महाभारत

महाभारत भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य का पतन

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महाभारत का युद्ध दिन-प्रतिदिन और भी अधिक भयानक होता जा रहा था। कुरुक्षेत्र की भूमि पर हर ओर रक्त, मृत्यु और विनाश का दृश्य दिखाई देता था। युद्ध के दसवें दिन कौरव सेना का नेतृत्व भीष्म पितामह कर रहे थे। वे इतने महान योद्धा थे कि उनके सामने कोई भी टिक नहीं पा रहा था। उनके बाणों की वर्षा से पाण्डव सेना लगातार टूट रही थी।

अर्जुन सहित सभी महारथी जानते थे कि जब तक भीष्म युद्धभूमि में उपस्थित हैं, तब तक विजय प्राप्त करना असंभव है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण भी समझ चुके थे कि इस महान योद्धा को रोकना अत्यंत आवश्यक है, अन्यथा पाण्डवों की पूरी सेना नष्ट हो जाएगी।

जब पाण्डवों ने भीष्म पितामह से उनकी मृत्यु का उपाय पूछा, तब उन्होंने स्वयं सत्य प्रकट किया। उन्होंने कहा कि जब तक उनके हाथ में शस्त्र रहेगा, तब तक उन्हें स्वयं महादेव के अतिरिक्त कोई पराजित नहीं कर सकता। फिर उन्होंने संकेत दिया कि यदि शिखंडी को सामने रखकर युद्ध किया जाए, तो वे उस पर अस्त्र नहीं उठाएँगे। भीष्म जानते थे कि शिखंडी पूर्वजन्म में अम्बा थी और इसी कारण वे उसे स्त्री स्वरूप मानते थे।

युद्ध के दसवें दिन अर्जुन ने शिखंडी को अपने रथ के आगे खड़ा कर लिया। जैसे ही भीष्म ने शिखंडी को देखा, उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्र त्याग दिए और शांत भाव से खड़े हो गए।

उसी क्षण अर्जुन ने भारी वेदना के साथ अपने बाणों की वर्षा प्रारंभ की। शिखंडी भी लगातार बाण चला रहा था। देखते ही देखते भीष्म पितामह का पूरा शरीर बाणों से ढक गया। उनके शरीर में इतने बाण धँस चुके थे कि वे भूमि पर नहीं गिरे, बल्कि उन्हीं बाणों की शय्या पर टिक गए। यह दृश्य देखकर दोनों सेनाएँ स्तब्ध रह गईं।

आकाश से देवताओं ने पुष्पवृष्टि की और महान भीष्म बाणों की शय्या पर लेटे हुए भगवान विष्णु का ध्यान करने लगे। उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था, इसलिए उन्होंने उत्तरायण आने तक अपने प्राण नहीं त्यागे। उनके पतन से कौरव सेना का मनोबल टूट गया और दुर्योधन गहरे शोक में डूब गया।

भीष्म के बाद आचार्य द्रोणाचार्य को कौरव सेना का सेनापति बनाया गया। दूसरी ओर पाण्डव सेना का नेतृत्व धृष्टद्युम्न को सौंपा गया। द्रोणाचार्य युद्धभूमि में काल के समान प्रतीत होते थे। उनके दिव्य अस्त्रों और अद्भुत युद्धकौशल के सामने पाण्डव सेना भयभीत हो उठी। उन्होंने असंख्य योद्धाओं का वध कर दिया और युद्ध का रुख फिर से कौरवों की ओर मोड़ दिया।

युद्ध के तेरहवें दिन द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को बंदी बनाने के उद्देश्य से चक्रव्यूह की रचना की। यह एक अत्यंत जटिल और घातक युद्धरचना थी, जिसे भेदना बहुत कठिन माना जाता था। पाण्डव पक्ष में केवल अर्जुन और श्रीकृष्ण ही इसे पूरी तरह भेदना जानते थे।

