अधूरी रागिनी

अधूरी रागिनी: दर्दभरा ब्रेकअप

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अधूरी रागिनी Part-1

बनारस के घाटों पर सुबह की पहली किरण जब गंगा के पानी को सोने जैसा चमकाती है, तो ऐसा लगता है जैसे समय वहीं ठहर गया हो। अस्सी घाट की सीढ़ियों पर बैठा शिव अपनी धुन में मग्न होकर बांसुरी बजा रहा था। उसकी बांसुरी की धुन में वह दर्द था, जो शायद खुद गंगा भी महसूस कर रही थी।

उसी समय वहां गौरी आई, जिसके कदमों की आहट ने शिव की लय बिगाड़ दी थी। गौरी बनारस के एक पुराने घराने की बेटी थी, जिसकी आंखों में एक अजीब सी चमक और चेहरे पर भोलापन था। शिव के लिए गौरी का आना किसी प्रार्थना के पूरा होने जैसा था, लेकिन उसे क्या पता था कि यही प्रार्थना उसकी बर्बादी का कारण बनेगी।

दोनों की मुलाकात एक शाम गंगा आरती के दौरान हुई थी, जहां भीड़ में शिव ने गौरी का हाथ थाम लिया था। वह पहला स्पर्श था जिसने दोनों की रूहों को एक-दूसरे से जोड़ दिया था। बनारस की गलियों में घूमते हुए, चाय की थड़ियों पर बैठकर घंटों बातें करना ही उनकी दुनिया थी। शिव, जो एक साधारण चित्रकार था, अपनी हर पेंटिंग में गौरी की आंखों को उकेरता था। गौरी भी शिव के बिना अपने अस्तित्व की कल्पना नहीं कर पाती थी। लेकिन कहते हैं न कि प्यार की उम्र अक्सर तकदीर की लकीरों से छोटी होती है, और वही हुआ।

कुछ समय बाद, गौरी को अपने आगे की पढ़ाई के लिए मुंबई जाना पड़ा। शिव ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की, क्योंकि वह गौरी के सपनों को अपने प्यार से ज्यादा महत्व देता था। मुंबई की चकाचौंध में गौरी बदल रही थी, या शायद उसकी दुनिया ही ऐसी थी जहाँ भावनाओं से ज्यादा दिखावे की अहमियत थी। वहां गौरी की मुलाकात आशुतोष से हुई, जो एक अमीर बिजनेस परिवार का इकलौता वारिस था। आशुतोष की पर्सनालिटी में एक ऐसा चुंबक था जो किसी भी लड़की को अपनी ओर आकर्षित कर सकता था। गौरी के जीवन में अब दो लोग थे, एक तरफ शिव की रूहानी यादें और दूसरी तरफ आशुतोष का भौतिक सुख।

मुंबई के मरीन ड्राइव पर एक शाम आशुतोष ने गौरी से अपने दिल की बात कह दी थी। आशुतोष का प्यार शिव जैसा नहीं था; वह थोड़ा जिद्दी था, थोड़ा अधिकार जमाने वाला था। गौरी, जो मुंबई की रफ्तार में खुद को खो रही थी, आशुतोष के प्रभाव में आने लगी। उधर बनारस में शिव को इस बात का आभास होने लगा था कि अब फोन पर होने वाली बातें ठंडी पड़ने लगी हैं। गौरी के जवाब छोटे होने लगे थे और उसकी आवाज़ में वह अपनापन नहीं था जो कभी हुआ करता था। शिव ने कई बार मुंबई जाने का सोचा, लेकिन उसके पास इतने पैसे नहीं थे कि वह इस दूरी को मिटा सके।

गौरी के जीवन में यह दोहराव उसे अंदर से तोड़ रहा था, क्योंकि वह न तो शिव को खोना चाहती थी और न ही आशुतोष की चकाचौंध से दूर हो सकती थी। एक दिन शिव ने हिम्मत जुटाई और अपनी जमा-पूंजी लगाकर मुंबई पहुंच गया। जब उसने गौरी को आशुतोष के साथ एक कैफे में हंसते-खेलते देखा, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। शिव के लिए वह दृश्य किसी बुरे सपने से कम नहीं था, जिसे वह अपनी आँखों से देख रहा था। गौरी ने जब शिव को देखा, तो उसके चेहरे पर शर्मिंदगी के बजाय एक घबराहट थी, मानो वह पकड़ी गई हो।

