अतीत का साया part-1
रुद्रपुर गाँव के बाहरी छोर पर स्थित वह पुरानी हवेली सालों से सन्नाटे की चादर ओढ़े खड़ी थी, जिसे स्थानीय लोग ‘काली कोठी’ के नाम से पुकारते थे। देवव्रत अपने जीवन के तीस साल शहर में बिताने के बाद जब वापस लौटा, तो उसके पास केवल एक धुंधली याद थी और एक पुरानी चाबी जो उसके पिता ने मरते समय उसे सौंपी थी।
हवेली की चटकती दीवारें और उन पर जमी धूल की परतें चीख-चीखकर किसी गहरे राज की गवाही दे रही थीं, जिसे वक्त ने छुपाने की पूरी कोशिश की थी। बचपन की एक धुंधली सी रात देवव्रत के जहन में हमेशा कौंधती रहती थी, जहाँ उसने एक औरत की चीख और खून से सने कुछ सफेद कपड़े देखे थे। उसने तय कर लिया था कि वह इस हवेली के बंद दरवाजों के पीछे छिपे सत्य को ढूंढकर ही दम लेगा, चाहे परिणाम कुछ भी हो।
हवेली के मुख्य द्वार को खोलते ही एक अजीब सी ठंडी हवा का झोंका देवव्रत के चेहरे से टकराया, जिसमें सूखी पत्तियों और सड़न की गंध घुली हुई थी। उसने अपने हाथ में पकड़ी टॉर्च की रोशनी को चारों तरफ घुमाया, जहाँ पुराने ज़माने के आलीशान मगर अब सड़ चुके फर्नीचर बिखरे पड़े थे।
दीवारों पर टंगे हुए उसके पूर्वजों के तैलचित्र ऐसे लग रहे थे मानो वे अपनी मूक आँखों से देवव्रत की हर हरकत पर कड़ी नज़र रख रहे हों। उसने जैसे ही दीवानखाने की तरफ कदम बढ़ाया, उसे फर्श के नीचे से किसी के चलने की आहट सुनाई दी, जिससे उसके रोंगटे खड़े हो गए। उसने खुद को समझाया कि यह केवल उसका वहम है या शायद कोई जंगली जानवर, लेकिन दिल की धड़कनें कुछ और ही कह रही थीं।
इस कोठी के बारे में गाँव के बुजुर्ग तरह-तरह की बातें करते थे, जिन्हें बचपन में देवव्रत हमेशा मनगढ़ंत कहानियाँ समझकर टाल दिया करता था। कोई कहता था कि यहाँ की मिट्टी में ही कोई प्राचीन श्राप घुला हुआ है, तो कोई इसे किसी भयानक पारिवारिक कत्लगाह के रूप में देखता था।
देवव्रत के पिता राघवेंद्र सिंह ने मरते दम तक कभी इस हवेली का जिक्र दोबारा नहीं किया था, मानो वे इसके नाम से ही थर-थर कांपते हों। उन्होंने शहर में एक साधारण जीवन बिताया, लेकिन उनके चेहरे पर हमेशा एक अनजाना खौफ और गहरा पछतावा साफ झलकता रहता था। अब जब वे इस दुनिया में नहीं थे, तो देवव्रत को लगा कि उस पछतावे की वजह जानना उसका सबसे पहला और सबसे जरूरी कर्तव्य है।
हवेली के भीतर कदम-दर-कदम बढ़ते हुए देवव्रत को ऐसा महसूस हो रहा था मानो समय कई दशक पीछे ठहर गया हो। हवा में एक अजीब सा भारीपन था जो फेफड़ों में चुभता था, और हर कोने से पुरानी इमारतों की विशिष्ट सीलन भरी महक आ रही थी। उसने देखा कि खिड़कियों के भारी मखमली परदे अब सड़कर चीथड़े हो चुके थे और फर्श पर कांच के टुकड़े बिखरे पड़े थे। धूल की मोटी परत पर उसके अपने जूतों के निशान बनते जा रहे थे, जो इस बात का सबूत थे कि यहाँ सालों से कोई नहीं आया था। उसने अपने मोबाइल का नेटवर्क चेक किया तो पाया कि सिग्नल पूरी तरह गायब हो चुके थे, जिससे उसका बाहरी दुनिया से संपर्क कट गया था।
हवेली के विशाल पुस्तकालय में पहुँचकर देवव्रत ने उन अलमारियों को खंगालना शुरू किया, जो बरसों से छुई नहीं गई थीं। किताबों के बीच उसे एक चमड़े की जिल्द वाली पुरानी डायरी मिली, जिसके पन्ने पीले पड़ चुके थे और उन पर उसके पिता के हस्ताक्षर थे। डायरी के शुरुआती पन्नों में केवल व्यापार और सामान्य पारिवारिक बातों का ज़िक्र था, लेकिन जैसे-जैसे वह आगे बढ़ा, शब्दों का लहजा बदलता गया।