किन्तु उस दिन अर्जुन को त्रिगर्त नरेश युद्ध करते-करते युद्धभूमि से बहुत दूर ले गए थे। ऐसी स्थिति में अर्जुन पुत्र अभिमन्यु ने आगे बढ़कर चक्रव्यूह में प्रवेश करने का निर्णय लिया। उसे केवल चक्रव्यूह में प्रवेश करना आता था, बाहर निकलना नहीं। यह ज्ञान उसने तब सुना था जब वह अपनी माता सुभद्रा के गर्भ में था और अर्जुन उन्हें यह विधि समझा रहे थे।

अभिमन्यु ने निडर होकर चक्रव्यूह को भेद दिया, लेकिन उसके पीछे आने वाले पाण्डवों को सिंधु नरेश जयद्रथ ने रोक लिया। परिणामस्वरूप अभिमन्यु अकेला ही कौरव सेना के बीच फँस गया। फिर भी उसने अद्भुत वीरता दिखाई और अकेले ही अनेक महारथियों को परास्त कर दिया।

अभिमन्यु के पराक्रम से दुर्योधन, कर्ण और द्रोणाचार्य तक विचलित हो उठे। तब उन्होंने युद्ध के नियमों को तोड़ते हुए सामूहिक रूप से उस पर आक्रमण करने का निर्णय लिया। कर्ण ने उसके धनुष को तोड़ दिया, उसके रथ को नष्ट कर दिया और अभिमन्यु को निहत्था कर दिया। इसके बाद अनेक महारथियों ने मिलकर उस अकेले वीर पर हमला किया।

अभिमन्यु ने रथ का पहिया उठाकर भी युद्ध किया, लेकिन अंततः वह वीरगति को प्राप्त हुआ। उसकी मृत्यु ने पाण्डवों के हृदय को शोक और क्रोध से भर दिया। जब अर्जुन को यह समाचार मिला कि जयद्रथ ने पाण्डवों को रोककर अभिमन्यु को अकेला पड़ने दिया, तब उन्होंने प्रतिज्ञा की कि अगले दिन सूर्यास्त से पहले वे जयद्रथ का वध करेंगे, अन्यथा अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राण त्याग देंगे।

चौदहवें दिन का युद्ध अत्यंत भयंकर हुआ। अर्जुन जयद्रथ तक पहुँचने के लिए पूरी शक्ति से लड़ रहे थे। दूसरी ओर भीमपुत्र घटोत्कच रात के समय अपने मायावी युद्धकौशल से कौरव सेना में विनाश मचा रहा था। क्योंकि वह राक्षस कुल से था, इसलिए रात्रि में उसकी शक्ति कई गुना बढ़ जाती थी।

उसकी मायाओं और आक्रमणों से कौरव सेना भयभीत होकर भागने लगी। दुर्योधन समझ गया कि यदि घटोत्कच को तुरंत नहीं रोका गया, तो पूरी कौरव सेना उसी रात समाप्त हो जाएगी। तब उसने कर्ण से उसे रोकने की प्रार्थना की।

कर्ण के पास इंद्रदेव द्वारा दिया गया दिव्य “शक्ति अस्त्र” था, जिसका प्रयोग केवल एक बार किया जा सकता था। कर्ण ने यह अस्त्र अर्जुन के लिए सुरक्षित रखा था, लेकिन परिस्थिति ऐसी बन गई कि उसे विवश होकर वही अस्त्र घटोत्कच पर चलाना पड़ा। शक्ति अस्त्र वज्र की भाँति गया और घटोत्कच के विशाल शरीर को भेद गया। मरते समय घटोत्कच ने अपना शरीर अत्यंत विशाल कर लिया और गिरते हुए उसने हजारों कौरव सैनिकों को अपने नीचे कुचल दिया।

उसकी मृत्यु पर पाण्डव शोक में डूब गए, लेकिन श्रीकृष्ण प्रसन्न दिखाई दिए। उन्होंने कहा कि आज अर्जुन का सबसे बड़ा संकट टल गया, क्योंकि अब कर्ण के पास वह दिव्य अस्त्र नहीं बचा था जिससे वह अर्जुन का वध कर सकता था।

इसके बाद द्रोणाचार्य पुनः भयंकर रूप धारण कर युद्ध करने लगे। उनके सामने कोई भी टिक नहीं पा रहा था। तब श्रीकृष्ण ने समझ लिया कि जब तक द्रोणाचार्य के हाथ में अस्त्र हैं, तब तक उन्हें हराना असंभव है।

