जातक कथा

जातक कथा : छद्दन्त हाथी

10
Join WhatsApp
Join Now
Join Facebook
Join Now

जातक कथा : छद्दन्त हाथी

बहुत समय पहले हिमालय के विशाल और रहस्यमयी वनों में अनेक प्रकार के दुर्लभ जीव-जंतु निवास करते थे। उन घने जंगलों में सफेद हाथियों की दो अद्भुत प्रजातियाँ विशेष रूप से प्रसिद्ध थीं—छद्दन्त और उपोसथ। कहा जाता है कि छद्दन्त हाथियों का शरीर चंद्रमा की तरह उज्ज्वल सफेद होता था और उनके छह विशाल दाँत होते थे। उनका रूप इतना दिव्य और प्रभावशाली था कि उन्हें देखकर देवता तक आश्चर्यचकित हो उठते थे।

इन हाथियों का राजा छद्दन्तराज नाम का एक महान गजराज था। वह अत्यंत बलवान, बुद्धिमान और दयालु स्वभाव का था। उसका निवास हिमालय की एक स्वर्णिम गुफा में था, जिसे लोग कंचन गुफा कहते थे। उसके मस्तक और चरण माणिक की भाँति लाल और चमकदार थे। उसकी विशाल देह दूर से ही सूर्य के प्रकाश में चमकती थी। जंगल के सभी जीव उसका आदर करते थे और उसके न्याय तथा करुणा की प्रशंसा करते थे।

छद्दन्तराज की दो रानियाँ थीं—महासुभद्दा और चुल्लसुभद्दा। दोनों ही अत्यंत सुंदर और प्रिय थीं, किन्तु महासुभद्दा स्वभाव से शांत और विनम्र थी, जबकि चुल्लसुभद्दा थोड़ी अभिमानी और संवेदनशील थी। फिर भी छद्दन्तराज दोनों से समान प्रेम करता था।
एक दिन की बात है। वर्षा ऋतु के बाद जंगल में चारों ओर हरियाली फैली हुई थी। एक विशाल सरोवर के किनारे छद्दन्तराज अपनी दोनों रानियों और सेवकों के साथ जल-क्रीड़ा कर रहा था।

सरोवर का जल निर्मल था और उसके किनारे एक विशाल साल वृक्ष खड़ा था, जो सुंदर फूलों से लदा हुआ था। वातावरण अत्यंत आनंदमय था। हाथियों का पूरा समूह हंसी-खुशी जल में खेल रहा था। खेलते-खेलते छद्दन्तराज ने अपनी विशाल सूँड से साल वृक्ष की एक डाल को हिला दिया। संयोगवश उस डाल से झड़ते हुए सुंदर फूल और सुगंधित पराग महासुभद्दा के ऊपर आ गिरे। उसका शरीर रंग-बिरंगे फूलों से ढक गया और वह अत्यंत सुंदर दिखाई देने लगी। लेकिन उसी समय सूखी टहनियाँ, टूटे पत्ते और धूल चुल्लसुभद्दा के ऊपर गिर पड़े।

यह घटना पूरी तरह संयोग थी, किन्तु चुल्लसुभद्दा ने इसे अपमान समझ लिया। उसे लगा कि छद्दन्तराज ने जानबूझकर महासुभद्दा का सम्मान और उसका अपमान किया है। उसके मन में ईर्ष्या और क्रोध की आग भड़क उठी। वह भीतर ही भीतर अपमान से जलने लगी।

क्रोध में भरकर उसने उसी समय छद्दन्तराज और उसके महल को छोड़ दिया। छद्दन्तराज ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की। उसने अपने सेवकों को चारों दिशाओं में उसे खोजने भेजा, लेकिन चुल्लसुभद्दा कहीं नहीं मिली। समय बीतता गया, किन्तु उसका कोई समाचार प्राप्त न हुआ।

कुछ समय बाद चुल्लसुभद्दा की मृत्यु हो गई। अपने मन में भरे क्रोध और प्रतिशोध के कारण उसने अगले जन्म में मद्द देश की राजकुमारी के रूप में जन्म लिया। बड़ी होकर उसका विवाह वाराणसी के राजा से हुआ और वह वहां की पटरानी बन गई। यद्यपि उसका नया जीवन वैभव और सुखों से भरा था, फिर भी उसके मन में छद्दन्तराज के प्रति पुराना क्रोध शांत नहीं हुआ। पिछले जन्म की स्मृतियाँ और अपमान की भावना उसके हृदय में जीवित थीं।

