्योंकि उसे लगता था कि यही स्वर्ग जाने का रास्ता है। उसे बेहोशी की दवा देकर एक सुंदर कमरे में ले जाया गया। जब उसकी आँख खुली तो वह खुद को एक नए और रहस्यमय स्थान पर देखकर बेहद प्रसन्न हुआ, जहाँ सब कुछ उसके सपनों जैसा था।

वहाँ उसे देवदूत जैसे कपड़े पहने लोग मिले जो उसकी हर इच्छा तुरंत पूरी कर देते थे। उसे तरह-तरह के व्यंजन दिए गए, मीठे पकवान और शरबत हमेशा तैयार रहते थे। अतजल को लगा कि उसका सपना सच हो गया है और वह सच में स्वर्ग में पहुँच गया है। लेकिन धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि यहाँ सब कुछ बहुत अजीब और एक जैसा है, जहाँ समय का कोई अस्तित्व नहीं है।
कुछ समय बाद अतजल ने चटपटा और नमकीन खाना माँगा, लेकिन उसे बताया गया कि स्वर्ग में केवल मीठी चीजें ही मिलती हैं। वह पानी माँगता तो उसे शरबत दिया जाता। शुरुआत में जो चीजें उसे बहुत पसंद थीं, वही धीरे-धीरे उसे परेशान करने लगीं। हर समय मिठास और एक जैसी चीजें उसे उबाऊ लगने लगीं और उसका मन बेचैन होने लगा।

अब अतजल अकेलापन महसूस करने लगा। उसे अपने माँ-बाप और दोस्तों की याद आने लगी। उसने देवदूतों से पूछा कि वह अपने परिवार से कब मिल पाएगा, लेकिन जवाब मिला कि यह संभव नहीं है। उसे बताया गया कि यहाँ हर आत्मा अपने स्थान पर ही रहती है और किसी से मिलना-जुलना नहीं होता। यह सुनकर अतजल अंदर से टूट गया और पहली बार उसे समझ आया कि अकेलापन कितना दर्दनाक हो सकता है।

धीरे-धीरे वह उदास और परेशान रहने लगा। उसे नींद नहीं आती थी और वह हर समय रोता रहता था। उसे एहसास हुआ कि स्वर्ग जैसा उसने कल्पना की थी, वैसा बिल्कुल नहीं है। यहाँ न तो स्वतंत्रता थी, न दोस्ती, न परिवार और न ही असली खुशी। उसे समझ आने लगा कि सिर्फ आराम और मिठास ही जीवन नहीं होते, बल्कि संघर्ष और संबंध भी उतने ही जरूरी हैं।

एक दिन अचानक एक देवदूत उसके पास आया और बताया कि सब कुछ एक गलती थी। असल में उसे किसी और लड़के की जगह यहाँ लाया गया था और अब उसे वापस धरती पर भेजा जाएगा। यह सुनकर अतजल को बहुत खुशी हुई। उसे बेहोशी की दवा दी गई और वह फिर से अपने घर के कमरे में पहुँच गया।

जब उसकी आँख खुली तो उसकी माँ उसके पास खड़ी थी। अतजल तुरंत उठकर अपनी माँ से लिपट गया और रोते हुए कहा कि स्वर्ग कोई अच्छी जगह नहीं है। उसने कहा कि अब वह पढ़ाई करेगा, मेहनत करेगा और अपने परिवार के साथ यहीं खुश रहेगा। उस दिन के बाद अतजल ने आलस्य छोड़ दिया और असली जीवन का महत्व समझ लिया।

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प्रस्तुति: Saying Central Team

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