आखिरी पन्नों में लिखी बातें किसी गहरे अपराधबोध और खौफ से भरी थीं, जिनमें बार-बार ‘उस रात की भूल’ और ‘तहखाने का सच’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया था। देवव्रत का हाथ कांपने लगा जब उसने पढ़ा कि परिवार की प्रतिष्ठा को बचाने के लिए एक मासूम की बलि दी गई थी।
डायरी के पन्नों को पलटते हुए देवव्रत की नजर एक ऐसी तारीख पर पड़ी जो उसके अपने जन्मदिन से ठीक एक दिन पहले की थी। उस पन्ने पर लिखावट बहुत ही अव्यवस्थित और डरावनी थी, मानो लिखते समय उसके पिता के हाथ बुरी तरह कांप रहे हों।
वहाँ लिखा था कि भगवान हमें कभी माफ नहीं करेंगे, हमने अपनी ही कोख से जनम लेने वाले सत्य को हमेशा के लिए दफन कर दिया। इन रहस्यमयी पंक्तियों ने देवव्रत के मन में एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर दी, जो अब धीरे-धीरे एक खौफनाक हकीकत का रूप ले रही थी। वह सोचने पर मजबूर हो गया कि क्या उसका जन्म ही किसी ऐसे घिनौने सच को छुपाने के लिए हुआ था जिसे दुनिया से ओझल रखना था।
पुस्तकालय की एक बड़ी अलमारी के पीछे छुपा हुआ एक गुप्त रास्ता था, जिसके बारे में डायरी के पन्नों में धुंधला सा संकेत दिया गया था। देवव्रत ने पूरी ताकत लगाकर उस भारी अलमारी को एक तरफ खिसकाया, जिससे हवेली की पूरी फर्श पर एक तेज चरचराहट की आवाज गूंज उठी।
अलमारी के हटते ही दीवार में एक संकरा और घुमावदार रास्ता दिखाई दिया जो सीधे नीचे की तरफ जाता हुआ प्रतीत होता था। उस रास्ते से आने वाली हवा इतनी ठंडी और बदबूदार थी कि देवव्रत को एक पल के लिए उल्टी आने का अहसास हुआ। उसने अपनी टॉर्च को मजबूती से पकड़ा और उस अंधेरी सुरंगनुमा रास्ते में कदम रखने के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार किया।
डायरी में छिपे संकेतों का पीछा करते हुए देवव्रत उस गलियारे की तरफ बढ़ा जो हवेली के सबसे पिछले हिस्से में जाता था। वहाँ एक भारी लोहे का दरवाजा था, जिस पर जंग लग चुकी थी और वही चाबी उसमें पूरी तरह फिट बैठ गई जो उसके पिता ने उसे दी थी। दरवाजा खुलते ही नीचे की ओर जाती हुई सीढ़ियाँ दिखाई दीं, जो पूरी तरह से घने अनदेखे अंधेरे में डूबी हुई थीं और वहाँ से अजीब सी गंध आ रही थी।
जैसे-जैसे वह नीचे उतर रहा था, वातावरण में भारीपन और ठंडक बढ़ती जा रही थी, मानो वह किसी दूसरी ही दुनिया में प्रवेश कर रहा हो। नीचे पहुँचकर टॉर्च की रोशनी में जो कुछ दिखा, उसने देवव्रत के पैरों तले से जमीन ही खिसका दी, क्योंकि वहाँ एक पूरा कमरा जंजीरों और पुराने बर्तनों से भरा था।
तहखाने की दीवारों पर कुछ अजीब से काले धब्बे थे, जो पहली ही नजर में सूखे हुए खून के निशान प्रतीत हो रहे थे। कमरे के एक कोने में लकड़ी की एक पुरानी आरामकुर्सी टूटी हुई हालत में पड़ी थी, जिसके चारों तरफ लोहे की भारी जंजीरें बिखरी हुई थीं। ऐसा लगता था कि किसी को यहाँ बहुत लंबे समय तक जबरदस्ती बांधकर रखा गया था, जिसने तड़प-तड़पकर दम तोड़ा होगा।
देवव्रत ने उन जंजीरों को छूकर देखा, तो वे बर्फ की तरह ठंडी थीं और उन्हें छूते ही उसके कानों में एक मंद सिसकी सुनाई दी। उसने घबराकर चारों तरफ देखा, लेकिन वहाँ केवल उसकी अपनी परछाई ही थी जो दीवार पर किसी दैत्य की तरह नाच रही थी।