एक दिन उसने निश्चय किया कि वह किसी भी प्रकार छद्दन्तराज से बदला लेकर रहेगी। उसने बीमारी का बहाना बनाकर राजा से कहा, “महाराज, यदि मुझे छद्दन्त हाथी के दाँत मिल जाएँ, तभी मेरा रोग दूर हो सकता है।”
राजा अपनी प्रिय रानी से अत्यंत प्रेम करता था। उसने तुरंत कुशल शिकारी निषादों की एक टोली तैयार करवाई और उनके नेता के रूप में सोनुत्तर नामक एक चतुर शिकारी को नियुक्त किया। राजा ने आदेश दिया कि किसी भी प्रकार छद्दन्तराज के दाँत लाकर रानी को दिए जाएँ।

सोनुत्तर अपने साथियों के साथ कठिन यात्रा पर निकल पड़ा। हिमालय के घने जंगलों, खतरनाक पहाड़ों और नदियों को पार करते हुए वह वर्षों तक छद्दन्तराज की खोज करता रहा। अंततः सात वर्ष, सात महीने और सात दिनों के बाद वह उस स्थान तक पहुँच गया जहाँ छद्दन्तराज निवास करता था।

सोनुत्तर ने एक गहरा गड्ढा खोदा और उसे लकड़ियों तथा पत्तों से ढक दिया। फिर वह पास की झाड़ियों में छिपकर अवसर की प्रतीक्षा करने लगा। कुछ समय बाद छद्दन्तराज वहां आया। जैसे ही वह गड्ढे के निकट पहुँचा, सोनुत्तर ने उस पर विष-बुझा बाण चला दिया। बाण उसके शरीर में गहराई तक धँस गया। पीड़ा से व्याकुल छद्दन्तराज क्रोध में भरकर उस दिशा में दौड़ा, जहाँ से बाण आया था।

जब उसने झाड़ियों में छिपे सोनुत्तर को देखा, तो वह उसे तुरंत मार सकता था। लेकिन तभी उसकी नजर सोनुत्तर के शरीर पर पड़े गेरुए वस्त्रों पर गई। सोनुत्तर ने स्वयं को बचाने के लिए संन्यासी जैसा वेश धारण किया हुआ था। छद्दन्तराज धर्म और तपस्वियों का बहुत सम्मान करता था। उसने सोचा कि यदि वह गेरुए वस्त्रधारी व्यक्ति को मार देगा, तो यह अधर्म होगा।
इसलिए उसने अपने क्रोध को रोक लिया और सोनुत्तर को जीवनदान दे दिया।

छद्दन्तराज की करुणा और महानता देखकर सोनुत्तर का हृदय बदल गया। उसकी आँखों में आँसू आ गए। वह छद्दन्तराज के चरणों में गिर पड़ा और सारी सच्चाई बता दी कि वाराणसी की रानी ने प्रतिशोधवश उसके दाँत मंगवाए हैं।
यह सुनकर भी छद्दन्तराज के मन में कोई क्रोध नहीं आया। वह शांत स्वर में बोला, “यदि मेरे दाँत किसी की इच्छा पूरी कर सकते हैं, तो उन्हें ले जाओ।”

लेकिन उसके विशाल और मजबूत दाँतों को सोनुत्तर काट नहीं पा रहा था। तब मृत्यु के निकट खड़े उस महान गजराज ने स्वयं अपनी सूँड से अपने छहों दाँत तोड़कर सोनुत्तर को सौंप दिए। उस दृश्य को देखकर पूरा वन मानो शोक में डूब गया। इतने महान और दयालु हाथी का त्याग देखकर सोनुत्तर फूट-फूटकर रोने लगा।

दाँत लेकर वह वाराणसी लौट आया और रानी के सामने उन्हें प्रस्तुत कर दिया। जैसे ही रानी ने उन दाँतों को देखा, उसके भीतर दबा हुआ पुराना प्रेम, पश्चाताप और अपराधबोध जाग उठा। उसे एहसास हुआ कि प्रतिशोध की अग्नि में उसने एक महान और निर्दोष प्राणी की मृत्यु करवा दी।