उस दिन बारिश हो रही थी, मरीन ड्राइव की लहरें बहुत ऊंची उठ रही थीं, ठीक वैसे ही जैसे शिव के अंदर उठ रहा तूफान। शिव ने गौरी से पूछा कि क्या ये सब सच है, तो गौरी ने अपनी नज़रें चुराते हुए बस चुप्पी साध ली। उस चुप्पी ने शिव के दिल के हर उस वादे को तोड़ दिया जो उन्होंने बनारस के घाटों पर किया था। आशुतोष वहां खड़ा मुस्कुरा रहा था, जैसे वह इस जीत को पहले से ही जानता हो। शिव वहां से बिना एक शब्द बोले चला आया, लेकिन उसकी आत्मा का एक बड़ा हिस्सा वहीं उन लहरों में बह गया था।

अधूरी रागिनी Part- 2

अधूरी रागिनी

शिव वापस बनारस लौट आया, लेकिन वह शिव अब वैसा नहीं रहा था। उसकी आंखों की चमक खो गई थी, और बांसुरी की धुन अब केवल विरह के गीत सुनाती थी। उसने पेंटिंग बनाना छोड़ दिया था, क्योंकि अब उसके पास कोई विषय ही नहीं बचा था जो उसे प्रेरणा दे सके। गौरी की यादें उसके कमरे की दीवारों पर एक साये की तरह मंडराती रहती थीं। बनारस की वही गलियां अब उसे चुभने लगी थीं, और वही गंगा का किनारा अब उसे उसकी तन्हाई की याद दिलाता था। उसने खुद को दुनिया से अलग कर लिया था, जैसे उसने अपनी खुशी का गला घोंट दिया हो।

मुंबई में गौरी की जिंदगी एक नए मोड़ पर थी, लेकिन क्या वह खुश थी? आशुतोष के साथ रहते हुए भी उसे बार-बार शिव की याद आती थी। उसे एहसास होने लगा था कि जिसे उसने ‘प्रोग्रेस’ समझा था, वह असल में एक गहरा खालीपन था। आशुतोष के साथ की गई पार्टियां और महंगी गाड़ियां अब उसे एक पिंजरे जैसा महसूस होने लगी थीं। उसने शिव को कई बार फोन करने की कोशिश की, लेकिन शिव ने अब उन रास्तों को बंद कर दिया था। गौरी को समझ आ गया था कि उसने एक कीमती हीरे को कांच के टुकड़ों के लिए खो दिया था।

आशुतोष और गौरी की सगाई की खबर जब बनारस पहुंची, तो शिव के घर वालों ने उसे एक और रिश्ता देखने के लिए मजबूर किया। शिव ने बिना किसी विरोध के हामी भर दी, क्योंकि अब उसके अंदर कोई भावना नहीं बची थी। उसे लगा कि जीवन का अंत तो उसी दिन हो गया था जब गौरी ने मुंबई में उसे अकेला छोड़ा था। पार्वती, जो एक सादगी भरी लड़की थी और शिव के माता-पिता की पसंद थी, शिव के जीवन में प्रवेश करने वाली थी। शिव के लिए पार्वती केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी थी जिसे वह निभाना चाहता था।

दूसरी तरफ गौरी का जीवन भी अपने तार्किक निष्कर्ष की ओर बढ़ रहा था। आशुतोष की शादी की तैयारियां पूरे जोरों पर थीं, लेकिन गौरी की आंखों में अब कोई खुशी नहीं थी। उसने अपनी गलती का पछतावा करना शुरू कर दिया था, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। पश्चाताप की आग में वह रोज जलती थी, लेकिन वह वापस जाकर शिव से माफी मांगने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। उसे पता था कि उसने जो विश्वास तोड़ा था, उसे जोड़ना नामुमकिन था। उसने खुद को आशुतोष के साथ एक सुनहरे भविष्य के लिए तैयार कर लिया, जो केवल बाहर से चमकता था।