योजना बनाई गई कि किसी प्रकार उनका मन युद्ध से हटाया जाए। उसी समय भीमसेन ने “अश्वत्थामा” नामक एक हाथी को मार डाला और जोर से घोषणा कर दी कि अश्वत्थामा मारा गया। यह सुनकर द्रोणाचार्य व्याकुल हो उठे। उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिर से सत्य जानना चाहा, क्योंकि वे जानते थे कि युधिष्ठिर कभी असत्य नहीं बोलते।

युधिष्ठिर ने धीमे स्वर में कहा—“अश्वत्थामा मारा गया…”, और उसके बाद बहुत धीरे से बोले—“किन्तु वह हाथी था।” लेकिन द्रोणाचार्य केवल पहली बात ही सुन सके। पुत्र के मारे जाने के शोक में उनका हृदय टूट गया। उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्र त्याग दिए और ध्यानमग्न होकर रथ में बैठ गए। उसी अवसर का लाभ उठाकर धृष्टद्युम्न ने उन पर आक्रमण कर दिया।

द्रोणाचार्य युद्धभूमि में गिर पड़े और इस प्रकार महाभारत के सबसे महान गुरुओं में से एक का अंत हुआ। उनके पतन के साथ ही कुरुक्षेत्र का युद्ध और भी अधिक विनाशकारी तथा निर्णायक हो गया।

महाभारत के शांति दूत श्रीकृष्ण

जब पाण्डवों का वनवास और अज्ञातवास समाप्त हो गया, तब धर्मराज युधिष्ठिर ने आशा की कि अब कौरव न्यायपूर्वक उनका राज्य लौटा देंगे। किन्तु दुर्योधन के मन में अहंकार और द्वेष इतना बढ़ चुका था कि वह किसी भी परिस्थिति में पाण्डवों को उनका अधिकार देना नहीं चाहता था। उधर पाण्डव भी अब अन्याय सहते-सहते थक चुके थे।

उन्होंने अपनी सात अक्षौहिणी सेना एकत्र कर ली थी, जबकि दुर्योधन के पास ग्यारह अक्षौहिणी विशाल सेना थी। सम्पूर्ण आर्यावर्त के राजा दो पक्षों में बँट चुके थे। चारों ओर युद्ध की तैयारी होने लगी, लेकिन धर्मराज युधिष्ठिर अभी भी रक्तपात नहीं चाहते थे। वे अंतिम क्षण तक शांति स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे।

इसी उद्देश्य से भगवान श्रीकृष्ण स्वयं शांति दूत बनकर हस्तिनापुर पहुँचे। वे जानते थे कि युद्ध होने पर असंख्य वीरों और निर्दोष लोगों का विनाश होगा, फिर भी वे धर्म की रक्षा के लिए अंतिम बार समझौते का मार्ग अपनाना चाहते थे। राजसभा में पहुँचकर उन्होंने दुर्योधन को समझाया कि पाण्डवों का राज्य लौटाना ही उचित है।

उन्होंने कहा कि यदि आधा राज्य देना कठिन लगता है, तो कम से कम पाँच गाँव ही दे दो ताकि पाण्डव सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकें। श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को यह भी चेतावनी दी कि यदि उसने अन्याय का मार्ग नहीं छोड़ा, तो महाविनाश निश्चित है। सभा में उपस्थित भीष्म, द्रोण, विदुर और धृतराष्ट्र भी भीतर ही भीतर श्रीकृष्ण की बात को उचित मान रहे थे।

किन्तु दुर्योधन का हृदय अहंकार से अंधा हो चुका था। उसने क्रोध में भरकर कहा कि वह पाण्डवों को सुई की नोक के बराबर भूमि भी नहीं देगा। वह केवल युद्ध चाहता था। इतना ही नहीं, उसने मूर्खतावश भगवान श्रीकृष्ण को बंदी बनाने का विचार भी कर लिया। जैसे ही उसके सैनिक श्रीकृष्ण की ओर बढ़े, उसी क्षण भगवान ने अपना विराट विश्वरूप प्रकट कर दिया।