कमरे के बीचों-बीच एक बड़ा सा संदूक रखा था, जिस पर अजीबोगरीब तांत्रिक प्रतीक बने हुए थे और उसे भारी तालों से जकड़ा गया था। देवव्रत ने पास पड़े एक लोहे के सरिये से उन तालों को तोड़ने की कोशिश शुरू की, और हर चोट के साथ हवेली की दीवारें गूँज उठती थीं।
जब आखिरी ताला टूटा और उसने संदूक का ढक्कन उठाया, तो उसके भीतर कुछ पुरानी तस्वीरें, खून से सने कपड़े और एक नवजात शिशु के कंकाल के अवशेष थे। तस्वीरों में उसके पिता के साथ एक अजनबी महिला मुस्कुरा रही थी, जिसके चेहरे पर देवव्रत को अपनी ही झलक दिखाई दे रही थी। वह स्तब्ध रह गया क्योंकि उसने हमेशा अपनी माँ के रूप में जिस महिला को जाना था, वह तस्वीर में मौजूद औरत से बिलकुल अलग थी।
तस्वीरों के पीछे कुछ नाम और तारीखें लिखी हुई थीं, जिन्हें पढ़कर देवव्रत के दिमाग का हर एक कोना सन्न रह गया। उस अजनबी महिला का नाम मंदाकिनी लिखा था, और उसके नीचे लिखा था ‘मेरी एकमात्र सच्ची पत्नी और मेरी आत्मा’। यह खोज देवव्रत के लिए किसी वज्रपात से कम नहीं थी, क्योंकि उसकी सौतेली माँ जिसे वह अपनी सगी माँ समझता था, उसका नाम सुलक्षणा था।
इसका मतलब यह था कि उसके पिता ने न केवल अपनी पहली पत्नी को दुनिया से छुपाया था, बल्कि उसके साथ कुछ ऐसा किया था जो कानून और इंसानियत दोनों की नजर में महापाप था। संदूक में रखे बच्चे के कंकाल को देखकर उसका दिल बुरी तरह बैठ गया, और वह सोचने लगा कि यह बच्चा कौन था।
भाग १ का अंत यहाँ एक ऐसे मोड़ पर होता है जहाँ देवव्रत को अहसास होता है कि उसका पूरा अस्तित्व ही एक फरेब की बुनियाद पर खड़ा है। वह जिस परिवार को बेहद सम्मानित और संस्कारी समझता आया था, उसकी जड़ें किसी घिनौने अपराध और धोखे के दलदल में धंसी हुई थीं। संदूक से मिली उन चीज़ों ने उसके दिमाग में सवालों का एक ऐसा बवंडर खड़ा कर दिया था, जिसका जवाब ढूंढना अब उसके जीवन का एकमात्र मकसद बन गया था। वह आधी रात को उसी अंधेरे तहखाने में बैठकर उन पुरानी तस्वीरों को निहार रहा था, और तभी उसे अपने पीछे किसी की सांसों की गर्म आहट महसूस हुई।
अतीत का साया part-2

देवव्रत ने झटके से पीछे मुड़कर देखा, लेकिन वहाँ टॉर्च की मद्धम रोशनी के सिवाय और कुछ भी नहीं था, सिर्फ परछाइयों का एक भयावह खेल चल रहा था। उसने संदूक से मिली उस डायरी के छूटे हुए पन्नों को दोबारा खोजना शुरू किया, जो संदूक के सबसे निचले हिस्से में एक गुप्त दराज के अंदर छुपाकर रखे गए थे। उन पन्नों को पढ़ते ही देवव्रत के सामने तीस साल पहले का वह खौफनाक मंजर जीवंत हो उठा, जिसे उसके अपनों ने मिलकर दफन कर दिया था।
डायरी के अनुसार, तस्वीर में दिख रही महिला उसकी असली माँ ‘मंदाकिनी’ थी, जो उस हवेली में एक दासी के रूप में आई थी लेकिन देवव्रत के पिता उससे गुप्त रूप से प्रेम कर बैठे थे। जब मंदाकिनी गर्भवती हुई, तो समाज और कुल की झूठी प्रतिष्ठा के नाम पर पूरे परिवार ने मिलकर एक ऐसी साजिश रची जिसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया।
देवव्रत के दादा और पिता ने मंदाकिनी को इसी तहखाने में कैद कर दिया था ताकि दुनिया को इस नाजायज रिश्ते की भनक न लग सके। डायरी में आगे लिखा था कि मंदाकिनी ने दो जुड़वां बच्चों को जन्म दिया था, जिनमें से एक देवव्रत था और दूसरा उसका जुड़वां भाई।