आखिरकार वह दिन आ ही गया, जो शिव के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत और पुरानी यादों का अंत था। शिव और पार्वती का विवाह बनारस के एक पुराने मंदिर में बड़ी धूमधाम से संपन्न हुआ। पार्वती ने शिव के जीवन को फिर से संवारने की कोशिश की, उसे फिर से बांसुरी उठाने के लिए प्रेरित किया। शिव ने धीरे-धीरे पार्वती के साथ एक नया रिश्ता बुनना शुरू किया, जिसमें जुनून भले ही न हो, पर गहरा सम्मान और ठहराव जरूर था। शिव को धीरे-धीरे समझ आया कि प्यार हमेशा वैसा नहीं होता जैसा हम सोचते हैं, कभी-कभी यह एक शांत समझौता भी होता है।

उसी दिन मुंबई में गौरी और आशुतोष की शादी हो रही थी। एक बहुत बड़े होटल में आयोजित उस शादी में हर तरफ दौलत की नुमाइश थी। गौरी जब दुल्हन के लिबास में तैयार होकर आई, तो उसे अपने आसपास की कोई चीज़ सुनाई नहीं दे रही थी। वह बस शिव के चेहरे को याद कर रही थी, जो बनारस की भोर में उसे देखता था। आशुतोष ने जब उसका हाथ पकड़ा, तो गौरी की आंखों से एक आंसू गिरा, जिसे उसने तुरंत पोंछ लिया। यह आंसू उस खोई हुई मासूमियत के लिए था, जिसे उसने मुंबई की दौड़ में कहीं पीछे छोड़ दिया था।

शिव और गौरी दोनों अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ चुके थे, लेकिन वे घाव अभी भी गहरे थे। शिव, जो अब पार्वती के साथ एक शांत जीवन जी रहा था, कभी-कभी गंगा किनारे बैठकर चुपचाप बैठा रहता था। वहीं गौरी, आशुतोष की पत्नी के रूप में, बड़े-बड़े आयोजनों की शान तो थी, पर अंदर से वह आज भी एक अधूरी कहानी की नायिका थी। समय ने सब कुछ बदल दिया था, लेकिन दिल के किसी कोने में दबी वह टीस आज भी बाकी थी। यह कहानी हार या जीत की नहीं थी, यह एक ऐसे सबक की थी जो प्यार के नाम पर हर कोई कभी न कभी सीखता है।

शिव को अब एहसास हो चुका था कि जिंदगी का मतलब किसी को खोकर दुखी होना नहीं, बल्कि जो मिला है उसे सहेजना है। पार्वती ने उसके जीवन के खालीपन को अपनी सादगी से भर दिया था, और वह उसका आभारी था। गौरी ने भी यह स्वीकार कर लिया था कि फैसले उसके अपने थे, और उनका परिणाम भी उसे ही भुगतना था। भले ही उन्होंने अलग-अलग रास्ते चुन लिए थे, लेकिन बनारस का वह घाट आज भी उनकी उन यादों का गवाह था जो कभी पूरी न हो सकीं। अंत में, सबकी अपनी मंजिल थी, और शायद यही उस प्रेम की नियति थी जो कभी पूरा होने के लिए नहीं बना था।

जीवन चलता रहा, और समय के साथ दर्द की तीव्रता भी कम होती गई। शिव ने अब अपने घर में बांसुरी की धुन बजाना शुरू कर दिया था, जिसे सुनकर पार्वती मुस्कुरा देती थी। गौरी ने भी अपनी नई जिंदगी को अपना लिया था, भले ही वह अधूरापन कहीं न कहीं मौजूद था। यह कहानी प्यार, विश्वासघात और अंततः स्वीकृति की थी। हर किसी का अपना सफर होता है, और हर सफर का एक अंजाम होता है। वे दो लोग, जो कभी एक-दूसरे की सांसों में बसते थे, आज दो अलग-अलग ध्रुवों पर खड़े थे, लेकिन उनकी यादें आज भी बनारस की गंगा में तैर रही थीं।

प्रतिशोध की मौन गूँज

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