सभा भवन दिव्य प्रकाश से भर उठा। सभी ने देखा कि श्रीकृष्ण के शरीर में संपूर्ण ब्रह्मांड समाया हुआ है। देवता, ग्रह, नक्षत्र, अग्नि, वायु और समस्त लोक उनके भीतर दिखाई देने लगे। यह अद्भुत दृश्य देखकर सभा में उपस्थित सभी लोग भय और विस्मय से काँप उठे, किन्तु दुर्योधन का अहंकार तब भी समाप्त नहीं हुआ।
राजसभा से निकलने के बाद भगवान श्रीकृष्ण विदुर के घर गए। विदुर भगवान के परम भक्त थे।

उन्होंने बड़े प्रेम और भक्ति से श्रीकृष्ण का स्वागत किया। कहते हैं कि विदुरानी भगवान के प्रेम में इतनी मग्न हो गईं कि केले छीलकर छिलके ही श्रीकृष्ण को खिलाने लगीं और भगवान प्रेमवश उन्हें भी प्रसाद की तरह ग्रहण करते रहे। वहाँ श्रीकृष्ण ने कुछ समय विश्राम किया और फिर पाण्डवों के पास लौट आए। उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा कि अब शांति का कोई मार्ग शेष नहीं है और दुर्योधन केवल युद्ध की भाषा समझता है। इसलिए धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करना ही एकमात्र उपाय है।

इसके बाद दोनों पक्षों की विशाल सेनाएँ कुरुक्षेत्र के मैदान में एकत्र हुईं। शंख, नगाड़ों और रणभेरियों की ध्वनि से पूरा आकाश गूँज उठा। एक ओर कौरवों की विशाल सेना थी, जिसका नेतृत्व भीष्म पितामह कर रहे थे, और दूसरी ओर पाण्डव सेना थी, जिसके प्रमुख योद्धा अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव और धृष्टद्युम्न थे।

युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले अर्जुन ने जब अपने ही गुरुजनों, पितामहों, भाइयों और संबंधियों को सामने खड़ा देखा, तब उनका हृदय दया और मोह से भर गया। उन्होंने अपना गांडीव धनुष नीचे रख दिया और श्रीकृष्ण से कहा कि वे अपने ही परिवार का विनाश करके राज्य प्राप्त नहीं करना चाहते।

अर्जुन की यह स्थिति देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन और धर्म का महान उपदेश दिया, जिसे आज संसार “श्रीमद्भगवद्गीता” के नाम से जानता है। श्रीकृष्ण ने कहा कि यह शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा अमर और अविनाशी है। मनुष्य केवल शरीर को मार सकता है, आत्मा को नहीं। उन्होंने अर्जुन को समझाया कि एक क्षत्रिय का धर्म अन्याय के विरुद्ध युद्ध करना है।

यदि वह अपने धर्म से पीछे हटेगा, तो उसे अपयश और अधर्म प्राप्त होगा। श्रीकृष्ण ने कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग का उपदेश देते हुए अर्जुन से कहा कि फल की चिंता छोड़कर केवल अपना कर्तव्य करो। विजय और पराजय दोनों में समान भाव रखो।

भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य उपदेश से अर्जुन का मोह नष्ट हो गया। उन्होंने पुनः अपना गांडीव उठाया और युद्ध के लिए तैयार हो गए। इसके बाद दोनों सेनाओं ने शंखनाद किया। श्रीकृष्ण का “पाञ्चजन्य” और अर्जुन का “देवदत्त” शंख पूरे कुरुक्षेत्र में गूँज उठा। पितामह भीष्म ने भी सिंहनाद करते हुए अपना शंख बजाया और उसी के साथ महाभारत का महान युद्ध आरंभ हो गया। दोनों ओर से बाणों की वर्षा होने लगी। हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सै

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महाभारत भारतीय संस्कृति का महान महाकाव्य है। इसमें कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध, धर्म-अधर्म, सत्य, कर्तव्य और मानव जीवन के मूल्यों का वर्णन किया गया है। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित यह ग्रंथ भारतीय इतिहास, दर्शन और नैतिक शिक्षा का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।

 लेखक / मूल रचनाकार: वेद व्यास
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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