इस गहरे आघात को वह सहन न कर सकी। पछतावे और दुख से भरा उसका हृदय टूट गया और उसी क्षण उसकी मृत्यु हो गई।
इस जातक कथा से हमें शिक्षा मिलती है कि क्रोध और प्रतिशोध मनुष्य को विनाश की ओर ले जाते हैं, जबकि दया, क्षमा और त्याग सबसे महान गुण हैं। सच्चा महान वही होता है जो अपने साथ अन्याय होने पर भी करुणा और धर्म का मार्ग न छोड़े।

उल्लू का राज्याभिषेक : जातक कथा

बहुत प्राचीन समय की बात है। उस समय जंगलों, पर्वतों और नदियों के किनारे असंख्य पक्षी निवास करते थे। आकाश में उनकी मधुर चहचहाहट गूंजती रहती थी और वे स्वतंत्र जीवन व्यतीत करते थे। किन्तु समय के साथ पक्षियों के बीच यह विचार उत्पन्न हुआ कि जैसे मनुष्यों का एक राजा होता है, वैसे ही उन्हें भी अपना कोई शासक चुनना चाहिए, जो संकट के समय उनका मार्गदर्शन करे और सभी पक्षियों की रक्षा करे।

एक दिन विशाल वन के बीच एक बहुत बड़ी सभा आयोजित की गई। उस सभा में छोटे-बड़े सभी पक्षी उपस्थित हुए। हंस, मोर, तोता, मैना, गरुड़, चील, कबूतर, बगुले और अनेक प्रकार के पक्षी वहां एकत्रित हुए। सभा का वातावरण अत्यंत गंभीर था, क्योंकि सभी को अपने भावी राजा का चुनाव करना था।

सभा में सबसे पहले एक वृद्ध पक्षी खड़ा हुआ और बोला, “जैसे मनुष्यों ने एक योग्य और शक्तिशाली पुरुष को अपना राजा बनाया है, जैसे जंगल के जानवरों ने सिंह को अपना स्वामी स्वीकार किया है और जैसे मछलियां एक विशाल मत्स्य का अनुसरण करती हैं, वैसे ही हमें भी अपना एक राजा चुन लेना चाहिए।”

उसकी बात सुनकर सभी पक्षियों ने सहमति में अपने पंख फड़फड़ाए। अब प्रश्न यह था कि राजा किसे बनाया जाए।
कुछ देर विचार-विमर्श के बाद कई पक्षियों ने उल्लू का नाम प्रस्तावित किया। उनका कहना था कि उल्लू गंभीर स्वभाव का है, रात में भी देख सकता है और उसकी आंखों में एक विचित्र तेज है। धीरे-धीरे अधिकांश पक्षी उसके पक्ष में हो गए। सभा में उल्लू को राजा बनाने का प्रस्ताव भारी मतों से स्वीकार कर लिया गया।

उल्लू यह सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसके चेहरे पर गर्व और अभिमान झलकने लगा। राज्याभिषेक की तैयारी शुरू हो गई। पक्षियों ने एक सुंदर स्थान सजाया, जहां उल्लू का अभिषेक होना था। अनेक पक्षी खुशी से गीत गाने लगे और आकाश में उड़-उड़कर आनंद प्रकट करने लगे।

राज्याभिषेक की परंपरा के अनुसार तीन बार घोषणा की जानी थी कि उल्लू पक्षियों का राजा है। पहली घोषणा हुई—“उल्लू हमारा राजा है।” सभी पक्षियों ने खुशी से उसका समर्थन किया। दूसरी बार भी यही घोषणा की गई और फिर से पूरा वातावरण जयघोष से गूंज उठा।

अब तीसरी और अंतिम घोषणा होने ही वाली थी कि तभी अचानक एक कौवा तेज आवाज में काँव-काँव करता हुआ वहां आ पहुंचा। वह अब तक सभा में उपस्थित नहीं था। उसने जैसे ही उल्लू को राजसिंहासन पर बैठे देखा, वह जोर से हंस पड़ा और बोला, “तुम लोग यह कैसी भूल कर रहे हो? क्या तुम्हें सचमुच यही पक्षी राजा बनने योग्य दिखाई देता है?” सभा में सन्नाटा छा गया। सभी पक्षी कौवे की ओर देखने लगे।

कौवा आगे बोला, “राजा वह होना चाहिए जो शांत, धैर्यवान और दयालु हो। लेकिन यह उल्लू तो देखने में ही अत्यंत क्रोधी प्रतीत होता है। इसकी टेढ़ी और भयानक आंखों को देखकर ही भय उत्पन्न होता है। इसकी केवल एक क्रोधित दृष्टि से ही लोग ऐसे कांपने लगेंगे जैसे गर्म हांडी में पड़े तिल फूटने लगते हैं। यदि ऐसा क्रोधी पक्षी राजा बन गया, तो हम सबका क्या होगा?”