जन्म के तुरंत बाद, देवव्रत को उसकी सौतेली माँ को सौंप दिया गया, जिसने कभी कोई संतान पैदा नहीं की थी, ताकि वंश का नाम चल सके। लेकिन मंदाकिनी और उस दूसरे बच्चे का क्या हुआ, यह सोचकर ही देवव्रत की रूह कांप उठी क्योंकि संदूक में मिला कंकाल किसी नवजात का ही था। डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था कि मंदाकिनी को पागल घोषित करके उसे जिंदा ही दीवार में चुनवा दिया गया था ताकि राज कभी बाहर न आए।
इस भयानक सत्य को জানার के बाद देवव्रत के भीतर का सारा संसार बिखर गया, और वह गुस्से तथा ग्लानि से चीखने लगा। तभी अचानक तहखाने का भारी लोहे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया और पूरी हवेली में एक अजीब सी गूंज सुनाई देने लगी, जैसे कोई सिसकियाँ ले रहा हो।
फर्श पर बिखरी हुई धूल अचानक उड़ने लगी और टॉर्च की रोशनी तेजी से टिमटिमाते हुए पूरी तरह से बुझ गई, जिससे वहाँ घना अंधेरा छा गया। अंधेरे में देवव्रत को महसूस हुआ कि कोई अदृश्य शक्ति उसे दीवारों की तरफ धकेल रही है, जहाँ पुरानी ईंटें कमजोर हो चुकी थीं। उसने डर के मारे अपने हाथ पैर चलाए, लेकिन तभी उसका हाथ दीवार के एक खोखले हिस्से में धंस गया, जहाँ से सूखी हड्डियाँ बाहर गिर पड़ीं।
दीवार से गिरी उन हड्डियों को देखकर देवव्रत की आंखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा, क्योंकि वह समझ गया था कि यह उसकी अभागी माँ का ही पार्थिव अवशेष था। उसने उस अंधेरे में अपनी उंगलियों से उन हड्डियों को छुआ और महसूस किया कि वे आज भी कितनी ठंडी और सूनी थीं।
उसकी माँ को न केवल अपनी संतानों से दूर किया गया, बल्कि उसे इस काल कोठरी में भूखा-प्यासा तड़पने के लिए छोड़ दिया गया था। देवव्रत का दिल अपने ही पिता और पूर्वजों के प्रति तीव्र नफरत से भर गया, जिन्होंने अपने नाम की खातिर दो जिंदगियों को बेरहमी से कुचल दिया था। वह उसी अंधेरे में घुटनों के बल बैठ गया और अपनी माँ की आत्मा से इस अनजाने पाप के लिए क्षमा याचना करने लगा।
तभी अचानक तहखाने का तापमान शून्य से भी नीचे गिरता हुआ महसूस हुआ, और देवव्रत की सांसें हवा में सफेद धुएं की तरह जमने लगीं। दीवार के खोखले हिस्से से एक अजीब सी नीली रोशनी फूटने लगी, जिसने धीरे-धीरे एक इंसानी आकृति का रूप ले लिया। देवव्रत ने खौफ और विस्मय से देखा कि वह आकृति किसी स्त्री की नहीं, बल्कि एक छोटे बालक की थी जिसके चेहरे पर भयानक क्रोध था। वह आकृति धीरे-धीरे देवव्रत की ओर बढ़ने लगी, और उसके चलने से तहखाने की फर्श पर कौंधती हुई दरारें पड़ने लगीं। देवव्रत समझ गया कि यह उसका वह अभागा जुड़वां भाई था जिसे जन्म लेते ही इस संदूक में बंद करके मार दिया गया था ताकि कोई सबूत न बचे।
वह मंदाकिनी का ही शव था, जिसे उसके अपने ही पति और ससुर ने तड़पा-तड़पा कर मार डाला था ताकि उनका झूठा सम्मान बचा रहे। देवव्रत को समझ आ गया कि बचपन में उसने जो चीख सुनी थी, वह उसकी अपनी माँ की थी जो अपनी जान की भीख मांग रही थी। तभी अंधेरे में दो जलती हुई लाल आँखें देवव्रत के सामने प्रकट हुईं, जिनमें कोई ममता नहीं बल्कि बरसों का संचित प्रतिशोध और क्रोध उबल रहा था। देवव्रत ने रोते हुए माफी मांगी, क्योंकि वह उसी पापी रक्त का हिस्सा था जिसने मंदाकिनी के साथ इतनी बड़ी क्रूरता की थी। लेकिन वह साया मंदाकिनी का नहीं, बल्कि उस दूसरे जुड़वां बच्चे की अतृप्त आत्मा का था जिसे पैदा होते ही मार दिया गया था।