कौवे की बात सुनकर सभा में हलचल मच गई। कुछ पक्षी सोच में पड़ गए। उन्हें लगा कि कौवे की बात में सच्चाई हो सकती है।
लेकिन कौवे की आलोचना सुनकर उल्लू का क्रोध भड़क उठा। वह अपने गुस्से को नियंत्रित नहीं कर सका। उसकी आंखें लाल हो गईं और वह क्रोध में जोर से चीखा। अगले ही क्षण वह कौवे को मारने के लिए उस पर झपट पड़ा। कौवा तुरंत उड़ गया और उल्लू उसके पीछे-पीछे क्रोध में पागलों की तरह उड़ने लगा। दोनों आकाश में दूर तक उड़ते रहे। सभा में उपस्थित सभी पक्षी यह दृश्य देखकर आश्चर्यचकित रह गए।

तब एक वृद्ध हंस गंभीर स्वर में बोला, “जिस पक्षी में अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीं है, वह दूसरों पर शासन करने योग्य कैसे हो सकता है? राजा का स्वभाव शांत और सहनशील होना चाहिए। क्रोधी राजा अपनी प्रजा को सुख नहीं दे सकता।”
सभी पक्षियों ने उसकी बात का समर्थन किया। उन्हें समझ आ गया कि कौवे ने सही समय पर उन्हें एक बड़ी भूल करने से बचा लिया है।

कुछ समय बाद जब उल्लू लौटकर आया, तब तक सभा का निर्णय बदल चुका था। पक्षियों ने उसे राजा बनाने का विचार त्याग दिया और हंस को अपना राजा चुन लिया। हंस स्वभाव से शांत, धैर्यवान और बुद्धिमान था। सभी पक्षियों ने प्रसन्नता से उसका राज्याभिषेक किया।

उल्लू यह अपमान सहन नहीं कर सका। उसके मन में कौवों के प्रति गहरा क्रोध भर गया। उसी दिन से उल्लुओं और कौवों के बीच शत्रुता आरंभ हो गई। कहा जाता है कि आज भी कौवा और उल्लू एक-दूसरे को देखकर शत्रु की भांति व्यवहार करते हैं।
इस जातक कथा से हमें शिक्षा मिलती है कि जो व्यक्ति अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीं रख सकता, वह नेतृत्व के योग्य नहीं होता। सच्चा नेता वही है जो धैर्य, सहनशीलता और बुद्धिमानी से कार्य करे।

अगर आपको यह कहानी पसंद आई, तो अन्य ज्ञानवर्धक और नैतिक कहानियाँ भी ज़रूर पढ़ें।

जातक कथाएँ बुद्धिमत्ता, करुणा, सत्य, दया और नैतिक मूल्यों से भरपूर प्रेरणादायक कहानियाँ हैं। इन कथाओं के माध्यम से जीवन जीने की सही राह, अच्छे कर्मों का महत्व और मानवता का अमूल्य संदेश मिलता है।

रचनाकार: जातक कथाएँ
 प्रस्तुति: Saying Central Team

दिलचस्प कहानियों का सफर यहीं खत्म नहीं होता, ये भी ज़रूर पढ़ें:
Share:
WhatsApp
Facebook

Leave a Comment

Feature corner

चाणक्य नीति
Chanakya Neeti Explained

नीति और सफलता के अमूल्य सूत्र।

Book Summaries Explained

लोकप्रिय किताबों के मुख्य विचार।
Read More »

Child Psychology Explained

बच्चों की सोच और मनोविज्ञान।
Read More »

Moral Values Explained

छोटी कहानियाँ और नैतिक शिक्षा।

Inspirational Lives

महान व्यक्तियों के प्रेरणादायक जीवन।

CATEGORIES