आत्मा की आँखें इतनी डरावनी और शून्य थीं कि देवव्रत की चीख उसके हलक में ही फंस कर रह गई। उसने भागने की कोशिश की, लेकिन उसके पैर जैसे जमीन से चिपक चुके थे और वह एक इंच भी हिलने में असमर्थ था। उस साये ने अपनी नन्हीं मगर फौलादी उंगलियों को देवव्रत के गले के चारों तरफ कसना शुरू कर दिया, जिससे उसकी श्वास नली रुंधने लगी। देवव्रत को महसूस हुआ कि उसके फेफड़े हवा के लिए तड़प रहे हैं, लेकिन उसके भीतर अब बचने की कोई इच्छा बाकी नहीं रह गई थी। वह जानता था कि इस भयंकर पाप का अंत केवल उसके अपने जीवन के अंत के साथ ही न्यायसंगत तरीके से हो सकता था।
गले पर बढ़ती हुई उस जानलेवा जकड़न के बीच देवव्रत के सामने उसके पिता के वे अंतिम शब्द बार-बार गूंज रहे थे जो उन्होंने अस्पताल के बिस्तर पर कहे थे। राघवेंद्र सिंह ने हाँफते हुए कहा था कि देवव्रत, मेरी तिजोरी की उस पुरानी चाबी को कभी मत छूना और रुद्रपुर की तरफ भूलकर भी रुख मत करना।
अब देवव्रत को समझ आ रहा था कि उनके उन शब्दों में कोई चिंता नहीं, बल्कि उस भयानक पाप के उजागर होने का डर छिपा हुआ था। वे अपनी आखिरी सांस तक उस राज को छुपाना चाहते थे, जिसे आज देवव्रत ने अपनी उत्सुकता के कारण खुद ही बेनकाब कर दिया था। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और खुद को पूरी तरह से उस भयानक न्याय के हवाले कर दिया जो उसकी नियति बन चुका था।
वह साया तेजी से देवव्रत की तरफ बढ़ा और उसके गले को अपनी बर्फीली उंगलियों से जकड़ लिया, जिससे देवव्रत का दम घुटने लगा। उसने अपनी जिंदगी की भीख नहीं मांगी, क्योंकि उसे अहसास हो चुका था कि इस भयानक पाप का अंत केवल उसके अपने विनाश के साथ ही संभव है।
जैसे ही उसकी चेतना लुप्त होने लगी, उसे अपने पिता के वे आखिरी शब्द याद आए कि ‘बेटा, रुद्रपुर कभी मत जाना, वहाँ हमारा काल रहता है’। अगले दिन सुबह जब गाँव के कुछ लोग हवेली के पास से गुजरे, तो उन्होंने मुख्य द्वार को खुला पाया और भीतर जाने का साहस किया। तहखाने में देवव्रत का निष्प्राण शरीर मंदाकिनी के कंकाल के ठीक बगल में पड़ा था, और उसके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था।
रुद्रपुर गाँव के इतिहास में काली कोठी का वह रहस्य हमेशा के लिए दफन हो गया, लेकिन अब वहाँ एक नहीं बल्कि तीन रूहों का वास था। देवव्रत की मौत के बाद हवेली को सरकार ने सील कर दिया, मगर आज भी अमावस्या की रात को वहाँ से रोने और जंजीरों के खिसकने की आवाजें आती हैं।
सत्य कभी नहीं मरता, वह बस सही समय का इंतजार करता है ताकि अपने कातिलों से उनकी अगली पीढ़ियों तक बदला ले सके। धोखा, फरेब और खून की बुनियाद पर बनाए गए महल एक न एक दिन इसी तरह श्मशान में तब्दील हो जाते हैं, जहाँ केवल सन्नाटा राज करता है। देवव्रत की कहानी इस बात का प्रमाण थी कि पूर्वजों के पापों की कीमत अक्सर मासूम औलादों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है।
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